श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

भक्ति

प्रेम, उपासना और भगवान् से सम्बन्ध

16 पद्य

श्रीमद्भागवत महापुराण — १

कथा का महत्व

कृष्णप्रियं सकलकल्मषनाशनं च ।

मुक्त्येकहेतुमिह भक्तिविलासकारि ॥

सन्तः कथानकमिदं पिबतादरेण ।

लोके हि तीर्थपरिशीलनसेवया किम् ॥

संतजन! आपलोग आदरपूर्वक इस कथामृतका पान कीजिये । यह श्रीकृष्णको अत्यन्त प्रिय, सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला मुक्तिका एकमात्र कारण और भक्तिको बढ़ानेवाला है । लोकमें अन्य कल्याणकारी साधनोंका विचार करने और तीर्थोंका सेवन करनेसे क्या होगा ।

सूतजी ने सन्तों से यह कहा।

उत्तरखण्ड, अध्याय 6, श्लोक 98 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 152 नाम महिमा
कथा श्रवण का फल

एतां यो नियततया शृणोति भक्त्या ।

यश्चैनां कथयति शुद्धवैष्णवाग्रे ॥

तौ सम्यग्विधिकरणात्फलं लभेते ।

याथार्थ्यान्न हि भुवने किमप्यसाध्यम् ॥

जो पुरुष नियमपूर्वक इस कथाका भक्तिभावसे श्रवण करता है और जो शुद्धान्तःकरण भगवद्भक्तोंके सामने इसे सुनाता है, वे दोनों ही विधिका पूरा-पूरा पालन करनेके कारण इसका यथार्थ फल पाते हैं — उनके लिये त्रिलोकीमें कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता ।

उत्तरखण्ड, अध्याय 6, श्लोक 103 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 153 साधना–योग
अनन्य आत्मभाव का महत्त्व

अथेह धन्या भगवन्त इत्थं ।

यद्वासुदेवेऽखिललोकनाथे ।

कुर्वन्ति सर्वात्मकमात्मभावं ।

न यत्र भूयः परिवर्त उग्रः ॥

शौनकादि ऋषियो! आपलोग बड़े ही सौभाग्यशाली तथा धन्य हैं जो इस जीवनमें और विघ्न-बाधाओंसे भरे इस संसारमें समस्त लोकोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्णसे वह सर्वात्मक आत्मभाव, वह अनिर्वचनीय अनन्य प्रेम करते हैं, जिससे फिर इस जन्म-मरणरूप संसारके भयंकर चक्रमें नहीं पड़ना होता ।

सूतजी ने शौनकादि ऋषियों से कहा।

प्रथमस्कन्ध, अध्याय 3, श्लोक 39 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 174 शरणागति
कर्मों का समर्पण

एतत्संसूचितं ब्रह्मंस्तापत्रयचिकित्सितम् ।

यदीश्वरे भगवति कर्म ब्रह्मणि भावितम् ॥

सत्यसंकल्प व्यासजी! पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके प्रति समस्त कर्मोंको समर्पित कर देना ही संसारके तीनों तापोंकी एकमात्र ओषधि है, यह बात मैंने आपको बतला दी ।

देवर्षि नारद ने व्यासजी को यह बात बताई।

प्रथमस्कन्ध, अध्याय 5, श्लोक 32 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 188 कर्म–प्रारब्ध
महाप्रयाण की पवित्र कथा

यः श्रद्धयैतद् भगवत्प्रियाणां ।

पाण्डोः सुतानामिति सम्प्रयाणम् ।

शृणोत्यलं स्वस्त्ययनं पवित्रं ।

लब्ध्वा हरौ भक्तिमुपैति सिद्धिम् ॥

भगवान्के प्यारे भक्त पाण्डवोंके महाप्रयाणकी इस परम पवित्र और मंगलमयी कथाको जो पुरुष श्रद्धासे सुनता है, वह निश्चय ही भगवान्की भक्ति और मोक्ष प्राप्त करता है ।

सूतजी शौनकजी से कहते हैं।

प्रथमस्कन्ध, अध्याय 15, श्लोक 51 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 277
सर्वान्तर्यामी परमात्मा का भजन

स सर्वधीवृत्त्यनुभूतसर्व ।

आत्मा यथा स्वप्नजनेक्षितैकः ।

तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत ।

नान्यत्र सज्जेद् यत आत्मपातः ॥

जैसे स्वप्न देखनेवाला स्वप्नावस्थामें अपने-आपको ही विविध पदार्थोंके रूपमें देखता है, वैसे ही सबकी बुद्धि-वृत्तियोंके द्वारा सब कुछ अनुभव करनेवाला सर्वान्तर्यामी परमात्मा भी एक ही है । उन सत्यस्वरूप आनन्दनिधि भगवान्का ही भजन करना चाहिये, अन्य किसी भी वस्तुमें आसक्ति नहीं करनी चाहिये । क्योंकि यह आसक्ति जीवके अधःपतनका हेतु है ।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं।

