श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण — १
ज्ञान–विवेक
आत्मबोध और विवेक
31 पद्य
श्रीमद्भागवत महापुराण — १
ज्ञानवैराग्यसंयुक्ता भक्तिः प्रेमरसावहा ।
प्रतिगेहं प्रतिजनं ततः क्रीडां करिष्यति ॥
तब प्रेमरस प्रवाहित करनेवाली भक्ति ज्ञान और वैराग्यको साथ लेकर प्रत्येक घर और व्यक्तिके हृदयमें क्रीड़ा करेगी ।
उद्दामभावपिशुनामलवल्गुहासव्रीडावलोकनिहतो मदनोऽपि यासाम् ।
सम्मुह्य चापमजहात्प्रमदोत्तमास्ता ।
यस्येन्द्रियं विमथितुं कुहकैर्न शेकुः ।
तमयं मन्यते लोको ह्यसङ्गमपि सङ्गिनम् ।
आत्मौपम्येन मनुजं व्यापृण्वानं यतोऽबुधः ॥
जिनकी निर्मल और मधुर हँसी उनके हृदयके उन्मुक्त भावोंको सूचित करनेवाली थी, जिनकी लजीली चितवनकी चोटसे बेसुध होकर विश्वविजयी कामदेवने भी अपने धनुषका परित्याग कर दिया था — वे कमनीय कामिनियाँ अपने काम-विलासोंसे जिनके मनमें तनिक भी क्षोभ नहीं पैदा कर सकीं, उन असंग भगवान् श्रीकृष्णको संसारके लोग अपने ही समान कर्म करते देखकर आसक्त मनुष्य समझते हैं — यह उनकी मूर्खता है ।
स सर्वधीवृत्त्यनुभूतसर्व ।
आत्मा यथा स्वप्नजनेक्षितैकः ।
तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत ।
नान्यत्र सज्जेद् यत आत्मपातः ॥
जैसे स्वप्न देखनेवाला स्वप्नावस्थामें अपने-आपको ही विविध पदार्थोंके रूपमें देखता है, वैसे ही सबकी बुद्धि-वृत्तियोंके द्वारा सब कुछ अनुभव करनेवाला सर्वान्तर्यामी परमात्मा भी एक ही है । उन सत्यस्वरूप आनन्दनिधि भगवान्का ही भजन करना चाहिये, अन्य किसी भी वस्तुमें आसक्ति नहीं करनी चाहिये । क्योंकि यह आसक्ति जीवके अधःपतनका हेतु है ।
श्रीशुकदेवजी कहते हैं।
योगेश्वराणां गतिमाहुरन्तर्बहिस्त्रिलोक्याः पवनान्तरात्मनाम् ।
न कर्मभिस्तां गतिमाप्नुवन्ति ।
विद्यातपोयोगसमाधिभाजाम् ॥
योगियोंका शरीर वायुकी भाँति सूक्ष्म होता है । उपासना, तपस्या, योग और ज्ञानका सेवन करनेवाले योगियोंको त्रिलोकीके बाहर और भीतर सर्वत्र स्वछन्दरूपसे विचरण करनेका अधिकार होता है । केवल कर्मोंके द्वारा इस प्रकार बेरोक-टोक विचरना नहीं हो सकता ।
स वाच्यवाचकतया भगवान् ब्रह्मरूपधृक् ।
नामरूपक्रिया धत्ते सकर्माकर्मकः परः ॥
वास्तवमें भगवान् निष्क्रिय हैं । अपनी शक्तिसे ही वे सक्रिय बनते हैं । फिर तो वे ब्रह्माका या विराट्रूप धारण करके वाच्य और वाचक-शब्द और उसके अर्थके रूपमें प्रकट होते हैं और अनेकों नाम, रूप तथा क्रियाएँ स्वीकार करते हैं ।
श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित् से कहा।
एतावाञ्जीवलोकस्य संस्थाभेदः समाहृतः ।
धर्मस्य ह्यनिमित्तस्य विपाकः परमेष्ठ्यसौ ॥
जीवोंके भोगस्थानके रूपमें इन्हीं तीन लोकोंका शास्त्रोंमें वर्णन हुआ है; जो निष्काम कर्म करनेवाले हैं, उन्हें महः, तपः, जनः और सत्यलोकरूप ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है ।
मैत्रेयजी ने विदुरजी से कहा।
संगो यः संसृतेर्हेतुरसत्सु विहितोऽधिया ।
स एव साधुषु कृतो निःसंगत्वाय कल्पते ॥
अज्ञानवश असत्पुरुषोंके साथ किया हुआ जो संग संसार-बन्धनका कारण होता है, वही सत्पुरुषोंके साथ किये जानेपर असंगता प्रदान करता है ।
देवहूति ने अपने पति कर्दम मुनि से सन्न्यासाश्रम के समय यह बात कही।
देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् ।
स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासुः ।
तं सप्रपंचमधिरूढसमाधियोगः ।
