श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

ज्ञान–विवेक

आत्मबोध और विवेक

21 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — २

रामचरित का प्रभाव

पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् ।

आनृशंस्यपरो राजन् कर्मबन्धैर्विमुच्यते ॥

जो पुरुष अपने कानोंसे भगवान् श्रीरामका चरित्र सुनता है — उसे सरलता, कोमलता आदि गुणोंकी प्राप्ति होती है । परीक्षित्! केवल इतना ही नहीं, वह समस्त कर्म-बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ।

शुकदेवजी ने राजा परीक्षित को भगवान् श्रीराम के चरित्र श्रवण के लाभ बताते हुए कहा।

नवमस्कन्ध, अध्याय 11, श्लोक 23 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 108 भक्ति
शुद्ध मन और परम गति

यस्मिञ्जनः प्राणवियोगकाले ।

क्षणं समावेश्य मनो विशुद्धम् ।

निर्हृत्य कर्माशयमाशु याति ।

परां गतिं ब्रह्ममयोऽर्कवर्णः ॥

जो जीव मृत्युके समय अपने शुद्ध मनको एक क्षणके लिये भी उनमें लगा देता है, वह समस्त कर्म-वासनाओंको धो बहाता है और शीघ्र ही सूर्यके समान तेजस्वी तथा ब्रह्ममय होकर परमगतिको प्राप्त होता है ।

दशमस्कन्ध, अध्याय 46, श्लोक 32 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 628 कर्म–प्रारब्ध
माया के स्वामी

श्रुतिगण उवाच

जय जय जह्यजामजित दोषगृभीतगुणां ।

त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभगः ॥

अगजगदोकसामखिलशक्त्यवबोधक ते ।

क्वचिदजयाऽऽत्मना च चरतोऽनुचरेन्निगमः ॥

श्रुतियाँ कहती हैं — अजित! आप ही सर्वश्रेष्ठ हैं, आपपर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता । आपकी जय हो, जय हो । प्रभो! आप स्वभावसे ही समस्त ऐश्वर्यांसे पूर्ण हैं, इसलिये चराचर प्राणियोंको फँसानेवाली मायाका नाश कर दीजिये । प्रभो! इस गुणमयी मायाने दोषके लिये-जीवोंके आनन्दादिमय सहज स्वरूपका आच्छादन करके उन्हें बन्धनमें डालनेके लिये ही सत्त्वादि गुणोंको ग्रहण किया है । जगत्में जितनी भी साधना, ज्ञान, क्रिया आदि शक्तियाँ हैं, उन सबको जगानेवाले आप ही हैं । इसलिये आपके मिटाये बिना यह माया मिट नहीं सकती । (इस विषयमें यदि प्रमाण पूछा जाय, तो आपकी श्वासभूता श्रुतियाँ ही-हम ही प्रमाण हैं ।) यद्यपि हम आपका स्वरूपतः वर्णन करनेमें असमर्थ हैं, परन्तु जब कभी आप मायाके द्वारा जगत्की सृष्टि करके सगुण हो जाते हैं या उसको निषेध करके स्वरूपस्थितिकी लीला करते हैं अथवा अपना सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीविग्रह प्रकट करके क्रीड़ा करते हैं, तभी हम यत्किंचित् आपका वर्णन करनेमें समर्थ होती हैं ।

श्रुतियों ने भगवान् नारायण की स्तुति करते हुए कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 87, श्लोक 14 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 991 माया–संसार
परमेश्वर की स्वयम्भुता

