श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५

काल–मृत्यु

समय, आयु और मृत्यु

20 पद्य

महाभारत — खण्ड ५

मृत्यु का सत्य

अश्मा उवाच

संनिमज्जेज्जगदिदं गम्भीरे कालसागरे ।

जरामृत्युमहाग्राहे न कश्चिदवबुध्यते ॥

जिसमें जरा और मृत्युरूपी बड़े-बड़े ग्राह पड़े हुए हैं, उस गम्भीर कालसमुद्रमें यह सारा संसार डूब रहा है, किंतु कोई इस बातको समझ नहीं पाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 28, श्लोक 44 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 184
पुण्यात्मा का लोक

कश्यप उवाच

पुण्यस्य लोको मधुमान् घृतार्चिहिरण्यज्योतिरमृतस्य नाभिः ।

तत्र प्रेत्य मोदते ब्रह्मचारी ।

न तत्र मृत्युर्न जरा नोत दुःखम् ॥

पुण्यात्माका लोक मधुरतम सुखसे भरा होता है । वहाँ घीके चिराग जलते हैं । उसमें सुवर्णके समान प्रकाश फैला रहता है । वहाँ अमृतका केन्द्र होता है । उस लोकमें न तो मृत्यु है, न बुढ़ापा है और न दूसरा ही कोई दुःख है । ब्रह्मचारी पुरुष मृत्युके पश्चात् उसी स्वर्गादि लोकमें जाकर आनन्दका अनुभव करता है ।

कश्यप ने परलोक की स्थिति बताते हुए कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 73, श्लोक 26 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 507
काल की समदृष्टि

गृध्र उवाच

किं करिष्यथ शोचित्वा मृतं किमनुशोचथ ।

सर्वस्य हि प्रभुः कालो धर्मतः समदर्शनः ॥

अच्छा, यह तो बताओ, तुम शोक करके क्या कर लोगे? क्या इसे जिला दोगे? फिर इस मृतकके लिये क्यों शोक करते हो? काल ही सबका शासक और स्वामी है, जो धर्मतः सबके ऊपर समान दृष्टि रखता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 153, श्लोक 44 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1007
काल की सर्वव्यापकता

गृध्र उवाच

यौवनस्थांश्च बालांश्च वृद्धान् गर्भगतानपि ।

सर्वानाविशते मृत्युरेवंभूतमिदं जगत् ॥

यह कराल काल युवा, बालक, वृद्ध और गर्भस्थ शिशु-सबमें प्रवेश करता है । इस संसारकी ऐसी ही दशा है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 153, श्लोक 45 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1008
काल का सदुपयोग

पुत्र उवाच

अद्यैव कुरु यच्छ्रेयो मा त्वां कालोऽत्यगादयम् ।

अकृतेष्वेव कार्येषु मृत्युर्वै सम्प्रकर्षति ॥

इसलिये जो कल्याणकारी कार्य हो, उसे आज ही कर डालिये । आपका यह समय हाथसे निकल न जाय; क्योंकि सारे काम अधूरे ही पड़े रह जायँगे और मौत आपको खींच ले जायगी ।

शान्तिपर्व, अध्याय 175, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1139 नीति–व्यवहार
मृत्यु का ज्ञान

बलि उवाच

भूतानां निधनं निष्ठा स्रोतसामिव सागरः ।

नैतत् सम्यग्विजानन्तो नरा मुह्यन्ति वज्रधृक् ॥

वज्रधारी इन्द्र! जैसे जलके प्रवाहोंका अन्तिम आश्रय समुद्र है, उसी प्रकार शरीरधारियोंकी अन्तिम गति मृत्यु है । जो पुरुष इस बातको अच्छी तरह जानते हैं, वे कभी मोहमें नहीं पड़ते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 224, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1467 ज्ञान–विवेक
काल का प्रभाव

बलि उवाच

लाभालाभौ सुखं दुःखं कामक्रोधौ भवाभवौ ।

वधबन्धप्रमोक्षं च सर्वं कालेन लभ्यते ॥

पुरुषको लाभ-हानि, सुख-दुःख, काम-क्रोध, अभ्युदयपराभव, वध, कैद और कैदसे छुटकारा — यह सब काल (प्रारब्ध) से ही प्राप्त होते हैं ।