स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तुः ॥
उसका शरीर तो पूर्वजन्मके संस्कारोंके अधीन है; अतः जबतक उसका आरम्भक प्रारब्ध शेष है तबतक वह इन्द्रियोंके सहित जीवित रहता है; किन्तु जिसे समाधिपर्यन्त योगकी स्थिति प्राप्त हो गयी है और जिसने परमात्मतत्त्वको भी भलीभाँति जान लिया है, वह सिद्धपुरुष पुत्र-कलत्रादिके सहित इस शरीरको स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले शरीरोंके समान फिर स्वीकार नहीं करता-फिर उसमें अहंता-ममता नहीं करता ।
कपिल ने माता देवहूति से कहा।
यथा वातरथो घ्राणमावृङ्क्ते गन्ध आशयात् ।
एवं योगरतं चेत आत्मानमविकारि यत् ॥
जिस प्रकार वायुके द्वारा उड़कर जानेवाला गन्ध अपने आश्रय पुष्पसे घ्राणेन्द्रियतक पहुँच जाता है, उसी प्रकार भक्तियोगमें तत्पर और राग-द्वेषादि विकारोंसे शून्य चित्त परमात्माको प्राप्त कर लेता है ।
ज्ञानमज्ञाततत्त्वाय यो दद्यात्सत्पथेऽमृतम् ।
कृपालोर्दीननाथस्य देवास्तस्यानुगृह्णते ॥
यह साक्षात् भगवद्विषयक अमृतमय ज्ञान है; जो लोग भगवन्मार्गके मर्मसे अनभिज्ञ हैं — उन्हें जो कोई इसे प्रदान करता है, उस दीनवत्सल कृपालु पुरुषपर देवता अनुग्रह करते हैं ।
सूतजी ने शौनकजी से कहा।
पुमाँल्लभेतानतिवेलमात्मनः ।
प्रसीदतोऽत्यन्तशमं स्वतः स्वयम् ।
यन्नित्यसम्बन्धनिषेवया ततः ।
परं किमत्रास्ति मुखं हविर्भुजाम् ॥
इनकी नित्य सेवा करनेसे शीघ्र ही चित्त शुद्ध हो जानेके कारण मनुष्य स्वयं ही (ज्ञान और अभ्यास आदिके बिना ही) परम शान्तिरूप मोक्ष प्राप्त कर लेता है । अतः लोकमें इन ब्राह्मणोंसे बढ़कर दूसरा कौन है जो हविष्यभोजी देवताओंका मुख हो सके?
गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः ।
क्षेमाय नैर्गुण्यमथो मनः स्यात् ।
यथा प्रदीपो घृतवर्तिमश्नन् ।
शिखाः सधूमा भजति ह्यन्यदा स्वम् ।
पदं तथा गुणकर्मानुबद्धं ।
वृत्तीर्मनः श्रयतेऽन्यत्र तत्त्वम् ॥
विषयासक्त मन जीवको संसार-संकटमें डाल देता है, विषयहीन होनेपर वही उसे शान्तिमय मोक्षपद प्राप्त करा देता है । जिस प्रकार घीसे भीगी हुई बत्तीको खानेवाले दीपकसे तो धुएँवाली शिखा निकलती रहती है और जब घी समाप्त हो जाता है तब वह अपने कारण अग्नितत्त्वमें लीन हो जाता है — उसी प्रकार विषय और कर्मोंसे आसक्त हुआ मन तरह-तरहकी वृत्तियोंका आश्रय लिये रहता है और इनसे मुक्त होनेपर वह अपने तत्त्वमें लीन हो जाता है ।
कल्पायुषां स्थानजयात्पुनर्भवात् ।
क्षणायुषां भारतभूजयो वरम् ।
क्षणेन मर्त्येन कृतं मनस्विनः ।
संन्यस्य संयान्त्यभयं पदं हरेः ॥
यह स्वर्ग तो क्या — जहाँके निवासियोंकी एक-एक कल्पकी आयु होती है किन्तु जहाँसे फिर संसारचक्रमें लौटना पड़ता है, उन ब्रह्मलोकादिकी अपेक्षा भी भारतभूमिमें थोड़ी आयुवाले होकर जन्म लेना अच्छा है; क्योंकि यहाँ धीर पुरुष एक क्षणमें ही अपने इस मर्त्यशरीरसे किये हुए सम्पूर्ण कर्म श्रीभगवान्को अर्पण करके उनका अभयपद प्राप्त कर सकता है ।
देवता भारतवर्ष में उत्पन्न हुए मनुष्यों की महिमा गाते हुए कहते हैं।
न वेद कृपणः श्रेय आत्मनो गुणवस्तुदृक् ।
तस्य तानिच्छतो यच्छेद् यदि सोऽपि तथाविधः ॥
जो पुरुष जगत्के विषयोंको सत्य समझता है, वह नासमझ अपने वास्तविक कल्याणको नहीं जानता । यही कारण है कि वह विषय चाहता है; परन्तु यदि कोई जानकार उसे उसकी इच्छित वस्तु दे देता है, तो वह भी वैसा ही नासमझ है ।
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित्!
भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभिर्भवन्ति काले न भवन्ति सर्वशः ।
न तत्र हात्मा प्रकृतावपि स्थितस्तस्या गुणैरन्यतमो निबध्यते ॥
रानियो! सभी प्राणियोंकी मृत्यु अपने पूर्वजन्मोंकी कर्मवासनाके अनुसार समयपर होती है और उसीके अनुसार उनका जन्म भी होता है । परन्तु आत्मा शरीरसे अत्यन्त भिन्न है, इसलिये वह उसमें रहनेपर भी उसके जन्म-मृत्यु आदि धर्मोंसे अछूता ही रहता है ।
वितथाभिनिवेशोऽयं यद् गुणेष्वर्थदृग्वचः ।
यथा मनोरथः स्वप्नः सर्वमैन्द्रियकं मृषा ॥
प्रकृतिके गुणों और उनसे बनी हुई वस्तुओंको सत्य समझना अथवा कहना झूठमूठका दुराग्रह है । मनोरथके समयकी कल्पित और स्वप्नके समयकी दीख पड़नेवाली वस्तुओंके समान इन्द्रियोंके द्वारा जो कुछ ग्रहण किया जाता है, सब मिथ्या है ।
त्वमेव कालोऽनिमिषो जनानामायुर्लवाद्यावयवैः क्षिणोषि ।
कूटस्थ आत्मा परमेष्ठ्यजो महांस्त्वं जीवलोकस्य च जीव आत्मा ॥
आप ही काल हैं । आप प्रतिक्षण सावधान रहकर अपने क्षण, लव आदि विभागोंके द्वारा लोगोंकी आयु क्षीण करते रहते हैं । फिर भी आप निर्विकार हैं । क्योंकि आप ज्ञानस्वरूप, परमेश्वर, अजन्मा, महान् और सम्पूर्ण जीवोंके जीवनदाता अन्तरात्मा हैं ।
हिरण्यकशिपु ने ब्रह्माजी की स्तुति करते हुए कहा।
परे ब्रह्मण्यनिर्देश्ये भगवत्यखिलात्मनि ।
युक्तात्मन्यफला आसन्नपुण्यस्येव सत्क्रियाः ॥
उस समय प्रह्लादजीका चित्त उन परमात्मामें लगा हुआ था, जो मन-वाणीके अगोचर, सर्वात्मा, समस्त शक्तियोंके आधार एवं परब्रह्म हैं । इसलिये उनके सारे प्रहार ठीक वैसे ही निष्फल हो गये, जैसे भाग्यहीनोंके बड़े-बड़े उद्योग-धंधे व्यर्थ होते हैं ।
श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित् से कहा।
परावरेषु भूतेषु ब्रह्मान्तस्थावरादिषु ।
भौतिकेषु विकारेषु भूतेष्वथ महत्सु च ॥
गुणेषु गुणसाम्ये च गुणव्यतिकरे तथा ।
एक एव परो ह्यात्मा भगवानीश्वरोऽव्ययः ॥
ब्रह्मासे लेकर तिनकेतक छोटे-बड़े समस्त प्राणियोंमें, पंचभूतोंसे बनी हुई वस्तुओंमें, पंचभूतोंमें, सूक्ष्म तन्मात्राओंमें, महत्तत्त्वमें तीनों गुणोंमें और गुणोंकी साम्यावस्था प्रकृतिमें एक ही अविनाशी परमात्मा विराजमान हैं । वे ही समस्त सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्योंकी खान हैं ।
एतद्द्वारो हि संसारो गुणकर्मनिबन्धनः ।
अज्ञानमूलोऽपार्थोऽपि पुंसः स्वप्न इवेष्यते ॥
गुणों और कर्मोंके कारण होनेवाला जन्म-मृत्युका यह चक्र आत्माको शरीर और प्रकृतिसे पृथक् न करनेके कारण ही है । यह अज्ञानमूलक एवं मिथ्या है । फिर भी स्वप्नके समान जीवको इसकी प्रतीति हो रही है ।
अधोक्षजालम्भमिहाशुभात्मनः ।
शरीरिणः संसृतिचक्रशातनम् ।
तद् ब्रह्म निर्वाणसुखं विदुर्बुधास्ततो भजध्वं हृदये हृदीश्वरम् ॥
