श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २
काम–क्रोध–लोभ–मोह
भीतर के छह शत्रु
19 पद्य
महाभारत — खण्ड २
शौनक उवाच
रागाभिभूतः पुरुषः कामेन परिकृष्यते ।
इच्छा संजायते तस्य ततस्तृष्णा विवर्धते ॥
तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी स्मृता ।
अधर्मबहुला चैव घोरा पापानुबन्धिनी ॥
रागके वशीभूत हुए पुरुषको काम अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है । फिर उसके मनमें कामभोगकी इच्छा जाग उठती है । तत्पश्चात् तृष्णा बढ़ने लगती है । तृष्णा सबसे बढ़कर पापिष्ठ (पापमें प्रवृत्त करनेवाली) तथा नित्य उद्वेग करनेवाली बतायी गयी है । उसके द्वारा प्रायः अधर्म ही होता है । वह अत्यन्त भयंकर पापाबन्धनमें डालनेवाली है ।
युधिष्ठिर उवाच
हिंस्यात् क्रोधादवध्यांस्तु वध्यान् सम्पूजयीत च ।
आत्मानमपि च क्रुद्धः प्रेषयेद् यमसादनम् ॥
क्रोधवश वह अवध्य पुरुषोंकी भी हत्या कर सकता है और वधके योग्य मनुष्योंकी भी पूजामें तत्पर हो सकता है । इतना ही नहीं, क्रोधी मानव (आत्महत्याद्वारा) अपने-आपको भी यमलोकका अतिथि बना सकता है ।
युधिष्ठिर उवाच
हन्त्यवध्यानपि क्रुद्धो गुरून् क्रुद्धस्तुदत्यपि ।
तस्मात् तेजसि कर्तव्यः क्रोधो दूरे प्रतिष्ठितः ॥
क्रोधी मनुष्य अवध्य पुरुषोंका वध कर देता है । क्रोधी मनुष्य गुरुजनोंको कटु वचनोंद्वारा पीड़ा पहुँचाता है । इसलिये जिसमें तेज हो, उस पुरुषको चाहिये कि वह क्रोधको अपनेसे दूर रखे ।
लोमश उवाच
दर्पान्मानः समभवन्मानात् क्रोधो व्यजायत ।
क्रोधादह्रीस्ततोऽलज्जा वृत्तं तेषां ततोऽनशत् ॥
दर्पसे मान हुआ और मानसे क्रोध उत्पन्न हुआ । क्रोधसे निर्लज्जता आयी और निर्लज्जताने उनके सदाचारको नष्ट कर दिया ।
लोमशजी ने युधिष्ठिर को असुरों के पतन का कारण बताते हुए कहा।
हनुमान् उवाच
क्रूरेषु कर्मसु कथं देहवाक्चित्तदूषिषु ।
धर्मघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥
किंतु पता नहीं, तुम्हारे-जैसे बुद्धिमान्लोग धर्मका नाश करनेवाले तथा मन, वाणी और शरीरको भी दूषित कर देनेवाले क्रूर कर्मोंमें कैसे प्रवृत्त होते हैं?
