श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६

सेवा–करुणा–विनय

सेवा, दया और नम्रता

10 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

दया का महत्व

भीष्म उवाच

अनुक्रोशो हि साधूनां महद्धर्मस्य लक्षणम् ।

अनुक्रोशश्च साधूनां सदा प्रीतिं प्रयच्छति ॥

श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये दूसरोंपर दया करना ही महान् धर्मका सूचक है । दयाभाव श्रेष्ठ पुरुषोंको सदा ही आनन्द प्रदान करता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 5, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 79
परोपकारी एवं मृदु स्वभाव

भीष्म उवाच

अपराधिषु सस्नेहा मृदवो मृदुवत्सलाः ।

आराधनसुखाश्चापि पुरुषाः स्वर्गगामिनः ॥

जो अपराधियोंके प्रति भी दया रखते हैं, जिनका स्वभाव मृदुल होता है, जो मृदुल स्वभाववाले व्यक्तियोंपर प्रेम रखते हैं तथा जिन्हें दूसरोंकी आराधना (सेवा) करनेमें ही सुख मिलता है, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 23, श्लोक 95 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 341
दया का महत्व

भीष्म उवाच

आनृशंस्यं परो धर्म इति तस्मै प्रदीयते ।

यत्र तत्र समुत्पन्नं गुणायैवोपपद्यते ॥

दया सबसे बड़ा धर्म है । यह समझकर ही उसे धनका भाग दिया जाता है । दया जहाँ भी उत्पन्न हो, वह गुणकारक ही होती है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 47, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 485
शत्रु पर दया

भीष्म उवाच

अमित्रमपि चेद् दीनं शरणैषिणमागतम् ।

व्यसने योऽनुगृह्णाति स वै पुरुषसत्तमः ॥

शत्रु भी यदि दीन होकर शरण पानेकी इच्छासे घरपर आ जाय तो संकटके समय जो उसपर दया करता है, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 59, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 567

पितामह उवाच

वृत्तिग्लाने सीदति चातिमात्रं ।

कृष्यर्थे वा होम्यहेतोः प्रसूतेः ।

गुर्वर्थं वा बालसंवृद्धये वा ।

धेनुं दद्याद् देशकालेऽविशिष्टे ॥

जिसकी जीविका क्षीण हो गयी हो तथा जो अत्यन्त कष्ट पा रहा हो, ऐसे ब्राह्मणको सामान्य देश-कालमें भी दूध देनेवाली गायका दान करना चाहिये । इसके सिवा खेतीके लिये, होम-सामग्रीके लिये, प्रसूता स्त्रीके पोषणके लिये, गुरुदक्षिणाके लिये अथवा शिशु-पालनके लिये सामान्य देश-कालमें भी दुधारू गायका दान करना उचित है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 73, श्लोक 40 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 662
गुरुशुश्रूषा का फल

भीष्म → राजन

शुश्रूषते यः पितरं न चासूयेत् कदाचन ।

मातरं भ्रातरं वापि गुरुमाचार्यमेव च ॥

तस्य राजन् फलं विद्धि स्वर्लोके स्थानमर्चितम् ।

न च पश्येत नरकं गुरुशुश्रूषयाऽऽत्मवान् ॥

राजन्! जो पिता-माता, बड़े भाई, गुरु और आचार्यकी सेवा करता है और कभी उनके गुणोंमें दोषदृष्टि नहीं करता है, उसको मिलनेवाले फलको जान लो । उसे स्वर्गलोकमें सर्वसम्मानित स्थान प्राप्त होता है । मनको वशमें रखनेवाला वह पुरुष गुरुशुश्रूषाके प्रभावसे कभी नरकका दर्शन नहीं करता ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 75, श्लोक 40–41 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 673
अतिथि सत्कार का महत्व

अरुन्धती उवाच

अहन्यहनि यो दद्यात् कपिलां द्वादशीः समाः ।

मासि मासि च सत्रेण यो यजेत सदा नरः ॥

गवां शतसहस्रं च यो दद्याज्ज्येष्ठपुष्करे ।

न तद्धर्मफलं तुल्यमतिथिर्यस्य तुष्यति ॥

जो मनुष्य बारह वर्षोंतक प्रतिदिन एक-एक कपिला गौका दान करता है, हर महीनेमें निरन्तर सत्रयाग चलाता और ज्येष्ठपुष्कर तीर्थमें जाकर एक लाख गोदान करता है, उसके धर्मका फल उस मनुष्यके बराबर नहीं हो सकता, जिसके द्वारा की हुई सेवासे अतिथि संतुष्ट हो जाता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 130, श्लोक 6–7 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1095 धर्म–आचरण
दयापरायण आचरण

