श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

कर्म–प्रारब्ध

कर्म और उसका फल

16 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

विवश कर्म का फल

राजा उवाच

अवशेनापि यत्कर्म कृतं तु सुमहत्फलम् ।

ददाति शृणु विप्रेन्द्र रामायणप्रसादतः ॥

विप्रवर! सुनिये, विवश होकर भी जो कर्म किया जाता है, वह रामायणके प्रसादसे परम महान् फल प्रदान करता है ।

राजा सुमति ने विभाण्डक मुनि से कहा।

उत्तरखण्ड, अध्याय 3, श्लोक 58 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 55
दैव की प्रबलता

दैवेनाक्रम्यते सर्वं दैवं हि परमा गतिः ।

तस्य मे परमार्तस्य प्रसादमभिकांक्षतः ।

कर्तुमर्हसि भद्रं ते दैवोपहतकर्मणः ॥

दैव सबपर आक्रमण करता है । दैव ही सबकी परमगति है । मुने! मैं अत्यन्त आर्त होकर आपकी कृपा चाहता हूँ । दैवने मेरे पुरुषार्थको दबा दिया है । आपका भला हो । आप मुझपर अवश्य कृपा करें ।

बालकाण्ड, अध्याय 58, श्लोक 23 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 193 ज्ञान–विवेक
सत्पुरुषों का चित्त

कामं खलु सतां वृत्ते भ्राता ते भरतः स्थितः ।

ज्येष्ठानुवर्ती धर्मात्मा सानुक्रोशो जितेन्द्रियः ॥

किं नु चित्तं मनुष्याणामनित्यमिति मे मतम् ।

सतां च धर्मनित्यानां कृतशोभि च राघव ॥

‘इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे भाई भरत सत्पुरुषोंके आचार-व्यवहारमें स्थित हैं, अपने बड़े भाईका अनुसरण करनेवाले, धर्मात्मा, दयालु और जितेन्द्रिय हैं तथापि मनुष्योंका चित्त प्रायः स्थिर नहीं रहता — ऐसा मेरा मत है । रघुनन्दन! धर्मपरायण सत्पुरुषोंका मन भी विभिन्न कारणोंसे राग-द्वेषादिसे संयुक्त हो जाता है’

राजा दशरथ ने श्रीराम से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 4, श्लोक 26–27 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 247 ज्ञान–विवेक
दैव का विधान

सुखदुःखे भयक्रोधौ लाभालाभौ भवाभवौ ।

यस्य किंचित् तथाभूतं ननु दैवस्य कर्म तत् ॥

सुख-दुःख, भय-क्रोध (क्षोभ), लाभ-हानि, उत्पत्ति और विनाश तथा इस प्रकारके और भी जितने परिणाम प्राप्त होते हैं, जिनका कोई कारण समझमें नहीं आता, वे सब दैवके ही कर्म हैं ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 22, श्लोक 22 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 310
धर्मनिष्ठ आत्मसंयम

प्रतीक्षमाणोऽभिजनं तदार्तमनार्तरूपः प्रहसन्निवाथ ।

जगाम रामः पितरं दिदृक्षुः ।

पितुर्निदेशं विधिवच्चिकीर्षुः ॥

पूर्वजोंकी निवासभूमि अवधके मनुष्य वहाँ शोकसे आतुर होकर खड़े थे । उन्हें देखकर भी श्रीराम स्वयं शोकसे पीड़ित नहीं हुए-उनके शरीरपर व्यथाका कोई चिह्न प्रकट नहीं हुआ । वे पिताकी आज्ञाका विधिपूर्वक पालन करनेकी इच्छासे उनका दर्शन करनेके लिये हँसते हुए-से आगे बढ़े ।

श्रीरामचन्द्रजी ने माता कैकेयी के भवन में प्रवेश करके देखा कि सुमन्त्र और अवध के मनुष्य शोक से आतुर खड़े हैं।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 33, श्लोक 29 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 342 धर्म–आचरण
धर्म का त्याग

