श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २
सेवा–करुणा–विनय
सेवा, दया और नम्रता
9 पद्य
महाभारत — खण्ड २
युधिष्ठिर उवाच
चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद् वाचं दद्याच्च सूनृताम् ।
अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञः पञ्चदक्षिणः ॥
अतिथिको नेत्र दे (उसे प्रेमभरी दृष्टिसे देखे), मन दे (मनसे हित-चिन्तन करे) तथा मधुर वाणी प्रदान करे (सत्य, प्रिय, हितकी बात कहे) । जब वह जाने लगे तब कुछ दूरतक उसके पीछे-पीछे जाय और जबतक वह घरपर रहे तबतक उसके पास बैठे (उसकी सेवामें लगा रहे) । यह पाँच प्रकारकी दक्षिणाओंसे युक्त अतिथि-यज्ञ है ।
युधिष्ठिर ने शौनकजी से कहा।
सुरभि उवाच
यदि पुत्रसहस्राणि सर्वत्र समतैव मे ।
दीनस्य तु सतः शक्र पुत्रस्याभ्यधिका कृपा ॥
सुरभि बोली — देवेन्द्र! यदि मेरे सहस्रों पुत्र हैं, तो मैं उन सबके प्रति समानभाव ही रखती हूँ; परंतु दीन-दुःखी पुत्रके प्रति अधिक दया उमड़ आती है ।
सुरभि ने इन्द्र से कहा।
दमयन्ती उवाच
तत् कुरुष्व नरव्याघ्र दयां मयि नरर्षभ ।
आनृशंस्यं परो धर्मस्त्वत्त एव हि मे श्रुतः ॥
‘नरव्याघ्र! नरोत्तम! मुझपर दया करो। मैंने तुम्हारे ही मुखसे सुन रखा है कि दयालुता सबसे बड़ा धर्म है’
दमयन्ती ने नल के लिए यह सन्देश ब्राह्मणों के हाथ भेजा।
उशीनर उवाच
प्रस्पन्दमानः सम्भ्रान्तः कपोतः श्येन लक्ष्यते ।
मत्सकाशं जीवितार्थी तस्य त्यागो विगर्हितः ॥
यो हि कश्चिद् द्विजान् हन्याद् गां वा लोकस्य मातरम् ।
शरणागतं च त्यजते तुल्यं तेषां हि पातकम् ॥
बाज! देखो तो यह बेचारा कबूतर किस प्रकार भयसे व्याकुल हो थर-थर काँप रहा है । इसने अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये ही मेरी शरण ली है । ऐसी दशामें इसे त्याग देना बड़ी ही निन्दाकी बात है । जो मनुष्य ब्राह्मणोंकी हत्या करता है, जो जगन्माता गौका वध करता है तथा जो शरणमें आये हुए को त्याग देता है, इन तीनोंको समान पाप लगता है ।
राजा उशीनर ने बाज से कहा।
वामदेव → राजन
नानुयोगा ब्राह्मणानां भवन्ति ।
वाचा राजन् मनसा कर्मणा वा ।
यस्त्वेवं ब्रह्म तपसान्वेति विद्वांस्तेन श्रेष्ठो भवति हि जीवमानः ॥
वामदेवने कहा — राजन्! मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा कोई भी अनुशासन या दण्ड ब्राह्मणोंपर लागू नहीं हो सकता । जो इस प्रकार जानकर कष्टसहनपूर्वक ब्राह्मणकी सेवा करता है; वह उस ब्राह्मणसेवारूप कर्मसे ही श्रेष्ठ होता और जीवित रहता है ।
वामदेव ने राजा से कहा।
द्रौपदी उवाच
अहंकारं विहायाहं कामक्रोधौ च सर्वदा ।
सदारान् पाण्डवान् नित्यं प्रयतोपचराम्यहम् ॥
मैं अहंकार और काम-क्रोधको छोड़कर सदा पूरी सावधानीके साथ सब पाण्डवोंकी और उनकी अन्यान्य स्त्रियोंकी भी सेवा करती हूँ ।
द्रौपदी ने सत्यभामा से कहा।
द्रौपदी उवाच
भिक्षाबलिश्राद्धमिति स्थालीपाकाश्च पर्वसु ।
मान्यानां मानसत्कारा ये चान्ये विदिता मम ॥
तान् सर्वाननुवर्तेऽहं दिवारात्रमतन्द्रिता ।
विनयान् नियमांश्चैव सदा सर्वात्मना श्रिता ॥
मैं दिन-रात आलस्य त्यागकर भिक्षा-दान, बलिवैश्वदेव, श्राद्ध, पर्वकालोचित स्थालीपाकयज्ञ, मान्य पुरुषोंका आदर-सत्कार, विनय, नियम तथा अन्य जो-जो धर्म मुझे ज्ञात हैं, उन सबका सब प्रकारसे उद्यत होकर पालन करती हूँ ।
द्रौपदी ने सत्यभामा से कहा।
सुमहत्यपराधेऽपि क्षान्तिः कार्या द्विजातिभिः ।
यथाशक्ति यथोत्साहं पूजा ग्राह्या द्विजोत्तम ॥
‘विप्रवर! सेवकका महान् अपराध होनेपर भी ब्राह्मणोंको क्षमा करनी चाहिये तथा शक्ति और उत्साहके अनुसार उनके द्वारा की हुई सेवा-पूजा स्वीकार कर लेनी चाहिये’
राजा ने ब्राह्मण से कहा कि यदि उसकी पुत्री कोई अपराध कर दे, तो वह उस पर क्रोध न करें।
यक्ष उवाच
अहिंसा समता शान्तिरानृशंस्यममत्सरः ।
द्वाराण्येतानि मे विद्धि प्रियो ह्यसि सदा मम ॥
अहिंसा, समता, शान्ति, दया और अमत्सर-डाहका न होना — इन्हें मेरे पास पहुँचनेके द्वार समझो । तुम मुझे सदा प्रिय हो ।
धर्मराज ने युधिष्ठिर से कहा।