श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६

शरणागति

समर्पण और प्रभु पर भरोसा

14 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

शिव की शरण

तं प्रपद्य सदा वत्स सर्वभावेन शङ्करम् ।

तत्प्रसादाच्च कामेभ्यः फलं प्राप्स्यसि पुत्रक ॥

‘बेटा! सदा सर्वतोभावसे उन्हीं भगवान् शंकरकी शरण लेकर उनकी कृपासे ही इच्छानुसार फल पा सकोगे’

उपमन्यु की माता ने उपमन्यु से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 128 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 180 भक्ति
महादेव की भक्ति

अम्बा उवाच

तद्भक्तस्तद्गतो नित्यं तन्निष्ठस्तत्परायणः ।

भज पुत्र महादेवं ततः प्राप्स्यसि चेप्सितम् ॥

बेटा! तुम उन्हींके भक्त बनकर उन्हींमें आसक्त रहो । सदा उन्हींपर निर्भर रहो और उन्हींके शरणागत होकर महादेवजीका निरन्तर भजन करते रहो । इससे तुम्हें मनोवाञ्छित वस्तुकी प्राप्ति होगी ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 166 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 186 भक्ति
ईश्वरीय कृपा और भक्ति

अम्बा उवाच

दिवसं दिवसार्धं वा मुहूर्तं वा क्षणं लवम् ।

न ह्यलब्धप्रसादस्य भक्तिर्भवति शङ्करे ॥

जिसपर भगवान् शिवकी कृपा नहीं है, उस मनुष्यकी एक दिन, आधे दिन, एक मुहूर्त, एक क्षण या एक लवके लिये भी भगवान् शंकरमें भक्ति नहीं होती है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 185 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 188
परमेश्वर की शरण

श्रीकृष्ण उवाच

त्वयि बुद्धिर्मतिर्लोकाः प्रपन्नाः संश्रिताश्च ये ।

ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसत्त्वा जितेन्द्रियाः ॥

आपमें बोध और मननकी शक्ति विद्यमान है । जो लोग आपकी शरणमें आकर सर्वथा आपके आश्रित रहते हैं, वे ध्यानपरायण, नित्य योगयुक्त, सत्यसंकल्प तथा जितेन्द्रिय होते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 421 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 223 ज्ञान–विवेक
भक्तियोग और आत्म-दर्शन

तण्डि उवाच

ये चैनं प्रतिपद्यन्ते भक्तियोगेन भाविताः ।

तेषामेवात्मनाऽऽत्मानं दर्शयत्येष हृच्छयः ॥

जो लोग भक्तियोगसे भावित होकर उन परमेश्वरकी शरण लेते हैं, उन्हींको यह हृदय-मन्दिरमें शयन करनेवाले भगवान् स्वयं अपना दर्शन देते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 16, श्लोक 39 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 234 भक्ति
ईश्वरीय कृपा और भक्ति

उपमन्यु उवाच

तस्यैव च प्रसादेन भक्तिरुत्पद्यते नृणाम् ।

येन यान्ति परां सिद्धिं तद्भागवतचेतसः ॥

भगवान् शंकरकी कृपासे ही मनुष्योंके हृदयमें उनकी अनन्यभक्ति उत्पन्न होती है, जिससे वे अपने चित्तको उन्हींके चिन्तनमें लगाकर परमसिद्धिको प्राप्त होते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 17, श्लोक 167 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 270
महादेव की शरण

उपमन्यु उवाच

एवमन्ये विकुर्वन्ति देवाः संसारमोचनम् ।

मनुष्याणामृते देवं नान्या शक्तिस्तपोबलम् ॥

इसी प्रकार भगवान्की स्तुतिद्वारा अन्य देवगण भी अपने संसारबन्धनका नाश करते हैं; क्योंकि महादेवजीकी शरण लेनेके सिवा ऐसी दूसरी कोई शक्ति या तपका बल नहीं है जिससे मनुष्योंका संसारबन्धनसे छुटकारा हो सके ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 17, श्लोक 169 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 271
स्वतन्त्रता का आत्म-बोध

उत्तर दिशा उवाच

न दोषो भविता चैव सत्येनैतद् ब्रवीम्यहम् ।

स्वतन्त्रां मां विजानीहि योऽधर्मः सोऽस्तु वै मयि ।

त्वय्यावेशितचित्ता च स्वतन्त्रास्मि भजस्व माम् ॥

मैं सच कहती हूँ, आपको कोई दोष नहीं लगेगा । आप मुझे स्वतन्त्र समझिये । इसमें जो पाप होता है, वह मुझे ही लगे । मेरा चित्त आपके ही चिन्तनमें लगा है । मैं स्वतन्त्र हूँ; अतः मुझे स्वीकार कीजिये ।