हनुमानजी ने भीमसेन से कहा।
सर्प → तात
विपरीतैश्च राजेन्द्र कारणैर्मानुषो भवेत् ।
तिर्यग्योनिस्तथा तात विशेषश्चात्र वक्ष्यते ॥
कामक्रोधसमायुक्तो हिंसालोभसमन्वितः ।
मनुष्यत्वात् परिभ्रष्टस्तिर्यग्योनौ प्रसूयते ॥
राजेन्द्र! इसके विपरीत कारण उपस्थित होनेपर मनुष्ययोनिमें तथा पशु-पक्षी आदि योनिमें जन्म लेना पड़ता है। तात! पशु-पक्षी आदि योनियोंमें जन्म लेनेका जो विशेष कारण है, उसे भी यहाँ बतलाया जाता है । जो काम, क्रोध, लोभ और हिंसामें तत्पर होकर मानवतासे भ्रष्ट हो जाता है, अपनी मनुष्य होनेकी योग्यताको भी खो देता है, वही पशु-पक्षी आदि योनिमें जन्म पाता है ।
सर्परूपधारी नहुष ने युधिष्ठिर से कहा।
मार्कण्डेय उवाच
ततः कालान्तरेऽन्यस्मिन् पृथिवीतलचारिणः ।
कामक्रोधाभिभूतास्ते मायाव्याजोपजीविनः ।
लोभमोहाभिभूताश्च त्यक्ता देहैस्ततो नराः ॥
तदनन्तर कुछ कालके पश्चात् भूतलपर विचरनेवाले मनुष्य काम और क्रोधके वशीभूत हो गये । वे छल-कपट और दम्भसे जीविका चलाने लगे । उनके मनको लोभ और मोहने दबा लिया । इन दोषोंके कारण उन्हें इच्छा न होते हुए भी अपना शरीर त्यागनेके लिये विवश होना पड़ा ।
मार्कण्डेय उवाच
विद्याहीनानविज्ञानाल्लोभोऽप्यभिभविष्यति ।
लोभक्रोधपरा मूढाः कामासक्ताश्च मानवाः ।
वैरबद्धा भविष्यन्ति परस्परवधैषिणः ॥
विद्याके बिना ज्ञान न होनेसे उन सबको लोभ दबा लेगा । फिर लोभ और क्रोधके वशीभूत हुए मूढ़ मनुष्य कामनाओंमें फँसकर आपसमें वैर बाँध लेंगे और एक-दूसरेके प्राण लेनेकी घातमें लगे रहेंगे ।
युधिष्ठिर उवाच
यत् त्वयोक्तं द्विजश्रेष्ठ वाक्यं श्रुतिमनोहरम् ।
तथा करिष्ये यत्नेन भवतः शासनं विभो ॥
न मे लोभोऽस्ति विप्रेन्द्र न भयं न च मत्सरः ।
करिष्यामि हि तत् सर्वमुक्तं यत् ते मयि प्रभो ॥
युधिष्ठिरने कहा — द्विजश्रेष्ठ! आपने मुझे जो उपदेश दिया है, वह मेरे कानोंको मधुर एवं मनको प्रिय लगा है । विभो! मैं आपकी आज्ञाका यत्नपूर्वक पालन करूँगा । ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरे मनमें लोभ, भय और ईर्ष्या नहीं है । प्रभो! आपने मेरे लिये जो कहा है, इसका अवश्य पालन करूँगा ।
स्त्री उवाच
बलाका हि त्वया दग्धा रोषात् तद् विदितं मया ।
क्रोधः शत्रुः शरीरस्थो मनुष्याणां द्विजोत्तम ॥
तुमने क्रोध करके जो एक बगुलीको जला दिया था वह बात मुझे मालूम हो गयी । द्विजश्रेष्ठ! मनुष्योंका एक बहुत बड़ा शत्रु है, वह उनके शरीरमें ही रहता है । उसका नाम है ‘क्रोध’
व्याध उवाच
कामक्रोधौ वशे कृत्वा दम्भं लोभमनार्जवम् ।
धर्ममित्येव संतुष्टास्ते शिष्टाः शिष्टसम्मताः ॥
जो काम, क्रोध, लोभ, दम्भ और कुटिलताको वशमें करके केवल धर्मको ही अपनाकर संतुष्ट रहते हैं, वे शिष्ट कहलाते हैं और उन्हींका शिष्ट पुरुष आदर करते हैं ।
व्याध ने द्विजश्रेष्ठ से शिष्ट पुरुषों के आचार-व्यवहार का वर्णन करते हुए कहा।
व्याध उवाच