ये च त्वामनुजीवन्ति नाहं तेषां न ते मम ।

केवलार्थपरां हि त्वां त्यक्तधर्मां त्यजाम्यहम् ॥

जो तेरा आश्रय लेकर जीवन निर्वाह करते हैं, मैं उनका स्वामी नहीं हूँ और वे मेरे परिजन नहीं हैं । तूने केवल धनमें आसक्त होकर धर्मका त्याग किया है, इसलिये मैं तेरा परित्याग करता हूँ ।

राजा दशरथ ने कैकेयी से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 42, श्लोक 7 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 366 वैराग्य
कर्म के फल का विचार

अविज्ञाय फलं यो हि कर्म त्वेवानुधावति ।

स शोचेत् फलवेलायां यथा किंशुकसेचकः ॥

जो क्रियमाण कर्मके फलका ज्ञान या विचार न करके केवल कर्मकी ओर ही दौड़ता है, उसे उसका फल मिलनेके समय उसी तरह शोक होता है, जैसा कि आम काटकर पलाश सींचनेवालेको हुआ करता है ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 63, श्लोक 9 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 422
लोकविरुद्ध कर्म का परिणाम

गजाश्वरथसम्बाधे बले महति तिष्ठता ।

कृतं ते दारुणं कर्म सर्वलोकजुगुप्सितम् ॥

उद्वेजनीयो भूतानां नृशंसः पापकर्मकृत् ।

त्रयाणामपि लोकानामीश्वरोऽपि न तिष्ठति ॥

कर्म लोकविरुद्धं तु कुर्वाणं क्षणदाचर ।

तीक्ष्णं सर्वजनो हन्ति सर्पं दुष्टमिवागतम् ॥

निशाचर! हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई विशाल सेनाके बीचमें खड़े रहकर (असंख्य राक्षसोंके स्वामित्वका अभिमान लेकर) तूने सदा जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, उसकी समस्त लोकोंद्वारा निन्दा हुई है । जो समस्त प्राणियोंको उद्वेगमें डालनेवाला, क्रूर और पापाचारी है, वह तीनों लोकोंका ईश्वर हो तो भी अधिक कालतक टिक नहीं सकता । जो लोकविरोधी कठोर कर्म करनेवाला है, उसे सब लोग सामने आये हुए दुष्ट सर्पकी भाँति मारते हैं ।

श्रीराम ने खर से कहा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 29, श्लोक 2–4 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 632
मृत्युबोध और हठ

निवार्यमाणस्तु मया हितैषिणा ।

न मृष्यसे वाक्यमिदं निशाचर ।

परेतकल्पा हि गतायुषो नरा ।

हितं न गृह्णन्ति सुहृद्धिरीरितम् ॥

‘निशाचर! मैं तुम्हारा हितैषी हूँ, इसीलिये तुम्हें पापकर्मसे रोक रहा हूँ; किंतु तुम्हें मेरी बात सहन नहीं मरणासन्न पुरुष अपने सुहृदोंकी कही हुई हितकर बातें होती है । सच है जिनकी आयु समाप्त हो जाती है, वे । नहीं स्वीकार करते हैं’

मारीच ने रावण से कहा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 41, श्लोक 20 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 661 नीति–व्यवहार
कर्म का परिणाम

अनुबन्धमजानन्तः कर्मणामविचक्षणाः ।

शीघ्रमेव विनश्यन्ति यथा त्वं विनशिष्यसि ॥

अपने कर्मोंका परिणाम न जाननेवाले अज्ञानीजन जैसे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार तुम भी विनाशके गर्तमें गिरोगे ।

जटायु ने रावण को रोककर यह कहा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 51, श्लोक 26 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 688
विनाशकारी अधर्म कर्म