बलि ने इन्द्र से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 227, श्लोक 83 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1498 कर्म–प्रारब्ध

व्यास उवाच

दधाति प्रभवे स्थानं भूतानां संयमो यमः ।

स्वभावेनैव वर्तन्ते द्वन्द्वयुक्तानि भूरिशः ॥

काल ही सम्पूर्ण प्राणियोंको संयम और नियममें रखनेवाला है । वही उनकी उत्पत्तिके लिये स्थान धारण करता है । सारे प्राणी स्वभावसे ही द्वन्द्वोंसे युक्त होकर अत्यन्त कष्ट पाते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 232, श्लोक 42 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1541

पुत्र उवाच

पुष्पाणीव विचिन्वन्तमन्यत्र गतमानसम् ।

अनवाप्तेषु कामेषु मृत्युरभ्येति मानवम् ॥

जैसे मनुष्य वनमें फूल चुन रहा हो, उसी बीचमें कोई हिंसक जीव उसपर आक्रमण कर दे; उसी प्रकार जब मनुष्यका मन दूसरी ओर (विषयभोगोंमें) लगा होता है, उसी समय उसकी इच्छा पूर्ण होनेके पहले ही सहसा मौत आकर उसे दबोच लेती है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 277, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1788 वैराग्य

पुत्र उवाच

श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्निकम् ।

न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वास्य न वा कृतम् ॥

इसलिये जिस कामको कल करना हो, उसे आज ही कर ले । जिसे अपराह्णमें करना हो, उसे पूर्वाह्णमें ही कर डाले; क्योंकि मृत्यु इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसका काम पूरा हो गया या नहीं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 277, श्लोक 13 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1788 नीति–व्यवहार
कल्याणकारी कार्य की तत्परता

पुत्र उवाच

अद्यैव कुरु यच्छ्रेयो मा त्वां कालोऽत्यगान्महान् ।

को हि जानाति कस्याद्य मृत्युकालो भविष्यति ॥

जो कल्याणकारी कार्य है, उसे आप आज ही कर डालिये । यह महान् काल आपको लाँघ न जाय; क्योंकि कौन जानता है कि आज किसकी मृत्युकी घड़ी आ पहुँचेगी ।

शान्तिपर्व, अध्याय 277, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1788

पुत्र उवाच

अकृतेष्वेव कार्येषु मृत्युर्वै सम्प्रकर्षति ।

युवैव धर्मशीलः स्यादनिमित्तं हि जीवितम् ॥

सारे काम अधूरे ही रह जाते हैं और मौत अपनी ओर खींच लेती है, इसलिये युवावस्थामें ही मनुष्यको धर्मका आचरण करना चाहिये, क्योंकि जीवनका कुछ ठिकाना नहीं है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 277, श्लोक 15 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1788 धर्म–आचरण
पुरुषत्व का क्षय

पुंस्त्वोपघातं कालेन दर्शनोपरमं तथा ।

बाधिर्यं प्राणमन्दत्वं यः पश्यति स मुच्यते ॥

‘समय आनेपर पुरुषत्व नष्ट हो जाता है, आँखोंसे दिखायी नहीं देता है, कान बहरे हो जाते हैं और प्राणशक्ति अत्यन्त क्षीण हो जाती है । इन सब बातोंको जो सदा देखता और इनपर विचार करता रहता है, वह संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है’

शान्तिपर्व, अध्याय 288, श्लोक 40 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1906 वैराग्य
निरन्तर धर्म का आचरण

पराशर उवाच

न धर्मकालः पुरुषस्य निश्चितो ।

न चापि मृत्युः पुरुषं प्रतीक्षते ।

सदा हि धर्मस्य क्रियैव शोभना ।

यदा नरो मृत्युमुखेऽभिवर्तते ॥

पुरुषके लिये धर्म करनेका कोई विशेष समय निश्चित नहीं है; क्योंकि मृत्यु किसीकी बाट नहीं जोहती । जब मनुष्य सदा मौतके मुखमें ही है, तब नित्य निरन्तर धर्मका आचरण करते रहना ही उसके लिये शोभाकी बात है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 298, श्लोक 17 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1958

