श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २

साधना–योग

अभ्यास, संयम और मन का निग्रह

20 पद्य

महाभारत — खण्ड २

धर्म के आठ मार्ग

शौनक उवाच

इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः ।

अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥

यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, मन और इन्द्रियोंका संयम तथा लोभका परित्याग — ये धर्मके आठ मार्ग हैं ।

शौनकजी ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 75 महाभारत — खण्ड २ पृ. 47 धर्म–आचरण
परम कल्याण के मार्ग

शौनक उवाच

सम्यक्संकल्पसंबन्धात् सम्यक् चेन्द्रियनिग्रहात् ।

सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक् च गुरुसेवनात् ॥

सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक् चाध्ययनागमात् ।

सम्यक्कर्मोपसंन्यासात् सम्यक् चित्तनिरोधनात् ॥

पूर्णतया संकल्पोंको एक ध्येयमें लगा देनेसे, इन्द्रियोंको भली प्रकार वशमें कर लेनेसे, अहिंसादि व्रतोंका अच्छी प्रकार पालन करनेसे, भली प्रकार गुरुकी सेवा करनेसे, यथायोग्य योगसाधनोपयोगी आहार करनेसे, वेदादिका भली प्रकार अध्ययन करनेसे, कर्मोंको भलीभाँति भगवत्समर्पण करनेसे और चित्तका भली प्रकार निरोध करनेसे मनुष्य परम कल्याणको प्राप्त होता है ।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 78–79 महाभारत — खण्ड २ पृ. 48 गुरु महिमा ज्ञान–विवेक
तीर्थफल की पात्रता

पुलस्त्य उवाच

प्रतिग्रहादपावृत्तः संतुष्टो येन केनचित् ।

अहंकारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥

जो प्रतिग्रहसे दूर रहे तथा जो कुछ अपने पास हो, उसीसे संतुष्ट रहे और जिसमें अहंकारका अभाव हो, वही तीर्थका फल पाता है ।

पुलस्त्यजी ने तीर्थ-सेवन का फल बताते हुए कहा।

वनपर्व, अध्याय 82, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड २ पृ. 568 वैराग्य
तीर्थाटन का पात्रता

पुलस्त्य उवाच

यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम् ।

विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥

जिसके हाथ, पैर और मन अपने काबूमें हों तथा जो विद्या, तप और कीर्तिसे सम्पन्न हो, वही तीर्थसेवनका फल पाता है ।

पुलस्त्यजी ने तीर्थ-सेवन का फल बताते हुए कहा।

वनपर्व, अध्याय 82, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड २ पृ. 568 नीति–व्यवहार

