श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २

ज्ञान–विवेक

आत्मबोध और विवेक

10 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २

शोक का त्याग

अस्मिन् काले महाप्राज्ञ सत्त्वमातिष्ठ तेजसा ।

शूराणां हि मनुष्याणां त्वद्विधानां महात्मनाम् ।

विनष्टे वा प्रणष्टे वा शोकः सर्वार्थनाशनः ॥

अतः महाप्राज्ञ श्रीराम! आप इस समय तेजके साथ ही धैर्यका आश्रय लें । कोई वस्तु खो गयी हो या नष्ट हो गयी हो, उसके लिये आप-जैसे शूरवीर महात्मा पुरुषोंको शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि शोक सब कामको बिगाड़ देता है ।

युद्धकाण्ड, अध्याय 2, श्लोक 15 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 240 धर्म–आचरण
अनुचित कर्मों का दोष

अनुपायेन कर्माणि विपरीतानि यानि च ।

क्रियमाणानि दुष्यन्ति हवींष्यप्रयतेष्विव ॥

जो कर्म उचित उपायका अवलम्बन किये बिना ही किये जाते हैं तथा जो लोक और शास्त्र के विपरीत होते हैं, वे पाप-कर्म उसी तरह दोषकी प्राप्ति कराते हैं, जैसे अपवित्र आभि-चारिक यज्ञों में होमे गये हविष्य ।

कामातुर रावण का यह खेदपूर्ण प्रलाप सुनकर कुम्भकर्ण को क्रोध आ गया और उसने इस प्रकार कहा।

युद्धकाण्ड, अध्याय 12, श्लोक 31 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 266 कर्म–प्रारब्ध
अज्ञान का बोझ

गृहीतो वा न विज्ञातो भारोऽज्ञानस्य वाह्यते ।

ईदृशैः सचिवैर्युक्तो मूर्खैर्दिष्ट्या धराम्यहम् ॥

यदि तुमने उसे ग्रहण भी किया हो तो भी इस समय तुम्हें उसका ज्ञान नहीं रह गया है — तुमने उसे भुला दिया है । तुमलोग केवल अज्ञानका बोझ ढो रहे हो । ऐसे मूर्ख मन्त्रियोंके सम्पर्क में रहते हुए भी जो मैं अपने राज्यको सुरक्षित रख सका हूँ, यह सौभाग्यकी ही बात है ।

रावण ने शुक और सारण से क्रोधपूर्वक यह कठोर बात कही।

युद्धकाण्ड, अध्याय 29, श्लोक 10 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 316 नीति–व्यवहार
अज्ञान का बोझ

आचार्या गुरवो वृद्धा वृथा वां पर्युपासिताः ।

सारं यद् राजशास्त्राणामनुजीव्यं न गृह्यते ॥

तुमलोगोंने आचार्य, गुरु और वृद्धोंकी व्यर्थ ही सेवा की है; क्योंकि राजनीतिका जो संग्रहणीय सार है, उसे तुम नहीं ग्रहण कर सके ।

रावण ने बात समाप्त होने पर वीर शुक और सारण को क्रोधपूर्वक यह कठोर बात कही।

युद्धकाण्ड, अध्याय 29, श्लोक 9 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 316 नीति–व्यवहार
धर्म और सुख

भूतानां स्थावराणां च जङ्गमानां च दर्शनम् ।

यथास्ति न तथा धर्मस्तेन नास्तीति मे मतिः ॥

स्थावरों तथा पशु आदि जङ्गम प्राणियोंको भी सुखका प्रत्यक्ष अनुभव होता है; किंतु उनके सुखमें धर्मं कारण नहीं है (क्योंकि न तो उनमें धर्माचरणकी शक्ति है और न धर्म में उनका अधिकार ही है) । अतः धर्मं सुखका साधन नहीं है; ऐसा मेरा विचार है ।

लक्ष्मण ने अस्वस्थ श्रीराम से यह बात कही।

युद्धकाण्ड, अध्याय 83, श्लोक 15 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 519
राम का ब्रह्म स्वरूप

एतत् तदुक्तमव्यक्तमक्षरं ब्रह्मसम्मितम् ।

देवानां हृदयं सौम्य गुह्यं रामः परंतपः ॥

सौम्य! शत्रुओं को संताप देनेवाले ये श्रीराम देवताओंके हृदय और परम गुह्य तत्त्व हैं । ये ही वेदोंद्वारा प्रतिपादित अव्यक्त एवं अविनाशी ब्रह्म है ।

राजा दशरथ ने लक्ष्मण से कहा।

युद्धकाण्ड, अध्याय 119, श्लोक 32 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 632
धर्मनिष्ठों की सामर्थ्य

नहि धर्माभिरतानां लोके किंचन दुर्लभम् ॥

‘क्योंकि जो धर्म में अनुरक्त हैं, उनके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है’

विभीषण ने ब्रह्माजी से कहा।

उत्तरकाण्ड, अध्याय 10, श्लोक 33 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 693 धर्म–आचरण
आसक्ति का त्याग

तस्मात् पुत्रेषु दारेषु मित्रेषु च धनेषु च ।

नातिप्रसङ्गः कर्तव्यो विप्रयोगो हि तैर्ध्रुवम् ॥

अतः स्त्री, पुत्र, मित्र और धनमें विशेष आसक्ति नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उनसे वियोग होना निश्चित है ।

लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा।

उत्तरकाण्ड, अध्याय 52, श्लोक 12 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 803 वैराग्य
बुद्धिमानों का कर्तव्य

लोकपीडाकरं कर्म न कर्तव्यं विचक्षणैः ।

बालानां तु शुभं वाक्यं ग्राह्यं लक्ष्मणपूर्वज ।

तस्माच्छृणोमि ते वाक्यं साधु युक्तं महाबल ॥

‘लक्ष्मण के बड़े भाई! बुद्धिमान् पुरुषोंको ऐसा कर्म नहीं करना चाहिये, जो सम्पूर्ण जगत् को पीड़ा देने वाला हो । बालकोंकी कही हुई बात भी यदि अच्छी हो तो उसे ग्रहण करना ही उचित है; अतः महाबली वीर! मैंने तुम्हारी उत्तम एवं युक्तिसंगत बातको बड़े ध्यान से सुना है’

भरत ने श्रीराम से कहा।

उत्तरकाण्ड, अध्याय 83, श्लोक 20 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 862 नीति–व्यवहार
तप का महत्त्व

तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना तपः कुर्यामनुत्तमम् ।

तपो हि परमं श्रेयः सम्मोहमितरत् सुखम् ॥

एक समय वृत्रासुरके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं परम उत्तम तप करूँ; क्योंकि तप ही परम कल्याणका साधन है । दूसरा सारा सुख तो मोहमात्र ही है ।

लक्ष्मण ने श्रीराम को वृत्रासुर की कथा सुनाते हुए कहा।

उत्तरकाण्ड, अध्याय 84, श्लोक 9 वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ पृ. 862 वैराग्य