पराशर उवाच

सर्वः स्वानि शुभाशुभानि नियतं कर्माणि जन्तुः स्वयं ।

गर्भात् सम्प्रतिपद्यते तदुभयं यत् तेन पूर्वं कृतम् ॥

मृत्युश्चापरिहारवान् समगतिः कालेन विच्छेदिना ।

दारोश्चूर्णमिवाश्मसारविहितं कर्मान्तिकं प्रापयेत् ॥

सभी जीव, पूर्वजन्ममें उन्होंने जो कुछ किया है, उन अपने शुभाशुभ कर्मोंके नियत फलोंको गर्भमें प्रवेश करनेके समयसे ही क्रमशः पाने और भोगने लगते हैं । जैसे वायु आरेसे चीरकर बनाये गये लकड़ीके चूरेको उड़ा देती है, उसी प्रकार कभी टाली न जा सकनेवाली मृत्यु विनाशकारी कालकी सहायतासे मनुष्यका अन्त कर देती है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 298, श्लोक 45 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1963 कर्म–प्रारब्ध

व्यास उवाच

पुराऽभिवाति मारुतो यमस्य यः पुरःसरः ।

पुरैक एव नीयसे कुरुष्व साम्परायिकम् ॥

जिस समय यमराजके आगे-आगे चलनेवाला प्रचण्ड कालरूपी पवन चल पड़ेगा, उस समय वह अकेले तुम्हींको वहाँ ले जायगा; अतः तुम पहलेसे ही परलोकमें सुख देनेवाले धर्मका आचरण करो ।

शान्तिपर्व, अध्याय 321, श्लोक 37 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2142

व्यास उवाच

पुरा करोति सोऽन्तकः प्रमादगोमुखां चमूम् ।

यथागृहीतमुत्थितस्त्वरस्व धर्मपालने ॥

देखो, तुम्हारा जो प्रमाद है, उसमें निवास करनेवाला काल तुम्हारी इन्द्रियोंके समुदायको मुखरहित (भोगशक्तिसे हीन) कर रहा है । इनके असमर्थ हो जानेके पहले ही तुम खड़े हो जाओ और अपने शरीरसे धर्मका पालन करनेके लिये जल्दी करो ।

शान्तिपर्व, अध्याय 321, श्लोक 64 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2146 धर्म–आचरण

व्यास उवाच

सकूलमूलबान्धवं प्रभुर्हरत्यसङ्गवान् ।

न सन्ति यस्य वारकाः कुरुष्व धर्मसंनिधिम् ॥

सर्वसमर्थ काल किसीके प्रति भी स्नेह नहीं करता । वह कूल और मूल अर्थात् आदि-अन्तसहित समस्त बन्धु-बान्धवोंको हर ले जाता है । उसको रोकनेवाले कोई नहीं हैं; इसलिये तुम धर्मका संचय करो ।

शान्तिपर्व, अध्याय 321, श्लोक 67 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2147 धर्म–आचरण

व्यास उवाच

श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्निकम् ।

न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वास्य न वाकृतम् ॥

जो काम कल करना हो, उसे आज ही कर लेना चाहिये और जो दोपहर-बाद करना हो, उसे पहले ही पहरमें पूरा कर डालना चाहिये; क्योंकि मौत यह नहीं देखती कि इसका काम पूरा हुआ है या नहीं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 321, श्लोक 73 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2148 नीति–व्यवहार

व्यास उवाच

मासर्तुसंज्ञापरिवर्तकेण ।

सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन ।

स्वकर्मनिष्ठाफलसाक्षिकेण ।

भूतानि कालः पचति प्रसह्य ॥

यह कालरूपी रसोइया बलपूर्वक सब जीवोंको पका रहा है । मास और ऋतु नामक करछुलसे वह जीवोंको उलटता-पलटता रहता है । सूर्य उसके लिये आगका काम देते हैं और कर्मफलके साक्षी रात और दिन उसके लिये ईंधन बने हुए हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 321, श्लोक 92 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2150