श्रीगणेशाय नमः।

श्रीरामचरितमानस

गुरु महिमा

गुरु का स्थान और कृपा

15 पद्य

श्रीरामचरितमानस

गुरु पद रज की महिमा

बंदउँ गुरु पद पदुम परागा । सुरुचि सुबास सरस अनुरागा ॥

अमिअ मूरिमय चूरन चारू । समन सकल भव रुज परिवारू ॥

मैं गुरु महाराजके चरणकमलोंकी रजकी वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि(सुन्दर स्वाद), सुगन्ध तथा अनुरागरूपी रससे पूर्ण है । वह अमर मूल (सञ्जीवनी जड़ी) का सुन्दर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भवरोगोंके परिवारको नाश करनेवाला है ।

बालकाण्ड, चौपाई 1.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 21
गुरु पद ज्योति का प्रभाव

श्रीगुर पद नख मनि गन जोती । सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती ॥

दलन मोह तम सो सप्रकासू । बड़े भाग उर आवइ जासू ॥

श्रीगुरु महाराजके चरण-नखोंकी ज्योति मणियोंके प्रकाशके समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदयमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है । वह प्रकाश अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश करनेवाला है; वह जिसके हृदयमें आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 1.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 21
सद्गुरु की महिमा

सदगुर ग्यान बिराग जोग के । बिबुध बैद भव भीम रोग के ॥

जननि जनक सिय राम प्रेम के । बीज सकल ब्रत धरम नेम के ॥

ज्ञान, वैराग्य और योगके लिये सद्गुरु हैं और संसाररूपी भयंकर रोगका नाश करनेके लिये देवताओंके वैद्य (अश्विनीकुमार) के समान हैं । ये श्रीसीतारामजीके प्रेमके उत्पन्न करनेके लिये माता-पिता हैं और सम्पूर्ण व्रत, धर्म और नियमोंके बीज हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 32(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 56 ज्ञान–विवेक
आज्ञा का पालन

मातु पिता गुर प्रभु कै बानी । बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी ॥

तुम्ह सब भाँति परम हितकारी । अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी ॥

माता, पिता, गुरु और स्वामीकी बातको बिना ही विचारे शुभ समझकर करना (मानना) चाहिये । फिर आप तो सब प्रकारसे मेरे परम हितकारी हैं । हे नाथ! आपकी आज्ञा मेरे सिरपर है ।

शिवजी ने श्रीरामचन्द्रजी से कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 77.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 95 धर्म–आचरण
गुरुवाक्य की निष्ठा

नारद बचन न मैं परिहरऊँ । बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ ॥

गुर के बचन प्रतीति न जेही । सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही ॥

अतः मैं नारदजीके वचनोंको नहीं छोडूंगी; चाहे घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती । जिसको गुरुके वचनोंमें विश्वास नहीं है, उसको सुख और सिद्धि स्वप्नमें भी सुगम नहीं होती ।

पार्वतीजी ने नारदजी से कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 80.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 97 ज्ञान–विवेक
गुरु की महिमा

सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा । द्विज गुर कोप कहहु को राखा ॥

राखड़ गुर जौं कोप बिधाता । गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता ॥

राजाने मुनिके चरण पकड़कर कहा — हे स्वामी! सत्य ही है । ब्राह्मण और गुरुके क्रोधसे, कहिये, कौन रक्षा कर सकता है? यदि ब्रह्मा भी क्रोध करें, तो गुरु बचा लेते हैं; पर गुरुसे विरोध करनेपर जगत्में कोई भी बचानेवाला नहीं है ।

राजा प्रतापभानु ने कपटी मुनि के चरण पकड़कर कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 166.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 172 धर्म–आचरण
गुरु पद-रज की महिमा

जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं । ते जनु सकल बिभव बस करहीं ॥

मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें । सबु पायउँ रज पावनि पूजें ॥

जो लोग गुरुके चरणोंकी रजको मस्तकपर धारण करते हैं, वे मानो समस्त ऐश्वर्यको अपने वशमें कर लेते हैं । इसका अनुभव मेरे समान दूसरे किसीने नहीं किया । आपकी पवित्र चरण-रजकी पूजा करके मैंने सब कुछ पा लिया ।

राजा ने मुनिराज से यह बात कही।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 3.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 348 शरणागति
गुरु की आज्ञा का महत्त्व

सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि ॥

सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ॥

स्वाभाविक ही हित चाहनेवाले गुरु और स्वामीकी सीखको जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह हृदयमें भरपेट पछताता है और उसके हितकी हानि अवश्य होती है ।

श्रीरामजी ने सीताजी को वन जाने से रोकने के लिए यह शीतल सीख दी।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 63 श्रीरामचरितमानस पृ. 398 नीति–व्यवहार
गुरु भक्ति का महत्त्व

जे गुर पद अंबुज अनुरागी । ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी ॥

राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू ॥

जो लोग गुरुके चरणकमलोंके अनुरागी हैं, वे लोकमें (लौकिक दृष्टिसे) भी और वेदमें (पारमार्थिक दृष्टिसे) भी बड़भागी होते हैं! [फिर] जिसपर आप (गुरु) का ऐसा स्नेह है, उस भरतके भाग्यको कौन कह सकता है?

