श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १

कर्म–प्रारब्ध

कर्म और उसका फल

13 पद्य

महाभारत — खण्ड १

धर्मयुक्त कर्म का पालन

वैशम्पायन → राजन

स्वकर्मनिरताश्चासन् सर्वे वर्णा नराधिप ।

एवं तदा नरव्याघ्र धर्मो न हसते क्वचित् ॥

राजन्! उस समय सब वर्णोंके लोग अपने-अपने कर्मके पालनमें लगे रहते थे । नरश्रेष्ठ! इस प्रकार उस समय कहीं भी धर्मका ह्रास नहीं होता था ।

आदिपर्व, अध्याय 64, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड १ पृ. 453
अधर्म का उदय

वैशम्पायन उवाच

प्रजानामन्नकामानामन्योन्यपरिभक्षणात् ।

अधर्मस्तत्र संजातः सर्वभूतविनाशकः ॥

तदनन्तर एक समय ऐसा आया जब प्रजा भूखसे पीड़ित हो भोजनकी इच्छासे एक-दूसरेको मारकर खाने लगी, उस समय वहाँ अधर्म प्रकट हुआ, जो समस्त प्राणियोंका नाश करनेवाला है ।

आदिपर्व, अध्याय 66, श्लोक 53 महाभारत — खण्ड १ पृ. 473 माया–संसार
पाप का फल

पुत्रेषु वा नप्तृषु वा न चेदात्मनि पश्यति ।

फलत्येव ध्रुवं पापं गुरु भुक्तमिवोदरे ॥

‘यदि वह (पापसे उपार्जित द्रव्यका) दुष्परिणाम अपने ऊपर नहीं दिखायी देता तो उस अन्यायोपार्जित द्रव्यका उपभोग करनेके कारण पुत्रों अथवा नाती-पोतोंपर अवश्य प्रकट होता है । जैसे खाया हुआ गरिष्ठ अन्न तुरंत नहीं तो कुछ देर बाद अवश्य ही पेटमें उपद्रव करता है, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी निश्चय ही अपना फल देता है’

शुक्राचार्य जी ने वृषपर्वा से कहा।

आदिपर्व, अध्याय 80, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड १ पृ. 605
अधर्म का परिणाम

शुक्र उवाच

धर्मज्ञः सन् महाराज योऽधर्ममकृथाः प्रियम् ।

तस्माज्जरा त्वामचिराद् धर्षयिष्यति दुर्जया ॥

शुक्राचार्यने कहा — महाराज! तुमने धर्मज्ञ होकर भी अधर्मको प्रिय मानकर उसका आचरण किया है । इसलिये जिसको जीतना कठिन है, वह वृद्धावस्था तुम्हें शीघ्र ही धर दबायेगी ।

शुक्राचार्य ने महाराज ययाति से कहा।

आदिपर्व, अध्याय 83, श्लोक 31 महाभारत — खण्ड १ पृ. 629 वैराग्य
धर्मनिष्ठ वानप्रस्थ का मोक्ष

ययाति उवाच

पापानां कर्मणां नित्यं बिभियाद् यस्तु मानवः ।

सुखमप्याचरन् नित्यं सोऽत्यन्तं सुखमेधते ॥

किंतु जो वानप्रस्थ मनुष्य पापकर्मोंसे नित्य भय करता है और सदा अपने धर्मका आचरण करता है, वह अत्यन्त सुखरूप मोक्षको अनायास ही प्राप्त कर लेता है ।

ययाति ने वानप्रस्थ का धर्म बताते हुए कहा।

आदिपर्व, अध्याय 92, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड १ पृ. 676
प्रारब्ध का प्रभाव

मृग → राजन

काममन्युपरीता हि बुद्ध्या विरहिता अपि ।

वर्जयन्ति नृशंसानि पापेष्वपि रता नराः ॥

न विधिं ग्रसते प्रज्ञा प्रज्ञां तु ग्रसते विधिः ।

विधिपर्यागतानर्थान् प्राज्ञो न प्रतिपद्यते ॥

मृगने कहा — राजन्! जो मनुष्य काम और क्रोधसे घिरे हुए, बुद्धिशून्य तथा पापोंमें संलग्न रहनेवाले हैं, वे भी ऐसे क्रूरतापूर्ण कर्मको त्याग देते हैं । बुद्धि प्रारब्धको नहीं ग्रसती (नहीं लाँघ सकती) प्रारब्ध ही बुद्धिको अपना ग्रास बना लेता है (भ्रष्ट कर देता है) । प्रारब्धसे प्राप्त होनेवाले पदार्थोंको बुद्धिमान् पुरुष भी नहीं जान पाता ।

मृगरूपधारी मुनि ने राजा पाण्डु से कहा।

आदिपर्व, अध्याय 117, श्लोक 9–10 महाभारत — खण्ड १ पृ. 840
दैव और पुरुषार्थ

पाण्डु उवाच

दैवे पुरुषकारे च लोकोऽयं सम्प्रतिष्ठितः ।

तत्र दैवं तु विधिना कालयुक्तेन लभ्यते ॥

यह संसार दैव तथा पुरुषार्थपर अवलम्बित है । इनमें दैव तभी सुलभ (सफल) होता है, जब समयपर उद्योग किया जाय ।

