श्रीगणेशाय नमः।
श्रीरामचरितमानस
काम–क्रोध–लोभ–मोह
भीतर के छह शत्रु
24 पद्य
श्रीरामचरितमानस
कठिन कुसंग कुपंथ कराला । तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला ॥
गृह कारज नाना जंजाला । ते अति दुर्गम सैल बिसाला ॥
घोर कुसंग ही भयानक बुरा रास्ता है; उन कुसंगियोंके वचन ही बाघ, सिंह और साँप हैं । घरके काम-काज और गृहस्थीके भाँति-भाँतिके जंजाल ही अत्यन्त दुर्गम बड़े-बड़े पहाड़ हैं ।
काम कोह मद मोह नसावन । बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन ॥
सादर मज्जन पान किए तें । मिटहिं पाप परिताप हिए तें ॥
यह जल काम, क्रोध, मद और मोहका नाश करनेवाला और निर्मल ज्ञान और वैराग्यका बढ़ानेवाला है । इसमें आदरपूर्वक स्नान करनेसे और इसे पीनेसे हृदयमें रहनेवाले सब पाप-ताप मिट जाते हैं ।
बैनतेय बलि जिमि चह कागू । जिमि ससु चहै नाग अरि भागू ॥
जिमि चह कुसल अकारन कोही । सब संपदा चहै सिवद्रोही ॥
लोभी लोलुप कल कीरति चहई । अकलंकता कि कामी लहई ॥
हरि पद बिमुख परम गति चाहा । तस तुम्हार लालचु नरनाहा ॥
जैसे गरुड़का भाग कौआ चाहे, सिंहका भाग खरगोश चाहे, बिना कारण ही क्रोध करनेवाला अपनी कुशल चाहे, शिवजीसे विरोध करनेवाला सब प्रकारकी सम्पत्ति चाहे, लोभी-लालची सुन्दर कीर्ति चाहे, कामी मनुष्य निष्कलंकता [चाहे तो] क्या पा सकता है? और जैसे श्रीहरिके चरणोंसे विमुख मनुष्य परमगति (मोक्ष) चाहे, हे राजाओ! सीताके लिये तुम्हारा लालच भी वैसा ही व्यर्थ है ।
लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल ॥
जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल ॥
लक्ष्मणजीने हँसकर कहा — हे मुनि! सुनिये, क्रोध पापका मूल है, जिसके वशमें होकर मनुष्य अनुचित कर्म कर बैठते हैं और विश्वभरके प्रतिकूल चलते (सबका अहित करते) हैं ।
लक्ष्मणजी ने परशुरामजी से हँसकर कहा।
रागु रोषु इरिषा मदु मोहू । जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू ॥
सकल प्रकार बिकार बिहाई । मन क्रम बचन करेहु सेवकाई ॥
राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह-इनके वश स्वप्नमें भी मत होना । सब प्रकारके विकारोंका त्याग कर मन, वचन और कर्मसे श्रीसीतारामजीकी सेवा करना ।
सुमित्राजी ने लक्ष्मणजी को वन जाने की आज्ञा देते हुए इस प्रकार शिक्षा दी।
काम कोह मद मान न मोहा । लोभ न छोभ न राग न द्रोहा ॥
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया । तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया ॥
जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह है; न लोभ है, न क्षोभ है; न राग है, न द्वेष है; और न कपट, दम्भ और माया ही है-हे रघुराज! आप उनके हृदयमें निवास कीजिये ।
कपट कुचालि सीवँ सुरराजू । पर अकाज प्रिय आपन काजू ॥
काक समान पाकरिपु रीती । छली मलीन कतहुँ न प्रतीती ॥
देवराज इन्द्र कपट और कुचालकी सीमा है । उसे परायी हानि और अपना लाभ ही प्रिय है । इन्द्रकी रीति कौएके समान है । वह छली और मलिन-मन है, उसका कहीं किसीपर विश्वास नहीं है ।
संशय सर्पसर्प ग्रसनग्रसन उरगादः । शमन सुकर्कश तर्क विषादः ॥
भव भंजन रंजन सुर यूथः । त्रातु सदा नो कृपा वरूथः ॥
जो संशयरूपी सर्पको ग्रसनेके लिये गरुड़ हैं, अत्यन्त कठोर तर्कसे उत्पन्न होनेवाले विषादका नाश करनेवाले हैं, आवागमनको मिटानेवाले और देवताओंके समूहको आनन्द देनेवाले हैं, वे कृपाके समूह श्रीरामजी सदा हमारी रक्षा करें ।
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ ॥
मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ ॥
हे तात! काम, क्रोध और लोभ-ये तीन अत्यन्त प्रबल दुष्ट हैं । ये विज्ञानके धाम मुनियोंके भी मनोंको पलभरमें क्षुब्ध कर देते हैं ।
श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी से कहा।
लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि ॥
क्रोध कें परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि ॥
लोभको इच्छा और दम्भका बल है, कामको केवल स्त्रीका बल है और क्रोधको कठोर वचनोंका बल है; श्रेष्ठ मुनि विचारकर ऐसा कहते हैं ।
श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी से कहा।
क्रोध मनोज लोभ मद माया । छूटहिं सकल राम कीं दाया ॥
सो नर इंद्रजाल नहिं भूला । जा पर होइ सो नट अनुकूला ॥
क्रोध, काम, लोभ, मद और माया-ये सभी श्रीरामजीकी दयासे छूट जाते हैं । वह नट (नटराजभगवान्) जिसपर प्रसन्न होता है, वह मनुष्य इन्द्रजाल (माया) में नहीं भूलता ।
श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी से कहा।
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह के धारि ॥
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि ॥
काम, क्रोध, लोभ और मद आदि मोह (अज्ञान) की प्रबल सेना है । इनमें मायारूपिणी (मायाकी साक्षात् मूर्ति) स्त्री तो अत्यन्त दारुण दुःख देनेवाली है ।
अर्क जवास पात बिनु भयऊ । जस सुराज खल उद्यम गयऊ ॥
खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी । करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी ॥
