श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

वैराग्य

अनासक्ति और संसार की नश्वरता

14 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

भक्ति की व्यापकता

ज्ञानवैराग्यसंयुक्ता भक्तिः प्रेमरसावहा ।

प्रतिगेहं प्रतिजनं ततः क्रीडां करिष्यति ॥

तब प्रेमरस प्रवाहित करनेवाली भक्ति ज्ञान और वैराग्यको साथ लेकर प्रत्येक घर और व्यक्तिके हृदयमें क्रीड़ा करेगी ।

उत्तरखण्ड, अध्याय 2, श्लोक 63 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 100 ज्ञान–विवेक
परम स्वरूप में रमण

यर्हि वाव महिम्नि स्वे परस्मिन् कालमाययोः ।

रमेत गतसम्मोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम् ॥

किन्तु जब यह गुणोंको क्षुब्ध करनेवाले काल और मोह उत्पन्न करनेवाली माया — इन दोनोंसे परे अपने अनन्त स्वरूपमें मोहरहित होकर रमण करने लगता है-आत्माराम हो जाता है; तब यह ‘मैं, मेरा’ का भाव छोड़कर पूर्ण उदासीन-गुणातीत हो जाता है ।

श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित् से कहा।

द्वितीयस्कन्ध, अध्याय 9, श्लोक 3 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 380 माया–संसार
सत्सङ्ग का प्रभाव

संगो यः संसृतेर्हेतुरसत्सु विहितोऽधिया ।

स एव साधुषु कृतो निःसंगत्वाय कल्पते ॥

अज्ञानवश असत्पुरुषोंके साथ किया हुआ जो संग संसार-बन्धनका कारण होता है, वही सत्पुरुषोंके साथ किये जानेपर असंगता प्रदान करता है ।

देवहूति ने अपने पति कर्दम मुनि से सन्न्यासाश्रम के समय यह बात कही।

तृतीयस्कन्ध, अध्याय 23, श्लोक 55 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 585 ज्ञान–विवेक
सिद्धपुरुष की देह-अहन्ता

देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् ।

स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासुः ।

तं सप्रपंचमधिरूढसमाधियोगः ।

स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तुः ॥

उसका शरीर तो पूर्वजन्मके संस्कारोंके अधीन है; अतः जबतक उसका आरम्भक प्रारब्ध शेष है तबतक वह इन्द्रियोंके सहित जीवित रहता है; किन्तु जिसे समाधिपर्यन्त योगकी स्थिति प्राप्त हो गयी है और जिसने परमात्मतत्त्वको भी भलीभाँति जान लिया है, वह सिद्धपुरुष पुत्र-कलत्रादिके सहित इस शरीरको स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले शरीरोंके समान फिर स्वीकार नहीं करता-फिर उसमें अहंता-ममता नहीं करता ।

कपिल ने माता देवहूति से कहा।

तृतीयस्कन्ध, अध्याय 28, श्लोक 38 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 627 ज्ञान–विवेक
कथामृत का प्रभाव

विद्याधरगण उवाच

त्वन्माययार्थमभिपद्य कलेवरेऽस्मिन् ।

कृत्वा ममाहमिति दुर्मतिरुत्पथैः स्वैः ॥

क्षिप्तोऽप्यसद्विषयलालस आत्ममोहं ।

युष्मत्कथामृतनिषेवक उद्व्युदस्येत् ॥

विद्याधरोंने कहा — प्रभो! परम पुरुषार्थकी प्राप्तिके साधनरूप इस मानवदेहको पाकर भी जीव आपकी मायासे मोहित होकर इसमें मैं-मेरेपनका अभिमान कर लेता है । फिर वह दुर्बुद्धि अपने आत्मीयोंसे तिरस्कृत होनेपर भी असत् विषयोंकी ही लालसा करता रहता है । किन्तु ऐसी अवस्थामें भी जो आपके कथामृतका सेवन करता है, वह इस अन्तःकरणके मोहको सर्वथा त्याग देता है ।

विद्याधरों ने भगवान् से कहा।

चतुर्थस्कन्ध, अध्याय 7, श्लोक 44 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 724 माया–संसार
भगवान की शरण

