श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५

सत्सङ्ग–सन्त महिमा

सङ्ग का प्रभाव और सन्त-स्वभाव

9 पद्य

महाभारत — खण्ड ५

धर्माचरण और सत्सङ्ग

कामन्दक उवाच

जपेदुदकशीलः स्यात् सततं सुखमास्थितः ।

धर्मान्वितान् सम्प्रविशेद् बहिः कृत्वेह दुष्कृतीन् ॥

वह जलमें खड़ा होकर गायत्रीका जप करे । सदा प्रसन्न रहे । पापियोंको राज्यसे बाहर निकालकर धर्मात्मा पुरुषोंका संग करे ।

कामन्दक ने आंगरिष्ठ से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 123, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 816
श्रेष्ठों का सङ्ग

भीष्म उवाच

कामक्रोधव्यपेता ये निर्ममा निरहंकृताः ।

सुव्रताः स्थिरमर्यादास्तानुपास्व च पृच्छ च ॥

जो काम और क्रोधसे रहित, ममता और अहंकारसे शून्य, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा धर्ममर्यादाको स्थिर रखनेवाले हैं, उन्हीं महापुरुषोंका संग करो और उनसे अपना संदेह पूछो ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 158, श्लोक 29 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1037
मात्सर्य दोष का निवारण

भीष्म → तात

सत्यत्यागात् तु मात्सर्यमहितानां च सेवया ।

एतत् तु क्षीयते तात साधूनामुपसेवनात् ॥

सत्यका त्याग और दुष्टोंका साथ करनेसे मात्सर्य-दोषकी उत्पत्ति होती है । तात! श्रेष्ठ पुरुषोंकी सेवा और संगति करनेसे उसका नाश हो जाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 163, श्लोक 15 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1057 नीति–व्यवहार
सङ्गति और संस्कार का प्रभाव

सत्यवान् उवाच

असाधुश्चैव पुरुषो लभते शीलमेकदा ।

साधोश्चापि ह्यसाधुभ्यः शोभना जायते प्रजा ॥

दुष्ट पुरुष भी कभी साधुसंगसे सुधरकर सुशील बन जाता है तथा बहुत-से दुष्ट पुरुषोंकी संतानें भी अच्छी निकल जाती हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 267, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1723
सत्सङ्ग और सत्कर्म का प्रभाव

भीष्म उवाच

य एतान् प्रज्ञया दोषान् पूर्वमेवानुपश्यति ।

कुशलः सुखदुःखानां साधूंश्चाप्यथ सेवते ।

तस्य साधुसमाचारादभ्यासाच्चैव वर्धते ॥

जो पुरुष अपनी बुद्धिसे राग आदि दोषोंको पहले ही देख लेता है, वह सुख-दुःखको समझनेमें कुशल होता है । फिर वह श्रेष्ठ पुरुषोंका सेवन करता है । सत्पुरुषोंकी सेवा या सत्संगसे और सत्कर्मोंके अभ्याससे उस पुरुषकी बुद्धि बढ़ती है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 273, श्लोक 13–14 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1771 ज्ञान–विवेक
सत्सङ्ग और आत्म-नियन्त्रण

हंस उवाच

सदाहमार्यान्निभृतोऽप्युपासे ।

न मे विधित्सोत्सहते न रोषः ।

न वाप्यहं लिप्समानः परैमि ।

न चैव किंचिद् विषयेण यामि ॥

यद्यपि मैं सब प्रकारसे परिपूर्ण हूँ (मुझे कुछ जानना या पाना शेष नहीं है) तो भी मैं श्रेष्ठ पुरुषोंकी उपासना (सत्संग) करता रहता हूँ। मुझपर न तृष्णाका वश चलता है न रोषका । मैं कुछ पानेके लोभसे धर्मका उल्लंघन नहीं करता और न विषयोंकी प्राप्तिके लिये ही कहीं आता-जाता हूँ ।

शान्तिपर्व, अध्याय 299, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1969 वैराग्य
सङ्ग का प्रभाव

हंस उवाच

यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं ।

तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव ।

वासो यथा रंगवशं प्रयाति ।

तथा स तेषां वशमभ्युपैति ॥

जैसे वस्त्र जिस रंगमें रँगा जाय, वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार यदि कोई सज्जन, असज्जन, तपस्वी अथवा चोरका सेवन करता है तो वह उन्हीं-जैसा हो जाता है अर्थात् उसपर उन्हींका रंग चढ़ जाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 299, श्लोक 33 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1971
सत्पुरुषों का सङ्ग

हंस उवाच

सदा देवाः साधुभिः संवदन्ते ।

न मानुषं विषयं यान्ति द्रष्टुम् ।

नेन्दुः समः स्यादसमो हि वायुरुच्चावचं विषयं यः स वेद ॥

देवतालोग सदा सत्पुरुषोंका संग — उन्हींके साथ वार्तालाप करते हैं; इसीलिये वे मनुष्योंके क्षणभंगुर भोगोंकी ओर देखने भी नहीं जाते । जो विभिन्न विषयोंके नश्वर स्वभावको ठीक-ठीक जानता है, उसकी समानता न चन्द्रमा कर सकते हैं न वायु ।

शान्तिपर्व, अध्याय 299, श्लोक 34 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1972 वैराग्य
धर्मनिष्ठों की सङ्गति

व्यास उवाच

ये तु तुष्टाः श्रुतिपरा महात्मानो महाबलाः ।

धर्म्यं पन्थानमारूढास्तानुपास्स्व च पृच्छ च ॥

इसलिये जो महान् धर्मबलसे सम्पन्न महात्मा पुरुष संतुष्ट और श्रुतिपरायण होकर सर्वदा धर्मपथपर ही आरूढ़ रहते हैं, तुम उन्हींकी सेवामें रहो और उन्हींसे अपना कर्तव्य पूछो ।

शान्तिपर्व, अध्याय 321, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2137