श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५

काम–क्रोध–लोभ–मोह

भीतर के छह शत्रु

29 पद्य

महाभारत — खण्ड ५

क्रोध और हर्ष का त्याग

युधिष्ठिर उवाच

संयुक्ताः काममन्युभ्यां क्रोधहर्षासमञ्जसाः ।

न ते जयफलं किंचिद् भोक्तारो जातु कर्हिचित् ॥

जो लोग कामना और खीझसे युक्त हो क्रोध और हर्षके कारण अपना संतुलन खो बैठते हैं, वे कभी कहीं किंचिन्मात्र भी विजयका फल नहीं भोग सकते ।

शान्तिपर्व, अध्याय 7, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 54 नीति–व्यवहार
क्रोधजनित व्यसनों के प्रकार

भीष्म उवाच

वाक्पारुष्यं तथोग्रत्वं दण्डपारुष्यमेव च ।

आत्मनो निग्रहस्त्यागो ह्यर्थदूषणमेव च ॥

वाणीकी कटुता, उग्रता, दण्डकी कठोरता, शरीरको कैद कर लेना, किसीको सदाके लिये त्याग देना और आर्थिक हानि पहुँचाना — ये छः प्रकारके क्रोधजनित व्यसन उक्त ग्रन्थमें बताये गये हैं ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 59, श्लोक 61 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 397
समभाव और विकार त्याग

देवगण उवाच

प्रियाप्रिये परित्यज्य समः सर्वेषु जन्तुषु ।

कामं क्रोधं च लोभं च मानं चोत्सृज्य दूरतः ॥

प्रिय और अप्रियका विचार छोड़कर काम, क्रोध, लोभ और मानको दूर हटाकर समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव रखो ।

देवताओं और महर्षियों ने राजा पृथु से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 59, श्लोक 104 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 403 धर्म–आचरण
राजा के गुण

भीष्म उवाच

आर्जवेन च सम्पन्नो धृत्या बुद्ध्या च भारत ।

यथार्थं प्रतिगृह्णीयात् कामक्रोधौ च वर्जयेत् ॥

भरतनन्दन! राजाको चाहिये कि वह सरल स्वभावसे सम्पन्न हो, धैर्य तथा बुद्धिके बलसे सत्यको ही ग्रहण करे और काम-क्रोधका परित्याग कर दे ।

शान्तिपर्व, अध्याय 71, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 491 नीति–व्यवहार
काम-क्रोध का दुष्परिणाम

भीष्म उवाच

कामक्रोधौ पुरस्कृत्य योऽर्थं राजानुतिष्ठति ।

न स धर्मं न चाप्यर्थं प्रतिगृह्णाति बालिशः ॥

जो राजा काम और क्रोधका आश्रय लेकर धन पैदा करना चाहता है, वह मूर्ख न तो धर्मको पाता है और न धन ही उसके हाथ लगता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 71, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 492 नीति–व्यवहार
लोभ का मूल प्रभाव

भीष्म उवाच

अतः पापमधर्मश्च यथा दुःखमनुत्तमम् ।

निकृत्या मूलमेतद्धि येन पापकृतो जनाः ॥

लोभसे ही पाप, अधर्म तथा महान् दुःखकी उत्पत्ति होती है । शठता तथा छल-कपटका भी मूल कारण लोभ ही है । इसीके कारण मनुष्य पापाचारी हो जाते हैं ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर को पाप के अधिष्ठान के विषय में बताया।

शान्तिपर्व, अध्याय 158, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1034
लोभ का प्रभाव

भीष्म उवाच

लोभात् क्रोधः प्रभवति लोभात् कामः प्रवर्तते ।

लोभान्मोहश्च माया च मानः स्तम्भः परासुता ॥

लोभसे ही क्रोध प्रकट होता है, लोभसे ही कामकी प्रवृत्ति होती है और लोभसे ही माया, मोह, अभिमान उद्दण्डता तथा पराधीनता आदि दोष प्रकट होते हैं ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 158, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1034
लोभ के दुष्प्रभाव

भीष्म उवाच

अक्षमा ह्रीपरित्यागः श्रीनाशो धर्मसंक्षयः ।

अभिध्याप्रख्यता चैव सर्वं लोभात् प्रवर्तते ॥

असहनशीलता, निर्लज्जता, सम्पत्तिनाश, धर्मक्षय, चिन्ता और अपयश — ये सब लोभसे ही सम्भव होते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 158, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1034