श्रीरामचन्द्रजी ने गुरु वसिष्ठजी से भरतजी के भाग्य की प्रशंसा करते हुए कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 259.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 562 भक्ति
प्रभु के दिव्य स्वरूप

प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी । पूज्य परम हित अंतरजामी ॥

सरल सुसाहिबु सील निधानू । प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू ॥

हे प्रभु! आप पिता, माता, सुहृद् (मित्र), गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितैषी और अन्तर्यामी हैं । सरलहृदय, श्रेष्ठ मालिक, शीलके भण्डार, शरणागतकी रक्षा करनेवाले, सर्वज्ञ, सुजान ।

भरतजी ने श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजी का स्मरण करके कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 298.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 594 भक्ति
गुरु का प्रभाव

राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम ॥

गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम ॥

राज्यका सब कार्य, लज्जा, प्रतिष्ठा, धर्म, पृथ्वी, धन, घर — इन सभीका पालन (रक्षण) गुरुजीका प्रभाव (सामर्थ्य) करेगा और परिणाम शुभ होगा ।

अयोध्याकाण्ड, दोहा 305 श्रीरामचरितमानस पृ. 602
सेवक की प्रीति की परीक्षा

उमा काल मर जाकीं ईछा । सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा ॥

सुनु सरबग्य चराचर नायक । प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक ॥

नाभिकुंड पियूष बस याकें । नाथ जिअत रावनु बल ताकें ॥

सुनत बिभीषन बचन कृपाला । हरषि गहे कर बान कराला ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! जिसकी इच्छामात्रसे काल भी मर जाता है, वही प्रभु सेवककी प्रीतिकी परीक्षा ले रहे हैं । [विभीषणजीने कहा — -] हे सर्वज्ञ! हे चराचरके स्वामी! हे शरणागतके पालन करनेवाले! हे देवता और मुनियोंको सुख देनेवाले! सुनिये, इसके नाभिकुण्डमें अमृतका निवास है । हे नाथ! रावण उसीके बलपर जीता है । विभीषणके वचन सुनते ही कृपालु श्रीरघुनाथजीने हर्षित होकर हाथमें विकराल बाण लिये ।

श्रीरामचन्द्रजी ने विभीषण की ओर देखा, तब शिवजी कहते हैं।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 102.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 880 शरणागति
मानव शरीर का महत्व

नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो । सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ॥

करनधार सदगुर दृढ़ नावा । दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ॥

यह मनुष्यका शरीर भवसागर [से तारने] के लिये बेड़ा (जहाज) है । मेरी कृपा ही अनुकूल वायु है । सद्गुरु इस मजबूत जहाजके कर्णधार (खेनेवाले) हैं । इस प्रकार दुर्लभ (कठिनतासे मिलनेवाले) साधन सुलभ होकर (भगवत्कृपासे सहज ही) उसे प्राप्त हो गये हैं … ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 44.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 953 वैराग्य साधना–योग
गुरु और भक्ति का महत्व

बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु ॥

गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु ॥

गुरुके बिना कहीं ज्ञान हो सकता है? अथवा वैराग्यके बिना कहीं ज्ञान हो सकता है? इसी तरह वेद और पुराण कहते हैं कि श्रीहरिकी भक्तिके बिना क्या सुख मिल सकता है?

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से कहा।

उत्तरकाण्ड, सोरठा 89(क) श्रीरामचरितमानस पृ. 993 ज्ञान–विवेक
गुरु की महत्ता

गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई । जौं बिरंचि संकर सम होई ॥

संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता । दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता ॥

गुरुके बिना कोई भवसागर नहीं तर सकता, चाहे वह ब्रह्माजी और शंकरजीके समान ही क्यों न हो । [गरुड़जीने कहा—] हे तात! मुझे सन्देहरूपी सर्पने डस लिया था और [साँपके डसनेपर जैसे विष चढ़नेसे लहरें आती हैं, वैसे ही] बहुत-सी कुतर्करूपी दुःख देनेवाली लहरें आ रही थीं ।

गरुड़जी ने काकभुशुण्डिजी से कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 93(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 997 साधना–योग ज्ञान–विवेक