श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४

ज्ञान–विवेक

आत्मबोध और विवेक

17 पद्य

महाभारत — खण्ड ४

विद्वानों की अपार सङ्ख्या

नारद उवाच

तस्याश्वमेधे राजर्षेर्देशाद्देशात् समीयुषाम् ।

शिक्षाक्षरविधिज्ञानां नासीत् संख्या विपश्चिताम् ॥

उन राजर्षिके अश्वमेध-यज्ञमें देश-देशसे आये हुए शिक्षाशास्त्र, अक्षर (विभिन्न देशोंकी लिपि) और यज्ञविधिके ज्ञाता विद्वानोंकी गिनती नहीं थी ।

नारदजी ने राजा सृंजय से राजा पौरव के अद्भुत दान का वर्णन किया।

द्रोणपर्व, अध्याय 57, श्लोक 2 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 411
पुत्र शोक का त्याग

नारद उवाच

स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।

पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः ।

अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ॥

श्वैत्य सृजय! वे धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य — इन चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी जीवित न रह सके, तब औरोंकी तो बात ही क्या है? अतः तुम अपने उस पुत्रके लिये शोक न करो, जिसने न तो यज्ञ किया था और न दक्षिणा ही दी थी । ऐसा नारदजीने कहा ।

नारदजी ने राजा सृंजय से कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 63, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 433 वैराग्य
शोक का त्याग

व्यास → राजन

एवं ज्ञात्वा स्थिरो भूत्वा जह्यरीन् धैर्यमाप्नुहि ।

जीवन्त एव नः शोच्या न तु स्वर्गगतोऽनघ ॥

राजन्! ऐसा जानकर सुस्थिर हो धैर्यका आश्रय लो और उत्साहपूर्वक शत्रुओंका वध करो । अनघ! हमें इस संसारमें जीवित पुरुषोंके लिये ही शोक करना चाहिये । जो स्वर्गमें चला गया है, उसके लिये शोक करना उचित नहीं है ।

व्यासजी ने युधिष्ठिर से कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 71, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 464 कर्म–प्रारब्ध
धर्म की अज्ञानता

अर्जुन उवाच

यूपकेतो निरीक्ष्यैतन्न मामर्हसि गर्हितुम् ।

न हि धर्ममविज्ञाय युक्तं गर्हयितुं परम् ॥

यूपध्वज भूरिश्रवाजी! इस बातपर ध्यान देकर आपको मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिये । धर्मके स्वरूपको जाने बिना दूसरे किसीकी निन्दा करना उचित नहीं है ।

अर्जुन ने भूरिश्रवा से कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 143, श्लोक 41 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1008
अहिंसा का श्रेष्ठ धर्म

भीमसेन उवाच

अहिंसां सर्वभूतेषु धर्मं ज्यायस्तरं विदुः ।

तस्य च ब्राह्मणो मूलं भवांश्च ब्रह्मवित्तमः ॥

प्राणियोंकी हिंसा न करनेको ही सबसे श्रेष्ठ धर्म माना गया है । उसकी जड़ है ब्राह्मण और आप तो उन ब्राह्मणोंमें भी सबसे उत्तम ब्रह्मवेत्ता हैं ।

भीमसेन ने द्रोणाचार्य से युद्ध के अवसर पर कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 192, श्लोक 38 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1452 धर्म–आचरण
स्वयं का कल्याण

संजय उवाच

वासुदेवोऽपि धर्मात्मा करिष्यत्यात्मनः क्षमम् ।

श्रेयो ह्यपदिशत्येष लोकस्य किमुतात्मनः ॥

धर्मात्मा भगवान् श्रीकृष्ण भी अपने लिये जो उचित समझेंगे, करेंगे । ये सारे जगत्को कल्याणका उपदेश देते हैं, फिर अपना भला क्यों नहीं करेंगे?

