श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ३
कर्म–प्रारब्ध
कर्म और उसका फल
32 पद्य
महाभारत — खण्ड ३
संजय उवाच
इह क्षेत्रे क्रियते पार्थ कार्यं ।
न वै किञ्चित् क्रियते प्रेत्य कार्यम् ।
कृतं त्वया पारलौक्यं च कर्म ।
पुण्यं महत् सद्भिरतिप्रशस्तम् ॥
कुन्तीनन्दन! इस शरीरके रहते हुए ही कोई भी सत्कर्म किया जा सकता है । मरनेके बाद कोई कार्य नहीं किया जा सकता । आपने तो परलोकमें सुख देनेवाला महान् पुण्यकर्म किया है, जिसकी साधु पुरुषोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की है ।
वासुदेव उवाच
या वै विद्याः साधयन्तीह कर्म ।
तासां फलं विद्यते नेतरासाम् ।
तत्रेह वै दृष्टफलं तु कर्म ।
पीत्वोदकं शाम्यति तृष्णयाऽऽर्तः ॥
जो विद्याएँ कर्मका सम्पादन करती हैं, उन्हींका फल दृष्टिगोचर होता है, दूसरी विद्याओंका नहीं । विद्या तथा कर्ममें भी कर्मका ही फल यहाँ प्रत्यक्ष दिखायी देता है । प्याससे पीड़ित मनुष्य जल पीकर ही शान्त होता है (उसे जानकर नहीं; अतः गृहस्थाश्रममें रहकर सत्कर्म करना ही श्रेष्ठ है)
वासुदेव उवाच
सोऽयं विधिर्विहितः कर्मणैव ।
संवर्तते संजय तत्र कर्म ।
तत्र योऽन्यत् कर्मणः साधु मन्येन्मोघं तस्यालपितं दुर्बलस्य ॥
संजय! ज्ञानका विधान भी कर्मको साथ लेकर ही है; अतः ज्ञानमें भी कर्म विद्यमान है । जो कर्मसे भिन्न कर्मोंके त्यागको श्रेष्ठ मानता है, वह दुर्बल है, उसका कथन व्यर्थ ही है ।
युधिष्ठिर उवाच
उत सन्तमसन्तं वा बालं वृद्धं च संजय ।
उताबलं बलीयांसं धाता प्रकुरुते वशे ॥
युधिष्ठिर बोले — संजय! साधु-असाधु, बालक-वृद्ध तथा निर्बल एवं बलिष्ठ — सबको विधाता अपने वशमें रखता है ।
युधिष्ठिर ने सञ्जय से कहा।
संजय उवाच
एतान् गुणान् कर्मकृतानवेक्ष्य ।
भावाभावौ वर्तमानावनित्यौ ।
बलिर्हि राजा पारमविन्दमानो ।
नान्यत् कालात् कारणं तत्र मेने ॥
ये शौर्य, विद्या आदि गुण अपने पूर्वकर्मके अनुसार ही प्राप्त होते हैं और प्राणियोंकी वर्तमान उन्नति तथा अवनति भी अनित्य हैं । यह सब सोचकर राजा बलिने जब इसका पार नहीं पाया, तब यही निश्चय किया कि इस विषयमें काल (दैव)-के सिवा और कोई कारण नहीं है ।
संजय उवाच
न त्वेव मन्ये पुरुषस्य कर्म ।
संवर्तते सुप्रयुक्तं यथावत् ।
मातुः पितुः कर्मणाभिप्रसूतः ।
संवर्धते विधिवद् भोजनेन ॥
कहते हैं, केवल पुरुषार्थका अच्छे ढंगसे प्रयोग होनेपर भी वह उत्तम फल देनेवाला होता है, जैसे माता-पिताके प्रयत्नसे उत्पन्न हुआ पुत्र विधिपूर्वक भोजनादिद्वारा वृद्धिको प्राप्त होता है; परंतु मैं इस मान्यतापर विश्वास नहीं करता (क्योंकि इस विषयमें दैव ही प्रधान है)
विदुर उवाच
अनुबन्धं च सम्प्रेक्ष्य विपाकं चैव कर्मणाम् ।
उत्थानमात्मनश्चैव धीरः कुर्वीत वा न वा ॥
धीर मनुष्यको उचित है कि पहले कर्मोंका प्रयोजन, परिणाम तथा अपनी उन्नतिका विचार करके फिर काम आरम्भ करे या न करे ।
विदुर उवाच
पूर्वे वयसि तत् कुर्याद् येन वृद्धः सुखं वसेत् ।
यावज्जीवेन तत् कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत् ॥
पहली अवस्थामें वह काम करे, जिससे वृद्धावस्थामें सुखपूर्वक रह सके और जीवनभर वह कार्य करे, जिससे मरनेके बाद भी (परलोकमें) सुखसे रह सके ।
विदुर उवाच
कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते ।
