श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५
भक्ति
प्रेम, उपासना और भगवान् से सम्बन्ध
20 पद्य
महाभारत — खण्ड ५
भीष्म उवाच
दुःखेन श्लिष्यते भिन्नं श्लिष्टं दुःखेन भिद्यते ।
भिन्ना श्लिष्टा तु या प्रीतिर्न सा स्नेहेन वर्तते ॥
प्रेमका बन्धन बड़ी कठिनाईसे टूटता है, पर जब वह एक बार टूट जाता है, तब बड़ी कठिनाईसे जुट पाता है । जो प्रेम बारंबार टूटता और जुड़ता रहता है, उसमें स्नेह नहीं होता ।
मनु उवाच
सर्वैरयं चेन्द्रियैः सम्प्रयुक्तो ।
देहं प्राप्तः पञ्चभूताश्रयः स्यात् ।
नासामर्थ्याद् गच्छति कर्मणेह ।
हीनस्तेन परमेणाव्ययेन ॥
सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे संयुक्त होकर यह देहधारी जीव पंचभूतस्वरूप शरीरके आश्रित हो जाता है । ज्ञान और उपासना आदिकी शक्तिके बिना वह केवल कर्मोंद्वारा परमात्माको नहीं पाता । अतः वह उस अविनाशी परमेश्वरसे वंचित रह जाता है ।
बलि उवाच
निष्प्रीतिं नष्टसंतापमात्मानं त्वमुपाससे ।
सुहृदं सर्वभूतानां निर्वैरं शान्तमानसम् ॥
जो हर्षसे रहित, संतापसे शून्य, सम्पूर्ण भूतोंका सुहृद्, वैररहित और शान्तचित्त है, उस आत्माकी तुम उपासना करते हो ।
लक्ष्मी उवाच
धर्मनित्ये महाबुद्धौ ब्रह्मण्ये सत्यवादिनि ।
प्रश्रिते दानशीले च सदैव निवसाम्यहम् ॥
नित्य धर्माचरण करनेवाले, परम बुद्धिमान्, ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, विनयी तथा दानशील पुरुषमें भी मैं सदा ही निवास करती हूँ ।
वासुदेव उवाच
दृढभक्तिरनिन्द्यात्मा श्रुतवाननृशंसवान् ।
वीतसम्मोहदोषश्च तस्मात् सर्वत्र पूजितः ॥
उनकी मेरे प्रति दृढ़ भक्ति है । उनका हृदय शुद्ध है। वे विद्वान् और दयालु हैं । उनके मोह आदि दोष दूर हो गये हैं; इसीलिये उनका सर्वत्र आदर है ।
श्रीकृष्ण ने उग्रसेन से नारदजी के गुण बताए।
कपिल उवाच
तेजः क्षमा शान्तिरनामयं शुभं ।
तथाविधं व्योम सनातनं ध्रुवम् ।
एतैः सर्वैर्गम्यते बुद्धिनेत्रैस्तस्मै नमो ब्रह्मणे ब्राह्मणाय ॥
उस आकाशके समान असंग, अविनाशी और सदा एकरस तत्त्वका ज्ञान-नेत्रोंवाले सभी पुरुष तेज, क्षमा और शान्तिरूप शुभ साधनोंके द्वारा साक्षात्कार करते हैं । जो वास्तवमें ब्रह्मवेत्तासे अभिन्न है, उस परब्रह्म परमात्माको नमस्कार है ।
भीष्म उवाच
रक्ष मां रक्षणीयोऽहं तवानघ नमोऽस्तु ते ।
भक्तानुकम्पी भगवान् भक्तश्चाहं सदा त्वयि ॥
अनघ! मैं आपके द्वारा रक्षित होने योग्य हूँ, आप अवश्य मेरी रक्षा करें, मैं आपको नमस्कार करता हूँ । आप भक्तोंपर दया करनेवाले भगवान् हैं और मैं सदाके लिये आपका भक्त हूँ ।
भीष्म उवाच
