श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५
सेवा–करुणा–विनय
सेवा, दया और नम्रता
18 पद्य
महाभारत — खण्ड ५
व्यास उवाच
निर्मन्त्रो निर्वृतो यः स्यादशास्त्रज्ञोऽनसूयकः ।
अनुक्रोशात् प्रदातव्यं हीनेष्वव्रतिकेषु च ॥
जो ब्राह्मण वेदज्ञानसे शून्य और शास्त्रज्ञानसे रहित होता हुआ भी दूसरोंमें दोष नहीं देखता तथा संतुष्ट रहता है, उसे तथा व्रतशून्य दीन-हीनको भी दया करके दान देना चाहिये ।
इन्द्र उवाच
आत्मत्यागः सर्वभूतानुकम्पा ।
लोकज्ञानं पालनं मोक्षणं च ।
विषण्णानां मोक्षणं पीडितानां ।
क्षात्रे धर्मे विद्यते पार्थिवानाम् ॥
युद्धमें अपने शरीरकी आहुति देना, समस्त प्राणियोंपर दया करना, लोकव्यवहारका ज्ञान प्राप्त करना, प्रजाकी रक्षा करना, विषादग्रस्त एवं पीड़ित मनुष्योंको दुःख और कष्टसे छुड़ाना — ये सब बातें राजाओंके क्षात्रधर्ममें ही विद्यमान हैं ।
भीष्म उवाच
यमाश्रित्य नरा राजन् वर्तयेयुर्यथासुखम् ।
अनाथास्तप्यमानाश्च दस्युभिः परिपीडिताः ॥
तमेव पूजयेयुस्ते प्रीत्या स्वमिव बान्धवम् ।
अभीरभीक्ष्णं कौरव्य कर्ता सन्मानमर्हति ॥
डाकुओंसे पीड़ित होकर कष्ट पाते हुए अनाथ मनुष्यगण जिसकी शरणमें जाकर सुखपूर्वक रह सकें, उसीको अपने बन्धु-वान्धवके समान मानकर बड़ी प्रसन्नताके साथ उसका आदर-सत्कार करना उनके लिये उचित है; क्योंकि कुरुनन्दन! जो निर्भय होकर बारंबार दूसरोंका संकट निवारण कर सके, वही राजोचित सम्मान पानेके योग्य है ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।
भीष्म उवाच
सम्मानयेत् पूजयेच्च वाचा नित्यं च कर्मणा ।
कुर्याच्च प्रियमेतेभ्यो नाप्रियं किञ्चिदाचरेत् ॥
राजाका कर्तव्य है कि वह सदा अपने जातीय बन्धुओंका वाणी और क्रियाद्वारा आदर-सत्कार करे । वह प्रतिदिन उनका प्रिय ही करता रहे । कभी कोई अप्रिय कार्य न करे ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।
भीष्म उवाच
आपद्येव तु याचन्ते येषां नास्ति परिग्रहः ।
दातव्यं धर्मतस्तेभ्यस्त्वनुक्रोशाद् भयान्न तु ॥
जिन लोगोंके पास कुछ भी संग्रह नहीं है, वे यदि आपत्तिके समय ही याचना करें तो उन्हें धर्म समझकर और दया करके ही देना चाहिये, किसी भय या दबावमें पड़कर नहीं ।
धृतराष्ट्र उवाच
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत् प्रशस्यते ॥
मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, सबपर दया करना और यथाशक्ति दान देना — यह शील कहलाता है, जिसकी सब लोग प्रशंसा करते हैं ।
धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को शील के स्वरूप और उसे पाने के उपाय के विषय में बताया।
यम → ब्रह्मन
तपः शौचवता नित्यं सत्यधर्मरतेन च ।
मातापित्रोरहरहः पूजनं कार्यमञ्जसा ॥
यमराजने कहा — ब्रह्मन्! मनुष्य तप करे, बाहर-भीतरसे पवित्र रहे और सदा सत्यभाषणरूप धर्मके पालनमें तत्पर रहे । यह सब करते हुए ही उसे नित्यप्रति माता-पिताकी सेवा-पूजा करनी चाहिये ।
यमराज ने ऋषि गौतम को धर्मचर्चा के अवसर पर माता-पिता के ऋण से मुक्ति का मार्ग बताते हुए कहा।
भीष्म उवाच
शरणागतस्य कर्तव्यमातिथ्यं हि प्रयत्नतः ।
पञ्चयज्ञप्रवृत्तेन गृहस्थेन विशेषतः ॥
यों तो घरपर आये हुए अतिथिका सभीको यत्नपूर्वक आदर-सत्कार करना चाहिये; परंतु पंचयज्ञके अधिकारी गृहस्थका यह प्रधान धर्म है ।
भीष्म उवाच
आर्यता नाम भूतानां यः करोति प्रयत्नतः ।
शुभं कर्म निराकारो वीतरागस्तथैव च ॥
जो मनुष्य अपनेको प्रकट न करके प्रयत्नपूर्वक प्राणियोंकी भलाईका काम करता रहता है, उसके उस श्रेष्ठ भाव और आचरणका नाम ही ‘आर्यता’ है । यह आसक्तिके त्यागसे प्राप्त होता है ।
मङ्कि उवाच
क्षमिष्ये क्षिपमाणानां न हिंसिष्ये विहिंसितः ।
द्वेष्ययुक्तः प्रियं वक्ष्याम्यनादृत्य तदप्रियम् ॥