तदेवापहरत्येनं तस्मात् कल्याणमाचरेत् ॥
मनुष्य मन, वाणी और कर्मसे जिसका निरन्तर सेवन करता है, वह कार्य उस पुरुषको अपनी ओर खींच लेता है । इसलिये सदा कल्याणकारी कार्योंको ही करे ।
विदुर उवाच
अग्नौ प्रास्तं तु पुरुषं कर्मान्वेति स्वयंकृतम् ।
तस्मात् तु पुरुषो यत्नाद् धर्मं संचिनुयाच्छनैः ॥
अग्निमें डाले हुए उस पुरुषके पीछे तो केवल उसका अपना किया हुआ बुरा या भला कर्म ही जाता है । इसलिये पुरुषको चाहिये कि वह धीरे-धीरे प्रयत्नपूर्वक धर्मका ही संग्रह करे ।
सनत्सुजात उवाच
गत्वोभयं कर्मणा युज्यतेऽस्थिरं ।
शुभस्य पापस्य स चापि कर्मणा ।
धर्मेण पापं प्रणुदतीह विद्वान् ।
धर्मो बलीयानिति तस्य सिद्धिः ॥
इस प्रकार पुण्य और पापके जो स्वर्ग-नरकरूप दो अस्थिर फल हैं, उनका भोग करके वह (इस जगत्में जन्म ले) पुनः तदनुसार कर्मोंमें लग जाता है; किंतु कर्मोंके तत्त्वको जाननेवाला पुरुष निष्कामधर्मरूप कर्मके द्वारा अपने पूर्वपापका यहाँ ही नाश कर देता है । इस प्रकार धर्म ही अत्यन्त बलवान् है । इसलिये निष्कामभावसे धर्माचरण करनेवालोंको समयानुसार अवश्य सिद्धि प्राप्त होती है ।
सनत्सुजात ने धृतराष्ट्र से कहा।
सनत्सुजात → राजन
न कर्मणा सुकृतेनैव राजन् ।
सत्यं जयेज्जुहुयाद् वा यजेद् वा ।
नैतेन बालोऽमृत्युमभ्येति राजन् ।
रतिं चासौ न लभत्यन्तकाले ॥
राजन्! (निष्कामभावके बिना किये हुए) केवल पुण्यकर्मके द्वारा सत्यस्वरूप ब्रह्मको नहीं जीता जा सकता । अथवा जो हवन या यज्ञ किया जाता है, उससे भी अज्ञानी पुरुष अमरत्व — मुक्तिको नहीं पा सकता तथा अन्तकालमें उसे शान्ति भी नहीं मिलती ।
सनत्सुजात ने धृतराष्ट्र से कहा।
संजय उवाच
ते चेदस्मान् युध्यमानाञ्जयेयुदेवैर्महेन्द्रप्रमुखैः सहायैः ।
धर्मादधर्मश्चरितो गरीयांततो ध्रुवं नास्ति कृतं च साधु ॥
यदि इन्द्र आदि देवताओंकी सहायता पाकर भी धृतराष्ट्रपुत्र हमें युद्धमें जीत लेंगे तो यह मानना पड़ेगा कि धर्मकी अपेक्षा पापाचारका ही महत्त्व अधिक है और संसारसे पुण्यकर्मका अस्तित्व निश्चय ही उठ गया ।
संजय → राजन
न चेदिदं कर्म नरेन्द्र वन्ध्यं ।
न चेद् भवेत् सुकृतं निष्फलं वा ।
इदं च तच्चाभिसमीक्ष्य नूनं ।
पराजयो धार्तराष्ट्रस्य साधुः ॥
राजन्! यदि मनुष्यका किया हुआ यह पापकर्म निष्फल नहीं होता अथवा पुण्यकर्मोंका फल मिले बिना नहीं रहता तो मैं दुर्योधनके वर्तमान और पहलेके किये हुए पापकर्मका विचार करके निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि धृतराष्ट्रपुत्रकी पराजय अनिवार्य है और इसीमें जगत्की भलाई है ।
युधिष्ठिर उवाच
यदस्य धर्म्यं मरणं शाश्वतं लोकवर्त्म तत् ।
समन्तात् सर्वभूतानां न तदत्येति कश्चन ॥
मनुष्यकी जो धर्मानुकूल मृत्यु है, वह परलोकके लिये सनातन मार्ग है । सम्पूर्ण प्राणियोंमेंसे कोई भी उस मृत्युका सब ओरसे उल्लंघन नहीं कर सकता ।
श्रीभगवान् उवाच
यदन्यद् दिष्टभावस्य पुरुषस्य स्वयंकृतम् ।
तस्मादनुपरोधश्च विद्यते तत्र लक्षणम् ॥
प्रारब्धके अतिरिक्त जो पुरुषका स्वयं अपना किया हुआ कर्म है, उससे भी फलकी सिद्धि होती है । इस विषयमें यथेष्ट उदाहरण मिलते हैं ।
श्रीभगवान् उवाच
लोकस्य नान्यतो वृत्तिः पाण्डवान्यत्र कर्मणः ।
एवंबुद्धिः प्रवर्तेत फलं स्यादुभयान्वये ॥