त्वमकरणः स्वराडखिलकारकशक्तिधरस्तव बलिमुद्वहन्ति समदन्त्यजयानिमिषाः ।

वर्षभुजोऽखिलक्षितिपतेरिव विश्वसृजो ।

विदधति यत्र ये त्वधिकृता भवतश्चकिताः ॥

प्रभो! आप मन, बुद्धि और इन्द्रिय आदि करणोंसे-चिन्तन, कर्म आदिके साधनोंसे सर्वथा रहित हैं । फिर भी आप समस्त अन्तःकरण और बाह्य करणोंकी शक्तियोंसे सदा-सर्वदा सम्पन्न हैं । आप स्वतः सिद्ध ज्ञानवान्, स्वयंप्रकाश हैं; अतः कोई काम करनेके लिये आपको इन्द्रियोंकी आवश्यकता नहीं है । जैसे छोटे-छोटे राजा अपनी-अपनी प्रजासे कर लेकर स्वयं अपने सम्राट्को कर देते हैं, वैसे ही मनुष्योंके पूज्य देवता और देवताओंके पूज्य ब्रह्मा आदि भी अपने अधिकृत प्राणियोंसे पूजा स्वीकार करते हैं और मायाके अधीन होकर आपकी पूजा करते रहते हैं। वे इस प्रकार आपकी पूजा करते हैं कि आपने जहाँ जो कर्म करनेके लिये उन्हें नियुक्त कर दिया है, वे आपसे भयभीत रहकर वहीं वह काम करते रहते हैं ।

दशमस्कन्ध, अध्याय 87, श्लोक 28 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 997
परमेश्वर की माया और शक्ति

स्थिरचरजातयः स्युरजयोत्थनिमित्तयुजो ।

विहर उदीक्षया यदि परस्य विमुक्त ततः ॥

न हि परमस्य कश्चिदपरो न परश्च भवेद् ।

वियत इवापदस्य तव शून्यतुलां दधतः ॥

नित्यमुक्त! आप मायातीत हैं, फिर भी जब अपने ईक्षणमात्रसे-संकल्पमात्रसे मायाके साथ क्रीडा करते हैं, तब आपका संकेत पाते ही जीवोंके सूक्ष्म शरीर और उनके सुप्त कर्म-संस्कार जग जाते हैं और चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है । प्रभो! आप परम दयालु हैं । आकाशके समान सबमें सम होनेके कारण न तो कोई आपका अपना है और न तो पराया । वास्तवमें तो आपके स्वरूपमें मन और वाणीकी गति ही नहीं है । आपमें कार्य-कारणरूप प्रपंचका अभाव होनेसे बाह्य दृष्टिसे आप शून्यके समान ही जान पड़ते हैं; परन्तु उस दृष्टिके भी अधिष्ठान होनेके कारण आप परम सत्य हैं ।

दशमस्कन्ध, अध्याय 87, श्लोक 29 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 997 लीला–रहस्य
जगत की मिथ्याता

न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निधनादनुमितमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे ।

अत उपमीयते द्रविणजातिविकल्पपथैर्वितथमनोविलासमृतमित्यवयन्त्यबुधाः ॥

भगवन्! वास्तविक बात तो यह है कि यह जगत् उत्पत्तिके पहले नहीं था और प्रलयके बाद नहीं रहेगा; इससे यह सिद्ध होता है कि यह बीचमें भी एकरस परमात्मामें मिथ्या ही प्रतीत हो रहा है । इसीसे हम श्रुतियाँ इस जगत्का वर्णन ऐसी उपमा देकर करती हैं कि जैसे मिट्टीमें घड़ा, लोहेमें शस्त्र और सोनेमें कुण्डल आदि नाममात्र हैं, वास्तवमें मिट्टी, लोहा और सोना ही हैं । वैसे ही परमात्मामें वर्णित जगत् नाममात्र है, सर्वथा मिथ्या और मनकी कल्पना है । इसे नासमझ मूर्ख ही सत्य मानते हैं ।

दशमस्कन्ध, अध्याय 87, श्लोक 37 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1001 माया–संसार
भक्त की मोक्षगति

