श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

माया–संसार

माया, भ्रम और जगत् का स्वरूप

9 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

परमेश्वर की अपारता

श्रीमहादेव उवाच

वयं न तात प्रभवाम भूम्नि ।

यस्मिन् परेऽन्येऽप्यजजीवकोशाः ।

भवन्ति काले न भवन्ति हीदृशाः ।

सहस्रशो यत्र वयं भ्रमामः ॥

श्रीमहादेवजीने कहा — दुर्वासाजी! जिन अनन्त परमेश्वरमें ब्रह्मा-जैसे जीव और उनके उपाधिभूत कोश, इस ब्रह्माण्डके समान ही अनेकों ब्रह्माण्ड समयपर पैदा होते हैं और समय आनेपर फिर उनका पता भी नहीं चलता, जिनमें हमारे जैसे हजारों चक्कर काटते रहते हैं — उन प्रभुके सम्बन्धमें हम कुछ भी करनेकी सामर्थ्य नहीं रखते ।

भगवान् शङ्कर ने दुर्वासाजी को इस अवसर पर कहा।

नवमस्कन्ध, अध्याय 4, श्लोक 56 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 38
मद और अज्ञान

हन्यन्ते पशवो यत्र निर्दयैरजितात्मभिः ।

मन्यमानैरिमं देहमजरामृत्यु नश्वरम् ॥

ऐश्वर्यमद और श्रीमदसे अंधे होकर अपनी इन्द्रियोंके वशमें रहनेवाले क्रूर पुरुष अपने नाशवान् शरीरको तो अजर-अमर मान बैठते हैं और अपने ही जैसे शरीरवाले पशुओंकी हत्या करते हैं ।

नारदजी ने कुबेर के पुत्रों से कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 10, श्लोक 9 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 304
संसार की नश्वरता

तस्माल्लोकमिमं राजन् स्वप्नमायामनोरथम् ।

वीक्ष्यायम्यात्मनाऽऽत्मानं समः शान्तो भव प्रभो ॥

इसलिये महाराज! यह बात समझ लीजिये कि यह दुनिया चार दिनकी चाँदनी है, सपनेका खिलवाड़ है, जादूका तमाशा है और है मनोराज्यमात्र! आप अपने प्रयत्नसे, अपनी शक्तिसे चित्तको रोकिये; ममतावश पक्षपात न कीजिये । आप समर्थ हैं, समत्वमें स्थित हो जाइये और इस संसारकी ओरसे उपराम-शान्त हो जाइये ।

अक्रूर जी ने राजा धृतराष्ट्र को उपदेश दिया।

दशमस्कन्ध, अध्याय 49, श्लोक 25 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 661 वैराग्य
माया के स्वामी

श्रुतिगण उवाच

जय जय जह्यजामजित दोषगृभीतगुणां ।

त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः ॥

अगजगदोकसामखिलशक्त्यवबोधक ते ।

क्वचिदजयाऽऽत्मना च चरतोऽनुचरेन्निगमः ॥

श्रुतियाँ कहती हैं — अजित! आप ही सर्वश्रेष्ठ हैं, आपपर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता । आपकी जय हो, जय हो । प्रभो! आप स्वभावसे ही समस्त ऐश्वर्यांसे पूर्ण हैं, इसलिये चराचर प्राणियोंको फँसानेवाली मायाका नाश कर दीजिये । प्रभो! इस गुणमयी मायाने दोषके लिये-जीवोंके आनन्दादिमय सहज स्वरूपका आच्छादन करके उन्हें बन्धनमें डालनेके लिये ही सत्त्वादि गुणोंको ग्रहण किया है । जगत्में जितनी भी साधना, ज्ञान, क्रिया आदि शक्तियाँ हैं, उन सबको जगानेवाले आप ही हैं । इसलिये आपके मिटाये बिना यह माया मिट नहीं सकती । (इस विषयमें यदि प्रमाण पूछा जाय, तो आपकी श्वासभूता श्रुतियाँ ही-हम ही प्रमाण हैं ।) यद्यपि हम आपका स्वरूपतः वर्णन करनेमें असमर्थ हैं, परन्तु जब कभी आप मायाके द्वारा जगत्की सृष्टि करके सगुण हो जाते हैं या उसको निषेध करके स्वरूपस्थितिकी लीला करते हैं अथवा अपना सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीविग्रह प्रकट करके क्रीड़ा करते हैं, तभी हम यत्किंचित् आपका वर्णन करनेमें समर्थ होती हैं ।

श्रुतियों ने भगवान् नारायण की स्तुति करते हुए कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 87, श्लोक 14 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 991 ज्ञान–विवेक
जगत की मिथ्याता

न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधनादनुमितमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे ।

