श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४
धर्म–आचरण
कर्तव्य और सदाचरण
30 पद्य
महाभारत — खण्ड ४
संशप्तक उवाच
ये वै लोकाश्चाव्रतिनां ये चैव ब्रह्मघातिनाम् ।
मद्यपस्य च ये लोका गुरुदाररतस्य च ।
ब्रह्मस्वहारिणश्चैव राजपिण्डापहारिणः ।
शरणागतं च त्यजतो याचमानं तथा घ्नतः ।
अगारदाहिनां चैव ये च गां निघ्नतामपि ।
अपकारिणां च ये लोका ये च ब्रह्मद्विषामपि ।
स्वभार्यामृतुकालेषु मोहाद् वै नाभिगच्छताम् ।
श्राद्धमैथुनिकानां च ये चाप्यात्मापहारिणाम् ।
न्यासापहारिणां ये च श्रुतं नाशयतां च ये ।
क्लीबेन युध्यमानानां ये च नीचानुसारिणाम् ।
नास्तिकानां च ये लोका येऽग्निमातृपितृत्यजाम् ।
सस्यमाक्रमतां ये च प्रत्यादित्यं प्रमेहताम् ।
तानाप्नुयामहे लोकान् ये च पापकृतामपि ।
यद्यहत्वा वयं युद्धे निवर्तेम धनंजयम् ।
तेन चाभ्यर्दितास्त्रासाद् भवेम हि पराङ्मुखाः ॥
यदि हमलोग अर्जुनको युद्धमें मारे बिना लौट आवें अथवा उनके बाणोंसे पीड़ित हो भयके कारण युद्धसे पराङ्मुख हो जायँ तो हमें वे ही पापमय लोक प्राप्त हों, जो व्रतका पालन न करनेवाले, ब्रह्महत्यारे, मद्य पीनेवाले, गुरुस्त्रीगामी, ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाले, राजाकी दी हुई जीविकाको छीन लेनेवाले, शरणागतको त्याग देनेवाले, याचकको मारनेवाले, घरमें आग लगानेवाले, गोवध करनेवाले, दूसरोंकी बुराईमें लगे रहनेवाले, ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाले, ऋतुकालमें भी मोहवश अपनी पत्नीके साथ समागम न करनेवाले, श्राद्धके दिन मैथुन करनेवाले, अपनी जाति छिपानेवाले, धरोहरको हड़प लेनेवाले, अपनी प्रतिज्ञा तोड़नेवाले, नपुंसकके साथ युद्ध करनेवाले, नीच पुरुषोंका संग करनेवाले, ईश्वर और परलोकपर विश्वास न करनेवाले, अग्नि, माता और पिताकी सेवाका परित्याग करनेवाले, खेतीको पैरोंसे कुचलकर नष्ट कर देनेवाले, सूर्यकी ओर मुँह करके मूत्रत्याग करनेवाले तथा पापपरायण पुरुषोंको प्राप्त होते हैं ।
संशप्तक योद्धाओं ने अर्जुन को मारने की शपथ लेते हुए कहा।
नारद उवाच
प्रजानां पालनं धर्मो दानमिज्या द्विषज्जयः ।
एतत् सुहोत्रो विज्ञाय धर्मेणैच्छद् धनागमम् ॥
प्रजापालन, धर्म, दान, यज्ञ और शत्रुओं पर विजय पाना — इन सबको राजा सुहोत्रने अपने लिये श्रेयस्कर जानकर धर्मके द्वारा ही धन पानेकी अभिलाषा की ।
नारदजी ने सृजय से राजा सुहोत्र के विषय में कहा।
संजय उवाच
राज्ञां सुचरितैर्या च गतिर्भवति शाश्वती ।
चतुराश्रमिणां पुण्यैः पावितानां सुरक्षितैः ॥
दीनानुकम्पिनां या च सततं संविभागिनाम् ।
पैशुन्याच्च निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥
पुत्र! सदाचारके पालनसे राजाओंको तथा सुरक्षित पुण्यके प्रभावसे पवित्र हुए चारों आश्रमोंके लोगोंको जो सनातन गति प्राप्त होती है; दीनोंपर दया करनेवाले, उत्तम वस्तुओंको घरमें बाँटकर उपयोगमें लेनेवाले तथा चुगलीसे दूर रहनेवाले लोगोंको जो गति प्राप्त होती है, वही गति तुम्हें भी मिले ।
संजय उवाच
असन्तस्तु न्यवर्तन्त वेदेभ्य इव नास्तिकाः ।
नरकं भजमानास्ते प्रत्यपद्यन्त किल्बिषम् ॥
जैसे नास्तिक पुरुष वेदोंसे (उनकी बतायी हुई विधियोंसे) दूर रहते हैं, उसी प्रकार जो अधम मनुष्य थे, वे ही अर्जुनके सामने जाकर भी लौट आये (पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए) । वे नरकमें पड़कर अपने पापका फल भोग रहे होंगे ।
संजय ने धृतराष्ट्र से कहा।
युधिष्ठिर उवाच
यो हि शैनेय मित्रार्थे युध्यमानस्त्यजेत् तनुम् ।
पृथिवीं च द्विजातिभ्यो यो दद्यात् स समो भवेत् ॥
शैनेय! जो मित्रके लिये युद्ध करते हुए शरीरका त्याग करता है तथा जो ब्राह्मणोंको समूची पृथ्वीका दान कर देता है, वे दोनों समान पुण्यके भागी होते हैं ।
युधिष्ठिर ने सात्यकि से कहा।
सोमदत्त उवाच
पराङ्मुखाय दीनाय न्यस्तशस्त्राय सात्यके ।
क्षत्रधर्मरतः प्राज्ञः कथं नु प्रहरेद् रणे ॥
सात्यके! जो युद्धसे विमुख एवं दीन होकर हथियार डाल चुका हो, उसपर रणभूमिमें क्षत्रियधर्मपरायण विद्वान् पुरुष कैसे प्रहार कर सकता है?
सोमदत्त ने सात्यकि से क्रोध में आकर यह कहा।
श्रीवासुदेव उवाच
ब्रह्मण्यः सत्यवादी च तपस्वी नियतव्रतः ।
रिपुष्वपि दयावांश्च तस्मात् कर्णो वृषः स्मृतः ॥
कर्ण ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, तपस्वी, नियम और व्रतका पालक तथा शत्रुओंपर भी दया करनेवाला है; इसीलिये उसे वृष (धर्मात्मा) कहा गया है ।
भीमसेन उवाच
अहिंसां सर्वभूतेषु धर्मं ज्यायस्तरं विदुः ।
तस्य च ब्राह्मणो मूलं भवांश्च ब्रह्मवित्तमः ॥
प्राणियोंकी हिंसा न करनेको ही सबसे श्रेष्ठ धर्म माना गया है । उसकी जड़ है ब्राह्मण और आप तो उन ब्राह्मणोंमें भी सबसे उत्तम ब्रह्मवेत्ता हैं ।
भीमसेन ने द्रोणाचार्य से युद्ध के अवसर पर कहा।
अर्जुन उवाच
उपचीर्णो गुरुर्मिथ्या भवता राज्यकारणात् ।
धर्मज्ञेन सता नाम सोऽधर्मः सुमहान् कृतः ॥
आपने धर्मज्ञ होते हुए भी राज्यके लोभसे झूठ बोलकर जो अपने गुरुको धोखा दिया, वह महान् पाप किया है ।
युधिष्ठिर उवाच
ब्राह्मणं वृद्धमाचार्यं न्यस्तशस्त्रं महामुनिम् ।
घातयित्वाद्य राज्यार्थे मृतं श्रेयो न जीवितम् ॥
एक तो वे ब्राह्मण, दूसरे वृद्ध और तीसरे अपने आचार्य थे । इसके सिवा उन्होंने हथियार नीचे डाल दिया था और महान् मुनिवृत्तिका आश्रय लेकर बैठे हुए थे । इस अवस्थामें राज्यके लिये उनकी हत्या कराकर मैं जीनेकी अपेक्षा मर जाना ही अच्छा समझता हूँ ।
युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा।
भीमसेन उवाच