त्वदवगमी न वेत्ति भवदुत्थशुभाशुभयोर्गुणविगुणान्वयांस्तर्हि देहभृतां च गिरः ।

अनुगमन्वहं सगुण गीतपरम्परया ।

श्रवणभृतो यतस्त्वमपवर्गगतिर्मनुजैः ॥

भगवन्! आपके वास्तविक स्वरूपको जाननेवाला पुरुष आपके दिये हुए पुण्य और पाप-कर्मोंके फल सुख एवं दुःखोंको नहीं जानता, नहीं भोगता; वह भोग्य और भोक्तापनके भावसे ऊपर उठ जाता है । उस समय विधि-निषेधके प्रतिपादक शास्त्र भी उससे निवृत्त हो जाते हैं; क्योंकि वे देहाभिमानियोंके लिये हैं । उनकी ओर तो उसका ध्यान ही नहीं जाता । जिसे आपके स्वरूपका ज्ञान नहीं हुआ है, वह भी यदि प्रतिदिन आपकी प्रत्येक युगमें की हुई लीलाओं, गुणोंका गान सुन-सुनकर उनके द्वारा आपको अपने हृदयमें बैठा लेता है तो अनन्त, अचिन्त्य, दिव्यगुणगणोंके निवासस्थान प्रभो! आपका वह प्रेमी भक्त भी पाप-पुण्योंके फल सुख-दुःखों और विधि-निषेधोंसे अतीत हो जाता है । क्योंकि आप ही उनकी मोक्षस्वरूप गति हैं । (परन्तु इन ज्ञानी और प्रेमियोंको छोड़कर और सभी शास्त्र बन्धनमें हैं तथा वे उसका उल्लंघन करनेपर दुर्गतिको प्राप्त होते हैं)

दशमस्कन्ध, अध्याय 87, श्लोक 40 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1003 लीला–रहस्य
परमात्मा की महिमा

य एवमव्याकृतशक्त्युदन्वतः ।

परस्य साक्षात् परमात्मनो हरेः ।

गिरित्रमोक्षं कथयेच्छृणोति वा ।

विमुच्यते संसृतिभिस्तथारिभिः ॥

भगवान् अनन्त शक्तियोंके समुद्र हैं । उनकी एक-एक शक्ति मन और वाणीकी सीमाके परे है । वे प्रकृतिसे अतीत स्वयं परमात्मा हैं । उनकी शंकरजीको संकटसे छुड़ानेकी यह लीला जो कोई कहता या सुनता है, वह संसारके बन्धनों और शत्रुओंके भयसे मुक्त हो जाता है ।

श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित् से कहा।

दशमस्कन्ध, अध्याय 88, श्लोक 40 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1018 लीला–रहस्य
उत्तम भगवद्भक्त की पहचान

देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो ।

जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रः ।

संसारधर्मैरविमुह्यमानः ।

स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः ॥

संसारके धर्म हैं — जन्म-मृत्यु, भूख-प्यास, श्रम-कष्ट, भय और तृष्णा । ये क्रमशः शरीर, प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धिको प्राप्त होते ही रहते हैं । जो पुरुष भगवान्की स्मृतिमें इतना तन्मय रहता है कि इनके बार-बार होते-जाते रहनेपर भी उनसे मोहित नहीं होता, पराभूत नहीं होता, वह उत्तम भागवत है ।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 49 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1058 वैराग्य
आत्मज्ञान और व्यर्थ विवाद

आत्मा परिज्ञानमयो विवादो ।

ह्यस्तीति नास्तीति भिदार्थनिष्ठः ।

व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां ।

मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात् ॥

आत्मा ज्ञानस्वरूप है; उसका इन पदार्थोंसे न तो कोई सम्बन्ध है और न उसमें कोई विवादकी ही बात है! अस्ति-नास्ति (है-नहीं), सगुण-निर्गुण, भाव-अभाव, सत्य-मिथ्या आदि रूपसे जितने भी वाद-विवाद हैं, सबका मूलकारण भेददृष्टि ही है । इसमें सन्देह नहीं कि इस विवादका कोई प्रयोजन नहीं है; यह सर्वथा व्यर्थ हैं तथापि जो लोग मुझसे-अपने वास्तविक स्वरूपसे विमुख हैं, वे इस विवादसे मुक्त नहीं हो सकते ।

भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धवजी से कहा।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 22, श्लोक 33 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1234
परम सत्य का स्वरूप

यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात् ।

पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य ।

तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं ।

नानापदेशैरहमस्य तद्वत् ॥

उद्धवजी! सोनेसे कंगन, कुण्डल आदि बहुत-से आभूषण बनते हैं; परन्तु जब वे गहने नहीं बने थे, तब भी सोना था और जब नहीं रहेंगे, तब भी सोना रहेगा । इसलिये जब बीचमें उसके कंगन-कुण्डल आदि अनेकों नाम रखकर व्यवहार करते हैं, तब भी वह सोना ही है । ठीक ऐसे ही जगत्का आदि, अन्त और मध्य मैं ही हूँ । वास्तवमें मैं ही सत्य तत्त्व हूँ ।