भीष्म उवाच

अत्यागश्चातितर्षश्च विकर्मसु च याः क्रियाः ।

कुलविद्यामदश्चैव रूपैश्वर्यमदस्तथा ॥

सर्वभूतेष्वभिद्रोहः सर्वभूतेष्वसत्कृतिः ।

सर्वभूतेष्वविश्वासः सर्वभूतेष्वनार्जवम् ॥

लोभसे ही कृपणता, अत्यन्त तृष्णा, शास्त्रविरुद्ध कर्मोंमें प्रवृत्ति, कुल और विद्याविषयक अभिमान, रूप और ऐश्वर्यका मद, समस्त प्राणियोंके प्रति द्रोह, सबका तिरस्कार, सबके प्रति अविश्वास तथा कुटिलतापूर्ण बर्ताव होते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 158, श्लोक 6–7 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1034
लोभ की असीमता

भीष्म उवाच

जातौ बाल्ये च कौमारे यौवने चापि मानवाः ।

न संत्यजन्त्यात्मकर्म यो न जीर्यति जीर्यतः ॥

यो न पूरयितुं शक्यो लोभः प्राप्त्या कुरूद्वह ।

नित्यं गम्भीरतोयाभिरापगाभिरिवोदधिः ॥

कुरुश्रेष्ठ! मनुष्य जन्मकालमें, बाल्यावस्थामें तथा कौमार और यौवनावस्थामें जिसके कारण अपने बुरे कर्मोंको छोड़ नहीं पाते हैं, जो मनुष्यके वृद्ध होनेपर भी जीर्ण नहीं होता, वह लोभ ही है । जिस प्रकार गहरे जलवाली बहुत-सी नदियोंके मिल जानेसे भी समुद्र नहीं भरता है, उसी प्रकार कितने ही पदार्थोंका लाभ क्यों न हो जाय, लोभका पेट कभी नहीं भरता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 158, श्लोक 11–12 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1035 माया–संसार

भीष्म उवाच

दर्पः क्रोधो मदः स्वप्नो हर्षः शोकोऽतिमानिता ।

एत एव हि कौरव्य दृश्यन्ते लुब्धबुद्धिषु ॥

कुरुनन्दन! जिनकी बुद्धि लोभमें फँसी हुई है, उन मनुष्योंमें दर्प, क्रोध, मद, दुःस्वप्न, हर्ष, शोक तथा अत्यन्त अभिमान — ये ही दोष दिखायी देते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 158, श्लोक 21 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1036
लोभ और अज्ञान का सम्बन्ध

भीष्म उवाच

लोभप्रभवमज्ञानं वृद्धं भूयः प्रवर्धते ।

स्थाने स्थानं क्षये क्षैण्यमुपैति विविधां गतिम् ॥

लोभसे ही अज्ञान प्रकट होता है और लोभके बढ़नेपर वह अज्ञान और भी बढ़ता है । जबतक लोभ रहता है, तबतक अज्ञान भी बना रहता है और जब लोभका क्षय होता है, तब अज्ञान भी क्षीण हो जाता है । अज्ञान और लोभके कारण ही जीव नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म लेता है ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 159, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1041 माया–संसार

भीष्म उवाच

तस्याज्ञानाद्धि लोभो हि लोभादज्ञानमेव च ।

सर्वदोषास्तथा लोभात् तस्मालोभं विवर्जयेत् ॥

मूढ़ मनुष्यको अज्ञानसे लोभ और लोभसे अज्ञान होता है । लोभसे ही सारे दोष पैदा होते हैं; इसलिये लोभको त्याग देना चाहिये ।

शान्तिपर्व, अध्याय 159, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1041

भीष्म उवाच

गुरुपूजा च कौरव्य दया भूतेष्वपैशुनम् ।

जनवादं मृषावादं स्तुतिनिन्दाविसर्जनम् ॥

कामं क्रोधं च लोभं च दर्पं स्तम्भं विकत्थनम् ।

रोषमीर्ष्यावमानं च नैव दान्तो निषेवते ॥

कुरुनन्दन! जिसने मन और इन्द्रियोंका दमन कर लिया है, उसमें गुरुजनोंके प्रति आदरका भाव, समस्त प्राणियोंके प्रति दया और किसीकी भी चुगली न करनेकी प्रवृत्ति होती है । वह जनापवाद, असत्य भाषण, निन्दा-स्तुतिकी प्रवृत्ति, काम, क्रोध, लोभ, दर्प, जडता, डींग हाँकना, रोष, ईर्ष्या और दूसरोंका अपमान — इन दुर्गुणोंका कभी सेवन नहीं करता ।

