श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २
वैराग्य
अनासक्ति और संसार की नश्वरता
17 पद्य
महाभारत — खण्ड २
शौनक उवाच
तस्मात् स्नेहं न लिप्सेत मित्रेभ्यो धनसंचयात् ।
स्वशरीरसमुत्थं च ज्ञानेन विनिवर्तयेत् ॥
इसलिये मित्रों तथा धनराशिको पाकर इनके प्रति स्नेह (आसक्ति) न करे । अपने शरीरसे उत्पन्न हुई आसक्तिको ज्ञानसे निवृत्त करे ।
शौनक उवाच
तस्मादर्थागमाः सर्वे मनोमोहविवर्धनाः ।
कार्पण्यं दर्पमानौ च भयमुद्वेग एव च ॥
अर्थजानि विदुः प्राज्ञाः दुःखान्येतानि देहिनाम् ।
अर्थस्योत्पादने चैव पालने च तथा क्षये ॥
सहन्ति च महद् दुःखं घ्नन्ति चैवार्थकारणात् ।
अर्था दुःखं परित्यक्तुं पालिताश्चैव शत्रवः ॥
इसलिये धन-प्राप्तिके सभी उपाय मनमें मोह बढ़ानेवाले हैं । कृपणता, घमण्ड, अभिमान, भय और उद्वेग इन्हें विद्वानोंने देहधारियोंके लिये धनजनित दुःख माना है । धनके उपार्जन, संरक्षण तथा व्ययमें मनुष्य महान् दुःख सहन करते हैं और धनके ही कारण एक-दूसरेको मार डालते हैं । धनको त्यागनेमें भी महान् दुःख होता है और यदि उसकी रक्षा की जाय तो वह शत्रुका-सा काम करता है ।
युधिष्ठिरैवं सर्वेषु न स्पृहां कर्तुमर्हसि ।
धर्मेण यदि ते कार्यं विमुक्तेच्छो भवार्थतः ॥
‘युधिष्ठिर! इस प्रकार आपके लिये किसी भी वस्तुकी अभिलाषा करनी उचित नहीं है । यदि आपको धर्मसे ही प्रयोजन हो तो धनकी इच्छाका सर्वथा त्याग कर दें’
बृहदश्व उवाच
विषमावस्थिते दैवे पौरुषेऽफलतां गते ।
विषादयन्ति नात्मानं सत्त्वोपाश्रयिणो नराः ॥
जब दैव (प्रारब्ध) प्रतिकूल हो और पुरुषार्थ निष्फल हो जाय, उस समय भी सत्त्वगुणका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने मनमें विषाद नहीं लाते ।
बृहदश्व मुनि ने युधिष्ठिर से कहा।
पुलस्त्य उवाच
प्रतिग्रहादपावृत्तः संतुष्टो येन केनचित् ।
अहंकारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥
जो प्रतिग्रहसे दूर रहे तथा जो कुछ अपने पास हो, उसीसे संतुष्ट रहे और जिसमें अहंकारका अभाव हो, वही तीर्थका फल पाता है ।
पुलस्त्यजी ने तीर्थ-सेवन का फल बताते हुए कहा।
लोमश उवाच
न तेन दृष्टपूर्वोऽन्यः पितुरन्यत्र मानुषः ।
तस्मात् तस्य मनो नित्यं ब्रह्मचर्येऽभवन्नृप ॥
नरेश्वर! उन्होंने अपने पिताके सिवा दूसरे किसी मनुष्यको पहले कभी नहीं देखा था, इसलिये उनका मन सदा स्वभावसे ही ब्रह्मचर्यमें संलग्न रहता था ।
हनुमान् उवाच
न सामऋग्यजुर्वर्णाः क्रिया नासीच्च मानवी ।
अभिध्याय फलं तत्र धर्मः संन्यास एव च ॥
ऋक्, साम और यजुर्वेदके मन्त्रवर्णोंका पृथक्-पृथक् विभाग नहीं था । कोई मानवी क्रिया (कृषि आदि) भी नहीं होती थी । उस समय चिन्तन करनेमात्रसे सबको अभीष्ट फलकी प्राप्ति हो जाती थी । सत्ययुगमें एक ही धर्म था, स्वार्थका त्याग ।
हनुमानजी ने भीमसेन को सत्ययुग का धर्म बताया।
सर्प → राजन
ब्रह्म च ब्राह्मणत्वं च येन त्वाहमचूचुदम् ।
सत्यं दमस्तपो दानमहिंसा धर्मनित्यता ।
साधकानि सदा पुंसां न जातिर्न कुलं नृप ।
अरिष्ट एष ते भ्राता भीमसेनो महाबलः ।
स्वस्ति तेऽस्तु महाराज गमिष्यामि दिवं पुनः ॥