द्वितीयस्कन्ध, अध्याय 1, श्लोक 39 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 322 ज्ञान–विवेक
वैष्णव पद की परिभाषा

परं पदं वैष्णवमामनन्ति तद् ।

यन्नेति नेतीत्यतदुत्सिसृक्षवः ।

विसृज्य दौरात्म्यमनन्यसौहृदा ।

हृदोपगुह्यार्हपदं पदे पदे ॥

योगीलोग ‘यह नहीं, यह नहीं’ — इस प्रकार परमात्मासे भिन्न पदार्थोंका त्याग करना चाहते हैं और शरीर तथा उसके सम्बन्धी पदार्थोंमें आत्मबुद्धिका त्याग करके हृदयके द्वारा पद-पदपर भगवान् के जिस परम पूज्य स्वरूपका आलिंगन करते हुए अनन्य प्रेमसे परिपूर्ण रहते हैं, वही भगवान् विष्णुका परम पद है — इस विषयमें समस्त शास्त्रोंकी सम्मति है ।

द्वितीयस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 18 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 327 शरणागति
परम भक्त की अनन्य भक्ति

श्रीमैत्रेय → विदुर

देवहूत्यपि संदेशं गौरवेण प्रजापतेः ।

सम्यक् श्रद्धाय पुरुषं कूटस्थमभजद्गुरुम् ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी! प्रजापति कर्दमके आदेशमें गौरव-बुद्धि होनेसे देवहूतिने उसपर पूर्ण विश्वास किया और वह निर्विकार, जगद्गुरु भगवान् श्रीपुरुषोत्तमकी आराधना करने लगी ।

मैत्रेयजी ने विदुरजी से कहा।

तृतीयस्कन्ध, अध्याय 24, श्लोक 5 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 587
अहैतुकी भक्ति

श्रीभगवान् उवाच

देवानां गुणलिंगानामानुश्रविककर्मणाम् ।

सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या ।

अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी ।

जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥

श्रीभगवान्ने कहा — माता! जिसका चित्त एकमात्र भगवान्‌में ही लग गया है, ऐसे मनुष्यकी वेदविहित कर्मोंमें लगी हुई तथा विषयोंका ज्ञान करानेवाली (कर्मेन्द्रिय एवं ज्ञानेन्द्रिय — दोनों प्रकारकी) इन्द्रियोंकी जो सत्त्वमूर्ति श्रीहरिके प्रति स्वाभाविकी प्रवृत्ति है, वही भगवान्की अहैतुकी भक्ति है । यह मुक्तिसे भी बढ़कर है; क्योंकि जठरानल जिस प्रकार खाये हुए अन्नको पचाता है, उसी प्रकार यह भी कर्मसंस्कारोंके भण्डाररूप लिंगशरीरको तत्काल भस्म कर देती है ।

भगवान् कपिल ने माता देवहूति से कहा।

तृतीयस्कन्ध, अध्याय 25, श्लोक 32–33 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 600
सात्त्विक भक्त की पहचान

कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन् वा तदर्पणम् ।

यजेद्यष्टव्यमिति वा पृथग्भावः स सात्त्विकः ॥

जो व्यक्ति पापोंका क्षय करनेके लिये, परमात्माको अर्पण करनेके लिये और पूजन करना कर्तव्य है — इस बुद्धिसे मेरा भेदभावसे पूजन करता है, वह सात्त्विक भक्त है ।

कपिल ने माता देवहूति से कहा।

तृतीयस्कन्ध, अध्याय 29, श्लोक 10 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 631 धर्म–आचरण
भक्तिपूर्वक निरन्तर भजन

विरक्तश्चेन्द्रियरतौ भक्तियोगेन भूयसा ।

तं निरन्तरभावेन भजेताद्धा विमुक्तये ॥

यदि उपासकको इन्द्रियसम्बन्थी भोगोंसे वैराग्य हो गया हो तो वह मोक्षप्राप्तिके लिये अत्यन्त भक्तिपूर्वक अविच्छिन्नभावसे भगवान्का भजन करे ।

नारदजी ने ध्रुव से कहा।

चतुर्थस्कन्ध, अध्याय 8, श्लोक 61 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 739 साधना–योग
भगवान की शरण