पाण्डु ने कहा।

आदिपर्व, अध्याय 122, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड १ पृ. 876
मोह और लोभ का प्रभाव

वैशम्पायन उवाच

तस्य धर्मादपेतस्य पापानि परिपश्यतः ।

मोहादैश्वर्यलोभाच्च पापा मतिरजायत ॥

वह सदा धर्मसे दूर रहता और पापकर्मोंपर ही दृष्टि रखता था । मोह और ऐश्वर्यके लोभसे उसके मनमें पापपूर्ण विचार भर गये थे ।

वैशम्पायनजी ने जनमेजय से दुर्योधन की मनोदशा का वर्णन किया।

आदिपर्व, अध्याय 127, श्लोक 26 महाभारत — खण्ड १ पृ. 921 काम–क्रोध–लोभ–मोह
देश-काल का महत्व

कणिक उवाच

उत्साहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता ।

विभज्य देशकालौ च दैवं धर्मादयस्त्रयः ।

नैःश्रेयसौ तु तौ ज्ञेयौ देशकालाविति स्थितिः ॥

ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले राजाको देश और कालका विभाग करके ही यत्नपूर्वक उत्साह एवं उद्यम करना चाहिये । इसी प्रकार देश-कालके विभाग-पूर्वक ही प्रारब्धकर्म तथा धर्म, अर्थ और कामका सेवन करना चाहिये । देश और कालको ही मंगलके प्रधान हेतु समझना चाहिये । यही नीतिशास्त्रका सिद्धान्त है ।

आदिपर्व, अध्याय 139, श्लोक 85 महाभारत — खण्ड १ पृ. 1030 नीति–व्यवहार
द्रोण की उदारता

ब्राह्मण उवाच

धृष्टद्युम्नं तु पाञ्चाल्यमानीय स्वं निवेशनम् ।

उपाकरोदस्त्रहेतोर्भारद्वाजः प्रतापवान् ॥

अमोक्षणीयं दैवं हि भावि मत्वा महामतिः ।

तथा तत् कृतवान् द्रोण आत्मकीर्त्यनुरक्षणात् ॥

परम बुद्धिमान् प्रतापी भरद्वाजनन्दन द्रोण यह सोचकर कि प्रारब्धके भावी विधानको टालना असम्भव है, पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नको अपने घर ले आये और उन्होंने उसे अस्त्र-विद्याकी शिक्षा देकर उसका बहुत बड़ा उपकार किया । द्रोणाचार्यने अपनी कीर्तिकी रक्षाके लिये वह उदारतापूर्ण कार्य किया ।

द्रोणाचार्य ने पाञ्चालराजकुमार धृष्टद्युम्न को अपने घर ले आकर उसे अस्त्र-विद्या की शिक्षा दी।

आदिपर्व, अध्याय 166, श्लोक 55–56 महाभारत — खण्ड १ पृ. 1186
काल की दुर्लङ्घता

व्यास → राजन

एवमीदृशकं स्वप्नं द्रक्ष्यसि त्वं विशाम्पते ।

मा तत्कृते ह्यनुध्याहि कालो हि दुरतिक्रमः ॥

राजन्! तुम्हें इस प्रकार ऐसा स्वप्न दिखायी देगा, किंतु उसके लिये तुम्हें चिन्ता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि काल सबके लिये दुर्लङ्घ है ।

व्यासजी ने युधिष्ठिर से कहा।

सभापर्व, अध्याय 46, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड १ पृ. 2024
कर्म का महत्व

दुर्योधन उवाच

भयं परिहरन् मन्द आत्मानं परिपालयन् ।

वर्षासु क्लिन्नकटवत् तिष्ठन्नेवावसीदति ॥

मूर्ख मनुष्य भयका त्याग और आत्मरक्षा करते हुए भी यदि चुपचाप बैठा रहे, उद्योग न करे, तो वह वर्षाकालमें भींगी हुई चटाईके समान नष्ट हो जाता है ।

दुर्योधन ने पिता धृतराष्ट्र से कहा।

सभापर्व, अध्याय 56, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड १ पृ. 2082 नीति–व्यवहार
धर्मज्ञा की महिमा

कुन्ती उवाच

धन्यां चातीन्द्रियज्ञानामिमां प्राप्तां परां गतिम् ।

मन्ये तु माद्रीं धर्मज्ञां कल्याणीं सर्वथैव तु ॥

रत्या मत्या च गत्या च ययाहमभिसन्धिता ।

जीवितप्रियतां मह्यं धिङ्मां संक्लेशभागिनीम् ॥

इसी प्रकार अतीन्द्रिय ज्ञानसे सम्पन्न एवं परमगतिको प्राप्त हुई कल्याणमयी इस धर्मज्ञा माद्रीको भी सर्वथा धन्य मानती हूँ । जिसने अपने अनुराग, उत्तम बुद्धि और सद्व्यवहारद्वारा मुझे भुलाकर जीवित रहनेके लिये विवश कर दिया । मुझको और जीवनके प्रति मेरी इस आसक्तिको धिक्कार है! जिसके कारण मुझे यह महान् क्लेश भोगना पड़ता है ।

सभापर्व, अध्याय 79, श्लोक 19–20 महाभारत — खण्ड १ पृ. 2229 माया–संसार