यत्पादसेवाभिरुचिस्तपस्विनामशेषजन्मोपचितं मलं धियः ।

सद्यः क्षिणोत्यन्वहमेधती सती ।

यथा पदांगुष्ठविनिःसृता सरित् ।

विनिर्धुताशेषमनोमलः पुमानसंगविज्ञानविशेषवीर्यवान् ।

यदङ्घ्रिमूले कृतकेतनः पुनर्न संसृतिं क्लेशवहां प्रपद्यते ।

तमेव यूयं भजतात्मवृत्तिभिमनोवचः कायगुणैः स्वकर्मभिः ।

अमायिनः कामदुघाङ्घ्रिपङ्कजं ।

यथाधिकारावसितार्थसिद्धयः ॥

जिनके चरणकमलोंकी सेवाके लिये निरन्तर बढ़नेवाली अभिलाषा उन्हींके चरणनखसे निकली हुई गंगाजीके समान, संसारतापसे संतप्त जीवोंके समस्त जन्मोंके संचित मनोमलको तत्काल नष्ट कर देती है, जिनके चरणतलका आश्रय लेनेवाला पुरुष सब प्रकारके मानसिक दोषोंको धो डालता तथा वैराग्य और तत्त्वसाक्षात्काररूप बल पाकर फिर इस दुःखमय संसारचक्रमें नहीं पड़ता और जिनके चरणकमल सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं — उन प्रभुको आपलोग अपनी-अपनी आजीविकाके उपयोगी वर्णाश्रमोचित अध्यापनादि कर्मों तथा ध्यान-स्तुति-पूजादि मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक क्रियाओंके द्वारा भजें । हृदयमें किसी प्रकारका कपट न रखें तथा यह निश्चय रखें कि हमें अपने-अपने अधिकारानुसार इसका फल अवश्य प्राप्त होगा ।

चतुर्थस्कन्ध, अध्याय 21, श्लोक 31–33 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 835 भक्ति
वैराग्य और आत्मिक प्रेम

सा श्रद्धया भगवद्धर्मचर्यया ।

जिज्ञासयाऽऽध्यात्मिकयोगनिष्ठया ।

योगेश्वरोपासनया च नित्यं ।

पुण्यश्रवःकथया पुण्यया च ।

अर्थेन्द्रियारामसगोष्ठ्यतृष्णया ।

तत्सम्मतानामपरिग्रहेण च ।

विविक्तरुच्या परितोष आत्मन् ।

विना हरेर्गुणपीयूषपानात् ।

अहिंसया पारमहंस्यचर्यया ।

स्मृत्या मुकुन्दाचरिताग्र्यसीधुना ।

यमैरकामैर्नियमैश्चाप्यनिन्दया ।

निरीहया द्वन्द्वतितिक्षया च ।

हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूरगुणाभिधानेन विजृम्भमाणया ।

भक्त्या ह्यसङ्गः सदसत्यनात्मनि ।

स्यान्निर्गुणे ब्रह्मणि चाञ्जसा रतिः ॥

शास्त्रोंका यह भी कहना है कि गुरु और शास्त्रके वचनोंमें विश्वास रखनेसे, भागवतधर्मोंका आचरण करनेसे, तत्त्वजिज्ञासासे, ज्ञानयोगकी निष्ठासे, योगेश्वर श्रीहरिकी उपासनासे, नित्यप्रति पुण्यकीर्ति श्रीभगवान्‌की पावन कथाओंको सुननेसे, जो लोग धन और इन्द्रियोंके भोगोंमें ही रत हैं उनकी गोष्ठीमें प्रेम न रखनेसे, उन्हें प्रिय लगनेवाले पदार्थोंका आसक्तिपूर्वक संग्रह न करनेसे, भगवद्गुणामृतका पान करनेके सिवा अन्य समय आत्मामें ही सन्तुष्ट रहते हुए एकान्तसेवनमें प्रेम रखनेसे, किसी भी जीवको कष्ट न देतेसे, अमृतका आस्वादन करनेसे, निष्कामभावसे यम-नियमोंका पालन करनेसे, कभी किसीकी निन्दा न करनेसे, योगक्षेमके लिये प्रयत्न न करनेसे, शीतोष्णादि द्वन्द्वोंको सहन करनेसे, भक्तजनोंके कानोंको सुख देनेवाले श्रीहरिके गुणोंका बार-बार वर्णन करनेसे और बढ़ते हुए भक्तिभावसे मनुष्यका कार्य-कारणरूप सम्पूर्ण जड प्रपंचसे वैराग्य हो जाता है और आत्मस्वरूप निर्गुण परब्रह्ममें अनायास ही उसकी प्रीति हो जाती है ।

चतुर्थस्कन्ध, अध्याय 22, श्लोक 22–25 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 843 साधना–योग
ऋषभदेव की महिमा

नित्यानुभूतनिजलाभनिवृत्ततृष्णः ।

श्रेयस्यतद्रचनया चिरसुप्तबुद्धेः ।

लोकस्य यः करुणयाभयमात्मलोकमाख्यान्नमो भगवते ऋषभाय तस्मै ॥

निरन्तर विषय-भोगोंकी अभिलाषा करनेके कारण अपने वास्तविक श्रेयसे चिरकालतक बेसुध हुए लोगोंको जिन्होंने करुणावश निर्भय आत्मलोकका उपदेश दिया और जो स्वयं निरन्तर अनुभव होनेवाले आत्मस्वरूपकी प्राप्तिसे सब प्रकारकी तृष्णाओंसे मुक्त थे, उन भगवान् ऋषभदेवको नमस्कार है ।

