श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६

माया–संसार

माया, भ्रम और जगत् का स्वरूप

17 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

कर्म का प्रधानत्व

काल उवाच

कर्मदायादवाँल्लोकः कर्मसम्बन्धलक्षणः ।

कर्माणि चोदयन्तीह यथान्योन्यं तथा वयम् ॥

संसारमें कर्म ही मनुष्योंका पुत्र-पौत्रके समान अनुगमन करनेवाला है । कर्म ही दुःख-सुखके सम्बन्धका सूचक है । इस जगत् में कर्म ही जैसे परस्पर एक-दूसरेको प्रेरित करते हैं, वैसे ही हम भी कर्मोंसे ही प्रेरित हुए हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 1, श्लोक 73 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 37 ज्ञान–विवेक
परम तत्व का दुर्लभ ज्ञान

तण्डि उवाच

दुर्विज्ञेयमसंख्येयं दुष्प्रापमकृतात्मभिः ।

योनिं विश्वस्य जगतस्तमसः परतः परम् ॥

उनका ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है । वे अप्रमेय हैं । जिन्होंने अपने अन्तःकरणको पवित्र एवं वशीभूत नहीं किया है, उनके लिये वे सर्वथा दुर्लभ हैं । वे ही सम्पूर्ण जगत्के कारण हैं । अज्ञानमय अन्धकारसे अत्यन्त परे हैं ।

तण्डि मुनि ने उग्र तपस्या के द्वारा प्राप्त किए गए ईश्वर के दर्शन के उपरान्त उनकी स्तुति करते हुए कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 16, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 230 ज्ञान–विवेक
ब्रह्म का स्वरूप

तण्डि उवाच

मनोरिन्द्राग्निमरुतां विश्वस्य ब्रह्मणो गतिम् ।

अग्राह्यमचलं शुद्धं बुद्धिग्राह्यं मनोमयम् ॥

वे ही मनु, इन्द्र, अग्नि, मरुद्गण, सम्पूर्ण विश्व तथा ब्रह्माजीकी भी गति हैं । मन और इन्द्रियोंके द्वारा उनका ग्रहण नहीं हो सकता । वे अग्राह्य, अचल, शुद्ध, बुद्धिके द्वारा अनुभव करने योग्य तथा मनोमय हैं ।

तण्डि मुनि ने ब्रह्म के दर्शन प्राप्त करने के बाद उनकी स्तुति की।

अनुशासनपर्व, अध्याय 16, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 230 ज्ञान–विवेक
भक्तों की स्वतन्त्रता

एवमेव महादेवं भक्ता ये मानवा भुवि ।

न ते संसारवशगा इति मे निश्चिता मतिः ॥

‘इसी प्रकार इस भूतलपर जो मानव महादेवजीके भक्त हैं, वे संसारके अधीन नहीं होते — यह मेरा निश्चित विचार है ।’

श्रीकृष्ण ने धर्मपुत्र युधिष्ठिर से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 18, श्लोक 69–70 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 284 वैराग्य
इन्द्र का मायावी रूप

देवशर्मा → तात

मक्षिकामशकादीनां वपुर्धारयतेऽपि च ।

न शक्यमस्य ग्रहणं कर्तुं विपुल केनचित् ॥

अपि विश्वकृता तात येन सृष्टमिदं जगत् ।

पुनरन्तर्हितः शक्रो दृश्यते ज्ञानचक्षुषा ॥

वे मक्खी और मच्छर आदिके भी रूप धारण करते हैं । विपुल! कोई भी उन्हें पकड़ नहीं सकता । तात! औरोंकी तो बात ही क्या है? जिन्होंने इस संसारको बनाया है वे विधाता भी उन्हें अपने काबूमें नहीं कर सकते। अन्तर्धान हो जानेपर इन्द्र केवल ज्ञानदृष्टिसे दिखायी देते हैं ।

देवशर्मा ने विपुल से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 40, श्लोक 36–37 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 445
तृष्णा का स्वभाव

विश्वामित्र उवाच

कामं कामयमानस्य यदा कामः समृध्यते ।

अथैनमपरः कामस्तृष्णाविध्यति बाणवत् ॥

विश्वामित्र बोले — किसी वस्तुकी कामना करनेवाले मनुष्यकी एक इच्छा जब पूरी होती है, तब दूसरी नयी उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार तृष्णा तीरकी तरह मनुष्यके मनपर चोट करती ही रहती है ।

