श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

ज्ञान–विवेक

आत्मबोध और विवेक

18 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

रामायण श्रवण का महत्व

तदिदं वर्तयिष्यावः सर्वं निखिलमादितः ।

धर्मकामार्थसहितं श्रोतव्यमनसूयता ॥

हम दोनों आदिसे अन्ततक इस सारे काव्यका पूर्णरूपसे गान करेंगे । इसके द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि होती है; अतः आपलोग दोषदृष्टिका परित्याग करके इसका श्रवण करें ।

बालकाण्ड, अध्याय 5, श्लोक 4 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 80 धर्म–आचरण
दैव की प्रबलता

दैवेनाक्रम्यते सर्वं दैवं हि परमा गतिः ।

तस्य मे परमार्तस्य प्रसादमभिकांक्षतः ।

कर्तुमर्हसि भद्रं ते दैवोपहतकर्मणः ॥

दैव सबपर आक्रमण करता है । दैव ही सबकी परमगति है । मुने! मैं अत्यन्त आर्त होकर आपकी कृपा चाहता हूँ । दैवने मेरे पुरुषार्थको दबा दिया है । आपका भला हो । आप मुझपर अवश्य कृपा करें ।

बालकाण्ड, अध्याय 58, श्लोक 23 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 193 कर्म–प्रारब्ध
शास्त्रज्ञ और व्यवहार कुशल

शास्त्रज्ञश्च कृतज्ञश्च पुरुषान्तरकोविदः ।

यः प्रग्रहानुग्रहयोर्यथान्यायं विचक्षणः ॥

वे शास्त्रोंके ज्ञाता, उपकारियोंके प्रति कृतज्ञ तथा पुरुषोंके तारतम्यको अथवा दूसरे पुरुषोंके मनोभावको जाननेमें कुशल थे । यथायोग्य निग्रह और अनुग्रह करनेमें वे पूर्ण चतुर थे ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 1, श्लोक 25 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 235 नीति–व्यवहार
सत्पुरुषों का चित्त

कामं खलु सतां वृत्ते भ्राता ते भरतः स्थितः ।

ज्येष्ठानुवर्ती धर्मात्मा सानुक्रोशो जितेन्द्रियः ॥

किं नु चित्तं मनुष्याणामनित्यमिति मे मतम् ।

सतां च धर्मनित्यानां कृतशोभि च राघव ॥

‘इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे भाई भरत सत्पुरुषोंके आचार-व्यवहारमें स्थित हैं, अपने बड़े भाईका अनुसरण करनेवाले, धर्मात्मा, दयालु और जितेन्द्रिय हैं तथापि मनुष्योंका चित्त प्रायः स्थिर नहीं रहता — ऐसा मेरा मत है । रघुनन्दन! धर्मपरायण सत्पुरुषोंका मन भी विभिन्न कारणोंसे राग-द्वेषादिसे संयुक्त हो जाता है’

राजा दशरथ ने श्रीराम से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 4, श्लोक 26–27 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 247 कर्म–प्रारब्ध
सत्य और धर्म

आहुः सत्यं हि परमं धर्मं धर्मविदो जनाः ।

सत्यमाश्रित्य च मया त्वं धर्मं प्रतिचोदितः ॥

धर्मज्ञ पुरुष सत्यको ही सबसे श्रेष्ठ धर्म बतलाते हैं, उस सत्यका सहारा लेकर मैंने आपको धर्मका पालन करनेके लिये ही प्रेरित किया है ।

कैकेयी ने दशरथ से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 14, श्लोक 3 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 279 धर्म–आचरण
सत्य की प्रधानता

धर्ममूलमिदं राम विदितं च सतामपि ।

तत् सत्यं न त्यजेद् राजा कुपितस्त्वत्कृते यथा ॥

राम! सत्य ही धर्मकी जड़ है, यह सत्पुरुषोंका भी निश्चय है । कहीं ऐसा न हो कि ये महाराज तुम्हारे कारण मुझपर कुपित होकर अपने उस सत्यको ही छोड़ बैठें । जैसे भी इनके सत्यका पालन हो, वैसा तुम्हें करना चाहिये ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 18, श्लोक 24 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 295 धर्म–आचरण
गुरु का अनुशासन

