श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २
भक्ति
प्रेम, उपासना और भगवान् से सम्बन्ध
12 पद्य
महाभारत — खण्ड २
युधिष्ठिर उवाच
न तेषामापदः सन्ति नाधयो व्याधयस्तथा ।
ये तवानन्यमनसः कुर्वन्त्यर्चनवन्दनम् ॥
भगवन्! जो अनन्य चित्तसे आपकी अर्चना और वन्दना करते हैं, उनपर कभी आपत्ति नहीं आती । वे मानसिक चिन्ताओं तथा रोगोंसे भी ग्रस्त नहीं होते ।
सुरभि उवाच
यदि पुत्रसहस्राणि सर्वत्र समतैव मे ।
दीनस्य तु सतः शक्र पुत्रस्याभ्यधिका कृपा ॥
सुरभि बोली — देवेन्द्र! यदि मेरे सहस्रों पुत्र हैं, तो मैं उन सबके प्रति समानभाव ही रखती हूँ; परंतु दीन-दुःखी पुत्रके प्रति अधिक दया उमड़ आती है ।
सुरभि ने इन्द्र से कहा।
बृहदश्व उवाच
निशम्य दमयन्त्यास्तत् करुणं प्रतिदेवितम् ।
निश्चयं परमं तथ्यमनुरागं च नैषधे ॥
मनोविशुद्धिं बुद्धिं च भक्तिं रागं च नैषधे ।
यथोक्तं चक्रिरे देवाः सामर्थ्यं लिङ्गधारणे ॥
दमयन्तीका वह करुण विलाप सुनकर तथा उसके अन्तिम निश्चय, नलविषयक वास्तविक अनुराग, विशुद्ध हृदय, उत्तम बुद्धि तथा नलके प्रति भक्ति एवं प्रेम देखकर देवताओंने दमयन्तीके भीतर वह यथार्थ शक्ति उत्पन्न कर दी, जिससे उसे देवसूचक लक्षणोंका निश्चय हो सके ।
देवताओं ने दमयन्ती के विलाप और नलविषयक वास्तविक अनुराग को देखकर उसके भीतर देवसूचक लक्षणों को पहचानने की शक्ति उत्पन्न की।
हनुमान् उवाच
समाश्रयं समाचारं समज्ञानं च केवलम् ।
तदा हि समकर्माणो वर्णा धर्मानवाप्नुवन् ॥
उस समय परब्रह्म परमात्मा ही सबके एकमात्र आश्रय थे । उन्हींकी प्राप्तिके लिये सदाचारका पालन किया जाता था । सब लोग एक परमात्माका ही ज्ञान प्राप्त करते थे । सभी वर्णोंके मनुष्य परब्रह्म परमात्माके उद्देश्यसे ही समस्त सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते थे और इस प्रकार उन्हें उत्तम धर्म-फलकी प्राप्ति होती थी ।
हनुमानजी ने भीमसेन को सत्ययुग के लोगों का आचरण बताया।
बालमुकुन्द उवाच
यतयः शान्तिपरमा यतात्मानो बुभुत्सवः ।
कामक्रोधद्वेषमुक्ता निःसंगा वीतकल्मषाः ॥
सत्त्वस्था निरहङ्कारा नित्यमध्यात्मकोविदाः ।
मामेव सततं विप्राश्चिन्तयन्त उपासते ॥
शान्तिपरायण, संयमी, जिज्ञासु, काम-क्रोध-द्वेषरहित आसक्तिशून्य, निष्पाप, सात्त्विक, नित्य अहंकारशून्य तथा अध्यात्मज्ञानकुशल यति एवं ब्राह्मण सदा मेरा ही चिन्तन करते हुए उपासना करते हैं ।
बालमुकुन्द भगवान् ने मार्कण्डेय मुनि से कहा।
बालमुकुन्द → ब्रह्मन
सर्वलोके च मां भक्ताः पूजयन्ति च सर्वशः ।
यच्च किंचित् त्वया प्राप्तं मयि क्लेशात्मकं द्विज ॥
सुखोदयाय तत् सर्वं श्रेयसे च तवानघ ।
यच्च किंचित् त्वया लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम् ॥
विहितः सर्वथैवासी ममात्मा भूतभावनः ।
अर्धं मम शरीरस्य सर्वलोकपितामहः ॥
समस्त जगत्में भक्त पुरुष सब प्रकारसे मेरी आराधना करते हैं । तुमने मेरे निकट आकर जो कुछ भी क्लेश उठाया है, ब्रह्मन्! वह सब तुम्हारे भावी कल्याण और सुखका साधक है । अनघ! लोकमें तुमने जो कोई भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखा है, उसके रूपमें सर्वथा मेरा भूत-भावन आत्मा ही प्रकट हुआ है । सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्मा मेरा आधा अंग हैं ।
