श्रीगणेशाय नमः।

श्रीरामचरितमानस

सत्सङ्ग–सन्त महिमा

सङ्ग का प्रभाव और सन्त-स्वभाव

37 पद्य

श्रीरामचरितमानस

सन्त समाज की महिमा

मुद मंगलमय संत समाजू । जो जग जंगम तीरथराजू ॥

राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा । सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा ॥

संतोंका समाज आनन्द और कल्याणमय है, जो जगत्में चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है । जहाँ (उस संतसमाजरूपी प्रयागराजमें) रामभक्तिरूपी गङ्गाजीकी धारा है और ब्रह्मविचारका प्रचार सरस्वतीजी हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 2.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 23
सत्सङ्ग की महिमा

मति कीरति गति भूति भलाई । जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई ॥

सो जानब सतसंग प्रभाऊ । लोकहुँ बेद न आन उपाऊ ॥

उनमेंसे जिसने जिस समय जहाँ कहीं भी जिस किसी यत्नसे बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, विभूति (ऐश्वर्य) और भलाई पायी है, सो सब सत्संगका ही प्रभाव समझना चाहिये । वेदोंमें और लोकमें इनकी प्राप्तिका दूसरा कोई उपाय नहीं है ।

बालकाण्ड, चौपाई 3(ख).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 24
सत्सङ्ग का महत्व

बिनु सतसंग बिबेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ॥

सतसंगत मुद मंगल मूला । सोइ फल सिधि सब साधन फूला ॥

सत्संगके बिना विवेक नहीं होता और श्रीरामजीकी कृपाके बिना वह सत्संग सहजमें मिलता नहीं । सत्संगति आनन्द और कल्याणकी जड़ है । सत्संगकी सिद्धि (प्राप्ति) ही फल है और सब साधन तो फूल हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 3(ख).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 24 ज्ञान–विवेक
सत्सङ्गति का प्रभाव

सठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पारस परस कुधात सुहाई ॥

बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं । फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं ॥

दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारसके स्पर्शसे लोहा सुहावना हो जाता है (सुन्दर सोना बन जाता है) । किन्तु दैवयोगसे यदि कभी सज्जन कुसंगतिमें पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँपकी मणिके समान अपने गुणोंका ही अनुसरण करते हैं (अर्थात् जिस प्रकार साँपका संसर्ग पाकर भी मणि उसके विषको ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण प्रकाशको नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टोंके संगमें रहकर भी दूसरोंको प्रकाश ही देते हैं, दुष्टोंका उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता)

बालकाण्ड, चौपाई 3(ख).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 24
सन्तों की महिमा

बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी । कहत साधु महिमा सकुचानी ॥

सो मोसन कहि जात न कैसें । साक बनिक मनि गुन गन जैसें ॥

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितोंकी वाणी भी संत-महिमाका वर्णन करनेमें सकुचाती है; वह मुझसे किस प्रकार नहीं कही जाती, जैसे साग-तरकारी बेचनेवालेसे मणियोंके गुणसमूह नहीं कहे जा सकते ।

बालकाण्ड, चौपाई 3(ख).6 श्रीरामचरितमानस पृ. 24
सन्त और असन्त का अन्तर

बंदउँ संत असज्जन चरना । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना ॥

बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं । मिलत एक दुख दारुन देहीं ॥

अब मैं संत और असंत दोनोंके चरणोंकी वन्दना करता हूँ; दोनों ही दुःख देनेवाले हैं, परन्तु उनमें कुछ अन्तर कहा गया है । वह अन्तर यह है कि एक (संत) तो बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं और दूसरे (असंत) मिलते हैं तब दारुण दुःख देते हैं । (अर्थात् संतोंका बिछुड़ना मरने समान दु:खदायी होता है और असंतोंका मिलना)

बालकाण्ड, चौपाई 5.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 26
सत्पुरुष का विवेक

जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार ॥

संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार ॥

विधाताने इस जड-चेतन विश्वको गुण-दोषमय रचा है; किन्तु संतरूपी हंस दोषरूपी जलको छोड़कर गुणरूपी दूधको ही ग्रहण करते हैं ।

