श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

शरणागति

समर्पण और प्रभु पर भरोसा

9 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

अनन्य आत्मभाव का महत्त्व

अथेह धन्या भगवन्त इत्थं ।

यद्वासुदेवेऽखिललोकनाथे ।

कुर्वन्ति सर्वात्मकमात्मभावं ।

न यत्र भूयः परिवर्त उग्रः ॥

शौनकादि ऋषियो! आपलोग बड़े ही सौभाग्यशाली तथा धन्य हैं जो इस जीवनमें और विघ्न-बाधाओंसे भरे इस संसारमें समस्त लोकोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्णसे वह सर्वात्मक आत्मभाव, वह अनिर्वचनीय अनन्य प्रेम करते हैं, जिससे फिर इस जन्म-मरणरूप संसारके भयंकर चक्रमें नहीं पड़ना होता ।

सूतजी ने शौनकादि ऋषियों से कहा।

प्रथमस्कन्ध, अध्याय 3, श्लोक 39 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 174 भक्ति
वैष्णव पद की परिभाषा

परं पदं वैष्णवमामनन्ति तद् ।

यन्नेति नेतीत्यतदुत्सिसृक्षवः ।

विसृज्य दौरात्म्यमनन्यसौहृदा ।

हृदोपगुह्यार्हपदं पदे पदे ॥

योगीलोग ‘यह नहीं, यह नहीं’ — इस प्रकार परमात्मासे भिन्न पदार्थोंका त्याग करना चाहते हैं और शरीर तथा उसके सम्बन्धी पदार्थोंमें आत्मबुद्धिका त्याग करके हृदयके द्वारा पद-पदपर भगवान् के जिस परम पूज्य स्वरूपका आलिंगन करते हुए अनन्य प्रेमसे परिपूर्ण रहते हैं, वही भगवान् विष्णुका परम पद है — इस विषयमें समस्त शास्त्रोंकी सम्मति है ।

द्वितीयस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 18 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 327 भक्ति
नृसिंह शरण की प्रेरणा

तस्माद्रजोरागविषादमन्युमानस्पृहाभयदैन्याधिमूलम् ।

हित्वा गृहं संसृतिचक्रवालं ।

नृसिंहपादं भजताकुतोभयमिति ॥

अतः असुरगण! तुम तृष्णा, राग, विषाद, क्रोध, अभिमान, इच्छा, भय, दीनता और मानसिक सन्तापके मूल तथा जन्म-मरणरूप संसारचक्रका वहन करनेवाले गृह आदिको त्यागकर भगवान् नृसिंहके निर्भय चरणकमलोंका आश्रय लो ।

पञ्चमस्कन्ध, अध्याय 18, श्लोक 14 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1041
परमेश्वर की सर्वव्यापकता

तमेव देवं वयमात्मदैवतं ।

परं प्रधानं पुरुषं विश्वमन्यम् ।

व्रजाम सर्वे शरणं शरण्यं ।

स्वानां स नो धास्यति शं महात्मा ॥

वे ही सबके आत्मा और परमाराध्य देव हैं । वे ही प्रकृति और पुरुषरूपसे विश्वके कारण हैं । वे विश्वसे पृथक् भी हैं और विश्वरूप भी हैं । हम सब उन्हीं शरणागतवत्सल भगवान् श्रीहरिकी शरण ग्रहण करते हैं । उदारशिरोमणि प्रभु अवश्य ही अपने निजजन हम देवताओंका कल्याण करेंगे ।

षष्ठस्कन्ध, अध्याय 9, श्लोक 27 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1181
ईश्वर की शरण

प्रह्लाद उवाच

तत्साधु मन्येऽसुरवर्य देहिनां ।

सदा समुद्विग्नधियामसद्ग्रहात् ।

हित्वाऽऽत्मपातं गृहमन्धकूपं ।

वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत ॥

प्रह्लादजीने कहा — पिताजी! संसारके प्राणी ‘मैं’ और ‘मेरे’ के झूठे आग्रहमें पड़कर सदा ही अत्यन्त उद्विग्न रहते हैं । ऐसे प्राणियोंके लिये मैं यही ठीक समझता हूँ कि वे अपने अधःपतनके मूल कारण, घाससे ढके हुए अँधेरे कूएँके समान इस घरको छोड़कर वनमें चले जायँ और भगवान् श्रीहरिकी शरण ग्रहण करें ।

प्रह्लाद ने हिरण्यकशिपु से कहा।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 5 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1309 वैराग्य
हृदयेश्वर का भजन

अधोक्षजालम्भमिहाशुभात्मनः ।

शरीरिणः संसृतिचक्रशातनम् ।

तद् ब्रह्म निर्वाणसुखं विदुर्बुधास्ततो भजध्वं हृदये हृदीश्वरम् ॥

इस अशुभ संसारके दलदलमें फँसकर अशुभमय हो जानेवाले जीवके लिये भगवान्की यह प्राप्ति संसारके चक्करको मिटा देनेवाली है । इसी वस्तुको कोई विद्वान् ब्रह्म और कोई निर्वाण-सुखके रूपमें पहचानते हैं । इसलिये मित्रो! तुमलोग अपने-अपने हृदयमें हृदयेश्वर भगवान्का भजन करो ।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 7, श्लोक 37 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1334 ज्ञान–विवेक
आन्तरिक भक्ति का महत्व

कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरेरुपासने स्वे हृदि छिद्रवत् सतः ।

स्वस्यात्मनः सख्युरशेषदेहिनां ।

सामान्यतः किं विषयोपपादनैः ॥

असुरकुमारो! अपने हृदयमें ही आकाशके समान नित्य विराजमान भगवान्का भजन करनेमें कौन-सा विशेष परिश्रम है । वे समानरूपसे समस्त प्रणियोंके अत्यन्त प्रेमी मित्र हैं; और तो क्या, अपने आत्मा ही हैं । उनको छोड़कर भोगसामग्री इकट्ठी करनेके लिये भटकना-राम! राम! कितनी मूर्खता है ।

प्रह्लाद ने दैत्यबालकों से कहा।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 7, श्लोक 38 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1334 ज्ञान–विवेक
भक्ति की महत्ता

स विधास्यति ते कामान्हरिर्दीनानुकम्पनः ।

अमोघा भगवद्भक्तिर्नेतरेति मतिर्मम ॥

वे बड़े दीनदयालु हैं । अवश्य ही श्रीहरि तुम्हारी कामनाएँ पूर्ण करेंगे । मेरा यह दृढ़ निश्चय है कि भगवान्‌की भक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती । इसके सिवा कोई दूसरा उपाय नहीं है ।

कश्यप ने अपनी पत्नी अदिति से कहा।

संहितायामष्टमस्कन्ध, अध्याय 16, श्लोक 21 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1546 भक्ति
आज्ञा पालन का कल्याण

तथापि वदतो भूमन् करिष्याम्यनुशासनम् ।

एतच्छ्रेयः परं पुंसां यत् तवाज्ञानुपालनम् ॥

तथापि अनन्त! जब आप स्वयं कह रहे हैं, तब मैं आपकी आज्ञाका अवश्य पालन करूँगा । मनुष्यके लिये सबसे बड़ा कल्याणका साधन यही है कि वह आपकी आज्ञाका पालन करे ।

शुक्राचार्य ने भगवान श्रीहरि से यह आज्ञा स्वीकार करते हुए कहा।

संहितायामष्टमस्कन्ध, अध्याय 23, श्लोक 17 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1599