श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६

भक्ति

प्रेम, उपासना और भगवान् से सम्बन्ध

20 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

भक्त का सान्निध्य

भीष्म उवाच

एवमेव मनुष्येन्द्र भक्तिमन्तं समाश्रितः ।

सर्वार्थसिद्धिं लभते शुकं प्राप्य यथा द्रुमः ॥

नरेन्द्र! जैसे भक्तिमान् शुकका सहवास पाकर उस वृक्षने सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि प्राप्त कर ली, उसी प्रकार अपनेमें भक्ति रखनेवाले पुरुषका सहारा पाकर प्रत्येक मनुष्य अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध कर लेता है ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर को उत्तर देते हुए यह कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 5, श्लोक 32 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 82
शिव की शरण

तं प्रपद्य सदा वत्स सर्वभावेन शङ्करम् ।

तत्प्रसादाच्च कामेभ्यः फलं प्राप्स्यसि पुत्रक ॥

‘बेटा! सदा सर्वतोभावसे उन्हीं भगवान् शंकरकी शरण लेकर उनकी कृपासे ही इच्छानुसार फल पा सकोगे’

उपमन्यु की माता ने उपमन्यु से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 128 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 180 शरणागति
महादेव की भक्ति

अम्बा उवाच

तद्भक्तस्तद्गतो नित्यं तन्निष्ठस्तत्परायणः ।

भज पुत्र महादेवं ततः प्राप्स्यसि चेप्सितम् ॥

बेटा! तुम उन्हींके भक्त बनकर उन्हींमें आसक्त रहो । सदा उन्हींपर निर्भर रहो और उन्हींके शरणागत होकर महादेवजीका निरन्तर भजन करते रहो । इससे तुम्हें मनोवाञ्छित वस्तुकी प्राप्ति होगी ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 166 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 186 शरणागति

अम्बा उवाच

वाय्वम्बुभुजोऽपि सतो ।

नरस्य दुःखक्षयः कुतस्तस्य ।

भवति हि सुरासुरगुरौ ।

यस्य न विश्वेश्वरे भक्तिः ॥

कोई जल या हवा पीकर ही रहनेवाला क्यों न हो, जिसकी सुरासुरगुरु भगवान् विश्वनाथमें भक्ति न हो, उसके दुःखोंका नाश कैसे हो सकता है?

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 182 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 188 ज्ञान–विवेक
शिव भक्ति का महत्त्व

अम्बा उवाच

हरचरणनिरतमतिना ।

भवितव्यमनार्जवं युगं प्राप्य ।

संसारभयं न भवति ।

हरभक्तिरसायनं पीत्वा ॥

कुटिल कलिकालको पाकर सभी पुरुषोंको अपना मन भगवान् शंकरके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें लगा देना चाहिये । शिव भक्तिरूपी रसायनके पी लेनेपर संसाररूपी रोगका भय नहीं रह जाता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 184 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 188 वैराग्य
अक्षय भक्ति की अभिलाषा

यदि नाम जन्म भूयो ।

भवति मदीयैः पुनर्दोषैः ।

भवे भवेन्मेऽक्षया भक्तिः ॥

‘यदि मेरे दोषोंसे मुझे बारंबार इस जगत्में जन्म लेना पड़े तो मेरी यही इच्छा है कि उस-उस प्रत्येक जन्ममें भगवान् शिवमें मेरी अक्षय भक्ति हो’

उपमन्यु ने इन्द्र से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 191 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 190
भक्तियोग और आत्म-दर्शन

तण्डि उवाच

ये चैनं प्रतिपद्यन्ते भक्तियोगेन भाविताः ।

तेषामेवात्मनाऽऽत्मानं दर्शयत्येष हृच्छयः ॥

जो लोग भक्तियोगसे भावित होकर उन परमेश्वरकी शरण लेते हैं, उन्हींको यह हृदय-मन्दिरमें शयन करनेवाले भगवान् स्वयं अपना दर्शन देते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 16, श्लोक 39 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 234 शरणागति
पापमुक्ति और भक्ति

