श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४
नीति–व्यवहार
लोकव्यवहार, मित्रता, वाणी और राजधर्म
17 पद्य
महाभारत — खण्ड ४
धृतराष्ट्र उवाच
यस्तु सौवीरराजस्य प्रमथ्य महतीं चमूम् ।
आदत्त महिषीं भोजां काम्यां सर्वाङ्गशोभनाम् ॥
सत्यं धृतिश्च शौर्यं च ब्रह्मचर्यं च केवलम् ।
सर्वाणि युयुधानेऽस्मिन् नित्यानि पुरुषर्षभे ॥
जिन्होंने सौवीरराजकी विशाल सेनाको मथकर उनकी सर्वांगसुन्दरी कमनीय कन्या भोजाको अपनी रानी बनानेके लिये हर लिया था, उन पुरुषशिरोमणि सात्यकिमें सत्य, धैर्य, शौर्य और विशुद्ध ब्रह्मचर्य आदि सारे सद्गुण सदा विद्यमान रहते हैं ।
धृतराष्ट्र ने संजय से सात्यकि के गुण बताते हुए कहा।
संजय उवाच
गुरुवात्सल्यमत्यन्तं नैभृत्यं विनयो दमः ।
नकुलेऽप्रातिरूप्यं च शौर्यं च नियतानि षट् ॥
बड़े भाईके प्रति अत्यन्त भक्ति, अपने पराक्रमको प्रकाशित न करना, विनयशीलता, इन्द्रिय-संयम, उपमा-रहित रूप तथा शौर्य — ये नकुलमें छः गुण निश्चितरूपसे निवास करते हैं ।
संजय उवाच
राज्ञां सुचरितैर्या च गतिर्भवति शाश्वती ।
चतुराश्रमिणां पुण्यैः पावितानां सुरक्षितैः ॥
दीनानुकम्पिनां या च सततं संविभागिनाम् ।
पैशुन्याच्च निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥
पुत्र! सदाचारके पालनसे राजाओंको तथा सुरक्षित पुण्यके प्रभावसे पवित्र हुए चारों आश्रमोंके लोगोंको जो सनातन गति प्राप्त होती है; दीनोंपर दया करनेवाले, उत्तम वस्तुओंको घरमें बाँटकर उपयोगमें लेनेवाले तथा चुगलीसे दूर रहनेवाले लोगोंको जो गति प्राप्त होती है, वही गति तुम्हें भी मिले ।
संजय उवाच
द्रोणे युधि पराक्रान्ते नर्दमाने मुहुर्मुहुः ।
पञ्चालेघु च क्षीणेषु वध्यमानेषु पाण्डुषु ॥
नापश्यच्छरणं किञ्चिद् धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
चिन्तयामास राजेन्द्र कथमेतद् भविष्यति ॥
जब द्रोणाचार्य युद्धमें पराक्रम प्रकट करके बारंबार गर्जना कर रहे थे, पांचाल वीरोंका विनाश हो रहा था और पाण्डव-सैनिक मारे जा रहे थे, उस समय धर्मराज युधिष्ठिरको कोई भी अपना आश्रय या रक्षक नहीं दिखायी दिया । राजेन्द्र! वे सोचने लगे कि यह कैसे होगा?
द्रोणाचार्य के पराक्रम से पाण्डव सैनिकों के मारे जाने पर युधिष्ठिर ने यह विचार किया।
दुर्योधन उवाच
यो हि मित्रमविज्ञाय याथातथ्येन मन्दधीः ।
मित्रार्थे योजयत्येनं तस्य सोऽर्थोऽवसीदति ॥
जो मूर्ख मनुष्य मित्रको ठीक-ठीक पहचाने बिना ही उसे मित्रके कार्यमें नियुक्त कर देता है, उसका वह काम बिगड़ जाता है ।
अर्जुन उवाच
उपचीर्णो गुरुर्मिथ्या भवता राज्यकारणात् ।
धर्मज्ञेन सता नाम सोऽधर्मः सुमहान् कृतः ॥
आपने धर्मज्ञ होते हुए भी राज्यके लोभसे झूठ बोलकर जो अपने गुरुको धोखा दिया, वह महान् पाप किया है ।
धृष्टद्युम्न → अर्जुन
विधर्मिणं धर्मविद्भिः प्रोक्तं तेषां विषोपमम् ।
जानन् धर्मार्थतत्त्वज्ञ किं मामर्जुन गर्हसे ॥
धर्म और अर्थका तत्त्व जाननेवाले अर्जुन! जो अपना धर्म छोड़कर परधर्म ग्रहण कर लेता है, उस विधर्मीको धर्मज्ञ पुरुषोंने धर्मात्माओंके लिये विषके तुल्य बताया है । यह सब जानते हुए भी तुम मेरी निन्दा क्यों करते हो?
