श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २

माया–संसार

माया, भ्रम और जगत् का स्वरूप

11 पद्य

महाभारत — खण्ड २

आसक्ति का प्रभाव

शौनक उवाच

स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भयानि च ।

शोकहर्षौ तथाऽऽयासः सर्वं स्नेहात् प्रवर्तते ॥

स्नेहाद् भावोऽनुरागश्च प्रजज्ञे विषये तथा ।

अश्रेयस्कावुभावेतौ पूर्वस्तत्र गुरुः स्मृतः ॥

दुःखका मूल कारण है आसक्ति । आसक्तिसे ही भय होता है । शोक, हर्ष तथा क्लेश — इन सबकी प्राप्ति भी आसक्तिके कारण ही होती है । आसक्तिसे ही विषयोंमें भाव और अनुराग होते हैं । ये दोनों ही अमंगलकारी हैं। इनमें भी पहला अर्थात् विषयोंके प्रति भाव महान् अनर्थकारक माना गया है ।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 28–29 महाभारत — खण्ड २ पृ. 41 ज्ञान–विवेक
तृष्णा का दुष्परिणाम

शौनक उवाच

रागाभिभूतः पुरुषः कामेन परिकृष्यते ।

इच्छा संजायते तस्य ततस्तृष्णा विवर्धते ॥

तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी स्मृता ।

अधर्मबहुला चैव घोरा पापानुबन्धिनी ॥

रागके वशीभूत हुए पुरुषको काम अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है । फिर उसके मनमें कामभोगकी इच्छा जाग उठती है । तत्पश्चात् तृष्णा बढ़ने लगती है । तृष्णा सबसे बढ़कर पापिष्ठ (पापमें प्रवृत्त करनेवाली) तथा नित्य उद्वेग करनेवाली बतायी गयी है । उसके द्वारा प्रायः अधर्म ही होता है । वह अत्यन्त भयंकर पापाबन्धनमें डालनेवाली है ।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 34–35 महाभारत — खण्ड २ पृ. 41 काम–क्रोध–लोभ–मोह
धनजनित दुःख

शौनक उवाच

तस्मादर्थागमाः सर्वे मनोमोहविवर्धनाः ।

कार्पण्यं दर्पमानौ च भयमुद्वेग एव च ॥

अर्थजानि विदुः प्राज्ञाः दुःखान्येतानि देहिनाम् ।

अर्थस्योत्पादने चैव पालने च तथा क्षये ॥

सहन्ति च महद् दुःखं घ्नन्ति चैवार्थकारणात् ।

अर्था दुःखं परित्यक्तुं पालिताश्चैव शत्रवः ॥

इसलिये धन-प्राप्तिके सभी उपाय मनमें मोह बढ़ानेवाले हैं । कृपणता, घमण्ड, अभिमान, भय और उद्वेग इन्हें विद्वानोंने देहधारियोंके लिये धनजनित दुःख माना है । धनके उपार्जन, संरक्षण तथा व्ययमें मनुष्य महान् दुःख सहन करते हैं और धनके ही कारण एक-दूसरेको मार डालते हैं । धनको त्यागनेमें भी महान् दुःख होता है और यदि उसकी रक्षा की जाय तो वह शत्रुका-सा काम करता है ।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 42–44 महाभारत — खण्ड २ पृ. 43 वैराग्य
अविद्या और तृष्णा का चक्र

शौनक उवाच

एवं पतति संसारे तासु तास्विह योनिषु ।

अविद्याकर्मतृष्णाभिर्भ्राम्यमाणोऽथ चक्रवत् ॥

इस प्रकार अविद्या, कर्म और तृष्णाद्वारा चक्रकी भाँति भ्रमण करता हुआ मनुष्य संसारकी विभिन्न योनियोंमें गिरता है ।

शौनकजी ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 71 महाभारत — खण्ड २ पृ. 47 कर्म–प्रारब्ध
मानव अधःपतन का कारण

मार्कण्डेय उवाच

ततः कालान्तरेऽन्यस्मिन् पृथिवीतलचारिणः ।

कामक्रोधाभिभूतास्ते मायाव्याजोपजीविनः ।

लोभमोहाभिभूताश्च त्यक्ता देहैस्ततो नराः ॥

तदनन्तर कुछ कालके पश्चात् भूतलपर विचरनेवाले मनुष्य काम और क्रोधके वशीभूत हो गये । वे छल-कपट और दम्भसे जीविका चलाने लगे । उनके मनको लोभ और मोहने दबा लिया । इन दोषोंके कारण उन्हें इच्छा न होते हुए भी अपना शरीर त्यागनेके लिये विवश होना पड़ा ।