शान्तिपर्व, अध्याय 160, श्लोक 17–18 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1045

ब्राह्मण उवाच

वृत्त एष हृदि प्रौढो मृत्युरेष मनोभवः ।

क्रोधो नाम शरीरस्थो देहिनां प्रोच्यते बुधैः ॥

हृदयसे उत्पन्न होनेवाला यह काम हृदयमें ही पुष्ट होता है, फिर यही मृत्युका रूप धारण कर लेता है । क्योंकि (जब इसकी सिद्धिमें कोई बाधा आती है, तब) विद्वानोंद्वारा यही प्राणियोंके शरीरके भीतर क्रोधके नामसे पुकारा जाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 174, श्लोक 50 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1133

भीष्म उवाच

कामानुबन्धं नुदते यत् किंचित् पुरुषो रजः ।

कामक्रोधोद्भवं दुःखमह्रीररतिरेव च ॥

मनुष्य कामसे सम्बन्ध रखनेवाला जो कुछ भी रजोगुण हो, उसे दूर कर दे । दुःख, निर्लज्जता और असंतोष — ये काम और क्रोधसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 177, श्लोक 49 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1155
काम का विनाश

मङ्कि उवाच

आत्मना सप्तमं कामं हत्वा शत्रुमिवोत्तमम् ।

प्राप्यावध्यं ब्रह्मपुरं राजेव स्यामहं सुखी ॥

‘काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य और ममता — ये देहधारियोंके सात शत्रु हैं । इनमें सातवाँ कामरूप शत्रु सबसे प्रबल है । उन सबके साथ इस महान् शत्रु कामका नाश करके मैं अविनाशी ब्रह्मपुरमें स्थित हो राजाके समान सुखी होऊँगा’

मङ्कि ने अपनी तृष्णा पर विजय पाने के बाद यह कहा।

शान्तिपर्व, अध्याय 177, श्लोक 52 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1155

भीष्म उवाच

लोकमातुरमसूयते जनस्तस्य तज्जनयतीह सर्वतः ॥

जो काम, क्रोध आदि दुर्व्यसनोंसे आतुर रहता है, उसे विचारवान् पुरुष धिक्कारते हैं । उसके निन्दनीय कर्म उस आतुर मानवको सभी योनियों (पशु-पक्षी आदिके शरीरों)-में जन्म दिलाता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 194, श्लोक 62 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1248

भीष्म उवाच

तमसा लोभयुक्तानि क्रोधजानि च सेवते ।

हिंसाविहाराभिरतस्तन्द्रीनिद्रासमन्वितः ॥

तमोगुणद्वारा मनुष्य लोभ और क्रोधजनित कर्मोंका सेवन करता है, हिंसात्मक कर्मोंमें उसकी विशेष आसक्ति हो जाती है, तथा वह हर समय निद्रा-तन्द्रासे घिरा रहता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 212, श्लोक 32 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1374

भीष्म उवाच

क्रोधात् काममवाप्याथ लोभमोहौ च मानवाः ।

मानदर्पावहङ्कारमहङ्कारात् ततः क्रियाः ॥

क्रोधसे काम उत्पन्न होता है और फिर कामसे मनुष्य लोभ, मोह, मान, दर्प एवं अहंकारको प्राप्त होते हैं । तत्पश्चात् अहंकारसे प्रेरित होकर ही उनकी सारी क्रियाएँ होने लगती हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 213, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1376

भीष्म उवाच

भूतैर्हि करणैः कर्मणि प्रतिपद्यते ।

स दुःखं प्राप्य लोकेऽस्मिन् नरकायोपपद्यते ।

तस्मान्मनोवाक्शरीरैराचरेद् धैर्यमात्मनः ॥

रजोगुणसे प्रभावित हुई इन्द्रियोंकी प्रेरणासे मनुष्य विषयभोगरूप कर्मोंमेंप्रवृत्त होता है और इस लोकमें दुःख भोगकर अन्तमें नरकगामी होता है । अतः मन, वाणी और शरीरद्वारा ऐसा कार्य करे जिससे अपनेको धैर्य प्राप्त हो ।

शान्तिपर्व, अध्याय 215, श्लोक 13 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1386 धर्म–आचरण

