श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २
सत्सङ्ग–सन्त महिमा
सङ्ग का प्रभाव और सन्त-स्वभाव
9 पद्य
महाभारत — खण्ड २
वैशम्पायन उवाच
येषां त्रीण्यवदातानि विद्या योनिश्च कर्म च ।
ते सेव्यास्तैः समास्या हि शास्त्रेभ्योऽपि गरीयसी ॥
निरारम्भा ह्यपि वयं पुण्यशीलेषु साधुषु ।
पुण्यमेवाप्नुयामेह पापं पापोपसेवनात् ॥
जिन पुरुषोंके विद्या, जाति और कर्म — ये तीनों उज्ज्वल हों, उनका सेवन करना चाहिये; क्योंकि उन महापुरुषोंके साथ बैठना शास्त्रोंके स्वाध्यायसे भी बढ़कर है । हमलोग अग्निहोत्र आदि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान नहीं करते, तो भी पुण्यात्मा साधुपुरुषोंके समुदायमें रहनेसे हमें पुण्यकी ही प्राप्ति होगी । इसी प्रकार पापीजनोंके सेवनसे हम पापके ही भागी होंगे ।
मार्कण्डेय → राजन
वेदाढ्या वृत्तसम्पन्ना ज्ञानवन्तस्तपस्विनः ।
यत्र तिष्ठन्ति वै विप्रास्तन्नाम नगरं नृप ॥
राजन्! वेदज्ञ, सदाचारी, ज्ञानी और तपस्वी ब्राह्मण जहाँ निवास करते हों, उसीका नाम नगर है ।
मार्कण्डेयजी ने युधिष्ठिर से कहा।
मार्कण्डेय उवाच
साधुसङ्गमपूतेन वाक्सुभाषितवारिणा ।
पवित्रीकृतमात्मानं सन्तो मन्यन्ति नित्यशः ॥
सत्संगसे पवित्र किये हुए वाणीके सुन्दर सम्भाषणरूप जलसे अभिषिक्त श्रेष्ठ पुरुष अपनेको सदा पवित्र हुआ मानते हैं ।
व्याध उवाच
पापात्मा भवति ह्येवं धर्मलाभं तु मे शृणु ।
यस्त्वेतान् प्रज्ञया दोषान् पूर्वमेवानुपश्यति ॥
कुशलः सुखदुःखेषु साधूंश्चाप्युपसेवते ।
तस्य साधुसमारम्भाद् बुद्धिर्धर्मेषु राजते ॥
इस प्रकार मनुष्य पापात्मा हो जाता है । अब धर्मकी प्राप्ति कैसे होती है, इसको मुझसे सुनो । जो दुःख और सुखके विवेचनमें कुशल है वह अपनी बुद्धि इन विषयसम्बन्धी दोषोंको पहले ही समझ लेता है । अतः उनसे दूर हटकर श्रेष्ठ पुरुषोंका संग करता है और उस श्रेष्ठसंगसे उसकी बुद्धि धर्ममें लग जाती है ।
धर्मव्याध ने ब्राह्मण को धर्म की प्राप्ति के विषय में बताया।
युधिष्ठिर → ब्रह्मन
अत्यद्भुतमिदं ब्रह्मन् धर्माख्यानमनुत्तमम् ।
सर्वधर्मविदां श्रेष्ठ कथितं मुनिसत्तम ॥
युधिष्ठिर बोले — ब्रह्मन्! आपने धर्मके विषयमें यह अत्यन्त अद्भुत और उत्तम उपाख्यान सुनाया है । मुनिवर! आप समस्त धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं ।
युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय मुनि से धर्म के विषय में अद्भुत उपाख्यान सुनने के बाद उनसे कहा।
सावित्री उवाच
सतां सकृत्संगतमीप्सितं परं ।
ततः परं मित्रमिति प्रचक्षते ।
न चाफलं सत्पुरुषेण सङ्गतं ।
ततः सतां सन्निवसेत् समागमे ॥
सत्पुरुषोंका एक बारका समागम भी अत्यन्त अभीष्ट होता है । उनके साथ मित्रता हो जाना उससे भी बढ़कर बताया गया है । साधु पुरुषका संग कभी निष्फल नहीं होता; अतः सदा सत्पुरुषोंके ही समीप रहना चाहिये ।
सावित्री ने यमराज से कहा।
सावित्री उवाच
आत्मन्यपि न विश्वासस्तथा भवति सत्सु यः ।
तस्मात् सत्सु विशेषेण सर्वः प्रणयमिच्छति ॥
मनुष्यको अपने-आपपर भी उतना विश्वास नहीं होता है, जितना संतोंपर होता है । इसलिये सब लोग संतोंसे विशेष प्रेम करना चाहते हैं ।
सावित्री ने यमराज से कहा।
सावित्री उवाच
सतां सदा शाश्वतधर्मवृत्तिः ।
सन्तो न सीदन्ति न च व्यथन्ति ।
सतां सद्भिर्नाफलः सङ्गमोऽस्ति ।
सद्भयो भयं नानुवर्तन्ति सन्तः ॥
सावित्रीने कहा — सत्पुरुषोंकी वृत्ति निरन्तर धर्ममें ही लगी रहती है । श्रेष्ठ पुरुष कभी दुःखी या व्यथित नहीं होते । सत्पुरुषोंका संतोंके साथ जो समागम होता है, वह कभी निष्फल नहीं होता है । श्रेष्ठ पुरुष संतोंसे कभी भय नहीं मानते हैं ।
सावित्री ने यमराज से कहा।
सावित्री उवाच
न च प्रसादः सत्पुरुषेषु मोघो ।
न चाप्यर्थो नश्यति नापि मानः ।
यस्मादेतन्नियतं सत्सु नित्यं ।
तस्मात् सन्तो रक्षितारो भवन्ति ॥
सत्पुरुषोंका प्रसाद कभी व्यर्थ नहीं जाता । वहाँ किसीको स्वार्थकी हानि नहीं उठानी पड़ती है और न मान-सम्मान ही नष्ट होता है । ये तीनों (प्रसाद, अर्थ और मान) संतोंमें नित्य-निरन्तर बने रहते हैं; इसलिये वे सम्पूर्ण जगत्के रक्षक होते हैं ।