श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४

कर्म–प्रारब्ध

कर्म और उसका फल

22 पद्य

महाभारत — खण्ड ४

दैव की प्रधानता

धृतराष्ट्र उवाच

व्यक्तं हि दैवं बलवत् पौरुषादिति मे मतिः ।

यद् द्रोणो निहतः शूरः पार्षतेन महात्मना ॥

निश्चय ही पुरुषार्थकी अपेक्षा दैव ही प्रबल है, ऐसा मेरा विश्वास है; क्योंकि द्रोणाचार्य-जैसे शूरवीर महामना धृष्टद्युम्नके हाथसे मारे गये ।

द्रोणपर्व, अध्याय 9, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 91
पाण्डवों के क्रोध का फल

अभिमन्यु उवाच

परवित्तापहारस्य क्रोधस्याप्रशमस्य च ।

लोभस्य ज्ञाननाशस्य द्रोहस्यात्याहितस्य च ॥

पितॄणां मम राज्यस्य हरणस्योग्रधन्विनाम् ।

तत् त्वयेदमनुप्राप्तं प्रकोपाद् वै महात्मनाम् ॥

दूसरोंके धनका अपहरण, क्रोध, अशान्ति, लोभ, ज्ञानलोप, द्रोह, दुःसाहसपूर्ण बर्ताव तथा मेरे उग्र धनुर्धर पितरोंके राज्यका अपहरण — इन सभी बुराइयोंके फलस्वरूप उन महात्मा पाण्डवोंके क्रोधसे तुझे आज यह बुरा दिन प्राप्त हुआ है ।

द्रोणपर्व, अध्याय 40, श्लोक 5–6 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 317 काम–क्रोध–लोभ–मोह
शोक का त्याग

व्यास → राजन

एवं ज्ञात्वा स्थिरो भूत्वा जह्यरीन् धैर्यमाप्नुहि ।

जीवन्त एव नः शोच्या न तु स्वर्गगतोऽनघ ॥

राजन्! ऐसा जानकर सुस्थिर हो धैर्यका आश्रय लो और उत्साहपूर्वक शत्रुओंका वध करो । अनघ! हमें इस संसारमें जीवित पुरुषोंके लिये ही शोक करना चाहिये । जो स्वर्गमें चला गया है, उसके लिये शोक करना उचित नहीं है ।

व्यासजी ने युधिष्ठिर से कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 71, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 464 ज्ञान–विवेक
पापकर्म का त्वरित फल

युयुत्सु उवाच

आगमिष्यति वः क्षिप्रं फलं पापस्य कर्मणः ।

अधर्मो हि कृतस्तीव्रः कथं स्यादफलश्चिरम् ॥

तुम्हारे पापकर्मका फल तुम्हें शीघ्र ही प्राप्त होगा। तुमलोगोंने घोर पाप किया है । उसका फल मिलनेमें अधिक विलम्ब कैसे हो सकता है?

युयुत्सु ने धर्म को न जानने वाले कौरवों से कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 72, श्लोक 62 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 476
मित्रता और दान का पुण्य

युधिष्ठिर उवाच

यो हि शैनेय मित्रार्थे युध्यमानस्त्यजेत् तनुम् ।

पृथिवीं च द्विजातिभ्यो यो दद्यात् स समो भवेत् ॥

शैनेय! जो मित्रके लिये युद्ध करते हुए शरीरका त्याग करता है तथा जो ब्राह्मणोंको समूची पृथ्वीका दान कर देता है, वे दोनों समान पुण्यके भागी होते हैं ।

युधिष्ठिर ने सात्यकि से कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 110, श्लोक 49 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 732 धर्म–आचरण
वर्तमान कर्तव्य का बोध

धृतराष्ट्र उवाच

यद् गतं तद् गतमिति ममासीन्मनसि स्थितम् ।

इदानीमत्र किं कार्यं प्रकरिष्यामि संजय ॥

संजय! अबतक मेरे मनमें यह बात थी कि जो बीत गया, सो बीत गया । उसके लिये चिन्ता करना व्यर्थ है । परंतु अब यहाँ इस समय मेरा क्या कर्तव्य है, उसे बताओ । मैं उसका पालन अवश्य करूँगा ।