इस अशुभ संसारके दलदलमें फँसकर अशुभमय हो जानेवाले जीवके लिये भगवान्की यह प्राप्ति संसारके चक्करको मिटा देनेवाली है । इसी वस्तुको कोई विद्वान् ब्रह्म और कोई निर्वाण-सुखके रूपमें पहचानते हैं । इसलिये मित्रो! तुमलोग अपने-अपने हृदयमें हृदयेश्वर भगवान्का भजन करो ।
कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरेरुपासने स्वे हृदि छिद्रवत् सतः ।
स्वस्यात्मनः सख्युरशेषदेहिनां ।
सामान्यतः किं विषयोपपादनैः ॥
असुरकुमारो! अपने हृदयमें ही आकाशके समान नित्य विराजमान भगवान्का भजन करनेमें कौन-सा विशेष परिश्रम है । वे समानरूपसे समस्त प्रणियोंके अत्यन्त प्रेमी मित्र हैं; और तो क्या, अपने आत्मा ही हैं । उनको छोड़कर भोगसामग्री इकट्ठी करनेके लिये भटकना-राम! राम! कितनी मूर्खता है ।
प्रह्लाद ने दैत्यबालकों से कहा।
यथा वार्तादयो ह्यर्था योगस्यार्थं न बिभ्रति ।
अनर्थाय भवेयुस्ते पूर्तमिष्टं तथासतः ॥
जैसे खेती, व्यापार आदि और उनके फल भी योग-साधनाके फल भगवत्प्राप्ति या मुक्तिको नहीं दे सकते — वैसे ही दुष्ट पुरुषके श्रौतस्मार्त कर्म भी कल्याणकारी नहीं होते, प्रत्युत उलटा फल देते हैं ।
तमीहमानं निरहङ्कृतं बुधं ।
निराशिषं पूर्णमनन्यचोदितम् ।
नॄन् शिक्षयन्तं निजवर्त्मसंस्थितं ।
प्रभुं प्रपद्येऽखिलधर्मभावनम् ॥
भगवान् ज्ञानस्वरूप हैं, इसलिये उनमें अहंकारका लेश भी नहीं है । वे सर्वतः परिपूर्ण हैं, इसलिये उन्हें किसी वस्तुकी कामना नहीं है । वे बिना किसीकी प्रेरणाके स्वच्छन्दरूपसे ही कर्म करते हैं । वे अपनी ही बनायी हुई मर्यादामें स्थित रहकर अपने कर्मोंके द्वारा मनुष्योंको शिक्षा देते हैं । वे ही समस्त धर्मोंके प्रवर्तक और उनके जीवनदाता हैं । मैं उन्हीं प्रभुकी शरणमें ।
श्रीशुकदेवजी परीक्षित को उपदेश देते हुए कहते हैं।
ब्रह्मा उवाच
अविक्रियं सत्यमनन्तमाद्यं ।
गुहाशयं निष्कलमप्रतर्क्यम् ।
मनोऽग्र्यानं वचसानिरुक्तं ।
नमामहे देववरं वरेण्यम् ॥
ब्रह्माजी बोले — भगवन्! आप निर्विकार, सत्य, अनन्त, आदिपुरुष, सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान, अखण्ड एवं अतर्क्य हैं । मन जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ-वहाँ आप पहलेसे ही विद्यमान रहते हैं । वाणी आपका निरूपण नहीं कर सकती । आप समस्त देवताओंके आराधनीय और स्वयंप्रकाश हैं । हम सब आपके चरणोंमें नमस्कार करते हैं ।
ब्रह्माजी ने वैकुण्ठ में भगवान् अजित की स्तुति करते हुए कहा।
विपश्चितं प्राणमनोधियात्मनामर्थेन्द्रियाभासमनिद्रमव्रणम् ।
छायातपौ यत्र न गृध्रपक्षौ ।
तमक्षरं खं त्रियुगं व्रजामहे ॥