उत्तर दिशा ने स्त्री के रूप में अष्टावक्र से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 20, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 305
गङ्गा की उपासना

सिद्ध उवाच

उपासते यथा बाला मातरं क्षुधयार्दिताः ।

श्रेयस्कामास्तथा गङ्गामुपासन्तीह देहिनः ॥

जैसे भूखसे पीड़ित हुए बच्चे माताके पास जाते हैं, उसी प्रकार कल्याणकी इच्छा रखनेवाले प्राणी इस जगत् में गङ्गाजीकी उपासना करते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 26, श्लोक 50 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 362
लक्ष्मी की शरणागति

लक्ष्मी उवाच

महाभागा भवत्यो वै शरण्याः शरणागताम् ।

परित्रायन्तु मां नित्यं भजमानामनिन्दिताम् ॥

तुम महान् सौभाग्यशालिनी और सबको शरण देनेवाली हो । मैं भी तुम्हारी शरणमें आयी हूँ । तुम्हारी भक्त हूँ। मुझमें कोई दोष भी नहीं है; अतः तुम मेरी रक्षा करो-मुझे अपना लो ।

लक्ष्मी ने गौओं से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 82, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 710

भीष्म उवाच

अभ्यासे नित्यं देवानां सप्तर्षीणां ध्रुवस्य च ।

मोक्षणं सर्वकृच्छ्राणां मोचयत्यशुभात् सदा ॥

प्रतिदिन देवताओं, सप्तर्षियों और ध्रुवका बारंबार स्मरण करनेसे समस्त संकटोंसे छुटकारा मिल जाता है । उनका कीर्तन सदा ही अशुभ अर्थात् पापके बन्धनसे मुक्त कर देता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 150, श्लोक 78 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1461

ब्राह्मण उवाच

ब्रह्मैव समिधस्तस्य ब्रह्माग्निर्ब्रह्मसम्भवः ।

आप ब्रह्म गुरुर्ब्रह्म स ब्रह्मणि समाहितः ॥

ब्रह्म ही उसकी समिधा है, ब्रह्म ही अग्नि है, ब्रह्मसे ही वह उत्पन्न हुआ है, ब्रह्म ही उसका जल और ब्रह्म ही गुरु है । उसकी चित्तवृत्तियाँ सदा ब्रह्ममें ही लीन रहती हैं ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 26, श्लोक 17 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1708 ज्ञान–विवेक

ब्रह्मा उवाच

तत्र बुद्धिविदो लोकाः सद्भावनिरताश्च ये ।

ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसंधा जितेन्द्रियाः ॥

ज्ञानवन्तश्च ये केचिदलुब्धा जितमन्यवः ।

प्रसन्नमनसो धीरा निर्ममा निरहंकृताः ॥

विमुक्ताः सर्व एवैते महत्त्वमुपयान्त्युत ।

आत्मनो महतो वेद यः पुण्यां गतिमुत्तमाम् ॥

संसारमें जो कोई भी मनुष्य बुद्धिमान्, सद्भाव-परायण, ध्यानी, नित्य योगी, सत्यप्रतिज्ञ, जितेन्द्रिय, ज्ञानवान् लोभहीन, क्रोधको जीतनेवाले, प्रसन्नचित्त, धीर तथा ममता और अहंकारसे रहित हैं, वे सब मुक्त होकर परमात्माको प्राप्त होते हैं । जो सर्वश्रेष्ठ परमात्माकी महिमाको जानता है, उसे पुण्यदायक उत्तम गति मिलती है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 40, श्लोक 6–8 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1769 ज्ञान–विवेक

ब्रह्मा उवाच

उच्छ्वासमात्रमपि चेद् योऽन्तकाले समो भवेत् ।

आत्मानमुपसङ्गम्य सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥

जो मनुष्य अन्तकालमें आत्माका ध्यान करके, साँस लेनेमें जितनी देर लगती है, उतनी देर भी, समभावमें स्थित होता है, वह अमृतत्व (मोक्ष) प्राप्त करनेका अधिकारी हो जाता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 48, श्लोक 2 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1808 ज्ञान–विवेक