यो यथाप्रकृतिर्जन्तुः स स्वां प्रकृतिमश्नुते ।
पापात्मा क्रोधकामादीन् दोषानाप्नोत्यनात्मवान् ॥
जिस जीवकी जैसी प्रकृति होती है, वह अपनी प्रकृतिका ही अनुसरण करता है । अपने मनको वशमें न रखनेवाला पापात्मा पुरुष ही काम, क्रोध आदि दोषोंको प्राप्त होता है ।
व्याध उवाच
अविद्याबहुलो मूढः स्वप्नशीलो विचेतनः ।
दुर्हृषीकस्तमोध्वस्तः सक्रोधस्तामसोऽलसः ॥
जिसमें अज्ञानकी बहुलता है, जो मूढ़ (मोहग्रस्त) और अचेत होकर सदा नींद लेता रहता है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें न होनेके कारण दूषित हैं, जो अविवेकी, क्रोधी और आलसी है, ऐसे मनुष्यको तमोगुणी जानना चाहिये ।
व्याध उवाच
सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः ।
एतत् पवित्रं लोकानां तपो वै संक्रमो मतः ॥
सम्पूर्ण उपायोंसे लोभ और क्रोधकी वृत्तियोंको दबाना चाहिए । संसारमें यही पवित्र तप है और यही सबके लिये भवसागरसे पार उतारनेवाला सेतु माना गया है ।
द्रौपदी उवाच
अहंकारं विहायाहं कामक्रोधौ च सर्वदा ।
सदारान् पाण्डवान् नित्यं प्रयतोपचराम्यहम् ॥
मैं अहंकार और काम-क्रोधको छोड़कर सदा पूरी सावधानीके साथ सब पाण्डवोंकी और उनकी अन्यान्य स्त्रियोंकी भी सेवा करती हूँ ।
द्रौपदी ने सत्यभामा से कहा।
देवदूत उवाच
न तत्र विप्र गच्छन्ति पुरुषा विषयात्मकाः ।
दम्भलोभमहाक्रोधमोहद्रोहैरभिद्रुताः ॥
विप्रवर! जिनका मन विषयोंमें रचा-पचा रहता है, वे लोग वहाँ नहीं जा सकते । दम्भ, लोभ, महाक्रोध, मोह और द्रोहसे युक्त मनुष्य भी वहाँ नहीं पहुँच सकते ।
देवदूत ने ब्रह्माजी के लोक से ऊपर स्थित भगवान विष्णु के परम धाम के बारे में बताते हुए कहा।
युधिष्ठिर उवाच
मानं हित्वा प्रियो भवति ।
क्रोधं हित्वा न शोचति ।
कामं हित्वार्थवान् भवति ।
लोभं हित्वा सुखी भवेत् ॥
युधिष्ठिर बोले — मानको त्याग देनेपर मनुष्य प्रिय होता है, क्रोधको त्यागकर शोक नहीं करता, कामको त्यागकर वह अर्थवान् होता है और लोभको त्यागकर सुखी होता ।
युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्न का उत्तर दिया।
युधिष्ठिर उवाच
क्रोधः सुदुर्जयः शत्रुर्लोभो व्याधिरनन्तकः ।
सर्वभूतहितः साधुरसाधुर्निर्दयः स्मृतः ॥
युधिष्ठिर बोले — क्रोध दुर्जय शत्रु है, लोभ अनन्त व्याधि है तथा जो समस्त प्राणियोंका हित करनेवाला हो, वही साधु है और निर्दयी पुरुषको ही असाधु माना गया है ।
युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा।
युधिष्ठिर उवाच
धर्मज्ञः पण्डितो ज्ञेयो नास्तिको मूर्ख उच्यते ।
कामः संसारहेतुश्च हृत्तापो मत्सरः स्मृतः ॥
युधिष्ठिर बोले — धर्मज्ञको पण्डित समझना चाहिये, मूर्ख नास्तिक कहलाता है और नास्तिक मूर्ख है तथा जो जन्म-मरणरूप संसारका कारण है, वह वासना काम है और हृदयकी जलन ही मत्सर है ।
युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा।