श्रीगणेशाय नमः।

श्रीरामचरितमानस

नाम महिमा

भगवन्नाम की सामर्थ्य

34 पद्य

श्रीरामचरितमानस

राम नाम की महिमा

बंदउँ नाम राम रघुबर को । हेतु कृसानु भानु हिमकर को ॥

बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो । अगुन अनूपम गुन निधान सो ॥

मैं श्रीरघुनाथजीके नाम ‘राम’ की वन्दना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात् ‘र’ ‘आ’ और ‘म’ रूपसे बीज है । वह ‘राम’ नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है । वह वेदोंका प्राण है; निर्गुण, उपमारहित और गुणोंका भण्डार है ।

बालकाण्ड, चौपाई 19.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 43 लीला–रहस्य
रामनाम की महिमा

बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास ॥

राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास ॥

श्रीरघुनाथजीकी भक्ति वर्षा ऋतु है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उत्तम सेवकगण धान हैं और ‘राम’ नामके दो सुन्दर अक्षर सावन-भादोंके महीने हैं ।

बालकाण्ड, दोहा 19 श्रीरामचरितमानस पृ. 43 भक्ति
नाम जप से ब्रह्मसुख

नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी । बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी ॥

ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा । अकथ अनामय नाम न रूपा ॥

ब्रह्माके बनाये हुए इस प्रपञ्च (दृश्य जगत्) से भलीभाँति छूटे हुए वैराग्यवान् मुक्त योगी पुरुष इस नामको ही जीभसे जपते हुए [तत्त्वज्ञानरूपी दिनमें] जागते हैं और नाम तथा रूपसे रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुखका अनुभव करते हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 22.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 45 साधना–योग ज्ञान–विवेक
नाम की महिमा

चहू चतुर कहुँ नाम अधारा । ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा ॥

चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ । कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ ॥

चारों ही चतुर भक्तोंको नामका ही आधार है; इनमें ज्ञानी भक्त प्रभुको विशेषरूपसे प्रिय है । यों तो चारों युगोंमें और चारों ही वेदोंमें नामका प्रभाव है, परन्तु कलियुगमें विशेषरूपसे है । इसमें तो [नामको छोड़कर] दूसरा कोई उपाय ही नहीं है ।

बालकाण्ड, चौपाई 22.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 46
नाम की महिमा

निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार ॥

कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार ॥

इस प्रकार निर्गुणसे नामका प्रभाव अत्यन्त बड़ा है । अब अपने विचारके अनुसार कहता हूँ कि नाम [सगुण] रामसे भी बड़ा है ।

बालकाण्ड, दोहा 23 श्रीरामचरितमानस पृ. 47 भक्ति
नाम की महिमा

राम एक तापस तिय तारी । नाम कोटि खल कुमति सुधारी ॥

रिषि हित राम सुकेतुसुता की । सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी ॥

सहित दोष दुख दास दुरासा । दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा ॥

भंजेउ राम आपु भव चापू । भव भय भंजन नाम प्रतापू ॥

श्रीरामजीने एक तपस्वीकी स्त्री (अहल्या) को ही तारा, परन्तु नामने करोड़ों दुष्टोंकी बिगड़ी बुद्धिको सुधार दिया । श्रीरामजीने ऋषि विश्वामित्रके हितके लिये एक सुकेतु यक्षकी कन्या ताड़काकी सेना और पुत्र (सुबाहु) सहित समाप्ति की; परन्तु नाम अपने भक्तोंके दोष, दुःख और दुराशाओंका इस तरह नाश कर देता है जैसे सूर्य रात्रिका । श्रीरामजीने तो स्वयं शिवजीके धनुषको तोड़ा, परन्तु नामका प्रताप ही संसारके सब भयोंका नाश करनेवाला है ।