मदार और जवासा बिना पत्तेके हो गये (उनके पत्ते झड़ गये) । जैसे श्रेष्ठ राज्यमें दुष्टोंका उद्यम जाता रहा (उनकी एक भी नहीं चलती) । धूल कहीं खोजनेपर भी नहीं मिलती, जैसे क्रोध धर्मको दूर कर देता है (अर्थात् क्रोधका आवेश होनेपर धर्मका ज्ञान नहीं रह जाता)
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ ॥
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत ॥
हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ — ये सब नरकके रास्ते हैं । इन सबको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीको भजिये, जिन्हें संत (सत्पुरुष) भजते हैं ।
विभीषणजी ने रावण से कहा।
जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार ॥
सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार ॥
जैसे-जैसे प्रभु उसके सिरोंको काटते हैं, वैसे-ही-वैसे वे अपार होते जाते हैं । जैसे विषयोंका सेवन करनेसे काम (उन्हें भोगनेकी इच्छा) दिन-प्रति-दिन नया-नया बढ़ता जाता है ।
श्रीरामजी द्वारा रावण के सिरों को काटे जाने पर यह कहा गया।
अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर । भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर ॥
काम क्रोध मद गज पंचानन । बसहु निरंतर जन मन कानन ॥
आप निर्गुण, सगुण, दिव्य गुणोंके धाम और परम सुन्दर हैं । भ्रमरूपी अन्धकारके [नाशके] लिये प्रबल प्रतापी सूर्य हैं । काम, क्रोध और मदरूपी हाथियोंके [वधके] लिये सिंहके समान आप इस सेवकके मनरूपी वनमें निरन्तर निवास कीजिये ।
काल कराल ब्याल खगराजहि । नमत राम अकाम ममता जहि ॥
लोभ मोह मृगजूथ किरातहि । मनसिज करि हरि जन सुखदातहि ॥
कालरूपी भयानक सर्पके भक्षण करनेवाले श्रीरामरूप गरुड़जीको भजो । निष्कामभावसे प्रणाम करते ही ममताका नाश कर देनेवाले श्रीरामजीको भजो । लोभ-मोहरूपी हरिनोंके समूहके नाश करनेवाले श्रीरामरूप किरातको भजो । कामदेवरूपी हाथीके लिये सिंहरूप तथा सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीको भजो ।
मोह न अंध कीन्ह केहि केही । को जग काम नचाव न जेही ॥
तृस्त्राँ केहि न कीन्ह बौराहा । केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा ॥
उनमेंसे भी किस-किसको मोहने अंधा (विवेकशून्य) नहीं किया? जगत्में ऐसा कौन है जिसे कामने न नचाया हो? तृष्णाने किसको मतवाला नहीं बनाया? क्रोधने किसका हृदय नहीं जलाया?
गुन कृत सन्यपात नहिं केही । कोउ न मान मद तजेउ निबेही ॥
जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा । ममता केहि कर जस न नसावा ॥
[रज, तम आदि] गुणोंका किया हुआ सन्निपात किसे नहीं हुआ? ऐसा कोई नहीं है जिसे मान और मदने अछूता छोड़ा हो । यौवनके ज्वरने किसे आपेसे बाहर नहीं किया? ममताने किसके यशका नाश नहीं किया?
काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप ॥
ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप ॥
जो काम, क्रोध, मद और लोभमें रत हैं और दुःखरूप घरमें आसक्त हैं, वे श्रीरघुनाथजीको कैसे जान सकते हैं? वे मूर्ख तो अन्धकाररूपी कुएँमें पड़े हुए हैं ।
काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से कहा।
प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई । हारहिं सकल सलभ समुदाई ॥
खल कामादि निकट नहिं जाहीं । बसइ भगति जाके उर माहीं ॥
[उसके प्रकाशसे] अविद्याका प्रबल अन्धकार मिट जाता है । मदादि पतंगोंका सारा समूह हार जाता है । जिसके हृदयमें भक्ति बसती है, काम, क्रोध और लोभ आदि दुष्ट तो उसके पास भी नहीं जाते ।
काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी को रामभक्तिरूपी मणि की महिमा बताते हुए कहा।
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला । तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला ॥
काम बात कफ लोभ अपारा । क्रोध पित्त नित छाती जारा ॥
सब रोगोंकी जड़ मोह (अज्ञान) है । उन व्याधियोंसे फिर और बहुत-से शूल उत्पन्न होते हैं । काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है ।
काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी को मानस-रोगों के विषय में बताते हुए कहा।
अहंकार अति दुखद डमरुआ । दंभ कपट मद मान नेहरुआ ॥
तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी । त्रिबिधि ईषना तरुन तिजारी ॥
अहंकार अत्यन्त दुःख देनेवाला डमरू (गाँठका) रोग है । दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ (नसोंका) रोग है । तृष्णा बड़ा भारी उदरवृद्धि (जलोदर) रोग है । तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं ।
यह न कहिअ सठही हठसीलहि । जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि ॥
कहिअ न लोभिहि क्रोधिहि कामिहि । जो न भजड़ सचराचर स्वामिहि ॥
यह कथा उनसे न कहनी चाहिये जो शठ (धूर्त) हों, हठी स्वभावके हों और श्रीहरिकी लीलाको मन लगाकर न सुनते हों । लोभी, क्रोधी और कामीको, जो चराचरके स्वामी श्रीरामजीको नहीं भजते, यह कथा नहीं कहनी चाहिये ।