व्यास उवाच

योगदोषान् समुच्छिद्य पञ्च यान् कवयो विदुः ।

कामं क्रोधं च लोभं च भयं स्वप्नं च पञ्चमम् ॥

क्रोधं शमेन जयति कामं संकल्पवर्जनात् ।

सत्त्वसंसेवनाद् धीरो निद्रामुच्छेत्तुमर्हति ॥

विद्वानोंने योगके जो काम, क्रोध, लोभ, भय और पाँचवाँ स्वप्न — ये पाँच दोष बताये हैं उनका पूर्णतया उच्छेद करे । इनमेंसे क्रोधको शम (मनोनिग्रह) के द्वारा जीते, कामको संकल्पके त्यागद्वारा पराजित करे तथा धीर पुरुष सत्वगुणका सेवन करनेसे निद्राका उच्छेद कर सकता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 240, श्लोक 4–5 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1581 साधना–योग

व्यास उवाच

इन्द्रियाणां तु सर्वेषां वश्यात्मा चलितस्मृतिः ।

आत्मनः सम्प्रदानेन मर्त्यो मृत्युमुपाश्नुते ॥

जिसका मन सम्पूर्ण इन्द्रियोंके वशमें होता है, वह मनुष्य विवेक शक्तिको खो देता है और अपनेको काम आदि शत्रुओंके हाथोंमें सौंपकर मृत्युका कष्ट भोगता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 246, श्लोक 8 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1616

व्यास उवाच

अभिमानो मृषावादो लोभो मोहस्तथाक्षमा ।

लिङ्गानि रजसस्तानि वर्तन्ते हेत्वहेतुतः ॥

अभिमान, असत्यभाषण, लोभ, मोह और असहनशीलता — ये दोष चाहे किसी कारणसे प्रकट हुए हों अथवा बिना कारणके हर एक परिस्थितिमें रजोगुणके ही चिह्न माने गये हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 247, श्लोक 24 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1622

कपिल उवाच

यो यथाप्रकृतिर्जन्तुः प्रकृतेः स्याद् वशानुगः ।

तस्य द्वेषश्च कामश्च क्रोधो दम्भोऽनृतं मदः ।

नित्यमेवाभिवर्तन्ते गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ॥

जिस प्राणीकी जैसी प्रकृति होती है, उस प्रकृतिके वह अधीन होता है । उसके भीतर द्वेष, काम, क्रोध, दम्भ, असत्य और मद — ये प्रकृतिजनित गुण सदा ही विद्यमान रहते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 269, श्लोक 55 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1745 माया–संसार

भीष्म उवाच

लोभमोहाभिभूतस्य रागद्वेषान्वितस्य च ।

न धर्मे जायते बुद्धिर्व्याजाद् धर्मं करोति च ॥

लोभ और मोहसे घिरे हुए तथा राग-द्वेषके वशीभूत हुए मनुष्यकी बुद्धि धर्ममें नहीं लगती है । वह किसी-न-किसी बहाने से दिखाऊ धर्मका आचरण करता है ।

शान्तिपर्व, अध्याय 273, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1771 माया–संसार

भीष्म उवाच

योगदोषान् समुच्छिद्य पञ्च यान् कवयो विदुः ।

कामं क्रोधं च लोभं च भयं स्वप्नं च पञ्चमम् ।

परित्यज्य निषेवेत यतवाग् योगसाधनान् ॥

काम, क्रोध, लोभ, भय और निद्रा — ये ही योगसम्बन्धी वे पाँच दोष हैं, जिनको विद्वान् पुरुष जानते हैं । इनका मूलोच्छेद कर देना चाहिये तथा इनका परित्याग करके वाणीको संयममें रखते हुए योगसाधनोंका सेवन करना चाहिये ।

शान्तिपर्व, अध्याय 274, श्लोक 13–14 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1775 साधना–योग

भीष्म → युधिष्ठिर

रागं मोहं तथा स्नेहं कामं क्रोधं च केवलम् ।

योगाच्छित्त्वा ततो दोषान् पञ्चैतान् प्राप्नुवन्ति तत् ॥

भीष्मजी ने कहा — युधिष्ठिर! योगी पुरुष केवल योगबलसे राग, मोह, स्नेह, काम और क्रोध — इन पाँच दोषोंका मूलोच्छेद करके परमपदको प्राप्त कर लेते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 300, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 1976 साधना–योग

नारद उवाच

सर्वोपायात् तु कामस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः ।

कार्यः श्रेयोऽर्थिना तौ हि श्रेयोघातार्थमुद्यतौ ॥

जिसे कल्याणप्राप्तिकी इच्छा हो, उसे सभी उपायोंसे काम और क्रोधको दबाना चाहिये; क्योंकि ये दोनों दोष कल्याणका नाश करनेके लिये उद्यत रहते हैं ।

शान्तिपर्व, अध्याय 329, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ५ पृ. 2201