धृतराष्ट्र ने सञ्जय से कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 138, श्लोक 2 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 957
दैव का प्रभाव

कर्ण उवाच

दैवं प्रमाणं सर्वस्य सुकृतस्येतरस्य वा ।

अनन्यकर्म दैवं हि जागर्ति स्वपतामपि ॥

सुकृत हो या दुष्कृत, सबपर दैवका ही अधिकार है; वही उसका फल देनेवाला है । अपना ही पूर्वकृत कर्म दैव है, जो मनुष्योंके सो जानेपर भी जागता रहता है ।

द्रोणपर्व, अध्याय 152, श्लोक 32 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1107
धर्म के विरुद्ध कार्य

अश्वत्थामा उवाच

कामात् क्रोधादविज्ञानाद्धर्षाद् बाल्येन वा पुनः ।

विधर्मकाणि कुर्वन्ति तथा परिभवन्ति च ।

तदिदं पार्षतेनेह महदाधर्मिकं कृतम् ।

अवज्ञाय च मां नूनं नृशंसेन दुरात्मना ।

तस्यानुबन्धं द्रष्टासौ धृष्टद्युम्नः सुदारुणम् ॥

लोग काम, क्रोध, अज्ञान, हर्ष अथवा बालोचित चपलताके कारण धर्मके विरुद्ध कार्य करते तथा श्रेष्ठ पुरुषोंका अपमान कर बैठते हैं । क्रूर एवं दुरात्मा द्रुपदपुत्रने निश्चय ही मेरी अवहेलना करके यह महान् पाप कर्म कर डाला है । अतः उस धृष्टद्युम्नको उस पापका अत्यन्त भयंकर परिणाम भोगना पड़ेगा ।

अश्वत्थामा ने दुर्योधन से कहा।

द्रोणपर्व, अध्याय 195, श्लोक 10–12 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1477 काम–क्रोध–लोभ–मोह
स्वयं का कल्याण

संजय उवाच

वासुदेवोऽपि धर्मात्मा करिष्यत्यात्मनः क्षमम् ।

श्रेयो ह्यपदिशत्येष लोकस्य किमुतात्मनः ॥

धर्मात्मा भगवान् श्रीकृष्ण भी अपने लिये जो उचित समझेंगे, करेंगे । ये सारे जगत्को कल्याणका उपदेश देते हैं, फिर अपना भला क्यों नहीं करेंगे?

द्रोणपर्व, अध्याय 199, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1513 ज्ञान–विवेक
दैव की प्रधानता

धृतराष्ट्र उवाच

अहो बत महद् दुःखं यत्र पाण्डुसुतान् रणे ।

नातरद् रभसः कर्णो दैवं नूनं परायणम् ॥

अहो! यह महान् दुःखकी बात है कि वेगशाली वीर कर्ण भी रणभूमिमें पाण्डवोंसे पार न पा सका । अवश्य दैव ही सबका परम आश्रय है ।

धृतराष्ट्र ने सञ्जय से कहा।

कर्णपर्व, अध्याय 31, श्लोक 23 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1787 भक्ति
जीवन की अनित्यता

कर्ण उवाच

नेह ध्रुवं किंचिदपि प्रचिन्तयन् ।

विद्यां लोके कर्मणो नित्ययोगात् ।

सूर्योदये को हि विमुक्तसंशयो ।

भावं कुर्वीताद्य गुरौ निपातिते ॥

बहुत सोचनेपर भी मैं कर्म-सम्बन्धकी अनित्यताके कारण इस लोकमें किसी भी वस्तुको नित्य नहीं मानता । जब आचार्य द्रोण भी मार दिये गये, तब कौन संदेहरहित होकर आगामी सूर्योदयतक जीवित रहनेका दृढ़ विश्वास कर सकता है?

