श्रीगणेशाय नमः।
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १
वैराग्य
अनासक्ति और संसार की नश्वरता
10 पद्य
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १
नारद उवाच
अन्यमासं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं सुसमाहिताः ।
सर्वपापहरं पुण्यं सर्वदुःखनिबर्हणम् ॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां चैव योषिताम् ।
समस्तकामफलदं सर्वव्रतफलप्रदम् ॥
दुःस्वप्ननाशनं धन्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ।
रामायणस्य माहात्म्यं श्रोतव्यं च प्रयत्नतः ॥
नारदजी कहते हैं — महर्षियो! अब मैं रामायणके पाठ और श्रवणके लिये उपयोगी दूसरे मासका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ।
नारदजी महर्षियों से कहते हैं।
विनाशकामामहिताममित्रामावासयं मृत्युमिवात्मनस्त्वाम् ।
चिरं बताङ्केन धृतासि सर्प ।
महाविषा तेन हतोऽस्मि मोहात् ॥
अरी! तू मेरा विनाश चाहनेवाली, अहित करनेवाली और शत्रुरूप है । जैसे कोई अपनी ही मृत्युको घरमें स्थान दे दे, उसी प्रकार मैंने तुझे घरमें बसा लिया है । खेदकी बात है कि मैंने मोहवश तुझ महाविषैली नागिनको चिरकालसे अपने अङ्कमें धारण कर रखा है; इसीलिये आज मैं मारा गया ।
क्रोधलोभौ विमोक्तव्यौ कर्तव्या तपसे मतिः ।
न भेतव्यं च भेतव्ये दुःखं नित्यमतो वनम् ॥
वहाँ क्रोध और लोभको त्याग देना होता है, । तपस्यामें मन लगाना पड़ता है और जहाँ भयका स्थान है, वहाँ भी भयभीत न होनेकी आवश्यकता होती है; अतः वनमें सदा दुःख-ही-दुःख है ।
श्रीराम ने सीता से कहा।
ये च त्वामनुजीवन्ति नाहं तेषां न ते मम ।
केवलार्थपरां हि त्वां त्यक्तधर्मां त्यजाम्यहम् ॥
जो तेरा आश्रय लेकर जीवन निर्वाह करते हैं, मैं उनका स्वामी नहीं हूँ और वे मेरे परिजन नहीं हैं । तूने केवल धनमें आसक्त होकर धर्मका त्याग किया है, इसलिये मैं तेरा परित्याग करता हूँ ।
राजा दशरथ ने कैकेयी से कहा।
यथा ग्रामान्तरं गच्छन् नरः कश्चिद् बहिर्वसेत् ।
उत्सृज्य च तमावासं प्रतिष्ठेतापरेऽहनि ॥
एवमेव मनुष्याणां पिता माता गृहं वसु ।
आवासमात्रं काकुत्स्थ सज्जन्ते नात्र सज्जनाः ॥
जैसे कोई मनुष्य दूसरे गाँवको जाते समय बाहर किसी धर्मशालामें एक रातके लिये ठहर जाता है और दूसरे दिन उस स्थानको छोड़कर आगेके लिये प्रस्थित हो जाता है, इसी प्रकार पिता, माता, घर और धन-ये मनुष्योंके आवासमात्र हैं । ककुत्स्थकुलभूषण! इनमें सज्जन पुरुष आसक्त नहीं होते हैं ।
जाबालि ने श्रीराम से कहा।
कच्चिच्छुश्रूषमाणा वः शुश्रूषणपरा मयि ।
प्रमदाभ्युचितां वृत्तिं सीता युक्तां न वर्तते ॥
‘अथवा क्या जो अर्घ्य पाद्य आदिके द्वारा सदा आपलोगोंकी सेवा करती रही है, वह सीता इस समय मेरी सेवामें लग जानेके कारण एक गृहस्थकी सती नारीके अनुरूप ऋषियोंकी समुचित सेवा नहीं कर पाती है?’
श्रीराम ने महर्षि से पूछा।
न नूनं चात्मनः श्रेयः पथ्यं वा समवेक्षसे ।
मृत्युकाले यथा मर्त्यो विपरीतानि सेवते ।
मुमूर्षूणां तु सर्वेषां यत् पथ्यं तन्न रोचते ॥
निश्चय ही तू अपने कल्याण और हितका विचार नहीं करता है । जैसे मरनेके समय मनुष्य स्वास्थ्यके विरोधी पदार्थोंका सेवन करने लगता है, वही दशा तेरी है । प्रायः सभी मरणासन्न मनुष्योंको पथ्य (हितकारक सलाह या भोजन) नहीं रुचता है ।
जानास्यनियतामेवं भूतानामागतिं गतिम् ।
तस्माच्छुभं हि कर्तव्यं पण्डिते नेह लौकिकम् ॥
देवि! तुम विदुषी हो, अतः जानती ही हो कि प्राणियोंके जन्म और मृत्युका कोई निश्चित समय नहीं है । इसलिये शुभ (परलोकके लिये सुखद) कर्म ही करना चाहिये । अधिक रोना-धोना आदि जो लौकिक कर्म (व्यवहार) है, उसे नहीं करना चाहिये ।
एष शोकः परित्यक्तः सर्वकार्यावसादकः ।
विक्रमेष्वप्रतिहतं तेजः प्रोत्साहयाम्यहम् ॥
लो, सब तरहके काम बिगाड़नेवाले शोकको मैंने त्याग दिया । अब मैं पराक्रमविषयक दुर्धर्ष तेजको प्रोत्साहित करता हूँ (बढ़ाता हूँ)
श्रीरघुनाथजी ने लक्ष्मण से इस प्रकार कहा।
तत्र नामुदितः कश्चिन्नात्र कश्चिदसत्प्रियः ।
अहन्यहनि वर्धन्ते गुणास्तत्र मनोरमाः ॥
वहाँ कोई भी अप्रसन्न नहीं रहता । किसीकी भी बुरे कामोंमें प्रीति नहीं होती । वहाँ रहनेसे प्रतिदिन मनोरम गुणोंकी वृद्धि होती है ।