तुलसीदासजी राम-नाम की महिमा का वर्णन करते हुए।

बालकाण्ड, चौपाई 24.2-3 श्रीरामचरितमानस पृ. 48
राम नाम की महिमा

ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि ॥

रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि ॥

इस प्रकार नाम [निर्गुण] ब्रह्म और [सगुण] राम दोनोंसे बड़ा है । यह वरदान देनेवालोंको भी वर देनेवाला है । श्रीशिवजीने अपने हृदयमें यह जानकर ही सौ करोड़ रामचरित्रमेंसे इस ‘राम’ नामको [साररूपसे चुनकर] ग्रहण किया है ।

बालकाण्ड, दोहा 25 श्रीरामचरितमानस पृ. 49
रामनाम की महिमा

नाम कामतरु काल कराला । सुमिरत समन सकल जग जाला ॥

राम नाम कलि अभिमत दाता । हित परलोक लोक पितु माता ॥

ऐसे कराल (कलियुगके) कालमें तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसारके सब जंजालोंको नाश कर देनेवाला है । कलियुगमें यह रामनाम मनोवाञ्छित फल देनेवाला है, परलोकका परम हितैषी और इस लोकका माता-पिता है (अर्थात् परलोकमें भगवान्‌का परमधाम देता है और इस लोकमें माता-पिताके समान सब प्रकारसे पालन और रक्षण करता है)

बालकाण्ड, चौपाई 27.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 50 काल–मृत्यु
रामनाम की महिमा

नहिं कलि करम न भगति बिबेकू । राम नाम अवलंबन एकू ॥

कालनेमि कलि कपट निधानू । नाम सुमति समरथ हनुमानू ॥

कलियुगमें न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है; रामनाम ही एक आधार है । कपटकी खान कलियुगरूपी कालनेमिके [मारनेके] लिये रामनाम ही बुद्धिमान् और समर्थ श्रीहनुमान्जी हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 27.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 51
रामनाम की महिमा

भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ । नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ ॥

सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा । करउँ नाइ रघुनाथहि माथा ॥

अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (वैर) से, क्रोधसे या आलस्यसे, किसी तरहसे भी नाम जपनेसे दसों दिशाओंमें कल्याण होता है । उसी (परम कल्याणकारी) रामनामका स्मरण करके और श्रीरघुनाथजीको मस्तक नवाकर मैं रामजीके गुणोंका वर्णन करता हूँ ।

बालकाण्ड, चौपाई 28(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 51
नाम स्मरण का प्रभाव

बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं । जनम अनेक रचित अघ दहहीं ॥

सादर सुमिरन जे नर करहीं । भव बारिधि गोपद इव तरहीं ॥

विवश होकर (बिना इच्छाके) भी जिनका नाम लेनेसे मनुष्योंके अनेक जन्मोंमें किये हुए पाप जल जाते हैं । फिर जो मनुष्य आदरपूर्वक उनका स्मरण करते हैं, वे तो संसाररूपी [दुस्तर] समुद्रको गायके खुरसे बने हुए गड्ढे के समान (अर्थात् बिना किसी परिश्रमके) पार कर जाते हैं ।

शिवजी ने पार्वतीजी का भ्रम मिटाते हुए कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 119.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 133
शिवनाम का जप

जपहु जाइ संकर सत नामा । होइहि हृदयँ तुरत बिश्रामा ॥

कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें । असि परतीति तजहु जनि भोरें ॥

[भगवान्ने कहा—] जाकर शङ्करजीके शतनामका जप करो, इससे हृदयमें तुरंत शान्ति होगी । शिवजीके समान मुझे कोई प्रिय नहीं है, इस विश्वासको भूलकर भी न छोड़ना ।

भगवान् विष्णु ने नारद मुनि से कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 138.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 149 भक्ति

जाकर नाम सुनत सुभ होई । मोरें गृह आवा प्रभु सोई ॥

परमानंद पूरि मन राजा । कहा बोलाइ बजावहु बाजा ॥

जिनका नाम सुननेसे ही कल्याण होता है, वही प्रभु मेरे घर आये हैं । [यह सोचकर] राजाका मन परम आनन्दसे पूर्ण हो गया । उन्होंने बाजेवालोंको बुलाकर कहा कि बाजा बजाओ ।