अत उपमीयते द्रविणजातिविकल्पपथैर्वितथमनोविलासमृतमित्यवयन्त्यबुधाः ॥

भगवन्! वास्तविक बात तो यह है कि यह जगत् उत्पत्तिके पहले नहीं था और प्रलयके बाद नहीं रहेगा; इससे यह सिद्ध होता है कि यह बीचमें भी एकरस परमात्मामें मिथ्या ही प्रतीत हो रहा है । इसीसे हम श्रुतियाँ इस जगत्का वर्णन ऐसी उपमा देकर करती हैं कि जैसे मिट्टीमें घड़ा, लोहेमें शस्त्र और सोनेमें कुण्डल आदि नाममात्र हैं, वास्तवमें मिट्टी, लोहा और सोना ही हैं । वैसे ही परमात्मामें वर्णित जगत् नाममात्र है, सर्वथा मिथ्या और मनकी कल्पना है । इसे नासमझ मूर्ख ही सत्य मानते हैं ।

दशमस्कन्ध, अध्याय 87, श्लोक 37 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1001 ज्ञान–विवेक
परमात्मा की अद्वैतता

स यदजया त्वजामनुशयीत गुणांश्च जुषन् ।

भजति सरूपतां तदनु मृत्युमपेतभगः ॥

त्वमुत जहासि तामहिरिव त्वचमात्तभगो ।

महसि महीयसेऽष्टगुणितेऽपरिमेयभगः ॥

भगवन्! जब जीव मायासे मोहित होकर अविद्याको अपना लेता है, उस समय उसके स्वरूपभूत आनन्दादि गुण ढक जाते हैं; वह गुणजन्य वृत्तियों, इन्द्रियों और देहोंमें फँस जाता है तथा उन्हींको अपना आपा मानकर उनकी सेवा करने लगता है । अब उनकी जन्म-मृत्युमें अपनी जन्म-मृत्यु मानकर उनके चक्करमें पड़ जाता है । परन्तु प्रभो! जैसे साँप अपने केंचुलसे कोई सम्बन्ध नहीं रखता, उसे छोड़ देता है — वैसे ही आप माया — अविद्यासे कोई सम्बन्ध नहीं रखते, उसे सदा-सर्वदा छोड़े रहते हैं । इसीसे आपके सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सदा-सर्वदा आपके साथ रहते हैं । अणिमा आदि अष्टसिद्धियोंसे युक्त परमैश्वर्यमें आपकी स्थिति है । इसीसे आपका ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य अपरिमित है, अनन्त है; वह देश, काल और वस्तुओंकी सीमासे आबद्ध नहीं है ।

दशमस्कन्ध, अध्याय 87, श्लोक 38 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1002 लीला–रहस्य
आत्मा की अविनाशिता

स्वप्ने यथा शिरश्छेदं पंचत्वाद्यात्मनः स्वयम् ।

यस्मात् पश्यति देहस्य तत आत्मा ह्यजोऽमरः ॥

स्वप्नावस्थामें ऐसा मालूम होता है कि मेरा सिर कट गया है और मैं मर गया हूँ, मुझे लोग श्मशानमें जला रहे हैं; परन्तु ये सब शरीरकी ही अवस्थाएँ दीखती हैं, आत्माकी नहीं । देखनेवाला तो उन अवस्थाओंसे सर्वथा परे, जन्म और मृत्युसे रहित, शुद्ध-बुद्ध परमतत्त्वस्वरूप है ।

श्रीशुकदेव मुनि ने राजा परीक्षित को उपदेश दिया।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 4 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1349 ज्ञान–विवेक
भगवान की शरण

मार्कण्डेय उवाच

प्रपन्नोऽस्म्यङ्घ्रिमूलं ते प्रपन्नाभयदं हरे ।

यन्माययापि विबुधा मुह्यन्ति ज्ञानकाशया ॥

मार्कण्डेयजीने मन-ही-मन कहा — प्रभो! आपकी माया वास्तवमें प्रतीतिमात्र होनेपर भी सत्य ज्ञानके समान प्रकाशित होती है और बड़े-बड़े विद्वान् भी उसके खेलोंमें मोहित हो जाते हैं । आपके श्रीचरणकमल ही शरणागतोंको सब प्रकारसे अभयदान करते हैं । इसलिये मैंने उन्हींकी शरण ग्रहण की है ।

मार्कण्डेय मुनि ने मायापति भगवान की शरण में स्थित होने का निश्चय करके मन-ही-मन कहा।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 10, श्लोक 2 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1389 शरणागति
भगवान् की चतुर्विध अवस्था

स विश्वस्तैजसः प्राज्ञस्तुरीय इति वृत्तिभिः ।

अर्थेन्द्रियाशयज्ञानैर्भगवान् परिभाव्यते ॥

वे ही जाग्रत्-अवस्थाके अभिमानी ‘विश्व’ बनकर शब्द, स्पर्श आदि बाह्य विषयोंको ग्रहण करते और वे ही स्वप्नावस्थाके अभिमानी ‘तैजस’ बनकर बाह्य विषयोंके बिना ही मन-ही-मन अनेक विषयोंको देखते और ग्रहण करते हैं । वे ही सुषुप्ति अवस्थाके अभिमानी ‘प्राज्ञ’ बनकर विषय और मनके संस्कारोंसे युक्त अज्ञानसे ढक जाते हैं और वही सबके साक्षी ‘तुरीय’ रहकर समस्त ज्ञानोंके अधिष्ठान रहते हैं ।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 11, श्लोक 22 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1400 ज्ञान–विवेक