वनपर्व, अध्याय 183, श्लोक 68–69 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1248 काम–क्रोध–लोभ–मोह
विषय-सुख का परिणाम

मार्कण्डेय उवाच

धनानि येषां विपुलानि सन्ति ।

नित्यं रमन्ते सुविभूषिताङ्गाः ।

तेषामयं शत्रुवरघ्न लोको ।

नासौ सदा देहसुखे रतानाम् ॥

जिनके पास बहुत धन होता है, वे अपने शरीरको हर तरहसे सजाकर नित्य विषयोंमें रमण करते अर्थात् विषय-सुख भोगते हैं । शुत्रुसूदन! सदा अपने शरीरके ही सुखमें आसक्त हुए उन मनुष्योंको केवल इसी लोकमें सुख मिलता है, परलोकमें उनके लिये सुखका सर्वथा अभाव है ।

मार्कण्डेयजी ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 183, श्लोक 89 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1251
कलियुग के अन्त की स्थिति

मार्कण्डेय उवाच

अल्पावशिष्टे तु तदा चुगान्ते भरतर्षभ ।

सहस्रान्ते नराः सर्वे प्रायशोऽनृतवादिनः ॥

यज्ञप्रतिनिधिः पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा ।

व्रतप्रतिनिधिश्चैव तस्मिन् काले प्रवर्तते ॥

भरतश्रेष्ठ! सहस्र युगकी समाप्तिमें जब थोड़ा-सा ही समय शेष रह जाता है, उस समय कलियुगके अन्तिम भागमें प्रायः सभी मनुष्य मिथ्यावादी हो जाते हैं । पार्थ! उस समय यज्ञ, दान और व्रतके प्रतिनिधि कर्म चालू हो जाते हैं अर्थात् यज्ञ, दान, तप मुख्य विधिसे न होकर गौण विधिसे नाममात्र होने लगते हैं ।

वनपर्व, अध्याय 188, श्लोक 29–30 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1286 कर्म–प्रारब्ध
लोभ और अज्ञान का प्रभाव

मार्कण्डेय उवाच

विद्याहीनानविज्ञानाल्लोभोऽप्यभिभविष्यति ।

लोभक्रोधपरा मूढाः कामासक्ताश्च मानवाः ।

वैरबद्धा भविष्यन्ति परस्परवधैषिणः ॥

विद्याके बिना ज्ञान न होनेसे उन सबको लोभ दबा लेगा । फिर लोभ और क्रोधके वशीभूत हुए मूढ़ मनुष्य कामनाओंमें फँसकर आपसमें वैर बाँध लेंगे और एक-दूसरेके प्राण लेनेकी घातमें लगे रहेंगे ।

वनपर्व, अध्याय 190, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1312 काम–क्रोध–लोभ–मोह
लोभ-मोह और अधर्म

मार्कण्डेय उवाच

एकाहार्यं युगं सर्वं लोभमोहव्यवस्थितम् ।

अधर्मो वर्द्धते तत्र न तु धर्मः प्रवर्तते ॥

युगके सब लोग लोभ और मोहमें फँसकर भक्ष्याभक्ष्यका विचार किये बिना ही एक साथ सम्मिलित होकर भोजन करने लगेंगे । अधर्म बढ़ेगा और धर्म विदा हो जायगा ।

वनपर्व, अध्याय 190, श्लोक 41 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1315
मोह और मान की परिभाषा

युधिष्ठिर उवाच

मोहो हि धर्ममूढत्वं मानस्त्वात्माभिमानिता ।

धर्मनिष्क्रियताऽऽलस्यं शोकस्त्वज्ञानमुच्यते ॥

युधिष्ठिर बोले — धर्ममूढ़ता ही मोह है, आत्माभिमान ही मान है, धर्मका पालन न करना आलस्य है और अज्ञानको ही शोक कहते हैं ।

युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्न का उत्तर दिया।

वनपर्व, अध्याय 313, श्लोक 94 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2101 ज्ञान–विवेक
मिथ्या आसक्ति का परिणाम

द्रौपदी उवाच

मिथ्याभिगृध्नो हि नरः पापात्मा मोहमास्थितः ।

अयशः प्राप्नुयाद् घोरं महद् वा प्राप्नुयाद् भयम् ॥

झूठे विषयोंमें आसक्त होनेवाला पापात्मा मनुष्य मोहमें पड़कर भयंकर अपयश पाता है अथवा उसे बड़े भारी भय (मृत्यु) का सामना करना पड़ता है ।

द्रौपदी ने कीचक से कहा।

विराटपर्व, अध्याय 14, श्लोक 37 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2211 कर्म–प्रारब्ध