श्रीगणेशाय नमः।
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २
भक्ति
प्रेम, उपासना और भगवान् से सम्बन्ध
6 पद्य
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २
अस्या देव्या मनस्तस्मिंस्तस्य चास्यां प्रतिष्ठितम् ।
तेनेयं स च धर्मात्मा मुहूर्तमपि जीवति ॥
इन देवीका मन श्रीरघुनाथजी में और श्रीरघुनाथजीका मन इनमें लगा हुआ है, इसीलिये ये तथा धर्मात्मा श्रीराम जीवित हैं । इनके मुहूर्तमात्र जीवन में भी यही कारण है ।
सीता जी के दर्शन पाकर हनुमान जी ने भगवान श्रीरघनाथजी के प्रति अपनी भावना व्यक्त की।
अर्चिष्मानर्चितोऽत्यर्थ ब्रह्मचर्यव्रते स्थितः ।
साधूनामुपकारशः प्रचारशश्च कर्मणाम् ॥
सर्वत्र अत्यन्त भक्तिभाव से उनकी पूजा होती है । ये कान्तिमान् एवं परम प्रकाशस्वरूप हैं, ब्रह्मचर्य व्रत के पालनमें लगे रहते हैं, साधु पुरुषोंका उपकार मानते और आचरणोंद्वारा सत्कर्मों के प्रचारका ढंग जानते हैं ।
तपसा सत्यवाक्येन अनम्यत्वाच्च भर्तरि ।
असौ विनिर्दहेदग्निं न तामग्निः प्रधक्ष्यति ॥
वे सोचने लगे ‘तपस्या, सत्य भाषण तथा पतिमें अनन्य भक्तिके कारण आर्या सीता ही अग्निको जला सकती हैं, आग उन्हें नहीं जला सकती’
हनुमान्जी ने मन-ही-मन विचार किया।
अनुरक्ता हि वैदेही रामे सर्वात्मना शुभा ।
अनन्यचित्ता रामेण पौलोमीव पुरन्दरे ॥
कल्याणी सीता श्रीराममें सम्पूर्ण हृदयसे अनुरक्त हैं, जैसे शची देवराज इन्द्र में अनन्य प्रेम रखती हैं, उसी प्रकार सीताका चित्त अनन्यभावसे श्रीरामके ही चिन्तनमें लगा हुआ है ।
हनुमान्जी ने वानरों से कहा।
ये त्वां देवं ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् ।
प्राप्नुवन्ति तथा कामानिह लोके परत्र च ॥
‘आप पुराणपुरुषोत्तम हैं । दिव्यरूपधारी परमात्मा हैं । जो लोग आपमें भक्ति रक्खेंगे, वे इस लोक और परलोक में अपने सभी मनोरथ प्राप्त कर लेंगे’
ब्रह्माजी ने श्रीराम की स्तुति करते हुए कहा।
मनसा कर्मणा वाचा यथा रामं समर्चये ।
तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ॥
यदि मैं मन, वाणी और क्रियाके द्वारा केवल श्रीरामकी ही आराधना करती हूँ तो भगवती पृथ्वीदेवी मुझे अपनी गोद-में स्थान दें ।
सीता ने पृथ्वीदेवी से प्रार्थना करते हुए कहा।