प्रसीद मम भद्रं ते भव भावगतस्य मे ।
त्वयि मे हृदयं देव त्वयि बुद्धिर्मनस्त्वयि ॥
भगवन् भव! आपका भला हो, मैं भक्तिभावके साथ आपकी शरणमें आया हूँ, इसलिये अब मुझपर प्रसन्न होइये । मेरा हृदय, मेरी बुद्धि और मेरा मन सब आपमें समर्पित हैं ।
पराशर → राजन
सतोयेऽन्यत् तु यत् तोयं तस्मिन्नेव प्रसिच्यते ।
वृद्धे वृद्धिमवाप्नोति सलिले सलिलं यथा ॥
एवं कर्माणि यानीह बुद्धियुक्तानि पार्थिव ।
समानि चैव यानीह तानि पुण्यतमान्यपि ॥
राजन्! उसी जलयुक्त पक्के घड़ेमें यदि दूसरा जल डाला जाय तो पात्रमें रखा हुआ पहलेका जल और नया डाला हुआ जल — दोनों मिलकर बढ़ जाते हैं और इस प्रकार वह घड़ा अधिक जलसे सम्पन्न हो जाता है। उसी तरह यहाँ विवेकपूर्वक किये हुए जो पुण्य कर्म संचित हैं, उन्हींके समान जो नये पुण्य कर्म किये जाते हैं — वे दोनों मिलकर अधिक पुण्यतम कर्म हो जाते हैं (और उनके द्वारा वह पुरुष महान् पुण्यात्मा हो जाता है)
पराशर → राजन
पिता सखायो गुरवः स्त्रियश्च ।
न निर्गुणानां हि भवन्ति लोके ।
अनन्यभक्ताः प्रियवादिनश्च ।
हिताश्च वश्याश्च भवन्ति राजन् ॥
राजन्! संसारमें पिता, सखा, गुरुजन और स्त्रियाँ — ये कोई भी उसके नहीं होते, जो सर्वथा गुणहीन हैं; किंतु जो प्रभुके अनन्य भक्त, प्रियवादी, हितैषी और इन्द्रियविजयी हैं, वे ही उसके होते हैं अर्थात् उसका त्याग नहीं करते ।
पराशर ने राजन् से कहा।
श्रीभगवान् उवाच
ये तु तद्भाविता लोके ह्येकान्तित्वं समास्थिताः ।
एतदभ्यधिकं तेषां यत् ते तं प्रविशन्त्युत ॥
जो सदा उसका स्मरण करते तथा अनन्य भावसे उसकी शरण लेते हैं, उन्हें सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि वे उसके स्वरूपमें प्रवेश कर जाते हैं ।
भगवान् नारायण ने नारदजी से इस प्रकार कहा।
भीष्म उवाच
एकान्तभावोपगतास्ते भक्ताः पुरुषोत्तमम् ।
ते सहस्रार्चिषं देवं प्रविशन्ति सनातनम् ।
अनिन्द्रिया निराहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः ॥
वे स्थूल इन्द्रियोंसे रहित, निराहार और निश्चेष्ट होते हैं । उनके शरीरसे मनोहर सुगन्ध निकलती रहती है तथा वे भगवान्के अनन्य भक्त होते हैं और सहस्रों किरणोंवाले उन सनातनदेव भगवान् पुरुषोत्तममें प्रवेश कर जाते हैं ।
भीष्म उवाच
मां प्रविश्य भवन्तीह मुक्ता भक्तास्तु ये मम ।
अहं हि पुरुषो ज्ञेयो निष्क्रियः पञ्चविंशकः ॥
यहाँ जो मेरे भक्त हैं, वे मुझमें ही प्रवेश करके मुक्त होते हैं । मैं ही पचीसवें तत्त्व निष्क्रिय पुरुषरूपसे जानने योग्य हूँ ।
भीष्म → मुने
सिद्धा हि ते महाभागा नरा ह्येकान्तिनोऽभवन् ।
तमोरजोभ्यां निर्मुक्ताः प्रवेक्ष्यन्ति च मां मुने ॥