उपमन्यु उवाच

जन्मकोटिसहस्रेषु नानासंसारयोनिषु ।

जन्तोर्विगतपापस्य भवे भक्तिः प्रजायते ॥

कोटि सहस्र जन्मोंतक नाना प्रकारकी संसारी योनियोंमें भटकते-भटकते जब कोई जीव सर्वथा पापोंसे रहित हो जाता है, तब उसकी भगवान् शिवमें भक्ति होती है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 17, श्लोक 164 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 270

वासुदेव उवाच

ईश्वरं सम्प्रपद्यन्ते द्विजा भावितभावनाः ।

सर्वथा वर्तमानोऽपि यो भक्तः परमेश्वरे ।

सदृशोऽरण्यवासीनां मुनीनां भावितात्मनाम् ॥

जिनका अन्तःकरण पवित्र है, वे ही द्विज महादेवजीकी शरण लेते हैं । जो परमेश्वर शिवका भका है, वह सब प्रकारसे बर्तता हुआ भी पवित्र अन्तःकरणवाले वनवासी मुनियोंके समान है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 18, श्लोक 63 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 284 ज्ञान–विवेक
गङ्गा भक्ति का फल

सिद्ध उवाच

तद्भावस्तद्गतमनास्तन्निष्ठस्तत्परायणः ।

गङ्गां योऽनुगतो भक्त्या स तस्याः प्रियतां व्रजेत् ॥

जो गंगाजीमें श्रद्धा रखता, उन्हींमें मन लगाता, उन्हींके पास रहता, उन्हींका आश्रय लेता तथा भक्तिभावसे उन्हींका अनुसरण करता है वह भगवती भागीरथीका स्नेह-भाजन होता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 26, श्लोक 78 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 366

भीष्म उवाच

गाश्च संकीर्तयेन्नित्यं नावमन्येत तास्तथा ।

अनिष्टं स्वप्नमालक्ष्य गां नरः सम्प्रकीर्तयेत् ॥

प्रतिदिन गौओंका नाम ले । उनका कभी अपमान न करे । यदि बुरे स्वप्न दिखायी दें तो मनुष्य गोमाताका नाम ले ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 78, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 691

शुक्र उवाच

गृह्णन्ति देवता नित्यमाशंसन्ति सदा गृहान् ।

बाह्याश्चागन्तवो येऽन्ये यक्षराक्षसपन्नगाः ॥

इतो दत्तेन जीवन्ति देवताः पितरस्तथा ।

ते प्रीताः प्रीणयन्तेनमायुषा यशसा धनैः ॥

क्योंकि देवतालोग सदा गृहस्थ मनुष्योंकी दी हुई बलिको स्वीकार करते और उन्हें आशीर्वाद देते हैं । देवता, पितर, यक्ष, राक्षस, सर्प तथा बाहरसे आये हुए अन्य अतिथि आदि गृहस्थके दिये हुए अन्नसे ही जीविका चलाते हैं और प्रसन्न होकर उस गृहस्थको आयु, यश तथा धनके द्वारा संतुष्ट करते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 98, श्लोक 58–59 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 872

भीष्म उवाच

स्नानेनाद्भिश्च यत् कर्म क्रियते वै विपश्चिता ।

नमस्कारप्रयुक्तेन तेन प्रीयन्ति देवताः ॥

पितरश्च महाभागा ऋषयश्च तपोधनाः ।

गृह्याश्च देवताः सर्वाः प्रीयन्ते विधिनार्चिताः ॥

विद्वान् पुरुष जलसे स्नान करके देवता आदिके लिये नमस्कारपूर्वक जो तर्पण आदि कर्म करते हैं, उससे देवता, महाभाग पितर तथा तपोधन ऋषि संतुष्ट होते हैं तथा विधिपूर्वक पूजित होकर घरके सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 100, श्लोक 9–10 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 880

भीष्म उवाच

अगाधे विमले शुद्धे सत्यतोये धृतिहृदे ।

स्नातव्यं मानसे तीर्थे सत्त्वमालम्ब्य शाश्वतम् ॥

जिसमें धैर्यरूप कुण्ड और सत्यरूप जल भरा हुआ है तथा जो अगाध, निर्मल एवं अत्यन्त शुद्ध है, उस मानस तीर्थमें सदा परमात्माका आश्रय लेकर स्नान करना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 108, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 967
अहङ्कारहीनता और भक्ति

भीष्म उवाच

तत्त्ववित्त्वनहंबुद्धिस्तीर्थप्रवरमुच्यते ।

नारायणेऽथ रुद्रे वा भक्तिस्तीर्थं परं मता ।

शौचलक्षणमेतत् ते सर्वत्रैवान्ववेक्षतः ॥

किंतु जिसकी बुद्धिमें अहंकारका नाम भी नहीं है, वह तत्त्वज्ञानी पुरुष श्रेष्ठ तीर्थ कहलाता है । भगवान् नारायण अथवा भगवान् शिवमें जो भक्ति होती है, वह भी उत्तम तीर्थ मानी गयी है । पवित्रताका यह लक्षण तुम्हें विचार करनेपर सर्वत्र ही दृष्टिगोचर होगा ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 108, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 967 ज्ञान–विवेक

महेश्वर उवाच

येषां धर्माश्रिता बुद्धिः श्रद्दधानाश्च ये नराः ।

तेषां स्यादुपदेष्टव्यः सरहस्यो महाफलः ॥

जिनकी बुद्धि सदा धर्ममें ही लगी रहती है और जो मनुष्य परम श्रद्धालु हैं, उन्हींको इस महान् फलदायक रहस्ययुक्त धर्मका उपदेश देना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 133, श्लोक 2 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1107 ज्ञान–विवेक
भक्तों का निर्भय पद

ईश्वर उवाच

भुवनेऽभ्यर्चितो नित्यं देवैरपि सनातनः ।

अभयेनानुरूपेण युज्यन्ते तमनुव्रताः ॥

वे सनातन देवता हैं, अतः इस त्रिभुवनमें देवता भी सदा उन्हींकी पूजा करते हैं । जो उनके अनन्य भक्त हैं, वे अपने भजनके अनुरूप ही निर्भय पद प्राप्त करते हैं ।

महेश्वर ने श्रीकृष्ण के माहात्म्य का वर्णन किया।

अनुशासनपर्व, अध्याय 147, श्लोक 49 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1406

वासुदेव उवाच

त्रिवर्गे चापवर्गे च यशःश्रीरोगशान्तिषु ।

देवतापितृपूजासु संतोष्याश्चैव नो द्विजाः ॥

धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये, मोक्षकी प्राप्तिके लिये और यश, लक्ष्मी तथा आरोग्यकी उपलब्धिके लिये एवं देवता और पितरोंकी पूजाके समय हमें ब्राह्मणोंको पूर्ण संतुष्ट करना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 159, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1508 धर्म–आचरण

ब्राह्मण उवाच

कृशाशाः सुव्रताशाश्च तपसा दग्धकिल्बिषाः ।

आत्मन्यात्मानमाविश्य ब्रह्माणं समुपासते ॥

जिनकी आशा क्षीण हो गयी है, जो उत्तम व्रतके पालनकी इच्छा रखते हैं । तपस्यासे जिनके सारे पाप दग्ध हो गये हैं । वे ही पुरुष अपनी बुद्धिको आत्मनिष्ठ करके परब्रह्मकी उपासना करते हैं ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 27, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1713 साधना–योग
परमेश्वर की सर्वव्यापकता

त्वं हि यज्ञोऽक्षरः सर्वस्त्वं धर्मस्त्वं प्रजापतिः ।

त्वं गतिः सर्वभूतानामिति मे निश्चिता मतिः ॥

‘आप ही यज्ञ, अक्षर, सर्वस्वरूप, धर्म, प्रजापति एवं सम्पूर्ण भूतोंकी गति हैं — यह मेरी निश्चित धारणा है’

अनुगीतापर्व, अध्याय 71, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1936 ज्ञान–विवेक