श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

साधना–योग

अभ्यास, संयम और मन का निग्रह

10 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

कथा श्रवण का फल

एतां यो नियततया शृणोति भक्त्या ।

यश्चैनां कथयति शुद्धवैष्णवाग्रे ॥

तौ सम्यग्विधिकरणात्फलं लभेते ।

याथार्थ्यान्न हि भुवने किमप्यसाध्यम् ॥

जो पुरुष नियमपूर्वक इस कथाका भक्तिभावसे श्रवण करता है और जो शुद्धान्तःकरण भगवद्भक्तोंके सामने इसे सुनाता है, वे दोनों ही विधिका पूरा-पूरा पालन करनेके कारण इसका यथार्थ फल पाते हैं — उनके लिये त्रिलोकीमें कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता ।

उत्तरखण्ड, अध्याय 6, श्लोक 103 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 153 भक्ति
योगियों की सूक्ष्मता

योगेश्वराणां गतिमाहुरन्तर्बहिस्त्रिलोक्याः पवनान्तरात्मनाम् ।

न कर्मभिस्तां गतिमाप्नुवन्ति ।

विद्यातपोयोगसमाधिभाजाम् ॥

योगियोंका शरीर वायुकी भाँति सूक्ष्म होता है । उपासना, तपस्या, योग और ज्ञानका सेवन करनेवाले योगियोंको त्रिलोकीके बाहर और भीतर सर्वत्र स्वछन्दरूपसे विचरण करनेका अधिकार होता है । केवल कर्मोंके द्वारा इस प्रकार बेरोक-टोक विचरना नहीं हो सकता ।

द्वितीयस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 23 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 329 ज्ञान–विवेक
परमात्मा की प्राप्ति

यथा वातरथो घ्राणमावृङ्क्ते गन्ध आशयात् ।

एवं योगरतं चेत आत्मानमविकारि यत् ॥

जिस प्रकार वायुके द्वारा उड़कर जानेवाला गन्ध अपने आश्रय पुष्पसे घ्राणेन्द्रियतक पहुँच जाता है, उसी प्रकार भक्तियोगमें तत्पर और राग-द्वेषादि विकारोंसे शून्य चित्त परमात्माको प्राप्त कर लेता है ।

तृतीयस्कन्ध, अध्याय 29, श्लोक 20 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 632 ज्ञान–विवेक
भक्तिपूर्वक निरन्तर भजन

विरक्तश्चेन्द्रियरतौ भक्तियोगेन भूयसा ।

तं निरन्तरभावेन भजेताद्धा विमुक्तये ॥

यदि उपासकको इन्द्रियसम्बन्थी भोगोंसे वैराग्य हो गया हो तो वह मोक्षप्राप्तिके लिये अत्यन्त भक्तिपूर्वक अविच्छिन्नभावसे भगवान्का भजन करे ।

नारदजी ने ध्रुव से कहा।

चतुर्थस्कन्ध, अध्याय 8, श्लोक 61 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 739 भक्ति
ब्राह्मणों की श्रेष्ठता

पुमाँल्लभेतानतिवेलमात्मनः ।

प्रसीदतोऽत्यन्तशमं स्वतः स्वयम् ।

यन्नित्यसम्बन्धनिषेवया ततः ।

परं किमत्रास्ति मुखं हविर्भुजाम् ॥

इनकी नित्य सेवा करनेसे शीघ्र ही चित्त शुद्ध हो जानेके कारण मनुष्य स्वयं ही (ज्ञान और अभ्यास आदिके बिना ही) परम शान्तिरूप मोक्ष प्राप्त कर लेता है । अतः लोकमें इन ब्राह्मणोंसे बढ़कर दूसरा कौन है जो हविष्यभोजी देवताओंका मुख हो सके?

चतुर्थस्कन्ध, अध्याय 21, श्लोक 40 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 836 ज्ञान–विवेक
वैराग्य और आत्मिक प्रेम

सा श्रद्धया भगवद्धर्मचर्यया ।

जिज्ञासयाऽऽध्यात्मिकयोगनिष्ठया ।

योगेश्वरोपासनया च नित्यं ।

पुण्यश्रवःकथया पुण्यया च ।

अर्थेन्द्रियारामसगोष्ठ्यतृष्णया ।

तत्सम्मतानामपरिग्रहेण च ।

विविक्तरुच्या परितोष आत्मन् ।

विना हरेर्गुणपीयूषपानात् ।

अहिंसया पारमहंस्यचर्यया ।

स्मृत्या मुकुन्दाचरिताग्र्यसीधुना ।

यमैरकामैर्नियमैश्चाप्यनिन्दया ।

निरीहया द्वन्द्वतितिक्षया च ।

हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूरगुणाभिधानेन विजृम्भमाणया ।