पुलस्त्य उवाच

मनसा तानि गच्छेत सर्वतीर्थसमीक्षया ।

एतानि वसुभिः साध्यैरादित्यैर्मरुदश्विभिः ।

ऋषिभिर्देवकल्पैश्च स्नातानि सुकृतैषिभिः ।

एवं त्वमपि कौरव्य विधिनानेन सुव्रत ।

व्रज तीर्थानि नियतः पुण्यं पुण्येन वर्धयन् ।

भावितैः करणैः पूर्वमास्तिक्याच्छ्रुतिदर्शनात् ।

प्राप्यन्ते तानि तीर्थानि सद्भिः शास्त्रानुदर्शिभिः ।

नाव्रती नाकृतात्मा च नाशुचिर्न च तस्करः ।

स्नाति तीर्थेषु कौरव्य न च वक्रमतिर्नरः ।

त्वया तु सम्यग्वृत्तेन नित्यं धर्मार्थदर्शिना ।

पिता पितामहश्चैव सर्वे च प्रपितामहाः ।

पितामहपुरोगाश्च देवाः सर्षिगणा नृप ।

तव धर्मेण धर्मज्ञ नित्यमेवाभितोषिताः ।

अवाप्स्यसि त्वं लोकान् वै वसूनां वासवोपम ।

कीर्तिं च महतीं भीष्म प्राप्स्यसे भुवि शाश्वतीम् ॥

सम्पूर्ण तीर्थोंके दर्शनकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मनुष्य जहाँ जाना सम्भव न हो उन अगम्य तीर्थोंमें मनसे यात्रा करे, अर्थात् मनसे उन तीर्थोंका चिन्तन करे । वसुगण, साध्यगण, आदित्यगण, मरुद्गण, दोनों अश्विनीकुमार तथा देवोपम महर्षियोंने भी पुण्य लाभकी इच्छासे उन तीर्थोंमें स्नान किया है । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुरुनन्दन! इसी प्रकार तुम भी विधिपूर्वक शौच-संतोषादि नियमोंका पालन करते और पुण्यसे पुण्यको बढ़ाते हुए उन तीर्थोंकी यात्रा करो । आस्तिकता और वेदोंके अनुशीलनसे पहले अपने इन्द्रियोंको पवित्र करके शास्त्रज्ञ साधु पुरुष ही उन तीर्थोंको प्राप्त करते हैं । कुरुनन्दन! जो ब्रह्मचर्य आदि व्रतोंका पालन नहीं करता, जिसने अपने चित्तको वशमें नहीं किया, जो अपवित्र आचार-विचारवाला और चोर है, जिसकी बुद्धि वक्र है, ऐसा मनुष्य श्रद्धा न होनेके कारण तीर्थोंमें स्नान नहीं करता । तुम धर्म और अर्थके ज्ञाता तथा नित्य सदाचारमें तत्पर रहनेवाले हो । धर्मज्ञ! तुमने पिता-पितामह प्रपितामह, ब्रह्मा आदि देवता तथा महर्षिगण इन सबको सदा स्वधर्मपालनसे संतुष्ट किया है, अतः इन्द्रके समान तेजस्वी नरेश! तुम वसुओंके लोकमें जाओगे । भीष्म! तुम्हें इस पृथ्वीपर विशाल एवं अक्षय कीर्ति प्राप्त होगी ।

वनपर्व, अध्याय 85, श्लोक 105–111 महाभारत — खण्ड २ पृ. 643 धर्म–आचरण
ज्ञान प्राप्ति के मार्ग

देवगण उवाच

मैवं कृथा यवक्रीत यथा वदसि वै मुने ।

ऋते गुरुमधीता हि सुखं वेदास्त्वया पुरा ॥

अनेन तु गुरून् दुःखात् तोषयित्वाऽऽत्मकर्मणा ।

कालेन महता क्लेशाद् ब्रह्माधिगतमुत्तमम् ॥

देवताओंने कहा — मुनि यवक्रीत! तुम जैसी बात कहते हो, वैसा न समझो । तुमने पूर्वकालमें बिना गुरुके ही सुखपूर्वक सब वेद पढ़े हैं और इन रैभ्यमुनिने बड़े क्लेश उठाकर अपने व्यवहारसे गुरुजनोंको संतुष्ट करके दीर्घकालतक कष्टसहनपूर्वक उत्तम वेदोंका ज्ञान प्राप्त किया है ।

देवताओं ने यवक्रीत से कहा।

वनपर्व, अध्याय 138, श्लोक 25–26 महाभारत — खण्ड २ पृ. 945 गुरु महिमा ज्ञान–विवेक
इन्द्रिय संयम का महत्व

युधिष्ठिर उवाच

मक्षिकादंशमशकान् सिंहान् व्याघ्रान् सरीसृपान् ।

प्राप्नोत्यनियतः पार्थ नियतस्तान् न पश्यति ॥

भीमसेन! जो अपने मन और इन्द्रियोंपर संयम नहीं रखता, ऐसे मनुष्यको वहाँ जानेपर मक्खी, डाँस, मच्छर, सिंह, व्याघ्र और सर्पोंका सामना करना पड़ता है, परंतु जो संयम-नियमसे रहनेवाला है, उसे उन जन्तुओंका दर्शनतक नहीं होता ।

युधिष्ठिर ने भीमसेन से कहा।

वनपर्व, अध्याय 141, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड २ पृ. 959 ज्ञान–विवेक

मार्कण्डेय उवाच

मनुष्यास्तप्ततपसः सर्वागमपरायणाः ।

स्थिरव्रताः सत्यपरा गुरुशुश्रूषणे रताः ॥

सुशीलाः शुक्लजातीयाः क्षान्ता दान्ताः सुतेजसः ।

शुचियोन्यन्तरगताः प्रायशः शुभलक्षणाः ॥

ज्ञानी मनुष्य तपस्वी, सम्पूर्ण शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर, स्थिरतापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, सत्यपरायण, गुरुसेवामें संलग्न, सुशील, शुक्ताजातीय (सात्त्विक), क्षमाशील, जितेन्द्रिय और अत्यन्त तेजस्वी होते हैं । वे शुद्ध योनिमें जन्म लेते और प्रायः शुभ लक्षणोंसे सुशोभित होते हैं ।

वनपर्व, अध्याय 183, श्लोक 81–82 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1250
स्वाध्याय का फल