कर्ण ने शल्य से कहा।

कर्णपर्व, अध्याय 37, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1855 वैराग्य
कर्तव्यहीनता और मूर्खता

शल्य उवाच

कार्याकार्यं न जानीषे कालपक्वोऽस्यसंशयम् ।

बह्वबद्धमकर्णीयं को हि ब्रूयाज्जिजीविषुः ॥

तुम्हें कर्तव्य और अकर्तव्यका कुछ भी ज्ञान नहीं है । निःसंदेह तुम्हें कालने पका दिया है । (अतः तुम पके हुए फलके समान गिरनेवाले ही हो); अन्यथा जो जीवित रहना चाहता है, ऐसा कौन पुरुष ऐसी बहुत-सी न सुननेयोग्य ऊटपटांग बातें कह सकता है?

कर्णपर्व, अध्याय 39, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 1868
सङ्कट में शरण

संजय उवाच

यथा सर्वाणि भूतानि मृत्योर्भीतानि मारिष ।

धर्ममेवोपलीयन्ते कर्मवन्ति हि यानि च ॥

तथा कर्णं महेष्वासं पुत्रास्तव नराधिप ।

उपालीयन्त संत्रासात् पाण्डवस्य महात्मनः ॥

माननीय नरेश! जैसे कर्म करनेवाले सब जीव मृत्युसे डरकर धर्मकी ही शरण लेते हैं, उसी प्रकार आपके पुत्र महामना पाण्डुपुत्र अर्जुनके भयसे महाधनुर्धर कर्णकी ही ओटमें छिपने लगे थे ।

संजय ने धृतराष्ट्र से कहा।

कर्णपर्व, अध्याय 81, श्लोक 49–50 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2257
भाग्य की प्रधानता

विधिश्च बलवानत्र पौरुषं तु निरर्थकम् ।

शक्रतुल्यबलाः सर्वे यथावध्यन्त पाण्डवैः ॥

‘इस जगत्में भाग्य ही बलवान् है । पुरुषार्थ तो निरर्थक है, क्योंकि आपके सभी पुत्र इन्द्रके तुल्य बलवान् होनेपर भी पाण्डवोंके हाथसे मारे गये!’

सञ्जय ने कुरुराज के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए यह कहा।

शल्यपर्व, अध्याय 1, श्लोक 17 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2432
सङ्कट और पद का प्रभाव

युधिष्ठिर उवाच

सर्वो विमृशते जन्तुः कृच्छ्रस्थो धर्मदर्शनम् ।

पदस्थः पिहितं द्वारं परलोकस्य पश्यति ॥

प्रायः सभी प्राणी जब स्वयं संकटमें पड़ जाते हैं तो अपनी रक्षाके लिये धर्मशास्त्रकी दुहाई देने लगते हैं और जब अपने उच्च पदपर प्रतिष्ठित होते हैं, उस समय उन्हें परलोकका दरवाजा बंद दिखायी देता है ।

युधिष्ठिर ने दुर्योधन से कहा।

शल्यपर्व, अध्याय 32, श्लोक 59 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2708 धर्म–आचरण
चन्द्रमा की वृद्धि और क्षय

दक्ष उवाच

मासार्धं च क्षयं सोमो नित्यमेव गमिष्यति ।

मासार्धं तु सदा वृद्धिं सत्यमेतद् वचो मम ॥

सोम आधे मासतक प्रतिदिन क्षीण होंगे और आधे मासतक निरन्तर बढ़ते रहेंगे । मेरी यह बात अवश्य सत्य होगी ।

दक्ष प्रजापति ने सोम से कहा।

शल्यपर्व, अध्याय 35, श्लोक 76 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2734
प्रारब्ध और पुरुषार्थ

कृप उवाच

आबद्धा मानुषाः सर्वे निबद्धाः कर्मणोर्द्वयोः ।

दैवे पुरुषकारे च परं ताभ्यां न विद्यते ॥

सभी मनुष्य प्रारब्ध और पुरुषार्थ दो प्रकारके कर्मोंसे बँधे हुए हैं । इन दोके सिवा दूसरा कुछ नहीं है ।