राजन्! उनका ब्रह्म-ज्ञान और ब्राह्मणत्व देखकर भी मुझे बड़ा विस्मय हुआ । इसीलिये इस विषयमें मैंने तुमसे पहले प्रश्न किया था । राजन्! सत्य, इन्द्रियसंयम, तपस्या, दान, अहिंसा और धर्मपरायणता — ये सद्गुण ही सदा मनुष्योंको सिद्धिकी प्राप्ति करानेवाले हैं, जाति और कुल नहीं । ये रहे तुम्हारे भाई महाबली भीमसेन, जो सर्वथा सकुशल हैं । महाराज! तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं पुनः स्वर्गलोकको जाऊँगा ।
राजा नहुष ने युधिष्ठिर से कहा।
मार्कण्डेय उवाच
ये पापानि न कुर्वन्ति मनोवाक्कर्मबुद्धिभिः ।
ते तपन्ति महात्मानो न शरीरस्य शोषणम् ॥
जो मन, वाणी, क्रिया और बुद्धिके द्वारा कभी पाप नहीं करते हैं, वे ही महात्मा तपस्वी हैं । शरीरको सुखा देना ही तपस्या नहीं है ।
मार्कण्डेय उवाच
न ज्ञातिभ्यो दया यस्य शुक्लदेहोऽविकल्मषः ।
हिंसा सा तपसस्तस्य नानाशित्वं तपः स्मृतम् ॥
जिसने व्रत, उपवास आदिके द्वारा शरीरको तो शुद्ध कर लिया और जो नाना प्रकारके पापकर्म भी नहीं करता, किंतु जिसके मनमें अपने कुटुम्बी जनोंके प्रति दया नहीं आती, उसकी वह निर्दयता उसके तपका नाश करनेवाली है; केवल भोजन छोड़ देनेका ही नाम तपस्या नहीं है ।
व्याध उवाच
वेदस्योपनिषत् सत्यं सत्यस्योपनिषद् दमः ।
दमस्योपनिषत् त्यागः शिष्टाचारेषु नित्यदा ॥
वेदका सार है सत्य, सत्यका सार है इन्द्रिय-संयम और इन्द्रिय-सयंमका सार है त्याग । यह त्याग शिष्ट पुरुषोंके आचारमें सदा विद्यमान रहता है ।
व्याध उवाच
धर्मस्य च फलं लब्ध्वा न तृप्यति महाद्विज ।
अतृप्यमाणो निर्वेदमापेदे ज्ञानचक्षुषा ॥
द्विजोत्तम! कोई-कोई धर्मके फलरूपसे सांसारिक सुखको पाकर संतुष्ट नहीं होता । वह ज्ञानदृष्टिके कारण विषयभोगके सुखसे तृप्ति-लाभ न करके निर्वेद (वैराग्य)-को प्राप्त होता है ।
धर्मव्याध ने कौशिक ब्राह्मण से कहा।
व्याध उवाच
वैराग्यस्य च रूपं तु पूर्वमेव प्रवर्तते ।
मृदुर्भवत्यहङ्कारः प्रसीदत्यार्जवं च यत् ॥
सात्त्विक पुरुषमें वैराग्यका लक्षण पहले ही प्रकट हो जाता है । उसका अहंकार ढीला पड़ जाता है और सरलता प्रकाशमें आने लगती है ।
व्याध उवाच
यस्य सर्वे समारम्भा निराशीर्बन्धनाः सदा ।
त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी स च बुद्धिमान् ॥
जिसके सम्पूर्ण आयोजन कभी कामनाओंसे बँधे हुए नहीं होते तथा जिसने त्यागकी आगमें अपना सर्वस्व होम दिया है वही त्यागी और बुद्धिमान् है ।
व्याध उवाच
परिग्रहं परित्यज्य भवेद् बुद्ध्या यतव्रतः ।
अशोकं स्थानमाश्रित्य निश्चलं प्रेत्य चेह च ॥
इहलोक और परलोकके समस्त भोगोंका एवं सब प्रकारके संग्रहका त्याग करके शोकरहित निश्चल परमधामको लक्ष्य बनाकर बुद्धिके द्वारा मन और इन्द्रियोंका संयम करे ।
व्याध उवाच
परित्यजति यो दुःखं सुखं चाप्युभयं नरः ।
ब्रह्म प्राप्नोति सोऽत्यन्तमसङ्गेन च गच्छति ॥
जो मनुष्य दुःख और सुख दोनोंको त्याग देता है, वही अनन्त ब्रह्मपदको प्राप्त होता है । अनासक्तिके द्वारा भी उसी पदकी प्राप्ति होती है ।
धर्मव्याध ने कौशिक ब्राह्मण से कहा।
कर्ण उवाच
धर्मपाशनिबद्धेन यत् त्वया मर्षितं पुरा ।
तथैव बद्धमात्मानमबद्धमिव मन्यसे ॥
यदि तूने पहले धर्मके बन्धनमें बँधकर कष्ट सहन किया है, तो आज भी तू उसी प्रकार बँधा हुआ है; तो भी तू अपने-आपको उस बन्धनसे मुक्त-सा मान रहा है ।