आप प्राण, मन, बुद्धि और अहंकारके ज्ञाता हैं । इन्द्रियाँ और उनके विषय दोनों ही आपके द्वारा प्रकाशित होते हैं । अज्ञान आपका स्पर्श नहीं कर सकता । प्रकृतिके विकार मरने-जीनेवाले शरीरसे भी आप रहित हैं । जीवके दोनों पक्ष-अविद्या और विद्या आपमें बिलकुल ही नहीं हैं । आप अविनाशी और सुखस्वरूप हैं । सत्ययुग, त्रेता और द्वापरमें तो आप प्रकटरूपसे ही विराजमान रहते हैं । हम सब आपकी शरण ग्रहण करते हैं ।
ब्रह्माजी ने भगवान की स्तुति करते हुए कहा।
पादौ महीयं स्वकृतैव यस्य ।
चतुर्विधो यत्र हि भूतसर्गः ।
स वै महापूरुष आत्मतन्त्रः ।
प्रसीदतां ब्रह्म महाविभूतिः ॥
उन्हींकी बनायी हुई यह पृथ्वी उनका चरण है । इसी पृथ्वीपर जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज — ये चार प्रकारके प्राणी रहते हैं । वे परम स्वतन्त्र, परम ऐश्वर्यशाली पुरुषोत्तम परब्रह्म हमपर प्रसन्न हों ।
आद्यन्तावस्य यन्मध्यमिदमन्यदहं बहिः ।
यतोऽव्ययस्य नैतानि तत् सत्यं ब्रह्म चिद् भवान् ॥
इस जगत्के आदि, अन्त और मध्य आपसे ही होते हैं; परन्तु आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं । आपके अविनाशी स्वरूपमें द्रष्टा, दृश्य, भोक्ता और भोग्यका भेदभाव नहीं है । वास्तवमें आप सत्य, चिन्मात्र ब्रह्म ही हैं ।
भगवान् शङ्कर ने भगवान् विष्णु से कहा।
त्वं ब्रह्म पूर्णममृतं विगुणं विशोकमानन्दमात्रमविकारमनन्यदन्यत् ।
विश्वस्य हेतुरुदयस्थितिसंयमानामात्मेश्वरश्च तदपेक्षतयानपेक्षः ॥
आप अमृतस्वरूप, समस्त प्राकृत गुणोंसे रहित, शोककी छायासे भी दूर, स्वयं परिपूर्ण ब्रह्म हैं । आप केवल आनन्दस्वरूप हैं । आप निर्विकार हैं । आपसे भिन्न कुछ नहीं है, परन्तु आप सबसे भिन्न हैं । आप विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके परम कारण हैं । आप समस्त जीवोंके शुभाशुभ कर्मका फल देनेवाले स्वामी हैं । परन्तु यह बात भी जीवोंकी अपेक्षासे ही कही जाती है; वास्तवमें आप सबकी अपेक्षासे रहित, अनपेक्ष हैं ।
भगवान् शङ्कर ने भगवान् विष्णु से कहा।
यदृच्छालाभतुष्टस्य तेजो विप्रस्य वर्धते ।
तत् प्रशाम्यत्यसंतोषादम्भसेवाशुशुक्षणिः ॥
जो ब्राह्मण स्वयंप्राप्त वस्तुसे ही सन्तुष्ट हो रहता है, उसके तेजकी वृद्धि होती है । उसके असन्तोषी हो जानेपर उसका तेज वैसे ही शान्त हो जाता है जैसे जलसे अग्नि ।
वामन भगवान् ने राजा बलि से कहा।
सत्यव्रत उवाच
अनाद्यविद्योपहतात्मसंविदस्तन्मूलसंसारपरिश्रमातुराः ।
यदृच्छयेहोपसृता यमाप्नुयुविमुक्तिदो नः परमो गुरुर्भवान् ॥
राजा सत्यव्रतने कहा — प्रभो! संसारके जीवोंका आत्मज्ञान अनादि अविद्यासे ढक गया है । इसी कारण वे संसारके अनेकानेक क्लेशोंके भारसे पीड़ित हो रहे हैं । जब अनायास ही आपके अनुग्रहसे वे आपकी शरणमें पहुँच जाते हैं तब आपको प्राप्त कर लेते हैं । इसलिये हमें बन्धनसे छुड़ाकर वास्तविक मुक्ति देनेवाले परम गुरु आप ही हैं ।
राजा सत्यव्रत ने मत्स्य भगवान से प्रार्थना करते हुए यह कहा।