बालकाण्ड, दोहा 6 श्रीरामचरितमानस पृ. 28 ज्ञान–विवेक
सङ्ग का प्रभाव

धूम कुसंगति कारिख होई । लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई ॥

सोइ जल अनल अनिल संघाता । होइ जलद जग जीवन दाता ॥

कुसंगके कारण धुआँ कालिख कहलाता है, वही धुआँ [सुसंगसे] सुन्दर स्याही होकर पुराण लिखनेके काममें आता है और वही धुआँ जल, अग्नि और पवनके संगसे बादल होकर जगत्को जीवन देनेवाला बन जाता है ।

बालकाण्ड, चौपाई 7(क).6 श्रीरामचरितमानस पृ. 29

जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ ॥

तिन्ह कहुँ मानस अगम अतिजिन्हहि न प्रिय रघुनाथ ॥

जिनके पास श्रद्धारूपी राह-खर्च नहीं है और संतोंका साथ नहीं है और जिनको श्रीरघुनाथजी प्रिय नहीं हैं, उनके लिये यह मानस अत्यन्त ही अगम है । (अर्थात् श्रद्धा, सत्संग और भगवत्प्रेमके बिना कोई इसको नहीं पा सकता)

बालकाण्ड, दोहा 38 श्रीरामचरितमानस पृ. 63 शरणागति

ते नर यह सर तजहिं न काऊ । जिन्ह कें राम चरन भल भाऊ ॥

जो नहाइ चह एहिं सर भाई । सो सतसंग करउ मन लाई ॥

जिनके मनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सुन्दर प्रेम है, वे इस सरोवरको कभी नहीं छोड़ते । हे भाई! जो इस सरोवरमें स्नान करना चाहे वह मन लगाकर सत्संग करे ।

बालकाण्ड, चौपाई 39.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 64 भक्ति
निन्दा का प्रतिकार

संत संभु श्रीपति अपबादा । सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा ॥

काटिअ तासु जीभ जो बसाई । श्रवन मूदि न त चलिअ पराई ॥

जहाँ संत, शिवजी और लक्ष्मीपति विष्णुभगवान्‌की निन्दा सुनी जाय वहाँ ऐसी मर्यादा है कि यदि अपना वश चले तो उस (निन्दा करनेवाले) की जीभ काट ले और नहीं तो कान मूँदकर जगदातमावहाँसे भाग जाय ।

सतीजी ने सभा को सम्बोधित करते हुए शिवजी की निन्दा करने वालों के लिए यह कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 64.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 85 भक्ति
साधुसङ्ग और हरिभजन का त्याग

जे नहिं साधुसंग अनुरागे । परमारथ पथ बिमुख अभागे ॥

जे न भजहिं हरि नर तनु पाई । जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई ॥

तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं । बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं ॥

तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ । जननी जौं यहु जानौं भेऊ ॥

जिनका सत्सङ्गमें प्रेम नहीं है; जो अभागे परमार्थके मार्गसे विमुख हैं; जो मनुष्यशरीर पाकर श्रीहरिका भजन नहीं करते; जिनको हरि-हर (भगवान् विष्णु और शंकरजी) का सुयश नहीं सुहाता, जो वेदमार्गको छोड़कर वाम (वेदप्रतिकूल) मार्गपर चलते हैं; जो ठग हैं और वेष बनाकर जगत्को छलते हैं; हे माता! यदि मैं इस भेदको जानता भी होऊँ तो शंकरजी मुझे उन लोगोंकी गति दें ।

भरतजी ने माता कौसल्या के सामने सौगन्ध खाते हुए कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 168.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 485 भक्ति

उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई । जाइ लोकु परलोकु नसाई ॥

दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई । जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई ॥

हृदयमें भी तुमपर कुटिलताका आरोप करनेसे यह लोक (यहाँके सुख, यश आदि) बिगड़ जाता है और परलोक भी नष्ट हो जाता है (मरनेके बाद भी अच्छी गति नहीं मिलती) । माता कैकेयीको तो वे ही मूर्ख दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओंकी सभाका सेवन नहीं किया है ।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 263.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 565 ज्ञान–विवेक
ब्राह्मण सेवा का फल

मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव ॥

मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव ॥

मन, वचन और कर्मसे कपट छोड़कर जो भूदेव ब्राह्मणोंकी सेवा करता है, मुझसमेत ब्रह्मा, शिव आदि सब देवता उसके वशमें हो जाते हैं ।

श्रीरामजी ने कबन्ध को ब्राह्मणकुल से द्रोह न करने की शिक्षा देते हुए यह कहा।

अरण्यकाण्ड, दोहा 33 श्रीरामचरितमानस पृ. 667 सेवा–करुणा–विनय
नवधा भक्ति का वर्णन

नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं । सावधान सुनु धरु मन माहीं ॥

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा । दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ॥

मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ तू सावधान होकर सुन और मनमें धारण कर । पहली भक्ति है संतोंका सत्संग । दूसरी भक्ति है मेरे कथा-प्रसंगमें प्रेम ।

श्रीरामजी ने शबरीजी से कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 35.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 669 भक्ति
सत्सङ्ग और भक्ति का मार्ग

दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग ॥

हि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग ॥

युवती स्त्रियोंका शरीर दीपककी लौके समान है, हे मन! तू उसका पतिंगा न बन । काम और मदको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीका भजन कर और सदा सत्संग कर ।

अरण्यकाण्ड, दोहा 46(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 681 भक्ति

बरषहिं जलद भूमि निअराएँ । जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ ॥

बूँद अघात सहहिं गिरि कैसें । खल के बचन संत सह जैसें ॥

बादल पृथ्वीके समीप आकर (नीचे उतरकर) बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान् नम्र हो जाते हैं । बूँदोंकी चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टोंके वचन संत सहते हैं ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 14.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 697
सङ्ग का प्रभाव

कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग ॥

बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग ॥

कभी [बादलोंके कारण] दिनमें घोर अन्धकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं । जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है ।

किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 15(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 699
सत्सँग का परम सुख

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग ॥

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥

हे तात! स्वर्ग और मोक्षके सब सुखोंको तराजूके एक पलड़ेमें रखा जाय, तो भी वे सब मिलकर [दूसरे पलड़ेपर रखे हुए] उस सुखके बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण)-मात्रके सत्सङ्गसे होता है ।

लङ्किनी ने हनुमान जी से कहा।

सुन्दरकाण्ड, दोहा 4 श्रीरामचरितमानस पृ. 720
सन्त की महिमा

उमा संत कइ इहड़ बड़ाई । मंद करत जो करइ भलाई ॥

तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा । रामु भजें हित नाथ तुम्हारा ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! संतकी यही बड़ाई (महिमा) है कि वे बुराई करनेपर भी [बुराई करनेवालेकी] भलाई ही करते हैं । [विभीषणजीने कहा—] आप मेरे पिताके समान हैं, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया; परन्तु हे नाथ! आपका भला श्रीरामजीको भजनेमें ही है ।

विभीषण ने रावण से कहा।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 41.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 754 भक्ति
सङ्ग का प्रभाव

संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ ॥

कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ ॥

संतका संग मोक्ष (भव-बन्धनसे छूटने) का और कामीका संग जन्म-मृत्युके बन्धनमें पड़नेका मार्ग है । संत, कवि और पण्डित तथा वेद, पुराण [आदि] सभी सद्ग्रन्थ ऐसा कहते हैं ।

श्रीरघुनाथजी ने श्रेष्ठ मुनियों को बैठाकर परम मनोहर वचन कहे।

उत्तरकाण्ड, दोहा 33 श्रीरामचरितमानस पृ. 944
सन्त और असन्त का स्वभाव

संत असंतन्हि कै असि करनी । जिमि कुठार चंदन आचरनी ॥

काटइ परसु मलय सुनु भाई । निज गुन देइ सुगंध बसाई ॥

संत और असंतोंकी करनी ऐसी है जैसे कुल्हाड़ी और चन्दनका आचरण होता है । हे भाई! सुनो, कुल्हाड़ी चन्दनको काटती है [क्योंकि उसका स्वभाव या काम ही वृक्षोंको काटना है]; किन्तु चन्दन [अपने स्वभाववश] अपना गुण देकर उसे (काटनेवाली कुल्हाड़ीको) सुगन्धसे सुवासित कर देता है ।