भगवान् श्रीकृष्ण उद्धवजी से ब्रह्मविद्या के रहस्य बताते हुए कहते हैं।

संहितायामेकादशस्कन्ध, अध्याय 28, श्लोक 19 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1283 लीला–रहस्य
आत्मा की अविनाशिता

स्वप्ने यथा शिरश्छेदं पंचत्वाद्यात्मनः स्वयम् ।

यस्मात् पश्यति देहस्य तत आत्मा ह्यजोऽमरः ॥

स्वप्नावस्थामें ऐसा मालूम होता है कि मेरा सिर कट गया है और मैं मर गया हूँ, मुझे लोग श्मशानमें जला रहे हैं; परन्तु ये सब शरीरकी ही अवस्थाएँ दीखती हैं, आत्माकी नहीं । देखनेवाला तो उन अवस्थाओंसे सर्वथा परे, जन्म और मृत्युसे रहित, शुद्ध-बुद्ध परमतत्त्वस्वरूप है ।

श्रीशुकदेव मुनि ने राजा परीक्षित को उपदेश दिया।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 4 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1349 माया–संसार
अनाहत नाद का अनुभव

सूत → ब्रह्मन

समाहितात्मनो ब्रह्मन् ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।

हृद्याकाशादभून्नादो वृत्तिरोधाद् विभाव्यते ॥

सूतजीने कहा — ब्रह्मन्! जिस समय परमेष्ठी ब्रह्माजी पूर्वसृष्टिका ज्ञान सम्पादन करनेके लिये एकाग्रचित्त हुए, उस समय उनके हृदयाकाशसे कण्ठ-तालु आदि स्थानोंके संघर्षसे रहित एक अत्यन्त विलक्षण अनाहत नाद प्रकट हुआ । जब जीव अपनी मनोवृत्तियोंको रोक लेता है, तब उसे भी उस अनाहत नादका अनुभव होता है ।

सूतजी ने शौनक आदि ऋषियों को बताया।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 6, श्लोक 37 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1358 साधना–योग
भगवान् की चतुर्विध अवस्था

स विश्वस्तैजसः प्राज्ञस्तुरीय इति वृत्तिभिः ।

अर्थेन्द्रियाशयज्ञानैर्भगवान् परिभाव्यते ॥

वे ही जाग्रत्-अवस्थाके अभिमानी ‘विश्व’ बनकर शब्द, स्पर्श आदि बाह्य विषयोंको ग्रहण करते और वे ही स्वप्नावस्थाके अभिमानी ‘तैजस’ बनकर बाह्य विषयोंके बिना ही मन-ही-मन अनेक विषयोंको देखते और ग्रहण करते हैं । वे ही सुषुप्ति अवस्थाके अभिमानी ‘प्राज्ञ’ बनकर विषय और मनके संस्कारोंसे युक्त अज्ञानसे ढक जाते हैं और वही सबके साक्षी ‘तुरीय’ रहकर समस्त ज्ञानोंके अधिष्ठान रहते हैं ।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 11, श्लोक 22 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1400 माया–संसार
परमात्म-ज्ञान की प्राप्ति

य इदं कल्य उत्थाय महापुरुषलक्षणम् ।

तच्चित्तः प्रयतो जप्त्वा ब्रह्म वेद गुहाशयम् ॥

पुरुषोत्तमभगवान्के चिह्नभूत अंग, उपांग और आयुध आदिके इस वर्णनका जो मनुष्य भगवान्में ही चित्त लगाकर पवित्र होकर प्रातःकाल पाठ करेगा, उसे सबके हृदयमें रहनेवाले ब्रह्मस्वरूप परमात्माका ज्ञान हो जायगा ।

सूतजी ने शौनकजी से कहा।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 11, श्लोक 26 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1401 साधना–योग
भक्तिहीन ज्ञान की निरर्थकता

नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं ।

न शोभते ज्ञानमलं निरंजनम् ।

कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे ।

न ह्यर्पितं कर्म यदप्यनुत्तमम् ॥

वह निर्मल ज्ञान भी, जो मोक्षकी प्राप्तिका साक्षात् साधन है, यदि भगवान्की भक्तिसे रहित हो तो उसकी उतनी शोभा नहीं होती । फिर जो कर्म भगवान्‌को अर्पण नहीं किया गया है — वह चाहे कितना ही ऊँचा क्यों न हो-सर्वदा अमंगलरूप, दुःख देनेवाला ही है; वह तो शोभन — वरणीय हो ही कैसे सकता है?