श्रीमहेश्वर उवाच

अपरः सर्वभूतानि दयावाननुपश्यति ।

मैत्रदृष्टिः पितृसमो निर्वैरो नियतेन्द्रियः ॥

नोद्वेजयति भूतानि न विघातयते तथा ।

हस्तपादैः सुनियतैर्विश्वास्यः सर्वजन्तुषु ॥

न रज्ज्वा न च दण्डेन न लोष्टैर्नायुधेन च ।

उद्वेजयति भूतानि श्लक्ष्णकर्मा दयापरः ॥

एवंशीलसमाचारः स्वर्गे समुपजायते ।

तत्रासौ भवने दिव्ये मुदा वसति देववत् ॥

इसके विपरीत जो मनुष्य सब प्राणियोंके प्रति दयादृष्टि रखता है, सबको मित्र समझता है, सबके ऊपर पिताके समान स्नेह रखता है, किसीके साथ वैर नहीं करता और इन्द्रियोंको वशमें किये रहता है, जो हाथ-पैर आदिको अपने अधीन रखकर किसी भी जीवको न तो उद्वेगमें डालता और न मारता ही है, जिसपर सब प्राणी विश्वास करते हैं, जो रस्सी, डंडे, ढेले और घातक अस्त्र-शस्त्रोंसे प्राणियोंको कष्ट नहीं पहुँचाता, जिसके कर्म कोमल एवं निर्दोष होते हैं तथा जो सदा ही दयापरायण होता है, ऐसे स्वभाव और आचरणवाला पुरुष स्वर्गलोकमें दिव्य शरीर धारण करता है और वहाँके दिव्य भवनमें देवताओंके समान आनन्दपूर्वक निवास करता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 145, श्लोक 37–40 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1212
श्रेष्ठ पुरुषों का बर्ताव

ब्राह्मण उवाच

दानं व्रतं ब्रह्मचर्यं यथोक्तं ब्रह्मधारणम् ।

दमः प्रशान्तता चैव भूतानां चानुकम्पनम् ॥

संयमाश्चानृशंस्यं च परस्वादानवर्जनम् ।

व्यलीकानामकरणं भूतानां मनसा भुवि ॥

मातापित्रोश्च शुश्रूषा देवतातिथिपूजनम् ।

गुरुपूजा घृणा शौचं नित्यमिन्द्रियसंयमः ॥

प्रवर्तनं शुभानां च तत् सतां वृत्तमुच्यते ।

ततो धर्मः प्रभवति यः प्रजाः पाति शाश्वतीः ॥

दान, व्रत, ब्रह्मचर्य, शास्त्रोक्त रीतिसे वेदाध्ययन, इन्द्रियनिग्रह, शान्ति, समस्त प्राणियोंपर दया, चित्तका संयम, कोमलता, दूसरोंके धन लेनेकी इच्छाका त्याग, संसारके प्राणियोंका मनसे भी अहित न करना, माता-पिताकी सेवा, देवता, अतिथि और गुरुओंकी पूजा, दया, पवित्रता, इन्द्रियोंको सदा काबूमें रखना तथा शुभ कर्मोंका प्रचार करना — यह सब श्रेष्ठ पुरुषोंका बर्ताव कहलाता है । इनके अनुष्ठानसे धर्म होता है, जो सदा प्रजावर्गकी रक्षा करता है ।

सिद्ध ब्राह्मण ने काश्यप से कहा।

अनुगीतापर्व, अध्याय 18, श्लोक 15–18 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1667 धर्म–आचरण
विश्वासपात्रता और आत्म-संयम

ब्रह्मा उवाच

परं नोद्वेजयेत् काचिन्न च कस्यचिदुद्विजेत् ।

विश्वास्यः सर्वभूतानामग्र्यो मोक्षविदुच्यते ॥

किसी दूसरे प्राणीको उद्वेगमें न डाले और स्वयं भी किसीसे उद्विग्न न हो । जो सब प्राणियोंका विश्वासपात्र बन जाता है, वह सबसे श्रेष्ठ और मोक्ष-धर्मका ज्ञाता कहलाता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 46, श्लोक 41 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1801 नीति–व्यवहार