अब जो लोग मुझपर आक्षेप या मेरा तिरस्कार करेंगे, उनके उस बर्तावको मैं चुपचाप सह लूँगा । जो लोग मुझे मारे-पीटेंगे या कष्ट देंगे, उनके साथ भी मैं बदलेमें वैसा बर्ताव नहीं करूँगा । द्वेषके योग्य पुरुषका भी यदि साथ हो जाय और वह मुझे अप्रिय वचन कहने लगे तो मैं उसपर ध्यान न देकर उससे अप्रिय वचन नहीं बोलूँगा ।
लक्ष्मी उवाच
धर्ममेवान्ववर्तन्त न हिंसन्ति परस्परम् ।
अनुकूलाश्च कार्येषु गुरुवृद्धोपसेविनः ॥
वे धर्मका ही आचरण करते थे। एक-दूसरेकी हिंसा नहीं करते थे । सब कार्योंमें परस्पर अनुकूल रहते और गुरुजनों तथा बड़े-बूढ़ोंकी सेवामें दत्तचित्त थे ।
व्यास उवाच
दानं हि भूताभयदक्षिणायाः ।
सर्वाणि दानान्यधितिष्ठतीह ।
तीक्ष्णां तनुं यः प्रथमं जहाति ।
सोऽऽनन्त्यमाप्नोत्यभयं प्रजाभ्यः ॥
इस जगत्में जीवोंको अभयकी दक्षिणा देना सब दानोंसे बढ़कर है । जो पहलेसे ही हिंसाका त्याग कर देता है, वह सब प्राणियोंसे निर्भय होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है ।
पराशर → राजन
दमान्वितः पुरुषो धर्मशीलो ।
भूतानि चात्मानमिवानुपश्येत् ।
गरीयसः पूजयेदात्मशक्त्या ।
सत्येन शीलेन सुखं नरेन्द्र ॥
राजन्! प्रत्येक पुरुषको इन्द्रियसंयमी और धर्मात्मा होकर समस्त प्राणियोंको अपने ही समान समझना चाहिये । जो विद्या, तप और अवस्थामें अपनेसे बड़े हों अथवा गुरु-कोटिके लोग हों, उन सबकी यथाशक्ति पूजा करनी चाहिये। सत्यभाषण और अच्छे आचार-विचारसे ही सुख मिलता है ।
पराशर उवाच
मानं त्यक्त्वा यो नरो वृद्धसेवी ।
विद्वान् क्लीबः पश्यति प्रीतियोगात् ।
दाक्ष्येण हीनो धर्मयुक्तो नदान्तो ।
लोकेऽस्मिन् वै पूज्यते सद्भिरार्यः ॥
जो अभिमानका त्याग करके वृद्ध पुरुषोंकी सेवा करता, विद्वान् एवं काम-भोगमें अनासक्त होकर सबको प्रेमभावसे देखता, मनमें चतुराई न रखकर धर्ममें संलग्न रहता और दूसरोंका दमन या हिंसा नहीं करता है, वह मनुष्य इस लोकमें श्रेष्ठ है तथा सत्पुरुष भी उसका आदर करते हैं ।
पराशर उवाच
धर्मशीलो नरो विद्वानीहकोऽनीहकोऽपि वा ।
आत्मभूतः सदा लोके चरेद् भूतान्यहिंसया ॥
धर्मशील विद्वान् मनुष्य सचेष्ट हो चाहे चेष्टारहित, उसे चाहिये कि सदैव जगत्में सबके प्रति आत्मभाव रखकर किसी भी प्राणीकी हिंसा न करते हुए समभावसे व्यवहार करे ।
भीष्म उवाच
सात्वतं विधिमास्थाय प्राक् सूर्यमुखनिःसृतम् ।
पूजयामास देवेशं तच्छेषेण पितामहान् ॥
पितृशेषेण विप्रांश्च संविभज्याश्रितांश्च सः ।
शेषान्नभुक् सत्यपरः सर्वभूतेष्वहिंसकः ॥
जो पहले भगवान् सूर्यके मुखसे प्रकट हुआ था, उस वैष्णव शास्त्रोक्त विधिका आश्रय ले वे प्रथम तो देवेश्वर भगवान् नारायणका पूजन करते । फिर उनकी सेवासे बचे हुए पदार्थोंसे पितरोंका, पितरोंकी सेवासे बचे हुए पदार्थोंसे ब्राह्मणोंका तथा अन्य आश्रितजनोंका विभागपूर्वक सत्कार करते थे । सबको देनेके अनन्तर बचे हुए अन्नका भोजन करते थे, सत्यमें तत्पर रहते और किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करते थे ।
वृषाकपि उवाच
ये यजन्ति पितॄन् देवान् गुरूंश्चैवातिथींस्तथा ।
गाश्चैव द्विजमुख्यांश्च पृथिवीं मातरं यथा ॥
कर्मणा मनसा वाचा विष्णुमेव यजन्ति ते ।
अन्तर्गतः स भगवान् सर्वसत्त्वशरीरगः ॥
जो देवता, पितर, गुरु, अतिथि, गौ, श्रेष्ठ ब्राह्मण, पृथ्वी और माताकी मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा पूजा करते हैं, वे वास्तवमें भगवान् विष्णुकी ही आराधना करते हैं; क्योंकि भगवान् विष्णु समस्त प्राणियोंके शरीरमें अन्तरात्मारूपसे विराजमान हैं ।
अतिथि उवाच
मातरं पितरं केचिच्छुश्रूषन्तो दिवं गताः ।
अहिंसया परे स्वर्गं सत्येन च तथा परे ॥
कुछ लोग माता-पिताकी सेवा करके ही स्वर्गमें चले गये । कोई अहिंसासे और कोई सत्यसे ही स्वर्गलोकके भागी हुए हैं ।