बालकाण्ड, चौपाई 193.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 196

जो आनंद सिंधु सुखरासी । सीकर तें त्रैलोक सुपासी ॥

सो सुखधाम राम अस नामा । अखिल लोक दायक बिश्रामा ॥

ये जो आनन्दके समुद्र और सुखकी राशि हैं, जिस (आनन्दसिन्धु) के एक कणसे तीनों लोक सुखी होते हैं, उन (आपके सबसे बड़े पुत्र) का नाम ‘राम’ है, जो सुखका भवन और सम्पूर्ण लोकोंको शान्ति देनेवाला है ।

बालकाण्ड, चौपाई 197.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 199

ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे । होइहहिं टूटें धनुष सुखारे ॥

उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा । दुरे नखत जग तेजु प्रकासा ॥

वैसे ही हे प्रभो! आपके सब भक्त धनुष टूटनेपर सुखी होंगे । सूर्य उदय हुआ, बिना ही परिश्रम अन्धकार नष्ट हो गया । तारे छिप गये, संसारमें तेजका प्रकाश हो गया ।

बालकाण्ड, चौपाई 239.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 235 लीला–रहस्य
श्रीसीतारामजी की महिमा

जिन्ह कर नाम लेत जग माहीं । सकल अमंगल मूल नसाहीं ॥

करतल होहिं पदारथ चारी । तेइ सिय रामु कहेउ कामारी ॥

जिनका नाम लेते ही जगत्में सारे अमङ्गलोंकी जड़ कट जाती है और चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) मुट्ठीमें आ जाते हैं, ये वही [जगत्के माता-पिता] श्रीसीतारामजी हैं; कामके शत्रु शिवजीने ऐसा कहा ।

शिवजी ने देवताओं को समझाया कि यह श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी का विवाह है।

बालकाण्ड, चौपाई 315.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 297 भक्ति
चरण पखारन और जयघोष

लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली ॥

नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली ॥

जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं ॥

जे सकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलि मल भाजहीं ॥

वे श्रीरामजीके चरणकमलोंको पखारने लगे, प्रेमसे उनके शरीरमें पुलकावली छा रही है ॥

आकाश और नगरमें होनेवाली गान, नगाड़े और जय-जयकारकी ध्वनि मानो चारों दिशाओंमें उमड़ चली । जो चरणकमल कामदेवके शत्रु श्रीशिवजीके हृदयरूपी सरोवरमें सदा ही विराजते हैं, जिनका एक बार भी स्मरण करनेसे मनमें निर्मलता आ जाती है और कलियुगके सारे पाप भाग जाते हैं … ।

राजा-रानी प्रेममग्न होकर श्रीरामचन्द्रजी के पवित्र चरणों को पखारने लगे।

बालकाण्ड, छन्द 324.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 308 भक्ति
राम यश की महिमा

निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसीं कह्यो ॥

रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो ॥

उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं ॥

बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं ॥

अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये तुलसीने रामका यश कहा है । [नहीं तो] श्रीरघुनाथजीका चरित्र अपार समुद्र है, किस कविने उसका पार पाया है? जो लोग यज्ञोपवीत और विवाहके मङ्गलमय उत्सवका वर्णन आदरके साथ सुनकर गावेंगे, वे लोग श्रीजानकीजी और श्रीरामजीकी कृपासे सदा सुख पावेंगे ।

तुलसीदासजी ने अपनी वाणी को पवित्र करने के लिए श्रीरघुनाथजी के यश का वर्णन किया है।

बालकाण्ड, छन्द (361 के निकट) श्रीरामचरितमानस पृ. 343 भक्ति

जासु नाम सुमिरत एक बारा । उतरहिं नर भवसिंधु अपारा ॥

सोइ कृपालु केवटहि निहोरा । जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा ॥

एक बार जिनका नाम स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागरके पार उतर जाते हैं, और जिन्होंने [वामनावतारमें] जगत्‌को तीन पगसे भी छोटा कर दिया था (दो ही पगमें त्रिलोकीको नाप लिया था), वही कृपालु श्रीरामचन्द्रजी [गङ्गाजीसे पार उतारनेके लिये] केवटका निहोरा कर रहे हैं!