द्रोणपर्व, अध्याय 199, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1513 कर्म–प्रारब्ध
ब्रह्मज्ञान और भक्ति

अश्वत्थामा उवाच

आत्मानं त्वामात्मनोऽनन्यबोधं ।

विद्वानेवं गच्छति ब्रह्म शुक्रम् ।

अस्तौषं त्वां तव सम्मानमिच्छन् ।

विचिन्वन् वै सदृशं देववर्य ।

सुदुर्लभान् देहि वरान् ममेष्टानभिष्टुतः प्रविकार्षीश्च मायाम् ॥

आप जीवात्मासे अभिन्न अनुभव किये जानेवाले सबके आत्मा हैं, ऐसा जाननेवाला विद्वान् पुरुष विशुद्ध ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। देववर्य! मैंने आपके सत्कारकी शुभ इच्छा लेकर यह स्तवन किया है । स्तुतिके सर्वथा योग्य आप परमेश्वरका मैं चिरकालसे अन्वेषण कर रहा था । जिनकी भलीभाँति स्तुति की गयी है ऐसे आप अपनी मायाको दूर कीजिये और मुझे अभीष्ट दुर्लभ वर प्रदान कीजिये ।

द्रोणकुमार ने नारायण की इस प्रकार स्तुति की।

द्रोणपर्व, अध्याय 201, श्लोक 78 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1557 भक्ति
ज्ञानस्वरूप ईश्वर की महिमा

व्यास उवाच

ज्ञानात्मानं ज्ञानगम्यं ज्ञानश्रेष्ठं सुदुर्विदम् ।

दातारं चैव भक्तानां प्रसादविहितान् वरान् ॥

वे ज्ञानस्वरूप, ज्ञानगम्य तथा ज्ञानमें श्रेष्ठ हैं । उनके स्वरूपको समझ लेना अत्यन्त कठिन है । वे अपने भक्तोंको कृपापूर्वक मनोवांछित उत्तम फल देनेवाले हैं ।

द्रोणपर्व, अध्याय 202, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1565 भक्ति
शास्त्र और कर्तव्य का ज्ञान

श्रीकृष्ण उवाच

न हि कार्यमकार्यं वा सुखं ज्ञातुं कथंचन ।

श्रुतेन ज्ञायते सर्वं तच्च त्वं नावबुध्यसे ॥

कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान किसी तरह भी अनायास ही नहीं हो जाता है । वह सब शास्त्रसे जाना जाता है और शास्त्रका तुम्हें पता ही नहीं है ।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा।

कर्णपर्व, अध्याय 69, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2133
सत्य का कठिन स्वरूप

श्रीकृष्ण उवाच

सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद् विद्यते परम् ।

तत्त्वेनैव सुदुर्ज्ञेयं पश्य सत्यमनुष्ठितम् ॥

सत्य बोलना उत्तम है । सत्यसे बढ़कर दूसरा कुछ नहीं है; परंतु यह समझ लो कि सत्पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए सत्यके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान अत्यन्त कठिन होता है ।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को धर्म के रहस्य बताते हुए यह उपदेश दिया।

कर्णपर्व, अध्याय 69, श्लोक 31 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2135
धर्म की सूक्ष्मता

श्रीकृष्ण उवाच

सूक्ष्मो धर्मो दुर्विदश्चापि पार्थ ।

विशेषतोऽज्ञैः प्रोच्यमानं निबोध ।

हत्वाऽऽत्मानमात्मना प्राप्नुयास्त्वं ।

वधाद् भ्रातुर्नरकं चातिघोरम् ॥

कुन्तीनन्दन! धर्मका स्वरूप सूक्ष्म है । उसको जानना या समझना बहुत कठिन है । विशेषतः अज्ञानी पुरुषोंके लिये तो उसका जानना और भी मुश्किल है । अब मैं जो कुछ कहता हूँ उसे ध्यान देकर सुनो, भाईका वध करनेसे जिस अत्यन्त घोर नरककी प्राप्ति होती है, उससे भी भयानक नरक तुम्हें स्वयं ही अपनी हत्या करनेसे प्राप्त हो सकता है ।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा।

कर्णपर्व, अध्याय 70, श्लोक 28 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2151
अवसर का सदुपयोग

श्रीकृष्ण उवाच

नैवाहितानां सततं विपश्चितः ।

क्षणं प्रतीक्षन्त्यपि दुर्बलीयसाम् ।

विशेषतोऽरीन् व्यसनेषु पण्डितो ।

निहत्य धर्मं च यशश्च विन्दते ॥

विद्वान् पुरुष कभी दुर्बल-से-दुर्बल शत्रुओंको भी नष्ट करनेके लिये किसी अवसरकी प्रतीक्षा नहीं करते । विशेषतः संकटमें पड़े हुए शत्रुओंको मारकर बुद्धिमान् पुरुष धर्म और यशका भागी होता है ।

भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कर्ण को मारने के अवसर पर शीघ्रता करने हेतु कहा।

कर्णपर्व, अध्याय 90, श्लोक 71 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2366
सन्न्यास और योग का उपदेश

मोक्षधर्मं समास्थातुमिच्छेयं भगवन्नहम् ।

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा उपदेशं चकार सः ।

विधिं च योगस्य परं कार्याकार्यस्य शास्त्रतः ।

संन्यासकृतबुद्धिं तं ततो दृष्ट्वा महातपाः ।

सर्वाश्चास्य क्रियाश्चक्रे विधिदृष्टेन कर्मणा ॥

‘भगवन्! मैं मोक्षधर्मका आश्रय लेना चाहता हूँ ।’ उनकी वह बात सुनकर महातपस्वी जैगीषव्यने उनका संन्यास लेनेका विचार जानकर उन्हें ज्ञानका उपदेश किया । साथ ही योगकी उत्तम विधि बताकर शास्त्रके अनुसार कर्तव्य-अकर्तव्यका भी उपदेश दिया । इतना ही नहीं, उन्होंने शास्त्रीय विधिके अनुसार उनके संन्यासग्रहणसम्बन्धी समस्त कार्य (दीक्षा और संस्कार आदि) किये ।

देवल ने महामुनि महात्मा जैगीषव्य के पास जाकर विनीतभाव से मोक्षधर्म का आश्रय लेने की इच्छा प्रकट की।

शल्यपर्व, अध्याय 50, श्लोक 55–56 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2855 साधना–योग
विनय और मेधा

कृप उवाच

तथैव तावन्मेधावी विनयं यो न शिक्षते ।

न च किंचन जानाति सोऽपि धर्मार्थनिश्चयम् ॥

इसी प्रकार मेधावी होनेपर भी जो मनुष्य विनय नहीं सीखता, वह भी धर्म और अर्थके निर्णयको थोड़ा भी नहीं समझ पाता है ।

कृपाचार्य ने अश्वत्थामन् से कहा।

सौप्तिकपर्व, अध्याय 5, श्लोक 2 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 3002
जड़ बुद्धि की सीमा

कृप उवाच

चिरं ह्यपि जडः शूरः पण्डितं पर्युपास्य हि ।

न स धर्मान् विजानाति दर्वी सूपरसानिव ॥

जिसकी बुद्धिपर जडता छा रही हो, वह शूरवीर योद्धा दीर्घकालतक विद्वान्की सेवामें रहनेपर भी धर्मोंका रहस्य नहीं जान पाता । ठीक उसी तरह जैसे करछुल दालमें डूबी रहनेपर भी उसके स्वादको नहीं जानती है ।

कृपाचार्य ने अश्वत्थामन् से कहा।

सौप्तिकपर्व, अध्याय 5, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 3002
विद्वान की सङ्गति

कृप उवाच

मुहूर्तमपि तं प्राज्ञः पण्डितं पर्युपास्य हि ।

क्षिप्रं धर्मान् विजानाति जिह्वा सूपरसानिव ॥

जैसे जिह्वा दालके स्वादको जानती है, उसी प्रकार बुद्धिमान् पुरुष यदि दो घड़ी भी विवेकशीलकी सेवामें रहे तो वह शीघ्र ही धर्मोंका रहस्य जान लेता है ।

सौप्तिकपर्व, अध्याय 5, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 3002
ज्ञान रूपी औषधि

विदुर उवाच

साधुः परमदुःखानां दुःखभैषज्यमाचरेत् ।

ज्ञानौषधमवाप्येह दूरपारं महौषधम् ।

छिन्द्याद् दुःखमहाव्याधिं नरः संयतमानसः ॥

साधु पुरुषको चाहिये कि वह अपने मनको वशमें करके ज्ञानरूपी महान् ओषधि प्राप्त करे, जो परम दुर्लभ है । उससे अपने बड़े-से-बड़े दुःखोंकी चिकित्सा करे । उस ज्ञानरूपी ओषधिसे दुःखरूपी महान् व्याधिका नाश कर डाले ।

स्त्रीपर्व, अध्याय 7, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 3129 साधना–योग