धृष्टद्युम्न ने अर्जुन से कहा।
कर्ण उवाच
न नूनमस्त्राणि बलं पराक्रमः ।
क्रियाः सुनीतं परमायुधानि वा ।
अलं मनुष्यस्य सुखाय वर्तितुं ।
तथा हि युद्धे निहतः परैर्गुरुः ॥
निश्चय ही अस्त्र, बल, पराक्रम, क्रिया, अच्छी नीति अथवा उत्तम आयुध आदि किसी मनुष्यको सुख पहुँचानेके लिये पर्याप्त नहीं हैं; क्योंकि इन सब साधनोंके होते हुए भी आचार्यको शत्रुओंने युद्धमें मार डाला है ।
कर्ण ने शल्य से कहा।
तदेतद् वै समालोक्य प्रत्यमित्रं महद् बलम् ।
यथा नाभिभवत्यस्मांस्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥
‘अतः इस विशाल शत्रुसेनाकी ओर देखकर तुम ऐसी नीतिका निर्माण करो, जिससे वह हमें परास्त न कर सके’
राजा युधिष्ठिर ने अर्जुन से रणभूमि में कर्ण द्वारा रचित महाव्यूह को देखकर ऐसी नीति बनाने को कहा जिससे शत्रु परास्त हो जाए।
श्रीकृष्ण उवाच
भवेत् सत्यमवक्तव्यं वक्तव्यमनृतं भवेत् ।
यत्रानृतं भवेत् सत्यं सत्यं चाप्यनृतं भवेत् ॥
जहाँ मिथ्या बोलनेका परिणाम सत्य बोलनेके समान मंगलकारक हो अथवा जहाँ सत्य बोलनेका परिणाम असत्यभाषणके समान अनिष्टकारी हो, वहाँ सत्य नहीं बोलना चाहिये । वहाँ असत्य बोलना ही उचित होगा ।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा।
दुर्योधन उवाच
वदन्ति मित्रं सहजं विचक्षणास्तथैव साम्ना च धनेन चार्जितम् ।
प्रतापतश्चोपनतं चतुर्विधं ।
तदस्ति सर्वं तव पाण्डवेषु ॥
विद्वान् पुरुष चार प्रकारके मित्र बतलाते हैं । एक सहज मित्र होते हैं (जिनके साथ स्वाभाविक मैत्री होती हैं) । दूसरे हैं संधि करके बनाये हुए मित्र । तीसरे वे हैं जो धन देकर अपनाये गये हैं । जो किसीके प्रबल प्रतापसे प्रभावित हो स्वतः शरणमें आ जाते हैं, वे चौथे प्रकारके मित्र हैं । पाण्डवोंके साथ तुम्हारी सभी प्रकारकी मित्रता सम्भव है ।
दुर्योधन ने अश्वत्थामा से कहा।
कृप उवाच
शक्नोति जीवितुं दक्षो नालसः सुखमेधते ।
दृश्यन्ते जीवलोकेऽस्मिन् दक्षाः प्रायो हितैषिणः ॥
पुरुषार्थमें लगा हुआ दक्ष पुरुष सुखसे जीवन-निर्वाह कर सकता है; परंतु आलसी मनुष्य कभी सुखी नहीं होता है । इस जीव जगत्में प्रायः तत्परतापूर्वक कर्म करनेवाले ही अपना हित साधन करते देखे जाते हैं ।
कृप उवाच
अकृत्वा कर्म यो लोके फलं विन्दति धिष्ठितः ।
स तु वक्तव्यतां याति द्वेष्यो भवति भूयशः ॥
परंतु जो इस जगत्में कोई काम न करके बैठा-बैठा फल भोगता है; वह प्रायः निन्दित होता है और दूसरोंके द्वेषका पात्र बन जाता है ।
कृप उवाच
एवमेतदनादृत्य वर्तते यस्त्वतोऽन्यथा ।
स करोत्यात्मनोऽनर्थानेष बुद्धिमतां नयः ॥
इस प्रकार जो पुरुष इस मतका अनादर करके इसके विपरीत बर्ताव करता है अर्थात् जो दैव और पुरुषार्थ दोनोंके सहयोगको न मानकर केवल एकके भरोसे ही बैठा रहता है, वह अपना ही अनर्थ करता है, यही बुद्धिमानोंकी नीति है ।
कृप उवाच
असम्भावितरूपं हि त्वयि कर्म विगर्हितम् ।
शुक्ले रक्तमिव न्यस्तं भवेदिति मतिर्मम ॥
जैसे सफेद वस्त्रमें लाल रंगका धब्बा लग जाय, उस प्रकार तुममें निन्दित कर्मका होना सम्भावनासे परेकी बात है, ऐसा मेरा विश्वास है ।
विदुर → राजन
यतेन्द्रियो नरो राजन् क्रोधलोभनिराकृतः ।
संतुष्टः सत्यवादी यः स शान्तिमधिगच्छति ॥
राजन्! जो मनुष्य जितेन्द्रिय, क्रोध और लोभसे शून्य, संतोषी तथा सत्यवादी होता है, उसे शान्ति प्राप्त होती है ।
व्यास उवाच
क्षमाशीला पुरा भूत्वा साद्य न क्षमसे कथम् ।
अधर्मं जहि धर्मज्ञे यतो धर्मस्ततो जयः ॥
धर्मज्ञे! तुम तो पहले बड़ी क्षमाशील थी । अब क्यों नहीं क्षमा करती हो? अधर्म छोड़ो, क्योंकि जहाँ धर्म है, वहीं विजय है ।
व्यासजी ने गान्धारी से कहा।