श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५
शरणागति
समर्पण और प्रभु पर भरोसा
14 पद्य
महाभारत — खण्ड ५
भीष्म उवाच
यमनन्यो व्यपेताशीरात्मानं वीतकल्मषम् ।
दृष्ट्यानन्त्याय गोविन्दं पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥
अतिवाय्विन्द्रकर्माणमतिसूर्यातितेजसम् ।
अतिबुद्धीन्द्रियात्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ॥
सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके अनन्यभावसे स्थित रहनेवाला साधक मोक्षके उद्देश्यसे अपने विशुद्ध अन्तःकरणमें जिन पापरहित शुद्ध-बुद्ध परमात्मा गोविन्दका ज्ञानदृष्टिसे साक्षात्कार करता है, जिनका पराक्रम वायु और इन्द्रसे बहुत बढ़कर है, जो अपने तेजसे सूर्यको भी तिरस्कृत कर देते हैं तथा जिनके स्वरूपतक इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी भी पहुँच नहीं हो पाती, उन प्रजापालक परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ ।
भीष्म → राजन
यस्मिन् भयार्दितः सम्यक् क्षेमं विन्दत्यपि क्षणम् ।
स स्वर्गजित्तमोऽस्माकं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥
भीष्मजीने कहा — राजन्! भयसे डरा हुआ मनुष्य जिसके पास जाकर एक क्षणके लिये भी भलीभाँति शान्ति पा लेता है, वही हमलोगोंमें स्वर्गलोककी प्राप्तिका सबसे बड़ा अधिकारी है, यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ ।
युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्मजी ने स्वर्ग-प्राप्ति का साधन बताया।
भीष्म उवाच
य एनं संश्रयन्तीह भक्ता नारायणं हरिम् ।
ते तरन्तीह दुर्गाणि न चात्रास्ति विचारणा ॥
जो भक्त पुरुष यहाँ इन भगवान् श्रीहरि-नारायण देवकी शरण लेते हैं, वे दुस्तर संकटोंसे तर जाते हैं । इस विषयमें कोई संशय नहीं है ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर को सम्बोधित करते हुए कहा।
भीष्म उवाच
भगवन्तमजं दिव्यं विष्णुमव्यक्तसंज्ञितम् ।
भावेन यान्ति शुद्धा ये ज्ञानतृप्ता निराशिषः ॥
जो सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे युक्त, अजन्मा, दिव्य एवं अव्यक्त नामवाले भगवान् विष्णुकी भक्तिभावसे शरण लेते हैं, वे ज्ञानानन्दसे तृप्त, विशुद्ध और कामनारहित हो जाते हैं ।
व्यास उवाच
त्यक्त्वा पूर्वकृतं कर्म रतिर्यस्य सदाऽऽत्मनि ।
सर्वभूतात्मभूतस्य गुणवर्गेष्वसज्जतः ॥
जो अपने पूर्वकृत कर्मोंके संस्कारोंका त्याग करके सदा परमात्मामें ही अनुराग रखता है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा हो जाता है और विषयोंमें कभी आसक्त नहीं होता ।
भीष्म उवाच
रक्ष मां रक्षणीयोऽहं तवानघ नमोऽस्तु ते ।
भक्तानुकम्पी भगवान् भक्तश्चाहं सदा त्वयि ॥
अनघ! मैं आपके द्वारा रक्षित होने योग्य हूँ, आप अवश्य मेरी रक्षा करें, मैं आपको नमस्कार करता हूँ । आप भक्तोंपर दया करनेवाले भगवान् हैं और मैं सदाके लिये आपका भक्त हूँ ।
भीष्म उवाच