पाण्डुनन्दन! पुरुषार्थको छोड़कर दूसरे किसी साधनसे-केवल दैवसे मनुष्यका जीवन-निर्वाह नहीं हो सकता । ऐसा विचारकर उसे कर्ममें प्रवृत्त होना चाहिये । फिर प्रारब्ध और पुरुषार्थ दोनोंके सम्बन्धसे फलकी प्राप्ति होगी ।
श्रीकृष्ण ने भीमसेन को सम्बोधित करते हुए पुरुषार्थ और प्रारब्ध के सम्बन्ध में यह विचार व्यक्त किया।
अर्जुन उवाच
अफलं मन्यसे वापि पुरुषस्य पराक्रमम् ।
न चान्तरेण कर्माणि पौरुषेण फलोदयः ॥
अथवा आप मनुष्यके पराक्रमको निष्फल मानते हैं; क्योंकि पूर्वजन्मके कर्म (प्रारब्ध)-के बिना केवल पुरुषार्थसे किसी फलकी प्राप्ति नहीं होती ।
अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा।
वैशम्पायन उवाच
अस्मिंश्चेदागते काले मिथ्या चातिक्रमिष्यति ।
लोकसम्भाविताः सन्तः सुनृशंसं करिष्यथ ॥
नृशंसेन च वो युक्तांस्त्यजेयं शाश्वतीः समाः ।
काले हि समनुप्राप्ते त्यक्तव्यमपि जीवनम् ॥
यदि ऐसा समय आनेपर भी तुम युद्ध नहीं करोगे तो यह व्यर्थ बीत जायगा । तुमलोग इस जगत्के सम्मानित पुरुष हो । यदि तुम कोई अत्यन्त घृणित कर्म कर डालोगे तो उस नृशंस कर्मसे युक्त होनेके कारण मैं तुम्हें सदाके लिये त्याग दूँगी । पुत्रो! तुम्हें तो समय आनेपर अपने प्राणोंको भी त्याग देनेके लिये उद्यत रहना चाहिये ।
श्रीभगवान् उवाच
मनसा चिन्तयन् पापं कर्मणा नातिरोचयन् ।
न प्राप्नोति फलं तस्येत्येवं धर्मविदो विदुः ॥
इसी प्रकार यदि मनुष्य मनसे पापका चिन्तन करते हुए भी उसमें रुचि न होनेके कारण उसे क्रियाद्वारा सम्पादित न करे, तो उसे उस पापका फल नहीं मिलता है । ऐसा धर्मज्ञ पुरुष जानते हैं ।
माता → तात
सर्वेषां कर्मणां तात फले नित्यमनित्यता ।
अनित्यमिति जानन्तो न भवन्ति भवन्ति च ॥
तात! सभी कर्मोंके फलमें सदा अनित्यता रहती है — कभी उनका फल मिलता है और कभी नहीं भी मिलता है । इस अनित्यताको जानते हुए भी बुद्धिमान् पुरुष कर्म करते हैं और वे कभी असफल होते हैं, तो कभी सफल भी हो जाते हैं ।
माता उवाच
अथ ये नैव कुर्वन्ति नैव जातु भवन्ति ते ।
ऐकगुण्यमनीहायामभावः कर्मणां फलम् ।
अथ द्वैगुण्यमीहायां फलं भवति वा न वा ॥
परंतु जो कर्मोंका आरम्भ ही नहीं करते, वे तो कभी अपने अभीष्टकी सिद्धिमें सफल नहीं होते, अतः कर्मोंको छोड़कर निश्चेष्ट बैठनेका यह एक ही परिणाम होता है कि मनुष्योंको कभी अभीष्ट मनोरथकी प्राप्ति नहीं हो सकती । परंतु कर्मोंमें उत्साहपूर्वक लगे रहनेपर तो दोनों प्रकारके परिणामोंकी सम्भावना रहती है — कर्मोंका वांछनीय फल प्राप्त भी हो सकता है और नहीं भी ।
संजय उवाच
शृणुष्वानवशेषेण वदतो मम पार्थिव ।
य आत्मनो दुश्चरितादशुभं प्राप्नुयान्नरः ।
न स कालं न वा देवानेनसा गन्तुमर्हति ॥
भूपाल! मैं सारी बातें बता रहा हूँ, आप सुनिये । जो मनुष्य अपने बुरे आचरणसे अशुभ फल पाता है, वह काल अथवा देवताओंपर दोषारोपण करनेका अधिकारी नहीं है ।
संजय → पार्थ
तदा मनस्ते त्रिदिवादिवाशुचेर्निवर्तिता पार्थ महीप्रशासनात् ।
प्रशाम्य राज्यं हि सुदुर्लभं त्वया ।
बुभूषितः स्वर्ग इवातपस्विना ॥