पञ्चमस्कन्ध, अध्याय 7, श्लोक 19 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 974
जन्म की सार्थकता

प्राप्ता नृजातिं त्विह ये च जन्तवो ।

ज्ञानक्रियाद्रव्यकलापसम्भृताम् ।

न वै यतेरन्नपुनर्भवाय ते ।

भूयो वनौका इव यान्ति बन्धनम् ॥

जिन जीवोंने इस भारतवर्षमें ज्ञान (विवेकबुद्धि), तदनुकूल कर्म तथा उस कर्मके उपयोगी द्रव्यादि सामग्रीसे सम्पन्न मनुष्यजन्म पाया है, वे यदि आवागमनके चक्रसे निकलनेका प्रयत्न नहीं करते, तो व्याधकी फाँसीसे छूटकर भी फलादिके लोभसे उसी वृक्षपर विहार करनेवाले वनवासी पक्षियोंके समान फिर बन्धनमें पड़ जाते हैं ।

पञ्चमस्कन्ध, अध्याय 19, श्लोक 25 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1053
अनुभवजन्य वैराग्य

नानुभूय न जानाति पुमान् विषयतीक्ष्णताम् ।

निर्विद्येत स्वयं तस्मान्न तथा भिन्नधीः परैः ॥

नारद! मनुष्य विषयोंका अनुभव किये बिना उनकी कटुता नहीं जान सकता । इसलिये उनकी दुःखरूपताका अनुभव होनेपर स्वयं जैसा वैराग्य होता है, वैसा दूसरोंके बहकानेसे नहीं होता ।

षष्ठस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 41 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1151
देह की कष्टकारी प्रकृति

अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ।

देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहृतः ॥

जीवात्माका यह देह — जो पंचभूत, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियोंका संघात है — जीवको विविध प्रकारके क्लेश और सन्ताप देनेवाली कही जाती है ।

षष्ठस्कन्ध, अध्याय 15, श्लोक 25 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1228
ईश्वर की शरण

प्रह्लाद उवाच

तत्साधु मन्येऽसुरवर्य देहिनां ।

सदा समुद्विग्नधियामसद्ग्रहात् ।

हित्वाऽऽत्मपातं गृहमन्धकूपं ।

वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत ॥

प्रह्लादजीने कहा — पिताजी! संसारके प्राणी ‘मैं’ और ‘मेरे’ के झूठे आग्रहमें पड़कर सदा ही अत्यन्त उद्विग्न रहते हैं । ऐसे प्राणियोंके लिये मैं यही ठीक समझता हूँ कि वे अपने अधःपतनके मूल कारण, घाससे ढके हुए अँधेरे कूएँके समान इस घरको छोड़कर वनमें चले जायँ और भगवान् श्रीहरिकी शरण ग्रहण करें ।

प्रह्लाद ने हिरण्यकशिपु से कहा।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 5 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1309 शरणागति
मोह और आसक्ति का प्रभाव

दुरापूरेण कामेन मोहेन च बलीयसा ।

शेषं गृहेषु सक्तस्य प्रमत्तस्यापयाति हि ॥

रह गयी बीचकी कुछ थोड़ी-सी आयु । उसमें कभी न पूरी होनेवाली बड़ी-बड़ी कामनाएँ हैं, बलात् पकड़ रखनेवाला मोह है और घर-द्वारकी वह आसक्ति है, जिससे जीव इतना उलझ जाता है कि उसे कुछ कर्तव्य-अकर्तव्यका ज्ञान ही नहीं रहता । इस प्रकार बची-खुची आयु भी हाथसे निकल जाती है ।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 17, श्लोक 8 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1321 काल–मृत्यु
आश्रमों के कलङ्क

गृहस्थस्य क्रियात्यागो व्रतत्यागो वटोरपि ।

तपस्विनो ग्रामसेवा भिक्षोरिन्द्रियलोलता ॥

आश्रमापसदा ह्येते खल्वाश्रमविडम्बकाः ।

देवमायाविमूढांस्तानुपेक्षेतानुकम्पया ॥

कर्मत्यागी गृहस्थ, व्रतत्यागी ब्रह्मचारी, गाँवमें रहनेवाला तपस्वी (वानप्रस्थ) और इन्द्रियलोलुप संन्यासी — ये चारों आश्रमके कलंक हैं और व्यर्थ ही आश्रमोंका ढोंग करते हैं । भगवान्‌की मायासे विमोहित उन मूढ़ोंपर तरस खाकर उनकी उपेक्षा कर देनी चाहिये ।

सप्तमस्कन्ध, अध्याय 15, श्लोक 38–39 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1416 नीति–व्यवहार