क्षतत्राता क्षताज्जीवन् क्षन्ता स्त्रीष्वपि साधुषु ।
क्षत्रियः क्षितिमाप्नोति क्षिप्रं धर्मं यशः श्रियः ॥
परंतु जो क्षति (संकट)-से अपना तथा दूसरोंका त्राण करता है, युद्धमें शत्रुओंको क्षति पहुँचाना ही जिसकी जीविका है तथा जो स्त्रियों और साधु पुरुषोंपर क्षमाभाव रखता है, वही क्षत्रिय है और उसे ही शीघ्र इस पृथ्वीके राज्य, धर्म, यश और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती ।
भीमसेन ने कुन्तीकुमार अर्जुन को फटकारते हुए कहा।
धृष्टद्युम्न → अर्जुन
विधर्मिणं धर्मविद्भिः प्रोक्तं तेषां विषोपमम् ।
जानन् धर्मार्थतत्त्वज्ञ किं मामर्जुन गर्हसे ॥
धर्म और अर्थका तत्त्व जाननेवाले अर्जुन! जो अपना धर्म छोड़कर परधर्म ग्रहण कर लेता है, उस विधर्मीको धर्मज्ञ पुरुषोंने धर्मात्माओंके लिये विषके तुल्य बताया है । यह सब जानते हुए भी तुम मेरी निन्दा क्यों करते हो?
धृष्टद्युम्न ने अर्जुन से कहा।
शल्य उवाच
कृषिश्च पाशुपाल्यं च विशां दानं च धर्मतः ।
ब्रह्मक्षत्रविशां शूद्रा विहिताः परिचारकाः ॥
कृषि, पशुपालन और धर्मानुसार दान देना वैश्योंका कर्म है तथा शूद्रलोग ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी सेवाके काममें नियुक्त किये गये हैं ।
ब्राह्मण उवाच
अनृतोक्तं प्रजां हन्यात् ततः पापमवाप्नुयाम् ।
तस्माद् धर्माभिरक्षार्थं नानृतं वक्तुमुत्सहे ॥
असत्य भाषण प्रजाका नाश कर देता है, अतः मैं झूठ बोलनेसे पापका भागी होऊँगा; इसीलिये धर्मकी रक्षाके उद्देश्यसे मैं मिथ्या भाषण नहीं कर सकता ।
ब्राह्मण ने कर्ण से कहा।
शल्य उवाच
सर्वत्र सन्ति राजानः स्वं स्वं धर्ममनुव्रताः ।
दुर्मनुष्यान् निगृह्णन्ति सन्ति सर्वत्र धार्मिकाः ॥
सभी देशोंमें अपने-अपने धर्मका पालन करनेवाले राजा रहते हैं, जो दुष्टोंका दमन करते हैं तथा सर्वत्र ही धर्मात्मा मनुष्य निवास करते हैं ।
श्रीकृष्ण उवाच
भवेत् सत्यमवक्तव्यं न वक्तव्यमनुष्ठितम् ।
सत्यानृते विनिश्चित्य ततो भवति धर्मवित् ॥
केवल अनुष्ठानमें लाया गया असत्यरूप सत्य बोलनेयोग्य नहीं होता, अतः वैसा सत्य न बोले । पहले सत्य और असत्यका अच्छी तरह निर्णय करके जो परिणाममें सत्य हो उसका पालन करे । जो ऐसा करता है, वही धर्मका ज्ञाता है ।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा।
वासुदेव उवाच
धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः ।
यत् स्याद् धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः ॥
धर्म ही प्रजाको धारण करता है और धारण करनेके कारण ही उसे धर्म कहते हैं । इसलिये जो धारण — प्राण-रक्षासे युक्त हो-जिसमें किसी भी जीवकी हिंसा न की जाती हो, वही धर्म है । ऐसा ही धर्म-शास्त्रोंका सिद्धान्त है ।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा।
