श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

साधना–योग

अभ्यास, संयम और मन का निग्रह

5 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

रामायण अनुष्ठान का फल

नारद उवाच

एवं यः प्रयतः कुर्याद् रामायणविधिं तथा ।

स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥

इस प्रकार जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर रामायणकी विधिका अनुष्ठान करता है, वह भगवान विष्णुके धाममें जाता है; जहाँसे लौटकर वह फिर इस संसारमें नहीं आता ।

उत्तरखण्ड, अध्याय 5, श्लोक 15 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 60 शरणागति
इन्द्रिय विजय और आत्म-संयम

अथवा नोच्छ्वसिष्यामि संवत्सरशतान्यपि ।

अहं हि शोषयिष्यामि आत्मानं विजितेन्द्रियः ॥

अथवा सौ वर्षोंतक मैं श्वास भी न लूँगा । इन्द्रियोंको जीतकर इस शरीरको सुखा डालूँगा ।

मुनिवर विश्वामित्र ने क्रोध से तपस्या का क्षय होने पर यह विचार किया।

बालकाण्ड, अध्याय 64, श्लोक 18 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 204
रघुकुल के गुण

त्वय्येतत् पुरुषव्याघ्र युक्तं राघववंशजे ।

गुरुवृत्तिर्दमश्चैव साधूनां चानुयायिता ॥

पुरुषसिंह! तुम रघुकुलमें उत्पन्न हुए हो । तुममें गुरुजनोंकी सेवा, इन्द्रियसंयम तथा श्रेष्ठ पुरुषोंके अनुसरणका भाव होना उचित ही है ।

भगवान् भरद्वाज ने प्रसन्न होकर भरत से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 90, श्लोक 20 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 489 नीति–व्यवहार
तपस्वियों की रक्षा

न्यस्तदण्डा वयं राजञ्जितक्रोधा जितेन्द्रियाः ।

रक्षणीयास्त्वया शश्वद् गर्भभूतास्तपोधनाः ॥

‘राजन्! हमने जीवमात्रको दण्ड देना छोड़ दिया है, क्रोध और इन्द्रियोंको जीत लिया है । अब तपस्या ही हमारा धन है । जैसे माता गर्भस्थ बालककी रक्षा करती है, उसी प्रकार आपको सदा सब तरहसे हमारी रक्षा करनी चाहिये’

तपस्वी मुनियों ने वन में श्री रामचन्द्रजी का सत्कार करते हुए उनसे अपनी रक्षा की प्रार्थना की।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 1, श्लोक 21 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 566 ज्ञान–विवेक
धर्म का कठिन मार्ग

आत्मानं नियमैस्तैस्तैः कर्षयित्वा प्रयत्नतः ।

प्राप्तये निपुणैर्धर्मो न सुखाल्लभते सुखम् ॥

चतुर मनुष्य भिन्न-भिन्न वानप्रस्थोचित नियमोंके द्वारा अपने शरीरको क्षीण करके यत्नपूर्वक धर्मका सम्पादन करते हैं; क्योंकि सुखदायक साधनसे सुखके हेतुभूत धर्मकी प्राप्ति नहीं होती है ।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 9, श्लोक 31 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 584 धर्म–आचरण