विश्वामित्र ने कश्यप और गौतम के कथनों के सन्दर्भ में कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 93, श्लोक 43 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 796 वैराग्य
अमृत और विष का स्वरूप

शुक्र उवाच

अमृतं मनसः प्रीतिं सद्यस्तृप्तिं ददाति च ।

मनो ग्लपयते तीव्रं विषं गन्धेन सर्वशः ॥

अमृत वह है, जिसे देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है । जो तत्काल तृप्ति प्रदान करता है और विष वह है जो अपनी गन्धसे चित्तमें सर्वथा तीव्र ग्लानि पैदा करता है ।

शुक्राचार्य ने राजा से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 98, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 866 ज्ञान–विवेक
कृष्ण का सर्वव्यापी स्वरूप

भीष्म उवाच

वेद्यं च यद् वेदयते च वेद्यं ।

विधिश्च यश्च श्रयते विधेयम् ।

धर्मे च वेदे च बले च सर्वं ।

चराचरं केशवं त्वं प्रतीहि ॥

ये स्वयं वेद्यस्वरूप होकर भी वेदवेद्य तत्त्वको जाननेका प्रयत्न करते हैं । विधिरूप होकर भी विहित कर्मोंका आश्रय लेते हैं । ये ही धर्म, वेद और बलमें स्थित हैं । तुम यह विश्वास करो कि सारा चराचर जगत् श्रीकृष्णका ही स्वरूप है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 158, श्लोक 36 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1503 लीला–रहस्य

वासुदेव उवाच

मोहमेव नियच्छन्ति कर्मणा ज्ञानवर्जिताः ।

नैष्कर्म्यं न च लोकेऽस्मिन् मुहूर्तमपि लभ्यते ॥

किंतु जिन्हें ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हुई है, वे लोग कर्मके द्वारा मोहका ही संग्रह करते हैं । इस लोकमें कोई दो घड़ी भी बिना कर्म किये रह सके, ऐसा सम्भाव नहीं है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 20, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1681 ज्ञान–विवेक

मन उवाच

बहूनपि हि संकल्पान् मत्वा स्वप्नानुपास्य च ।

बुभुक्षया पीड्यमानो विषयानेव धावति ॥

बहुत-से संकल्पोंका मनन और स्वप्नोंका आश्रय लेकर भोग भोगनेकी इच्छासे पीड़ित हुआ प्राणी विषयोंकी ओर ही दौड़ता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 22, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1693 वैराग्य
अन्न और ममत्व

ब्राह्मण उवाच

अदन्नन्नान्यथोऽविद्वान् ममत्वेनोपपद्यते ।

आत्मार्थे पाचयन्नन्नं ममत्वेनोपहन्यते ॥

अज्ञानी पुरुष अन्न भोजन करते समय उसके प्रति ममत्वसे युक्त हो जाता है । इसी प्रकार जो अपने लिये भोजन पकाता है, वह भी ममत्व दोषसे मारा जाता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 25, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1704 कर्म–प्रारब्ध
ब्रह्मचर्य का स्वरूप

ब्राह्मण उवाच

संकल्पदंशमशकं शोकहर्षहिमातपम् ।

मोहान्धकारतिमिरं लोभव्याधिसरीसृपम् ॥

विषयैकात्ययाध्वानं कामक्रोधविरोधकम् ।

तदतीत्य महादुर्गं प्रविष्टोऽस्मि महद् वनम् ॥

ब्राह्मणने कहा — प्रिये! जहाँ संकल्परूपी डाँस और मच्छरोंकी अधिकता होती है । शोक और हर्षरूपी गर्मी, सर्दीका कष्ट रहता है, मोहरूपी अन्धकार फैला हुआ है, लोभ तथा व्याधिरूपी सर्प विचरा करते हैं । जहाँ विषयोंका ही मार्ग है, जिसे अकेले ही तै करना पड़ता है तथा जहाँ काम और क्रोधरूपी शत्रु डेरा डाले रहते हैं, उस संसाररूपी दुर्गम पथका उल्लंघन करके अब मैं ब्रह्मरूपी महान् वनमें प्रवेश कर चुका हूँ ।

ब्राह्मण ने अपनी पत्नी से कहा।

अनुगीतापर्व, अध्याय 27, श्लोक 1–2 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1710 वैराग्य