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 101.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 429
राम नाम की महिमा

यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं । सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं ॥

बारक राम कहत जग जेऊ । होत तरन तारन नर तेऊ ॥

भरतजीके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है, जिन्हें श्रीरामजी स्वयं अपने मनमें स्मरण करते रहते हैं । जगत्में जो भी मनुष्य एक बार ‘राम’ कह लेते हैं, वे भी तरने-तारनेवाले हो जाते हैं!

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 217.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 526

अतुलित भुज प्रताप बल धामः । कलि मल विपुल विभंजन नामः ॥

धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः । संतत शं तनोतु मम रामः ॥

जिनकी भुजाओंका प्रताप अतुलनीय है, जो बलके धाम हैं, जिनका नाम कलियुगके बड़े भारी पापोंका नाश करनेवाला है, जो धर्मके कवच (रक्षक) हैं और जिनके गुणसमूह आनन्द देनेवाले हैं, वे श्रीरामजी निरन्तर मेरे कल्याणका विस्तार करें ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 11.8 श्रीरामचरितमानस पृ. 636 धर्म–आचरण

तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी । जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी ॥

ऊमर तरु बिसाल तव माया । फल ब्रह्मांड अनेक निकाया ॥

हे पापोंका नाश करनेवाले! मैं तो आपहीके भजनके प्रभावसे आपकी कुछ थोड़ी-सी महिमा जानता हूँ । आपकी माया गूलरके विशाल वृक्षके समान है, अनेकों ब्रह्माण्डोंके समूह ही जिसके फल हैं ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 13.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 639
रामनाम की श्रेष्ठता

जद्यपि प्रभु के नाम अनेका । श्रुति कह अधिक एक तें एका ॥

राम सकल नामन्ह तें अधिका । होउ नाथ अघ खग गन बधिका ॥

यद्यपि प्रभुके अनेकों नाम हैं और वेद कहते हैं कि वे सब एक-से-एक बढ़कर हैं, तो भी हे नाथ! रामनाम सब नामोंसे बढ़कर हो और पापरूपी पक्षियोंके समूहके लिये यह वधिकके समान हो ।

नारदजी ने श्रीरघुनाथजी से यह वर माँगते हुए कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 42(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 677 भक्ति

राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम ॥

अपर नाम उडगन बिमल बसहुँ भगत उर ब्योम ॥

आपकी भक्ति पूर्णिमाकी रात्रि है; उसमें ‘राम’ नाम यही पूर्ण चन्द्रमा होकर और अन्य सब नाम तारागण होकर भक्तोंके हृदयरूपी निर्मल आकाशमें निवास करें ।

अरण्यकाण्ड, दोहा 42(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 677 भक्ति

पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं । अति अपार भवसागर तरहीं ॥

तासु दूत तुम्ह तजि कदराई । राम हृदयँ धरि करहु उपाई ॥

पापी भी जिनका नाम स्मरण करके अत्यन्त अपार भवसागरसे तर जाते हैं, तुम उनके दूत हो, अतः कायरता छोड़कर श्रीरामजीको हृदयमें धारण करके उपाय करो ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 29.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 711 भक्ति
हनुमान जी का आत्म-बन्धन

जासु नाम जप सुनहु भवानी । भव बंधन काटहिं नर ग्यानी ॥

तासु दूत कि बंध तरु आवा । प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण) के बन्धनको काट डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धनमें आ सकता है? किन्तु प्रभुके कार्यके लिये हनुमान्जीने स्वयं अपनेको बँधा लिया ।

शिवजी ने भवानी से कहा।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 20.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 734 ज्ञान–विवेक

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान ॥

सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान ॥

श्रीरघुनाथजीका गुणगान सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोंका देनेवाला है । जो इसे आदरसहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य साधन) के ही भवसागरको तर जायँगे ।