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः ।

उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम् ॥

क्योंकि यदि गुरु भी घमंडमें आकर कर्तव्याकर्तव्यका । ज्ञान खो बैठे और कुमार्गपर चलने लगे तो उसे भी दण्ड देना आवश्यक हो जाता है ।

लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 21, श्लोक 13 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 304 गुरु महिमा
कर्मफल का विवेक

गुरुलाघवमर्थानामारम्भे कर्मणां फलम् ।

दोषं वा यो न जानाति स बाल इति होच्यते ॥

जो कर्मोंका आरम्भ करते समय उनके फलोंकी गुरुता या लघुताको नहीं जानता, उनसे होनेवाले लाभरूपी गुण अथवा हानिरूपी दोषको नहीं समझता, वह मनुष्य बालक (मूर्ख) कहा जाता है ।

राजा दशरथ ने कौसल्या से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 63, श्लोक 7 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 422
स्वयं की चिन्ता

आत्मानमनुशोच त्वं किमन्यमनुशोचसि ।

आयुस्तु हीयते यस्य स्थितस्यास्य गतस्य च ॥

तुम अपने ही लिये चिन्ता करो, दूसरेके लिये क्यों बार-बार शोक करते हो । कोई इस लोकमें स्थित हो या अन्यत्र गया हो, जिस किसीकी भी आयु तो निरन्तर क्षीण ही हो रही है ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 105, श्लोक 21 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 530
सत्य की सर्वोच्चता

सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः ।

सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम् ॥

जगत्में सत्य ही ईश्वर है । सदा सत्यके ही आधारपर धर्मकी स्थिति रहती है । सत्य ही सबकी जड़ है । सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई परम पद नहीं है ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 109, श्लोक 13 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 539
तपस्वियों की रक्षा

न्यस्तदण्डा वयं राजञ्जितक्रोधा जितेन्द्रियाः ।

रक्षणीयास्त्वया शश्वद् गर्भभूतास्तपोधनाः ॥

‘राजन्! हमने जीवमात्रको दण्ड देना छोड़ दिया है, क्रोध और इन्द्रियोंको जीत लिया है । अब तपस्या ही हमारा धन है । जैसे माता गर्भस्थ बालककी रक्षा करती है, उसी प्रकार आपको सदा सब तरहसे हमारी रक्षा करनी चाहिये’

तपस्वी मुनियों ने वन में श्री रामचन्द्रजी का सत्कार करते हुए उनसे अपनी रक्षा की प्रार्थना की।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 1, श्लोक 21 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 566 साधना–योग
कालपाश और विवेक का ह्रास

कालपाशपरिक्षिप्ता भवन्ति पुरुषा हि ये ।

कार्याकार्यं न जानन्ति ते निरस्तषडिन्द्रियाः ॥

‘जो पुरुष कालके फन्देमें फँस जाते हैं, उनकी छहों इन्द्रियाँ बेकाम हो जाती हैं; इसीलिये उन्हें कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान नहीं रह जाता है’

वन में श्रीरामचन्द्रजी से क्रोध में भरकर खर ने उन्हें फटकारते हुए कहा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 30, श्लोक 15 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 635 काल–मृत्यु
तिलक का ज्ञान