ब्राह्मण उवाच

स तैर्गुणैः संहतदेहबन्धनः ।

पुनः पुनर्जायति कर्म चेहते ।

जन्मक्षये भिन्नविकीर्णदेहो ।

मृत्युं पुनर्गच्छति जन्मनैव ॥

उन गुणोंके द्वारा देह-बन्धनमें जकड़कर वह बारंबार जन्म लेता और तरह-तरहके कर्म करता रहता है । फिर जीवनका अन्त समय आनेपर उसके देहके तत्त्व विलग-विलग होकर बिखर जाते हैं और वह मृत्युको प्राप्त हो जाता है । इसके बाद फिर जन्म-मृत्युके बन्धनमें पड़ता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 31, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1731 कर्म–प्रारब्ध

गुरु उवाच

प्रधानगुणतत्त्वज्ञः सर्वभूतविधानवित् ।

निर्ममो निरहङ्कारो मुच्यते नात्र संशयः ॥

जो माया और सत्त्वादि गुणोंके तत्त्वको जानता है, जिसे सब भूतोंके विधानका ज्ञान है और जो ममता तथा अहंकारसे रहित हो गया है, वह मुक्त हो जाता है — इसमें संदेह नहीं है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 35, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1747 ज्ञान–विवेक
देह का वृक्ष रूप

गुरु उवाच

अव्यक्तबीजप्रभवो बुद्धिस्कन्धमयो महान् ।

महाहङ्कारविटप इन्द्रियाङ्कुरकोटरः ।

महाभूतविशेषश्च विशेषप्रतिशाखवान् ।

सदापर्णः सदापुष्पः सदा शुभफलोदयः ।

अजीवः सर्वभूतानां ब्रह्मबीजः सनातनः ।

एतज्ज्ञात्वा च तत्त्वानि ज्ञानेन परमासिना ।

छित्त्वा चामरतां प्राप्य जहाति मृत्युजन्मनी ॥

यह देह एक वृक्षके समान है । अज्ञान इसका मूल अंकुर (जड़) है, बुद्धि स्कन्ध (तना) है, अहंकार शाखा है, इन्द्रियाँ खोखले हैं, पञ्च महाभूत उसके विशेष अवयव हैं और उन भूतोंके विशेष भेद उसकी टहनियाँ हैं। इसमें सदा ही संकल्परूपी पत्ते उगते और कर्मरूपी फूल खिलते रहते हैं। शुभाशुभ कर्मोंसे प्राप्त होनेवाले सुख-दुःखादि ही उसमें सदा लगे रहनेवाले फल हैं । इस प्रकार ब्रह्मरूपी बीजसे प्रकट होकर प्रवाहरूपसे सदा मौजूद रहनेवाला देहरूपी वृक्ष समस्त प्राणियोंके जीवनका आधार है । जो इसके तत्त्वको भलीभाँति जानकर ज्ञानरूपी उत्तम तलवारसे इसे काट डालता है, वह अमरत्वको प्राप्त होकर जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 35, श्लोक 20–22 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1747

ब्रह्मा उवाच

महानात्मा तथाव्यक्तमहंकारस्तथैव च ।

इन्द्रियाणि दशैकं च महाभूतानि पञ्च च ॥

विशेषाः पञ्चभूतानामिति सर्गः सनातनः ।

चतुर्विंशतिरेका च तत्त्वसंख्या प्रकीर्तिता ॥

अव्यक्त प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, दस इन्द्रियाँ, एक मन, पञ्च महाभूत और उनके शब्द आदि विशेष गुण — यह चौबीस तत्त्वोंका सनातन सर्ग है । तथा एक जीवात्मा — इस प्रकार तत्त्वोंकी संख्या पचीस बतलायी गयी है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 35, श्लोक 47–48 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1751 ज्ञान–विवेक

ब्रह्मा उवाच

कर्मणा जायते जन्तुर्मूर्तिमान् षोडशात्मकः ।

पुरुषं ग्रसतेऽविद्या तद् ग्राह्यममृताशिनाम् ॥

क्योंकि सकाम कर्मके अनुष्ठानसे जीवको सोलह विकारोंसे निर्मित स्थूल शरीर धारण करके जन्म लेना पड़ता है और वह सदा अविद्याका ग्रास बना रहता है । इतना ही नहीं, कर्मठ पुरुष देवताओंके भी उपभोगका विषय होता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 51, श्लोक 31 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1827 कर्म–प्रारब्ध