यदि मे भगवन् प्रीतः पुण्डरीकनिभेक्षण ।
धर्मे सत्ये दमे चैव बुद्धिर्भवतु मे सदा ।
अभ्यासश्च भवेद् भक्त्या त्वयि नित्यं ममेश्वर ॥
‘भगवन्! कमलनयन! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मेरी बुद्धि सदा धर्म, सत्य और इन्द्रियनिग्रहमें लगी रहे। मेरे स्वामी! आपके भजनका मेरा अभ्यास सदा बना रहे’
भगवान् विष्णु के वर माँगने का आग्रह करने पर उत्तङ्क ने हाथ जोड़कर यह वर माँगा।
मार्कण्डेय उवाच
सूक्ष्मं तपस्तत् परमं त्वमेव ।
परावरज्ञोऽसि परावरस्त्वम् ।
धर्मस्य कामस्य परस्य चैव ।
त्वत्तेजसा कृत्स्नमिदं महात्मन् ॥
जो सर्वोत्कृष्ट सूक्ष्म तप है, वह आप ही हैं। आप ही कार्य-कारण-तत्त्वके ज्ञाता तथा कार्यकारणस्वरूप हैं । धर्म, काम तथा इन दोनोंसे परे जो मोक्षतत्त्व है, उसके भी आप ही ज्ञाता हैं । महात्मन्! यह सम्पूर्ण जगत् आपके तेजसे प्रकाशित होता है ।
द्रौपदी उवाच
पतिदेवको अनुकूल करनेका उपायपतिकी अनन्यभावसे ।
इमं तु ते मार्गमपेतमोहं ।
वक्ष्यामि चित्तग्रहणाय भर्तुः ।
अस्मिन् यथावत् सखि वर्तमाना ।
भर्तारमाच्छेत्स्यसि कामिनीभ्यः ॥
द्रौपदी बोली — सखी! मैं स्वामीके मनका आकर्षण करनेके लिये तुम्हें एक ऐसा मार्ग बता रही हूँ, जिसमें भ्रम अथवा छल-कपटके लिये तनिक भी स्थान नहीं है । यदि तुम यथावत्रूपसे इसी पथपर चलती रहोगी तो स्वामीके चित्तको अपनी सौतोंसे हटाकर अपनी ओर अवश्य खींच सकोगी ।
द्रौपदी उवाच
नीलोत्पलदलश्याम पद्मगर्भारुणेक्षण ।
पीताम्बरपरीधान लसत्कौस्तुभभूषण ॥
त्वमादिरन्तो भूतानां त्वमेव च परायणम् ।
परात्परतरं ज्योतिर्विश्वात्मा सर्वतोमुखः ॥
नीलकमलदलके समान श्यामसुन्दर! कमलपुष्पके भीतरी भागके समान किंचित् लाल नेत्रोंवाले पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण! तुम्हारे वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणिमय आभूषण शोभा पाता है । प्रभो! तुम्हीं समस्त प्राणियोंके आदि और अन्त हो । तुम्हीं सबके परम आश्रय हो । तुम्हीं परात्पर, ज्योतिर्मय सर्वात्मा एवं सब ओर मुखवाले परमेश्वर हो ।
द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए कहा।
सूर्य उवाच
भक्तिमन्तो हि मे रक्ष्या इत्येतेनापि हेतुना ।
भक्तोऽयं परया भक्त्या मामित्येव महाभुज ।
ममापि भक्तिरुत्पन्ना स त्वं कुरु वचो मम ॥
मुझे अपने भक्तोंकी रक्षा करनी ही चाहिये, इसलिये भी तुमसे तुम्हारे हितकी बात कहता हूँ । महाबाहो! यह मेरा भक्त है, परम भक्तिभावसे मेरा भजन करता है, यह सोचकर मेरे मनमें भी तुम्हारे प्रति स्नेह जाग उठा है । अतः तुम मेरी आज्ञाका पालन करो ।
सूर्यदेव ने कर्ण से कहा।
कर्ण उवाच
न मे दारा न मे पुत्रा न चात्मा सुहृदो न च ।
तथेष्टा वै सदा भक्त्या यथा त्वं गोपते मम ॥
स्त्री, पुत्र, सुहृद् और अपना शरीर भी मुझे वैसा प्रिय नहीं है, जैसे आप हैं । किरणोंके स्वामी सूर्यदेव! सदा आप ही मेरे भक्तिभावके आश्रय हैं ।
कर्ण ने सूर्यदेव से कहा।