ककुभः ककुभोरुं तां व्यक्तं जानाति मैथिलीम् ।

लतापल्लवपुष्पाढ्यो भाति ह्येष वनस्पतिः ॥

भ्रमरैरुपगीतश्च यथा द्रुमवरो ह्यसि ।

एष व्यक्तं विजानाति तिलकस्तिलकप्रियाम् ॥

यह ककुभ अपने ही समान ऊरुवाली मिथिलेशकुमारीको अवश्य जानता होगा; क्योंकि यह वनस्पति लता, पल्लव तथा फूलोंसे सम्पन्न हो बड़ी । शोभा पा रहा है । ककुभ! तुम सब वृक्षोंमें श्रेष्ठ हो, क्योंकि ये भ्रमर तुम्हारे समीप आकर अपने झंकारोंद्वारा तुम्हारा यशोगान करते हैं । (तुम्हीं सीताका पता बताओ, रामायणके व्याख्याकारोंमेंसे किसीने ककुभका अर्थ मरुवक लिखा है और किसीने अर्जुनविशेष, किंतु कोषोंमें यह कुटजका पर्याय बताया गया है । अहो! यह भी कोई उत्तर नहीं दे रहा है ।) यह तिलक वृक्ष अवश्य सीताके विषयमें जानता होगा; क्योंकि मेरी प्रिया सीताको भी तिलकसे प्रेम था ।

श्रीराम ने वृक्ष से सीता का पता पूछा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 60, श्लोक 15–16 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 711
बुद्धि और विवेक

तत्त्वतो हि नरश्रेष्ठ बुद्ध्या समनुचिन्तय ।

बुद्ध्या युक्ता महाप्राज्ञा विजानन्ति शुभाशुभे ॥

नरश्रेष्ठ! आप बुद्धिके द्वारा तात्त्विक विचार कीजिये-क्या करना चाहिये और क्या नहीं; क्या उचित है और क्या अनुचित-इसका निश्चय कीजिये; क्योंकि बुद्धियुक्त महाज्ञानी पुरुष ही शुभ और अशुभ (कर्तव्य-अकर्तव्य एवं उचित-अनुचित) को अच्छी तरह जानते हैं ।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 66, श्लोक 16 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 727
बुद्धि और विवेक का महत्व

बुद्धिविज्ञानसम्पन्न इङ्गितैः सर्वमाचर ।

नह्यबुद्धिं गतो राजा सर्वभूतानि शास्ति हि ॥

‘बुद्धि और विज्ञानसे सम्पन्न होकर आप दूसरोंकी चेष्टाओंके द्वारा उनका मनोभाव समझें और उसीके अनुसार सभी आवश्यक कार्य करें; क्योंकि जो राजा बुद्धि-बलका आश्रय नहीं लेता, वह सम्पूर्ण प्रजापर शासन नहीं कर सकता’

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 2, श्लोक 18 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 764 नीति–व्यवहार
आत्म-बोध और शोक

शोच्या शोचसि कं शोच्यं दीनं दीनानुकम्पसे ।

कश्च कस्यानुशोच्योऽस्ति देहेऽस्मिन् बुद्बुदोपमे ॥

तुम स्वयं शोचनीया हो; फिर दूसरे किसको शोचनीय समझकर शोक कर रही हो? स्वयं दीन होकर दूसरे किस दीनपर दया करती हो? पानीके बुलबुलेके समान इस शरीरमें रहकर कौन जीव किस जीवके लिये शोचनीय है?

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 21, श्लोक 3 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 816
शुभ कर्म का महत्त्व

जानास्यनियतामेवं भूतानामागतिं गतिम् ।

तस्माच्छुभं हि कर्तव्यं पण्डिते नेह लौकिकम् ॥

देवि! तुम विदुषी हो, अतः जानती ही हो कि प्राणियोंके जन्म और मृत्युका कोई निश्चित समय नहीं है । इसलिये शुभ (परलोकके लिये सुखद) कर्म ही करना चाहिये । अधिक रोना-धोना आदि जो लौकिक कर्म (व्यवहार) है, उसे नहीं करना चाहिये ।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 21, श्लोक 5 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 816 वैराग्य
गुणों की वृद्धि

तत्र नामुदितः कश्चिन्नात्र कश्चिदसत्प्रियः ।

अहन्यहनि वर्धन्ते गुणास्तत्र मनोरमाः ॥

वहाँ कोई भी अप्रसन्न नहीं रहता । किसीकी भी बुरे कामोंमें प्रीति नहीं होती । वहाँ रहनेसे प्रतिदिन मनोरम गुणोंकी वृद्धि होती है ।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 43, श्लोक 52 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 894 वैराग्य