सरस्वती → मुने

यो ब्रह्म जानाति यथाप्रदेशं ।

स्वाध्यायनित्यः शुचिरप्रमत्तः ।

सवै पारं देवलोकस्य गन्ता ।

सहामरैः प्राप्नुयात् प्रीतियोगम् ॥

सरस्वती बोली — मुने! जो प्रमाद छोड़कर पवित्र भावसे नित्य स्वाध्याय करता है और अर्चि आदि मार्गोंसे प्राप्त होनेयोग्य सगुण ब्रह्मको जान लेता है, वह देवलोकसे उठकर ब्रह्मलोकमें जाता है और देवताओंके साथ प्रेमसम्बन्ध स्थापित कर लेता है ।

सरस्वतीदेवी ने ब्रह्मर्षि तार्क्ष्य को उनके प्रेमपूर्वक पूछने पर यह हितकर वचन कहा।

वनपर्व, अध्याय 186, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1265 ज्ञान–विवेक
सत्कर्मों का प्रभाव

सरस्वती उवाच

यः सप्त वर्षाणि जुहोति तार्क्ष्य ।

हव्यं त्वग्नौ नियतः साधुशीलः ।

सप्तावरान् सप्त पूर्वान् पुनाति ।

पितामहानात्मना कर्मभिः स्वैः ॥

तार्क्ष्य! जो सदाचारी पुरुष संयम-नियमका पालन करते हुए सात वर्षोंतक अग्निमें आहुति देता है, वह अपने सत्कर्मोंद्वारा अपने साथ ही सात पीढ़ीतककी भावी संतानोंको और सात पीढ़ी पूर्वतकके पितामहोंको भी पवित्र कर देता है ।

सरस्वती ने तार्क्ष्य मुनि से कहा।

वनपर्व, अध्याय 186, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1267 धर्म–आचरण
यतियों का उपासना

बालमुकुन्द उवाच

यतयः शान्तिपरमा यतात्मानो बुभुत्सवः ।

कामक्रोधद्वेषमुक्ता निःसंगा वीतकल्मषाः ॥

सत्त्वस्था निरहङ्कारा नित्यमध्यात्मकोविदाः ।

मामेव सततं विप्राश्चिन्तयन्त उपासते ॥

शान्तिपरायण, संयमी, जिज्ञासु, काम-क्रोध-द्वेषरहित आसक्तिशून्य, निष्पाप, सात्त्विक, नित्य अहंकारशून्य तथा अध्यात्मज्ञानकुशल यति एवं ब्राह्मण सदा मेरा ही चिन्तन करते हुए उपासना करते हैं ।

बालमुकुन्द भगवान् ने मार्कण्डेय मुनि से कहा।

वनपर्व, अध्याय 189, श्लोक 15–16 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1303 भक्ति
योगसेवित मार्ग की पात्रता

बालमुकुन्द उवाच

प्राप्तुं न शक्यो यो विद्वन् नरैर्दुष्कृतकर्मभिः ।

लोभाभिभूतैः कृपणैरनार्यैरकृतात्मभिः ॥

तं मां महाफलं विद्धि नराणां भावितात्मनाम् ।

सुदुष्प्रापं विमूढानां मार्गं योगैर्निषेवितम् ॥

विद्वन्! पापकर्मा, लोभी, कृपण, अनार्य और अजितात्मा मनुष्य जिसे कभी नहीं पा सकते वह महान् फल मुझे ही समझो । मैं ही शुद्ध अन्तःकरणवाले मानवोंको सुलभ होनेवाला योगसेवित मार्ग हूँ । मूढ़ मनुष्योंके लिये मैं सर्वथा दुर्लभ हूँ ।

वनपर्व, अध्याय 189, श्लोक 25–26 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1305 ज्ञान–विवेक
धर्म और भक्ति का अभ्यास

यदि मे भगवन् प्रीतः पुण्डरीकनिभेक्षण ।

धर्मे सत्ये दमे चैव बुद्धिर्भवतु मे सदा ।

अभ्यासश्च भवेद् भक्त्या त्वयि नित्यं ममेश्वर ॥

‘भगवन्! कमलनयन! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मेरी बुद्धि सदा धर्म, सत्य और इन्द्रियनिग्रहमें लगी रहे। मेरे स्वामी! आपके भजनका मेरा अभ्यास सदा बना रहे’

भगवान् विष्णु के वर माँगने का आग्रह करने पर उत्तङ्क ने हाथ जोड़कर यह वर माँगा।

वनपर्व, अध्याय 201, श्लोक 28–29 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1399 भक्ति

व्याध उवाच

तपोमूलमिदं सर्वं यन्मां विप्रानुपृच्छसि ।

इन्द्रियाण्येव संयम्य तपो भवति नान्यथा ॥

विप्रवर! आप मुझसे जो कुछ पूछते हैं, उसके उत्तरमें मैं यह बता रहा हूँ कि इस सबका मूल तप है । इन्द्रियोंका संयम करनेसे ही वह तपस्या सम्पन्न होती है, और किसी प्रकारसे नहीं ।

वनपर्व, अध्याय 211, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1470

व्याध उवाच

येषु विप्रतिपद्यन्ते षट्सु मोहात् फलागमम् ।

तेष्वध्यवसिताध्यायी विन्दते ध्यानजं फलम् ॥

सभी मनुष्य इन छः इन्द्रियोंके शब्द आदि विषयोंमें उनसे प्राप्त होनेवाले सुखरूप फल पानेके सम्बन्धमें मोहसे संशयमें पड़ जाते हैं। परंतु जो उनके दोषोंका अनुसंधान करनेवाला वीतराग पुरुष है, वह उनका निग्रह करके ध्यानजनित आनन्दका अनुभव करता है ।

वनपर्व, अध्याय 211, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1471 ज्ञान–विवेक
पुण्यात्मा पुरुषों के सद्गुण

व्यास उवाच

सत्यमार्जवमक्रोधः संविभागो दमः शमः ।

अनसूयाविहिंसा च शौचमिन्द्रियसंयमः ।

पावनानि महाराज नराणां पुण्यकर्मणाम् ॥

महाराज! सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, देवता और अतिथियोंको देकर अन्न आदि ग्रहण करना, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, दूसरोंके दोष न देखना, हिंसा न करना, बाहर-भीतरकी पवित्रता रखना तथा सम्पूर्ण इन्द्रियोंको काबूमें रखना — ये पुण्यात्मा पुरुषोंके सद्गुण सबको पवित्र करनेवाले हैं ।

वनपर्व, अध्याय 259, श्लोक 17–18 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1735 धर्म–आचरण

न त्वामेवंविधो भावः स्प्रष्टुमर्हति मानद ।

आत्मवन्तमिव व्याधिः पुरुषं वृद्धशीलिनम् ॥

‘मानद! मनपर काबू रखनेवाले तथा वृद्धोंके समान संयम-नियमसे रहनेवाले पुरुषको जैसे कोई रोग नहीं छू सकता, उसी प्रकार आपको ऐसे दैन्यभावका स्पर्श होना उचित नहीं जान पड़ता है’

वनपर्व, अध्याय 280, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1870 नीति–व्यवहार

युधिष्ठिर उवाच

तपः स्वधर्मवर्तित्वं मनसो दमनं दमः ।

क्षमा द्वन्द्वसहिष्णुत्वं हीरकार्यनिवर्तनम् ॥

युधिष्ठिर बोले — अपने धर्ममें तत्पर रहना तप है, मनके दमनका ही नाम दम है, सर्दी-गरमी आदि द्वन्द्वोंको सहन करना क्षमा है तथा न करने योग्य कामसे दूर रहना लज्जा है ।

वनपर्व, अध्याय 313, श्लोक 88 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2100 धर्म–आचरण

यक्ष उवाच

यशः सत्यं दमः शौचमार्जवं ह्रीरचापलम् ।

दानं तपो ब्रह्मचर्यमित्येतास्तनवो मम ॥

यश, सत्य, दम, शौच, सरलता, लज्जा, अचंचलता, दान, तप और ब्रह्मचर्य — ये सब मेरे शरीर हैं ।

वनपर्व, अध्याय 314, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2110 धर्म–आचरण
दोषों पर विजय

यक्ष उवाच

दिष्ट्या पञ्चसु रक्तोऽसि दिष्ट्या ते षट्पदी जिता ।

द्वे पूर्वे मध्यमे द्वे च द्वे चान्ते साम्परायिके ॥

सौभाग्यवश तुम्हारा शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान — इन पाँचों साधनोंपर अनुराग है तथा सौभाग्यसे तुमने भूख-प्यास, शोक-मोह और जरा-मृत्यु — इन छहों दोषोंको जीत लिया है । इनमेंसे पहले दो दोष आरम्भसे ही रहते हैं, बीचके दो तरुणावस्था आनेपर होते हैं तथा बादवाले दो दोष अन्तिम समयपर आते हैं ।

धर्म ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 314, श्लोक 9 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2110 काल–मृत्यु