श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २

भक्ति

प्रेम, उपासना और भगवान् से सम्बन्ध

6 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २

परस्पर प्रेम और धर्म

अस्या देव्या मनस्तस्मिंस्तस्य चास्यां प्रतिष्ठितम् ।

तेनेयं स च धर्मात्मा मुहूर्तमपि जीवति ॥

इन देवीका मन श्रीरघुनाथजी में और श्रीरघुनाथजीका मन इनमें लगा हुआ है, इसीलिये ये तथा धर्मात्मा श्रीराम जीवित हैं । इनके मुहूर्तमात्र जीवन में भी यही कारण है ।

सीता जी के दर्शन पाकर हनुमान जी ने भगवान श्रीरघनाथजी के प्रति अपनी भावना व्यक्त की।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 15, श्लोक 52 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 81 धर्म–आचरण
श्रीराम के गुण

अर्चिष्मानर्चितोऽत्यर्थ ब्रह्मचर्यव्रते स्थितः ।

साधूनामुपकारशः प्रचारशश्च कर्मणाम् ॥

सर्वत्र अत्यन्त भक्तिभाव से उनकी पूजा होती है । ये कान्तिमान् एवं परम प्रकाशस्वरूप हैं, ब्रह्मचर्य व्रत के पालनमें लगे रहते हैं, साधु पुरुषोंका उपकार मानते और आचरणोंद्वारा सत्कर्मों के प्रचारका ढंग जानते हैं ।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 35, श्लोक 12 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 127 धर्म–आचरण
सीता की धर्मपरायणता

तपसा सत्यवाक्येन अनम्यत्वाच्च भर्तरि ।

असौ विनिर्दहेदग्निं न तामग्निः प्रधक्ष्यति ॥

वे सोचने लगे ‘तपस्या, सत्य भाषण तथा पतिमें अनन्य भक्तिके कारण आर्या सीता ही अग्निको जला सकती हैं, आग उन्हें नहीं जला सकती’

हनुमान्जी ने मन-ही-मन विचार किया।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 55, श्लोक 28 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 189
सीता का अनन्य प्रेम

अनुरक्ता हि वैदेही रामे सर्वात्मना शुभा ।

अनन्यचित्ता रामेण पौलोमीव पुरन्दरे ॥

कल्याणी सीता श्रीराममें सम्पूर्ण हृदयसे अनुरक्त हैं, जैसे शची देवराज इन्द्र में अनन्य प्रेम रखती हैं, उसी प्रकार सीताका चित्त अनन्यभावसे श्रीरामके ही चिन्तनमें लगा हुआ है ।

हनुमान्जी ने वानरों से कहा।

सुन्दरकाण्ड, अध्याय 59, श्लोक 24 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 211
भक्ति का फल

ये त्वां देवं ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् ।

प्राप्नुवन्ति तथा कामानिह लोके परत्र च ॥

‘आप पुराणपुरुषोत्तम हैं । दिव्यरूपधारी परमात्मा हैं । जो लोग आपमें भक्ति रक्खेंगे, वे इस लोक और परलोक में अपने सभी मनोरथ प्राप्त कर लेंगे’

ब्रह्माजी ने श्रीराम की स्तुति करते हुए कहा।

युद्धकाण्ड, अध्याय 117, श्लोक 31 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 628
श्रीराम की अनन्य भक्ति

मनसा कर्मणा वाचा यथा रामं समर्चये ।

तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ॥

यदि मैं मन, वाणी और क्रियाके द्वारा केवल श्रीरामकी ही आराधना करती हूँ तो भगवती पृथ्वीदेवी मुझे अपनी गोद-में स्थान दें ।

सीता ने पृथ्वीदेवी से प्रार्थना करते हुए कहा।

उत्तरकाण्ड, अध्याय 97, श्लोक 15 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 884