श्रीरामजी ने सन्तों के लक्षणों के विषय में बताते हुए कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 37.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 947 नीति–व्यवहार
सन्तों का स्वभाव

बिषय अलंपट सील गुनाकर । पर दुख दुख सुख सुख देखे पर ॥

सम अभूतरिपु बिमद बिरागी । लोभामरष हरष भय त्यागी ॥

संत विषयोंमें लम्पट (लिप्त) नहीं होते, शील और सद्गुणोंकी खान होते हैं । उन्हें पराया दुःख देखकर दुःख और सुख देखकर सुख होता । वे [सबमें, सर्वत्र, सब समय] समता रखते हैं, उनके मन कोई उनका शत्रु नहीं है, वे मदसे रहित और वैराग्यवान् होते हैं तथा लोभ, क्रोध, हर्ष और भयका त्याग किये हुए रहते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 38.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 947 वैराग्य
सच्चे सन्त के लक्षण

ए सब लच्छन बसहिं जासु उर । जानेहु तात संत संतत फुर ॥

सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं । परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं ॥

हे तात! ये सब लक्षण जिसके हृदयमें बसते हों, उसको सदा सच्चा संत जानना । जो शम (मनके निग्रह), दम (इन्द्रियोंके निग्रह), नियम और नीतिसे कभी विचलित नहीं होते और मुखसे कभी कठोर वचन नहीं बोलते … ।

श्रीराम भरत को सच्चे सन्त की पहचान बताते हुए।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 38.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 948 नीति–व्यवहार
सत्सङ्गति का महत्त्व

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी । बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ॥

पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता । सतसंगति संसृति कर अंता ॥

भक्ति स्वतन्त्र है और सब सुखोंकी खान है । परन्तु सत्संग (संतोंके संग) के बिना प्राणी इसे नहीं पा सकते । और पुण्यसमूहके बिना संत नहीं मिलते । सत्संगति ही संसृति (जन्म-मरणके चक्र) का अन्त करती है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 45.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 954

प्रीति सदा सज्जन संसर्गा । तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा ॥

भगति पच्छ हठ नहिं सठताई । दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई ॥

संतजनोंके संसर्ग (सत्संग) से जिसे सदा प्रेम है, जिसके मनमें सब विषय यहाँतक कि स्वर्ग और मुक्तितक [भक्तिके सामने] तृणके समान हैं, जो भक्तिके पक्षमें हठ करता है, पर [दूसरेके मतका खण्डन करनेकी] मूर्खता नहीं करता तथा जिसने सब कुतर्कोंको दूर बहा दिया है … ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 46.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 955

मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही । कवन भाँति समुझावौं तोही ॥

तबहिं होइ सब संसय भंगा । जब बहु काल करिअ सतसंगा ॥

हे गरुड़! तुम मुझे रास्तेमें मिले हो । राह चलते मैं तुम्हें किस प्रकार समझाऊँ? सब सन्देहोंका तो तभी नाश हो जब दीर्घ कालतक सत्संग किया जाय ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 61.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 967
सत्सङ्ग और अनन्य प्रेम

बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग ॥

मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग ॥

सत्संगके बिना हरिकी कथा सुननेको नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोहके गये बिना श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें दृढ़ (अचल) प्रेम नहीं होता ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 61 श्रीरामचरितमानस पृ. 968 भक्ति

सुनु मम बचन सत्य अब भाई । हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई ॥

अब जनि करहि बिप्र अपमाना । जानेसु संत अनंत समाना ॥

हे भाई! अब मेरा सत्य वचन सुन । द्विजोंकी सेवा ही भगवान्‌को प्रसन्न करनेवाला व्रत है । अब कभी ब्राह्मणका अपमान न करना । संतोंको अनन्त श्रीभगवान्हीके समान जानना ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 109(क).6 श्रीरामचरितमानस पृ. 1015 धर्म–आचरण
सन्तों का स्वभाव