पार्थ! जैसे अपवित्र मनुष्यका मन स्वर्गकी ओरसे निवृत्त हो जाता है (क्योंकि उसके लिये स्वर्गकी प्राप्ति असम्भव है), उसी प्रकार तुम्हारा मन भी उस समय इस पृथ्वीपर राज्यशासन करनेसे निराश होकर निवृत्त हो जायगा । अर्जुन! शान्त होकर बैठ जाओ । राज्य तुम्हारे लिये अत्यन्त दुर्लभ है। जिसने तपस्या नहीं की है, वह जैसे स्वर्ग पाना चाहे, उसी प्रकार तुमने भी राज्यकी अभिलाषा की है ।
भीष्म उवाच
मयैव यानि कर्माणि पूर्वदेहे तु मूढया ।
कृतानि नूनं पापानि तेषामेतत् फलं ध्रुवम् ॥
मुझ मूढ़ नारीने अपने पूर्वजन्मके शरीरसे जो पापकर्म किये थे, अवश्य ही उन्हींका यह दुःखदायक फल प्राप्त हुआ है ।
संजय उवाच
य आत्मनो दुश्चरितादशुभं प्राप्नुयान्नरः ।
एनसा तेन नान्यं स उपाशङ्कितुमर्हति ॥
जो मनुष्य अपने दुष्कर्मोंके कारण अशुभ फल भोग रहा हो, उसे उस पापकी आशंका दूसरेपर नहीं करनी चाहिये ।
श्रीभगवान् उवाच
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि ॥
जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्तिरहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धिको प्राप्त हुए थे । इसलिये तथा लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू कर्म करनेको ही योग्य है अर्थात् तुझे कर्म करना ही उचित है ।
श्रीभगवान् → पार्थ
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥
श्रीभगवान् बोले — हे पार्थ! उस पुरुषका न तो इस लोकमें नाश होता है और न परलोकमें ही; क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धारके लिये अर्थात् भगवत्प्राप्तिके लिये कर्म करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता ।
श्रीभगवान् उवाच
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥
परंतु निष्कामभावसे श्रेष्ठ कर्मोंका आचरण करनेवाले जिन पुरुषोंका पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषजनित द्वन्द्वरूप मोहसे मुक्ता दृढनिश्चयी भक्त मुझको सब प्रकारसे भजते हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा।
श्रीभगवान् उवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥
श्रीभगवान्ने कहा — परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरूप अर्थात् जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नामसे कहा जाता है तथा भूतोंके भावको उत्पन्न करनेवाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नामसे कहा गया है ।
संजय → राजन
आत्मनैव कृतं कर्म आत्मनैवोपभुज्यते ।
इह च प्रेत्य वा राजंस्त्वया प्राप्तं यथातथम् ॥
राजन्! इहलोक अथवा परलोकमें अपने किये हुए कर्मका फल अपने-आपको ही भोगना पड़ता है; अतः आपको जैसेका तैसा प्राप्त हुआ है ।
संजय ने धृतराष्ट्र से कहा।
धृतराष्ट्र → तात
न हि दुर्योधनो मन्दः पुरा प्रोक्तमबुध्यत ।
वार्यमाणो मया तात भीष्मेण विदुरेण च ॥
गान्धार्या चैव दुर्मेधाः सततं हितकाम्यया ।
नाबुध्यत पुरा मोहात् तस्य प्राप्तमिदं फलम् ॥
यद् भीमसेनः समरे पुत्रान् मम विचेतसः ।
अहन्यहनि संक्रुद्धो नयते यमसादनम् ॥
मूर्ख दुर्योधनने पहले मेरी कही हुई बातोंपर ध्यान नहीं दिया । तात! मैंने, भीष्मने, विदुरने तथा गान्धारीने भी सदा हितकी इच्छासे दुर्बुद्धि दुर्योधनको बार-बार मना किया; परंतु मोहवश पूर्वकालमें हमारी ये बातें उसके समझमें नहीं आयीं । उसीका यह फल अब प्राप्त हुआ है, जिससे भीमसेन समरांगणमें कुपित होकर मेरे मूर्ख पुत्रोंको प्रतिदिन यमलोक भेज रहा है ।