सुन्दरकाण्ड, दोहा 60 श्रीरामचरितमानस पृ. 770 भक्ति

किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो ॥

पायो बिभीषन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो ॥

मोहि सहित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइहैं ॥

संसार सिंधु अपार पार प्रयास बिनु नर पाइहैं ॥

भगवान्ने अमृतके समान यह वाणी कहकर सबको सुखी किया कि तुम्हारे ही बलसे यह प्रबल शत्रु मारा गया और विभीषणने राज्य पाया । इसके कारण तुम्हारा यश तीनों लोकोंमें नित्य नया बना रहेगा । जो लोग मेरेसहित तुम्हारी शुभ कीर्तिको परम प्रेमके साथ गायेंगे वे बिना ही परिश्रम इस अपार संसारसागरका पार पा जायँगे ।

लङ्काकाण्ड, छन्द (106 के निकट) श्रीरामचरितमानस पृ. 886 भक्ति

महिमा नाम रूप गुन गाथा । सकल अमित अनंत रघुनाथा ॥

निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं । निगम सेष सिव पार न पावहिं ॥

श्रीरघुनाथजीकी महिमा, नाम, रूप और गुणोंकी कथा सभी अपार एवं अनन्त हैं तथा श्रीरघुनाथजी स्वयं भी अनन्त हैं । मुनिगण अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार श्रीहरिके गुण गाते हैं । वेद, शेष और शिवजी भी उनका पार नहीं पाते ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 91(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 995
नाम सङ्कीर्तन की महिमा

कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग ॥

जो गति होड़ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग ॥

सत्ययुग, त्रेता और द्वापरमें जो गति पूजा, यज्ञ और योगसे प्राप्त होती है, वही गति कलियुगमें लोग केवल भगवान्के नामसे पा जाते हैं ।

गरुड़जी को सम्बोधित करते हुए कलिकाल के गुणों का वर्णन।

उत्तरकाण्ड, दोहा 102(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 1007 भक्ति
नाम सङ्कीर्तन की महिमा

द्वापर करि रघुपति पद पूजा । नर भव तरहिं उपाय न दूजा ॥

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा । गावत नर पावहिं भव थाहा ॥

द्वापरमें श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी पूजा करके मनुष्य संसारसे तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है । और कलियुगमें तो केवल श्रीहरिकी गुणगाथाओंका गान करनेसे ही मनुष्य भवसागरकी थाह पा जाते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 103(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 1007 साधना–योग भक्ति
नाम सङ्कीर्तन की महिमा

कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना । एक अधार राम गुन गाना ॥

सब भरोस तजि जो भज रामहि । प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि ॥

सोइ भव तर कछु संसय नाहीं । नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं ॥

कलि कर एक पुनीत प्रतापा । मानस पुन्य होहिं नहिं पापा ॥

कलियुगमें न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है । श्रीरामजीका गुणगान ही एकमात्र आधार है । अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्रीरामजीको भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहोंको गाता है, वही भवसागरसे तर जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । नामका प्रताप कलियुगमें प्रत्यक्ष है । कलियुगका एक पवित्र प्रताप (महिमा) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर [मानसिक] पाप नहीं होते ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 103(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1007 भक्ति

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास ॥

गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास ॥

यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुगके समान दूसरा युग नहीं है । [क्योंकि] इस युगमें श्रीरामजीके निर्मल गुणसमूहोंको गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार [रूपी समुद्र] से तर जाता है ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 103(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 1008 भक्ति
राम-स्मरण की महिमा

एहिं कलिकाल न साधन दूजा । जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा ॥

रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि । संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि ॥

[तुलसीदासजी कहते हैं—] इस कलिकालमें योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है । बस, श्रीरामजीका ही स्मरण करना, श्रीरामजीका ही गुण गाना और निरन्तर श्रीरामजीके ही गुणसमूहोंको सुनना चाहिये ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 130(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1047 भक्ति