मुने! ये महाभाग श्वेतद्वीपनिवासी सिद्ध हैं । ये पहले मेरे अनन्य भक्त रहे हैं। ये तमोगुण और रजोगुणसे मुक्त हो गये हैं; इसलिये मेरे भीतर प्रवेश करेंगे ।
श्रीभगवान् उवाच
ब्रह्माणं शितिकण्ठं च याश्चान्या देवताः स्मृताः ।
प्रबुद्धचर्याः सेवन्तो मामेवैष्यन्ति यत् परम् ॥
ज्ञानी भक्त ब्रह्मा, शिव तथा दूसरे देवताओंकी निष्काम भावसे सेवा करते हुए भी अन्तमें मुझ परमात्माको ही प्राप्त होते हैं ।
वृषाकपि उवाच
ये यजन्ति पितॄन् देवान् गुरूंश्चैवातिथींस्तथा ।
गाश्चैव द्विजमुख्यांश्च पृथिवीं मातरं यथा ॥
कर्मणा मनसा वाचा विष्णुमेव यजन्ति ते ।
अन्तर्गतः स भगवान् सर्वसत्त्वशरीरगः ॥
जो देवता, पितर, गुरु, अतिथि, गौ, श्रेष्ठ ब्राह्मण, पृथ्वी और माताकी मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा पूजा करते हैं, वे वास्तवमें भगवान् विष्णुकी ही आराधना करते हैं; क्योंकि भगवान् विष्णु समस्त प्राणियोंके शरीरमें अन्तरात्मारूपसे विराजमान हैं ।
ब्रह्मा उवाच
नारायणपरा वेदा यज्ञा नारायणात्मकाः ।
तपो नारायणपरं नारायणपरा गतिः ॥
वेदोंका पर्यवसान भगवान् नारायणमें ही है । यज्ञ नारायणके ही स्वरूप हैं । तपस्याके परम फल भगवान् नारायण ही हैं तथा नारायणकी प्राप्ति ही सर्वोत्तम गति है ।
जनमेजय उवाच
नूनमेकान्तधर्मोऽयं श्रेष्ठो नारायणप्रियः ।
अगत्वा गतयस्तिस्रो यद् गच्छत्यव्ययं हरिम् ॥
निश्चय ही यह अनन्यभावसे भगवान्का भजनरूप धर्म श्रेष्ठ एवं श्रीनारायणको परम प्रिय है; क्योंकि इसका आश्रय लेनेवाले भक्तजन उक्त तीन गतियोंको प्राप्त न होकर सीधे चौथी गतिमें पहुँचकर अविनाशी श्रीहरिको प्राप्त कर लेते हैं ।
जनमेजय ने वैशम्पायनजी से कहा।
वैशम्पायन → राजन
एवमेष महान् धर्म आद्यो राजन् सनातनः ।
दुर्विज्ञेयो दुष्करश्च सात्वतैर्धार्यते सदा ॥
राजन्! इस प्रकार यह आदि एवं महान् धर्म सनातनकालसे चला आ रहा है । यह दूसरोंके लिये दुर्ज्ञेय और दुष्कर है। भगवान्के भक्त सदा ही इस धर्मको धारण करते हैं ।
वैशम्पायन उवाच
एकान्तिनो हि पुरुषा दुर्लभा बहवो नृप ।
यद्येकान्तिभिराकीर्णं जगत् स्यात् कुरुनन्दन ॥
अहिंसकैरात्मविद्भिः सर्वभूतहिते रतैः ।
भवेत् कृतयुगप्राप्तिराशीःकर्मविवर्जिता ॥
नरेश्वर! भगवान्के अनन्य भक्त दुर्लभ हैं, क्योंकि ऐसे पुरुष बहुत नहीं हुआ करते । कुरुनन्दन! यदि सम्पूर्ण भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले, आत्मज्ञानी, अहिंसक एवं अनन्य भक्तोंसे जगत् भर जाय तो यहाँ सर्वत्र सत्ययुग ही छा जाय और कहीं भी सकाम कर्मोंका अनुष्ठान न हो ।
वैशम्पायनजी ने जनमेजय से कहा।