भक्त्या ह्यसङ्गः सदसत्यनात्मनि ।

स्यान्निर्गुणे ब्रह्मणि चाञ्जसा रतिः ॥

शास्त्रोंका यह भी कहना है कि गुरु और शास्त्रके वचनोंमें विश्वास रखनेसे, भागवतधर्मोंका आचरण करनेसे, तत्त्वजिज्ञासासे, ज्ञानयोगकी निष्ठासे, योगेश्वर श्रीहरिकी उपासनासे, नित्यप्रति पुण्यकीर्ति श्रीभगवान्‌की पावन कथाओंको सुननेसे, जो लोग धन और इन्द्रियोंके भोगोंमें ही रत हैं उनकी गोष्ठीमें प्रेम न रखनेसे, उन्हें प्रिय लगनेवाले पदार्थोंका आसक्तिपूर्वक संग्रह न करनेसे, भगवद्गुणामृतका पान करनेके सिवा अन्य समय आत्मामें ही सन्तुष्ट रहते हुए एकान्तसेवनमें प्रेम रखनेसे, किसी भी जीवको कष्ट न देतेसे, अमृतका आस्वादन करनेसे, निष्कामभावसे यम-नियमोंका पालन करनेसे, कभी किसीकी निन्दा न करनेसे, योगक्षेमके लिये प्रयत्न न करनेसे, शीतोष्णादि द्वन्द्वोंको सहन करनेसे, भक्तजनोंके कानोंको सुख देनेवाले श्रीहरिके गुणोंका बार-बार वर्णन करनेसे और बढ़ते हुए भक्तिभावसे मनुष्यका कार्य-कारणरूप सम्पूर्ण जड प्रपंचसे वैराग्य हो जाता है और आत्मस्वरूप निर्गुण परब्रह्ममें अनायास ही उसकी प्रीति हो जाती है ।

चतुर्थस्कन्ध, अध्याय 22, श्लोक 22–25 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 843 वैराग्य
चित्त की एकाग्रता

तान्निर्जितप्राणमनोवचोदशो ।

जितासनान् शान्तसमानविग्रहान् ।

परेऽमले ब्रह्मणि योजितात्मनः ।

सुरासुरेड्यो ददृशे स्म नारदः ॥

उन्होंने प्राण, मन, वाणी और दृष्टिको वशमें किया तथा शरीरको निश्चेष्ट, स्थिर और सीधा रखते हुए आसनको जीतकर चित्तको विशुद्ध परब्रह्ममें लीन कर दिया । ऐसी स्थितिमें उन्हें देवता और असुर दोनोंके ही वन्दनीय श्रीनारदजीने देखा ।

प्रचेताओं ने आत्मविचाररूप ब्रह्मसत्र का सङ्कल्प करके बैठते हुए जब चित्त को परब्रह्म में लीन किया, तब उन्हें नारदजी ने देखा।

चतुर्थस्कन्ध, अध्याय 31, श्लोक 3 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 929
सच्चा प्रायश्चित्त

नैकान्तिकं तद्धि कृतेऽपि निष्कृते ।

मनः पुनर्धावति चेदसत्पथे ।

तत्कर्मनिर्हारमभीप्सतां हरेर्गुणानुवादः खलु सत्त्वभावनः ॥

यदि प्रायश्चित्त करनेके बाद भी मन फिरसे कुमार्गमें-पापकी ओर दौड़े, तो वह चरम सीमाका — पूरा-पूरा प्रायश्चित्त नहीं है । इसलिये जो लोग ऐसा प्रायश्चित्त करना चाहें कि जिससे पापकर्मों और वासनाओंकी जड़ ही उखड़ जाय, उन्हें भगवान्‌के गुणोंका ही गान करना चाहिये; क्योंकि उससे चित्त सर्वथा शुद्ध हो जाता है ।

विष्णुदूतों ने यमदूतों से कहा।

षष्ठस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 12 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1113
उत्तम मृत्यु के प्रकार

द्वौ संमताविह मृत्यू दुरापौ ।

यद् ब्रह्मसंधारणया जितासुः ।

कलेवरं योगरतो विजह्याद् ।

यदग्रणीर्वीरशयेऽनिवृत्तः ॥

संसारमें दो प्रकारकी मृत्यु परम दुर्लभ और श्रेष्ठ मानी गयी है-एक तो योगी पुरुषका अपने प्राणोंको वशमें करके ब्रह्मचिन्तनके द्वारा शरीरका परित्याग और दूसरा युद्धभूमिमें रहे हो)

वृत्रासुर ने दैत्यों से कहा।

षष्ठस्कन्ध, अध्याय 10, श्लोक 33 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1194
शास्त्रों का वास्तविक उद्देश्य

षड्वर्गसंयमैकान्ताः सर्वा नियमचोदनाः ।

तदन्ता यदि नो योगानावहेयुः श्रमावहाः ॥

शास्त्रोंमें जितने भी नियमसम्बन्धी आदेश हैं, उनका एकमात्र तात्पर्य यही है कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर — इन छः शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली जाय अथवा पाँचों इन्द्रिय और मन — ये छः वशमें हो जायँ । ऐसा होनेपर भी यदि उन नियमोंके द्वारा भगवान्‌के ध्यान-चिन्तन आदिकी प्राप्ति नहीं होती, तो उन्हें केवल श्रम-ही-श्रम समझना चाहिये ।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 15, श्लोक 28 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1413 काम–क्रोध–लोभ–मोह