यत्पादसेवाभिरुचिस्तपस्विनामशेषजन्मोपचितं मलं धियः ।

सद्यः क्षिणोत्यन्वहमेधती सती ।

यथा पदांगुष्ठविनिःसृता सरित् ।

विनिर्धुताशेषमनोमलः पुमानसंगविज्ञानविशेषवीर्यवान् ।

यदङ्घ्रिमूले कृतकेतनः पुनर्न संसृतिं क्लेशवहां प्रपद्यते ।

तमेव यूयं भजतात्मवृत्तिभिमनोवचः कायगुणैः स्वकर्मभिः ।

अमायिनः कामदुघाङ्घ्रिपङ्कजं ।

यथाधिकारावसितार्थसिद्धयः ॥

जिनके चरणकमलोंकी सेवाके लिये निरन्तर बढ़नेवाली अभिलाषा उन्हींके चरणनखसे निकली हुई गंगाजीके समान, संसारतापसे संतप्त जीवोंके समस्त जन्मोंके संचित मनोमलको तत्काल नष्ट कर देती है, जिनके चरणतलका आश्रय लेनेवाला पुरुष सब प्रकारके मानसिक दोषोंको धो डालता तथा वैराग्य और तत्त्वसाक्षात्काररूप बल पाकर फिर इस दुःखमय संसारचक्रमें नहीं पड़ता और जिनके चरणकमल सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं — उन प्रभुको आपलोग अपनी-अपनी आजीविकाके उपयोगी वर्णाश्रमोचित अध्यापनादि कर्मों तथा ध्यान-स्तुति-पूजादि मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक क्रियाओंके द्वारा भजें । हृदयमें किसी प्रकारका कपट न रखें तथा यह निश्चय रखें कि हमें अपने-अपने अधिकारानुसार इसका फल अवश्य प्राप्त होगा ।

चतुर्थस्कन्ध, अध्याय 21, श्लोक 31–33 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 835 वैराग्य
भक्ति का फल

यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना ।

सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः ।

हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा ।

मनोरथेनासति धावतो बहिः ॥

जिस पुरुषकी भगवान्‌में निष्काम भक्ति है, उसके हृदयमें समस्त देवता धर्म-ज्ञानादि सम्पूर्ण सद्गुणोंके सहित सदा निवास करते हैं । किन्तु जो भगवान्‌का भक्त नहीं है, उसमें महापुरुषोंके वे गुण आ ही कहाँसे सकते हैं? वह तो तरह-तरहके संकल्प करके निरन्तर तुच्छ बाहरी विषयोंकी ओर ही दौड़ता रहता है ।

प्रह्लादजी ने भगवान् नृसिंह से कहा।

पञ्चमस्कन्ध, अध्याय 18, श्लोक 12 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1041
मन की शुद्धि

ममाहमिति देहादौ हित्वामिथ्यार्थधीर्मतिम् ।

धास्ये मनो भगवति शुद्धं तत्कीर्तनादिभिः ॥

मैंने सत्य वस्तु परमात्माको पहचान लिया है; अतः अब मैं शरीर आदिमें ‘मैं’ तथा ‘मेरे’ का भाव छोड़कर भगवन्नामके कीर्तन आदिसे अपने मनको शुद्ध करूँगा और उसे भगवान्‌में लगाऊँगा ।

षष्ठस्कन्ध, अध्याय 2, श्लोक 38 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1117
भक्तों से सख्य

ममोत्तमश्लोकजनेषु सख्यं ।

संसारचक्रे भ्रमतः स्वकर्मभिः ।

त्वन्माययाऽऽत्मात्मजदारगेहेष्वासक्तचित्तस्य न नाथ भूयात् ॥

प्रभो! मैं मुक्ति नहीं चाहता । मेरे कर्मोंके फलस्वरूप मुझे बार-बार जन्म-मृत्युके चक्करमें भटकना पड़े, इसकी परवा नहीं । परन्तु मैं जहाँ-जहाँ जाऊँ, जिस-जिस योनिमें जन्मूँ, वहाँ-वहाँ भगवान्‌के प्यारे भक्तजनोंसे मेरी प्रेम-मैत्री बनी रहे । स्वामिन्! मैं केवल यही चाहता हूँ कि जो लोग आपकी मायासे देह-गेह और स्त्री-पुत्र आदिमें आसक्त हो रहे हैं, उनके साथ मेरा कभी किसी प्रकारका भी सम्बन्ध न हो ।

षष्ठस्कन्ध, अध्याय 11, श्लोक 27 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1200
भक्ति की महत्ता

स विधास्यति ते कामान्हरिर्दीनानुकम्पनः ।

अमोघा भगवद्भक्तिर्नेतरेति मतिर्मम ॥

वे बड़े दीनदयालु हैं । अवश्य ही श्रीहरि तुम्हारी कामनाएँ पूर्ण करेंगे । मेरा यह दृढ़ निश्चय है कि भगवान्‌की भक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती । इसके सिवा कोई दूसरा उपाय नहीं है ।

कश्यप ने अपनी पत्नी अदिति से कहा।

संहितायामष्टमस्कन्ध, अध्याय 16, श्लोक 21 श्रीमद्भागवत महापुराण — १ पृ. 1546 शरणागति