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 12, श्लोक 52 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1414 भक्ति
कृष्णस्मरण का फल

अविस्मृतिः कृष्णपदारविन्दयोः ।

क्षिणोत्यभद्राणि शमं तनोति च ।

सत्त्वस्य शुद्धिं परमात्मभक्तिं ।

ज्ञानं च विज्ञानविरागयुक्तम् ॥

भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी अविचल स्मृति सारे पाप ताप और अमंगलोंको नष्ट कर देती और परम शान्तिका विस्तार करती है । उसीके द्वारा अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, भगवान्की भक्ति प्राप्त होती है एवं परवैराग्यसे युक्त भगवान्‌के स्वरूपका ज्ञान तथा अनुभव प्राप्त होता है ।

सूतजी ने शौनकादि ऋषियों से कहा।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 12, श्लोक 54 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1414 नाम महिमा
परमात्मा का स्वरूप

तमहमजमनन्तमात्मतत्त्वं ।

जगदुदयस्थितिसंयमात्मशक्तिम् ।

द्युपतिभिरजशक्रशंकराद्यैर्दुरवसितस्तवमच्युतं नतोऽस्मि ॥

वे जन्म-मृत्यु आदि विकारोंसे रहित, देशकाला-दिकृत परिच्छेदोंसे मुक्त एवं स्वयं आत्मतत्त्व ही हैं । जगत्की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय करनेवाली शक्तियाँ भी उनकी स्वरूपभूत ही हैं, भिन्न नहीं । ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र आदि लोकपाल भी उनकी स्तुति करना लेशमात्र भी नहीं जानते । उन्हीं एकरस सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ ।

सूतजी ने भगवान् को नमस्कार करते हुए कहा।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 12, श्लोक 66 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1416
ब्रह्म-आत्मैकत्व और मोक्ष

सर्ववेदान्तसारं यद् ब्रह्मात्मैकत्वलक्षणम् ।

वस्त्वद्वितीयं तन्निष्ठं कैवल्यैकप्रयोजनम् ॥

आपलोग जानते हैं कि समस्त उपनिषदोंका सार है ब्रह्म और आत्माका एकत्वरूप अद्वितीय सवस्तु । वही श्रीमद्भागवतका प्रतिपाद्य विषय है । इसके निर्माणका प्रयोजन है एकमात्र कैवल्य-मोक्ष ।

सूतजी ने शौनकजी से कहा।

द्वादशस्कन्ध, अध्याय 13, श्लोक 12 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1420
श्रीमद्भागवत का स्वरूप

ज्ञानविज्ञानभक्त्यङ्गचतुष्टयपरं वचः ।

मायामर्दनदक्षं च विद्धि भागवतं च तत् ॥

जो वाक्य ज्ञान, विज्ञान, भक्ति एवं इनके अंगभूत साधनचतुष्टयको प्रकाशित करनेवाला है तथा जो मायाका मर्दन करनेमें समर्थ है, उसे भी तुम श्रीमद्भागवत समझो ।

सूतजी ऋषिगणों से कहते हैं।

वैष्णवखण्ड, अध्याय 4, श्लोक 5 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1453 भक्ति
मोक्ष की औषधि

येऽपि संसारसन्तापनिर्विण्णा मोक्षकांक्षिणः ।

तेषां भवौषधं चैतत् कलौ सेव्यं प्रयत्नतः ॥

तथा जो संसारके दुःखोंसे घबराकर अपनी मुक्ति चाहते हैं, उनके लिये भी यही इस भवरोगकी ओषधि है। अतः इस कलिकालमें इसका प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये ।

वैष्णवखण्ड, अध्याय 4, श्लोक 32 श्रीमद्भागवत महापुराण — २ पृ. 1458 वैराग्य