श्रीगणेशाय नमः।
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २
ज्ञान–विवेक
आत्मबोध और विवेक
10 पद्य
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २
अस्मिन् काले महाप्राज्ञ सत्त्वमातिष्ठ तेजसा ।
शूराणां हि मनुष्याणां त्वद्विधानां महात्मनाम् ।
विनष्टे वा प्रणष्टे वा शोकः सर्वार्थनाशनः ॥
अतः महाप्राज्ञ श्रीराम! आप इस समय तेजके साथ ही धैर्यका आश्रय लें । कोई वस्तु खो गयी हो या नष्ट हो गयी हो, उसके लिये आप-जैसे शूरवीर महात्मा पुरुषोंको शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि शोक सब कामको बिगाड़ देता है ।
अनुपायेन कर्माणि विपरीतानि यानि च ।
क्रियमाणानि दुष्यन्ति हवींष्यप्रयतेष्विव ॥
जो कर्म उचित उपायका अवलम्बन किये बिना ही किये जाते हैं तथा जो लोक और शास्त्र के विपरीत होते हैं, वे पाप-कर्म उसी तरह दोषकी प्राप्ति कराते हैं, जैसे अपवित्र आभि-चारिक यज्ञों में होमे गये हविष्य ।
कामातुर रावण का यह खेदपूर्ण प्रलाप सुनकर कुम्भकर्ण को क्रोध आ गया और उसने इस प्रकार कहा।
गृहीतो वा न विज्ञातो भारोऽज्ञानस्य वाह्यते ।
ईदृशैः सचिवैर्युक्तो मूर्खैर्दिष्ट्या धराम्यहम् ॥
यदि तुमने उसे ग्रहण भी किया हो तो भी इस समय तुम्हें उसका ज्ञान नहीं रह गया है — तुमने उसे भुला दिया है । तुमलोग केवल अज्ञानका बोझ ढो रहे हो । ऐसे मूर्ख मन्त्रियोंके सम्पर्क में रहते हुए भी जो मैं अपने राज्यको सुरक्षित रख सका हूँ, यह सौभाग्यकी ही बात है ।
रावण ने शुक और सारण से क्रोधपूर्वक यह कठोर बात कही।
आचार्या गुरवो वृद्धा वृथा वां पर्युपासिताः ।
सारं यद् राजशास्त्राणामनुजीव्यं न गृह्यते ॥
तुमलोगोंने आचार्य, गुरु और वृद्धोंकी व्यर्थ ही सेवा की है; क्योंकि राजनीतिका जो संग्रहणीय सार है, उसे तुम नहीं ग्रहण कर सके ।
रावण ने बात समाप्त होने पर वीर शुक और सारण को क्रोधपूर्वक यह कठोर बात कही।
भूतानां स्थावराणां च जङ्गमानां च दर्शनम् ।
यथास्ति न तथा धर्मस्तेन नास्तीति मे मतिः ॥
स्थावरों तथा पशु आदि जङ्गम प्राणियोंको भी सुखका प्रत्यक्ष अनुभव होता है; किंतु उनके सुखमें धर्मं कारण नहीं है (क्योंकि न तो उनमें धर्माचरणकी शक्ति है और न धर्म में उनका अधिकार ही है) । अतः धर्मं सुखका साधन नहीं है; ऐसा मेरा विचार है ।
लक्ष्मण ने अस्वस्थ श्रीराम से यह बात कही।
एतत् तदुक्तमव्यक्तमक्षरं ब्रह्मसम्मितम् ।
देवानां हृदयं सौम्य गुह्यं रामः परंतपः ॥
सौम्य! शत्रुओं को संताप देनेवाले ये श्रीराम देवताओंके हृदय और परम गुह्य तत्त्व हैं । ये ही वेदोंद्वारा प्रतिपादित अव्यक्त एवं अविनाशी ब्रह्म है ।
राजा दशरथ ने लक्ष्मण से कहा।
नहि धर्माभिरतानां लोके किंचन दुर्लभम् ॥
‘क्योंकि जो धर्म में अनुरक्त हैं, उनके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है’
विभीषण ने ब्रह्माजी से कहा।
तस्मात् पुत्रेषु दारेषु मित्रेषु च धनेषु च ।
नातिप्रसङ्गः कर्तव्यो विप्रयोगो हि तैर्ध्रुवम् ॥
अतः स्त्री, पुत्र, मित्र और धनमें विशेष आसक्ति नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उनसे वियोग होना निश्चित है ।
लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा।
लोकपीडाकरं कर्म न कर्तव्यं विचक्षणैः ।
बालानां तु शुभं वाक्यं ग्राह्यं लक्ष्मणपूर्वज ।
तस्माच्छृणोमि ते वाक्यं साधु युक्तं महाबल ॥
‘लक्ष्मण के बड़े भाई! बुद्धिमान् पुरुषोंको ऐसा कर्म नहीं करना चाहिये, जो सम्पूर्ण जगत् को पीड़ा देने वाला हो । बालकोंकी कही हुई बात भी यदि अच्छी हो तो उसे ग्रहण करना ही उचित है; अतः महाबली वीर! मैंने तुम्हारी उत्तम एवं युक्तिसंगत बातको बड़े ध्यान से सुना है’
भरत ने श्रीराम से कहा।
तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना तपः कुर्यामनुत्तमम् ।
तपो हि परमं श्रेयः सम्मोहमितरत् सुखम् ॥
एक समय वृत्रासुरके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं परम उत्तम तप करूँ; क्योंकि तप ही परम कल्याणका साधन है । दूसरा सारा सुख तो मोहमात्र ही है ।
लक्ष्मण ने श्रीराम को वृत्रासुर की कथा सुनाते हुए कहा।