ततोऽर्जुनो महाराज लज्जया वै समन्वितः ।
धर्मराजस्य चरणौ प्रपद्य शिरसा नतः ॥
उवाच भरतश्रेष्ठं प्रसीदेति पुनः पुनः ।
क्षमस्व राजन् यत्र प्रोक्तं धर्मकामेन भीरुणा ॥
‘महाराज! तब अर्जुन लज्जित हो धर्मराजके चरणोंमें गिरकर मस्तक नवाकर उन भरतश्रेष्ठ नरेशसे बारंबार बोले—’ राजन्! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये । मैंने धर्मपालनकी इच्छासे भयभीत होकर जो अनुचित वचन कहा है, उसके लिये क्षमा कीजिये ।
अर्जुन ने युधिष्ठिर के चरणों में गिरकर मस्तक नवाते हुए उनसे क्षमा माङ्गी।
संजय उवाच
महात्मा फाल्गुनश्चापि सत्यधर्मरतः सदा ।
विजयस्तस्य नियतं जायते नात्र संशयः ॥
महात्मा अर्जुन सदा सत्य और धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं; अतः उनकी विजय अवश्य होगी, इसमें संशय नहीं है ।
कर्ण उवाच
धर्मप्रधानं किल पाति धर्म ।
इत्यब्रुवन् धर्मविदः सदैव ।
वयं च धर्मे प्रयताम नित्यं ।
चर्तुं यथाशक्ति यथाश्रुतं च ।
स चापि निघ्नाति न पाति भक्तान् ।
मन्ये न नित्यं परिपाति धर्मः ॥
‘धर्मज्ञ पुरुषोंने सदा ही यह बात कही है कि’ धर्मपरायण पुरुषकी धर्म सदा रक्षा करता है । हम अपनी शक्ति और ज्ञानके अनुसार सदा धर्मपालनके लिये प्रयत्न करते रहते हैं, किंतु वह भी हमें मारता ही है, भक्तोंकी रक्षा नहीं करता; अतः मैं समझता हूँ, धर्म सदा किसीकी रक्षा नहीं करता है ।
कर्ण ने अर्जुन के बाणों की मार से विचलित होकर धर्म की निन्दा की।
दुर्योधन उवाच
पितामहैराचरितं न धर्मं हातुमर्हथ ।
नान्यत् कर्मास्ति पापीयः क्षत्रियस्य पलायनात् ॥
इसलिये अपने बाप-दादोंके द्वारा आचरणमें लाये हुए धर्मका परित्याग न करो । क्षत्रियके लिये युद्ध छोड़कर भागनेसे बढ़कर दूसरा कोई अत्यन्त पापपूर्ण कर्म नहीं है ।
राजा दुर्योधन ने अपने महारथी क्षत्रियों से युद्ध में भागने के बजाय डटे रहने की बात कही।
कृप उवाच
न युद्धधर्माच्छ्रेयान् वै पन्था राजेन्द्र विद्यते ।
यं समाश्रित्य युध्यन्ते क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ॥
राजेन्द्र! क्षत्रियशिरोमणे! युद्धधर्मसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है, जिसका आश्रय लेकर क्षत्रिय लोग युद्धमें तत्पर रहते हैं ।
कृपाचार्य ने दुर्योधन से कहा।
कृप उवाच
वधे चैव परो धर्मस्तथाधर्मः पलायने ।
ते स्म घोरां समापन्ना जीविकां जीवितार्थिनः ॥
युद्धमें शत्रुको मारना या उसके हाथसे मारा जाना दोनों ही उत्तम धर्म है और युद्धसे भागनेपर महान् पाप होता है । सभी क्षत्रिय जीवन-निर्वाहकी इच्छा रखते हुए उसी घोर जीविकाका आश्रय लेते हैं ।
कृपाचार्य ने दुर्योधन से कहा।
संजय उवाच
श्रेयो नो भीमसेनस्य क्रुद्धस्याभिमुखे स्थितम् ।
सुखः सांग्रामिको मृत्युः क्षत्रधर्मेण युध्यताम् ॥