कृपाचार्य ने अश्वत्थामा से कहा।

सौप्तिकपर्व, अध्याय 2, श्लोक 2 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2985
पुरुषार्थ और दैव का समन्वय

कृप उवाच

उत्थानं चाप्यदैवस्य ह्यनुत्थानं च दैवतम् ।

व्यर्थं भवति सर्वत्र पूर्वस्तत्र विनिश्चयः ॥

दैवरहित पुरुषका पुरुषार्थ व्यर्थ है और पुरुषार्थशून्य दैव भी व्यर्थ हो जाता है । सर्वत्र ये दो ही पक्ष उठाये जाते हैं । इन दोनोंमें पहला पक्ष ही सिद्धान्तभूत एवं श्रेष्ठ है (अर्थात् दैवके सहयोगके बिना पुरुषार्थ नहीं काम देता है)

कृपाचार्य ने अश्वत्थामा से कहा।

सौप्तिकपर्व, अध्याय 2, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2985
पुरुषार्थ और दैव का संयोग

कृप उवाच

कृतः पुरुषकारश्च सोऽपि दैवेन सिध्यति ।

तथास्य कर्मणः कर्तुरभिनिर्वर्तते फलम् ॥

किया हुआ पुरुषार्थ भी दैवके सहयोगसे ही सफल होता है तथा दैवकी अनुकूलतासे ही कर्ताको उसके कर्मका फल प्राप्त होता है ।

सौप्तिकपर्व, अध्याय 2, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2986
दैव और पुरुषार्थ का महत्त्व

कृप उवाच

तयोर्दैवं विनिश्चित्य स्वयं चैव प्रवर्तते ।

प्राज्ञाः पुरुषकारेषु वर्तन्ते दाक्ष्यमाश्रिताः ॥

इन दोनोंमें दैव बलवान् है । वह स्वयं ही निश्चय करके पुरुषार्थकी अपेक्षा किये बिना ही फल-साधनमें प्रवृत्त हो जाता है, तथापि विद्वान् पुरुष कुशलताका आश्रय ले पुरुषार्थमें ही प्रवृत्त होते हैं ।

सौप्तिकपर्व, अध्याय 2, श्लोक 8 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 2986
प्रमाद का विनाश

सूत उवाच

न हि प्रमादात् परमस्ति कश्चिद् ।

वधो नराणामिह जीवलोके ।

प्रमत्तमर्था हि नरं समन्तात् ।

त्यजन्त्यनर्थाश्च समाविशन्ति ॥

प्रमादसे बढ़कर इस संसारमें मनुष्योंके लिये दूसरी कोई मृत्यु नहीं । प्रमादी मनुष्यको सारे अर्थ सब ओरसे त्याग देते हैं और अनर्थ बिना बुलाये ही उसके पास चले आते हैं ।

सौप्तिकपर्व, अध्याय 10, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 3057
कर्मों का फल

गान्धारी उवाच

पूर्वजातिकृतं पापं मन्ये नाल्पमिवानघ ।

एताभिर्निरवद्याभिर्मया चैवाल्पमेधया ॥

यदिदं धर्मराजेन पातितं नो जनार्दन ।

न हि नाशोऽस्ति वार्ष्णेय कर्मणोः शुभपापयोः ॥

अनघ! मैं समझती हूँ कि इन अनिन्द्य सुन्दरी अबलाओंने तथा मन्द बुद्धिवाली मैंने भी पूर्वजन्मोंमें कोई बड़ा भारी पाप किया है, जिसके फलस्वरूप धर्मराजने हमलोगोंको बड़ी भारी विपत्तिमें डाल दिया है । जनार्दन! वृष्णिनन्दन! जान पड़ता है कि किये हुए पुण्य और पापकर्मोंका उनके फलका उपभोग किये बिना नाश नहीं होता है ।

गान्धारी ने श्रीकृष्ण से कहा।

स्त्रीपर्व, अध्याय 18, श्लोक 11–12 महाभारत — खण्ड ४ पृ. 3187