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं । संत मिलन सम सुख जग नाहीं ॥

पर उपकार बचन मन काया । संत सहज सुभाउ खगराया ॥

जगत्में दरिद्रताके समान दुःख नहीं है तथा संतोंके मिलनके समान जगत्में सुख नहीं है । और हे पक्षिराज! मन, वचन और शरीरसे परोपकार करना, यह संतोंका सहज स्वभाव है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 121(क).7 श्रीरामचरितमानस पृ. 1035 नीति–व्यवहार सेवा–करुणा–विनय
सन्तों का परोपकारी स्वभाव

संत सहहिं दुख पर हित लागी । पर दुख हेतु असंत अभागी ॥

भूर्ज तरू सम संत कृपाला । पर हित निति सह बिपति बिसाला ॥

संत दूसरोंकी भलाईके लिये दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरोंको दुःख पहुँचानेके लिये । कृपालु संत भोजके वृक्षके समान दूसरोंके हितके लिये भारी विपत्ति सहते हैं (अपनी खालतक उधड़वा लेते हैं)

उत्तरकाण्ड, चौपाई 121(क).8 श्रीरामचरितमानस पृ. 1035 सेवा–करुणा–विनय
सन्तों का अभ्युदय

संत उदय संतत सुखकारी । बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी ॥

परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा । पर निंदा सम अघ न गरीसा ॥

और संतोंका अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चन्द्रमा और सूर्यका उदय विश्वभरके लिये सुखदायक है । वेदोंमें अहिंसाको परम धर्म माना है और परनिन्दाके समान भारी पाप नहीं है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 121(क).11 श्रीरामचरितमानस पृ. 1036 धर्म–आचरण

पूँछहु राम कथा अति पावनि । सुक सनकादि संभु मन भावनि ॥

सत संगति दुर्लभ संसारा । निमिष दंड भरि एकउ बारा ॥

जो आपने मुझसे शुकदेवजी, सनकादि और शिवजीके मनको प्रिय लगनेवाली अति पवित्र रामकथा पूछी । संसारमें घड़ीभरका अथवा पलभरका एक बारका भी सत्संग दुर्लभ है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 123(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1040
परहित की भावना

संत हृदय नवनीत समाना । कहा कबिन्ह परि कहै न जाना ॥

निज परिताप द्रवइ नवनीता । पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता ॥

संतोंका हृदय मक्खनके समान होता है, ऐसा कवियोंने कहा है; परन्तु उन्होंने [असली बात] कहना नहीं जाना । क्योंकि मक्खन तो अपनेको ताप मिलनेसे पिघलता है और परम पवित्र संत दूसरोंके दुःखसे पिघल जाते हैं ।

गरुड़जी ने काकभुशुण्डिजी की प्रशंसा करते हुए कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 125(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 1042

गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन ॥

बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान ॥

हे गिरिजे! संत-समागमके समान दूसरा कोई लाभ नहीं है । पर वह (संत-समागम) श्रीहरिकी कृपाके बिना नहीं हो सकता, ऐसा वेद और पुराण गाते हैं ।

उत्तरकाण्ड, दोहा 125(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 1043 शरणागति

सो धन धन्य प्रथम गति जाकी । धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी ॥

धन्य घरी सोइ जब सतसंगा । धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा ॥

वह धन धन्य है जिसकी पहली गति होती है (जो दान देनेमें व्यय होता है) । वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्यमें लगी हुई है । वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो और वही जन्म धन्य है जिसमें ब्राह्मणकी अखण्ड भक्ति हो ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 127.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 1044

द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ । सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ ॥

राम कथा के तेइ अधिकारी । जिन्ह कें सत संगति अति प्यारी ॥

ब्राह्मणोंके द्रोहीको, यदि वह देवराज (इन्द्र) के समान ऐश्वर्यवान् राजा भी हो, तब भी यह कथा कभी न सुनानी चाहिये । श्रीरामकी कथाके अधिकारी वे ही हैं जिनको सत्संगति अत्यन्त प्रिय है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 128.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 1045