अतः क्रोधमें भरे हुए भीमसेनके सामने डटे रहना ही हमारे लिये कल्याणकारी होगा । क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करनेवाले वीर पुरुषोंके लिये संग्राममें होनेवाली मृत्यु ही सुखद है ।
संजय उवाच
मर्त्येनावश्यमर्तव्यं गृहेष्वपि कदाचन ।
युध्यतः क्षत्रधर्मेण मृत्युरेष सनातनः ॥
मरणधर्मा मनुष्यको कभी-न-कभी अवश्य मरना पड़ेगा । घरमें भी उससे छुटकारा नहीं है । अतः क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध करते हुए ही जो मृत्यु होती है, यही क्षत्रियके लिये सनातन मृत्यु है ।
एक क्षत्रिय ने अन्य एकत्रित हुए क्षत्रियों को सम्बोधित करते हुए कहा।
युधिष्ठिर उवाच
सर्वो विमृशते जन्तुः कृच्छ्रस्थो धर्मदर्शनम् ।
पदस्थः पिहितं द्वारं परलोकस्य पश्यति ॥
प्रायः सभी प्राणी जब स्वयं संकटमें पड़ जाते हैं तो अपनी रक्षाके लिये धर्मशास्त्रकी दुहाई देने लगते हैं और जब अपने उच्च पदपर प्रतिष्ठित होते हैं, उस समय उन्हें परलोकका दरवाजा बंद दिखायी देता है ।
युधिष्ठिर ने दुर्योधन से कहा।
वैशम्पायन उवाच
धर्मनित्यः शुचिर्दान्तो न्यस्तदण्डो महातपाः ।
कर्मणा मनसा वाचा समः सर्वेषु जन्तुषु ॥
वे सदा धर्मपरायण, पवित्र, जितेन्द्रिय, किसीको भी दण्ड न देनेवाले, महातपस्वी तथा मन, वाणी और क्रियाद्वारा सभी जीवोंके प्रति समानभाव रखनेवाले थे ।
वैशम्पायनजी जनमेजय को बताते हुए कहते हैं कि प्राचीन काल में उस तीर्थ में तपस्या के धनी धर्मात्मा असित देव मुनि निवास करते थे।
संजय उवाच
गोब्राह्मणनृपस्त्रीषु सख्युर्मातुर्गुरोस्तथा ।
प्राणजडान्धेषु सुप्तभीतोत्थितेषु च ।
मत्तोन्मत्तप्रमत्तेषु न शस्त्राणि च पातयेत् ॥
गौ, ब्राह्मण, राजा, स्त्री, मित्र, माता, गुरु, दुर्बल, जड, अन्धे, सोये हुए, ड हुए, मतवाले, उन्मत्त और असावधान पुरुषोंपर मनुष्य शस्त्र न चलाये ।
विदुर उवाच
तस्मान्मैत्रं समास्थाय शीलमापद्य भारत ।
दमस्त्यागोऽप्रमादश्च ते त्रयो ब्रह्मणो हयाः ॥
शीलरश्मिसमायुक्तः स्थितो यो मानसे रथे ।
त्यक्त्वा मृत्युभयं राजन् ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥
भरतनन्दन! इसलिये सर्वत्र मैत्रीभाव रखते हुए शील प्राप्त करना चाहिये । दम, त्याग और अप्रमाद — ये तीन परमात्माके धाममें ले जानेवाले घोड़े हैं । जो मनुष्य शीलरूपी लगामको पकड़कर इन तीनों घोड़ोंसे जुते हुए मनरूपी रथपर सवार होता है, वह मृत्युका भय छोड़कर ब्रह्मलोकमें चला जाता है ।
व्यास उवाच
क्षमाशीला पुरा भूत्वा साद्य न क्षमसे कथम् ।
अधर्मं जहि धर्मज्ञे यतो धर्मस्ततो जयः ॥
धर्मज्ञे! तुम तो पहले बड़ी क्षमाशील थी । अब क्यों नहीं क्षमा करती हो? अधर्म छोड़ो, क्योंकि जहाँ धर्म है, वहीं विजय है ।
व्यासजी ने गान्धारी से कहा।