परेतकाले पुरुषो यत् कर्म प्रतिपद्यते ।

विनाशायात्मनोऽधर्म्यं प्रतिपन्नोऽसि कर्म तत् ॥

विनाशके समय पुरुष जैसा कर्म करता है, तुमने भी अपने विनाशके लिये वैसे ही अधर्मपूर्ण कर्मको अपनाया है ।

जटायु ने रावण से कहा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 51, श्लोक 31 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 689
कर्म और फल का सम्बन्ध

अदृष्टगुणदोषाणामध्रुवाणां तु कर्मणाम् ।

नान्तरेण क्रियां तेषां फलमिष्टं च वर्तते ॥

जिनके गुण-दोष देखे या जाने नहीं गये हैं तथा जो अध्रुव हैं-फल देकर नष्ट हो जानेवाले हैं, ऐसे कर्मोंका शुभाशुभ फल उन्हें आचरणमें लाये बिना नहीं प्राप्त होता है ।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 66, श्लोक 17 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 727
होनहार अटल है

भवितव्यं हि तच्चापि न तच्छक्यमिहान्यथा ।

कर्तुमिक्ष्वाकुशार्दूल कालो हि दुरतिक्रमः ॥

इक्ष्वाकुवंशी वीरोंमें श्रेष्ठ श्रीराम! जो होनहार है, उसे कोई भी पलट नहीं सकता । कालका विधान सभीके लिये दुर्लङ्घ्य होता है (अतः आपपर जो कुछ भी बीत रहा है, इसे काल या प्रारब्धका विधान समझकर आपको धैर्य धारण करना चाहिये)

कबन्ध ने श्रीराम से कहा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 72, श्लोक 16 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 742
कर्मफल का सिद्धान्त

गुणदोषकृतं जन्तुः स्वकर्म फलहेतुकम् ।

अव्यग्रस्तदवाप्नोति सर्वं प्रेत्य शुभाशुभम् ॥

देवि! जीवके द्वारा गुणबुद्धिसे अथवा दोषबुद्धिसे किये हुए जो अपने कर्म हैं, वे ही सुख-दुःखरूप फलकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं । परलोकमें जाकर प्रत्येक जीव शान्तभावसे रहकर अपने शुभ और अशुभ-सभी कर्मोंका फल भोगता है ।

हनुमान्जी ने तारा से कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 21, श्लोक 2 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 816
नियति की प्रधानता

नियतिः कारणं लोके नियतिः कर्मसाधनम् ।

नियतिः सर्वभूतानां नियोगेष्विह कारणम् ॥

जगत्में नियति (काल) ही सबका कारण है । वही समस्त कर्मोंका साधन है और काल ही समस्त प्राणियोंको विभिन्न कर्मोंमें नियुक्त करनेका कारण है (क्योंकि वही सबका प्रवर्तक है)

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 25, श्लोक 4 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 827
प्रतिज्ञा भङ्ग का पाप

शतमश्वानृते हन्ति सहस्त्रं तु गवानृते ।

आत्मानं स्वजनं हन्ति पुरुषः पुरुषानृते ॥

‘अश्वदानकी प्रतिज्ञा करके उसकी पूर्ति न करनेपर’ अश्वानृत (अश्वविषयक असत्य) नामक पाप होता है । यह पाप बन जानेपर मनुष्य सौ अश्वोंकी हत्याके पापका भागी होता है । इसी प्रकार गोदानविषयक प्रतिज्ञाको मिथ्या कर देनेपर सहस्र गौओंके वधका पाप लगता है तथा किसी पुरुषके समक्ष उसका कार्य पूर्ण कर देनेकी प्रतिज्ञा करके जो उसकी पूर्ति नहीं करता है, वह पुरुष आत्मघात और स्वजन-वधके पापका भागी होता है (फिर जो परम पुरुष श्रीरामके समक्ष की हुई प्रतिज्ञाको मिथ्या करता है, उसके पापकी कोई इयत्ता नहीं हो सकती)

लक्ष्मण ने सुग्रीव से कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 34, श्लोक 9 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 865