प्रसीद मम भद्रं ते भव भावगतस्य मे ।
त्वयि मे हृदयं देव त्वयि बुद्धिर्मनस्त्वयि ॥
भगवन् भव! आपका भला हो, मैं भक्तिभावके साथ आपकी शरणमें आया हूँ, इसलिये अब मुझपर प्रसन्न होइये । मेरा हृदय, मेरी बुद्धि और मेरा मन सब आपमें समर्पित हैं ।
भीष्म उवाच
परमा सा गतिः पार्थ निर्द्वन्द्वानां महात्मनाम् ।
सत्यार्जवरतानां वै सर्वभूतदयावताम् ॥
कुन्तीकुमार! जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित, सत्यवादी, सरल तथा सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनेवाले हैं, उन महात्माओंको वही परमगति मिलती है ।
वसिष्ठ उवाच
अयमत्र भवेद् बन्धुरनेन सह मे क्षमम् ।
साम्यमेकत्वमायातो यादृशस्तादृशस्त्वहम् ॥
वास्तवमें इस जगत्के भीतर यह परमात्मा ही मेरा बन्धु है । इसीके साथ मेरी मैत्री हो सकती है । पहले मैं कैसा भी क्यों न रहा होऊँ, इस समय तो मैं इसकी समानता और एकताको प्राप्त हो चुका हूँ, जैसा वह है वैसा ही मैं हूँ ।
श्रीभगवान् उवाच
ये तु तद्भाविता लोके ह्येकान्तित्वं समास्थिताः ।
एतदभ्यधिकं तेषां यत् ते तं प्रविशन्त्युत ॥
जो सदा उसका स्मरण करते तथा अनन्य भावसे उसकी शरण लेते हैं, उन्हें सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि वे उसके स्वरूपमें प्रवेश कर जाते हैं ।
भगवान् नारायण ने नारदजी से इस प्रकार कहा।
समाहितमनस्काश्च नियताः संयतेन्द्रियाः ।
एकान्तभावोपगता वासुदेवं विशन्ति ते ॥
जिन्होंने अपने मनको एकाग्र कर लिया है, जो शौच संतोष आदि नियमोंसे सम्पन्न और जितेन्द्रिय हैं, वे अनन्य भावसे भगवान्की शरणमें गये हुए भक्त साक्षात् वासुदेवमें प्रवेश करते हैं ।
असुरवधकरस्तपसां निधिः सुमहतां यशसां च भाजनम् ।
मधुकैटभहा कृतधर्मविदां गतिदोऽभयदो मखभागहरोऽस्तु शरणं स ते ॥
असुरोंका वध करनेवाले, तपस्याकी निधि, विशाल यशके भाजन, मधु और कैटभके हन्ता, सत्ययुगके धर्मोंका ज्ञान रखकर उनका पालन करनेवालोंको सद्गति प्रदान करनेवाले, अभयदाता तथा यज्ञका भाग ग्रहण करनेवाले भगवान् नारायण तुम्हें शरण दें ।
ब्रह्मा उवाच
ये केचित् सर्वलोकेषु दैवं पित्र्यं च कुर्वते ।
दानानि च प्रयच्छन्ति तप्यन्ते च तपो महत् ॥
सर्वेषामाश्रयो विष्णुरैश्वरं विधिमास्थितः ।
सर्वभूतकृतावासो वासुदेवेति चोच्यते ॥
समस्त विश्वमें जो कोई देवताओंके लिये यज्ञ और पितरोंके लिये श्राद्ध करते हैं, दान देते हैं और बड़ी भारी तपस्या करते हैं, उन सबके आश्रय भगवान् विष्णु ही हैं । वे अपने ऐश्वर्ययोगमें स्थित रहते हैं । सम्पूर्ण प्राणियोंके आवासस्थान होनेके कारण वे ‘वासुदेव’ कहे जाते हैं ।
वैशम्पायन उवाच
मनीषिणो हि ये केचिद् यतयो मोक्षधर्मिणः ।
तेषां विच्छिन्नतृष्णानां योगक्षेमवहो हरिः ॥
मोक्षधर्ममें तत्पर रहनेवाले जो कोई भी मनीषी यति हैं तथा जिनकी तृष्णाका सर्वथा नाश हो गया है, उनके योग-क्षेमका भार स्वयं भगवान् नारायण वहन करते हैं ।
वैशम्पायनजी ने जनमेजय से कहा।