श्रीगणेशाय नमः।
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २
धर्म–आचरण
कर्तव्य और सदाचरण
20 पद्य
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २
अतिथिः किल पूजार्हः प्राकृतोऽपि विजानता ।
धर्म जिज्ञासमानेन किं पुनर्यादृशो भवान् ॥
धर्मकी जिज्ञासा रखनेवाले विज्ञ पुरुषके लिये एक साधारण अतिथि भी निश्चय ही पूजाके योग्य माना गया है । फिर आप जैसे असाधारण शौर्यशाली पुरुष कितने सम्मान के योग्य हैं, इस विषय में तो कहना क्या है?
मैनाक ने हनुमान्जी से कहा।
परदारावरोधस्य प्रसुप्तस्य निरीक्षणम् ।
इदं खलु ममात्यर्थे धर्मलोपं करिष्यति ॥
वे सोचने लगे कि इस तरह गाढ़ निद्रामें सोयी हुई परायी स्त्रियोंको देखना अच्छा नहीं है । यह तो मेरे धर्मका अत्यन्त विनाश कर डालेगा ।
हनुमान जी ने सोती हुई परायी स्त्रियों को देखते हुए धर्म के भय से शङ्कित होकर यह विचार किया।
अस्या देव्या मनस्तस्मिंस्तस्य चास्यां प्रतिष्ठितम् ।
तेनेयं स च धर्मात्मा मुहूर्तमपि जीवति ॥
इन देवीका मन श्रीरघुनाथजी में और श्रीरघुनाथजीका मन इनमें लगा हुआ है, इसीलिये ये तथा धर्मात्मा श्रीराम जीवित हैं । इनके मुहूर्तमात्र जीवन में भी यही कारण है ।
सीता जी के दर्शन पाकर हनुमान जी ने भगवान श्रीरघनाथजी के प्रति अपनी भावना व्यक्त की।
तेजसाऽऽदित्यसंकाशः क्षमया पृथिवीसमः ।
बृहस्पतिसमो बुद्ध्या यशसा वासवोपमः ॥
रक्षिता जीवलोकस्य खजनस्य च रक्षिता ।
रक्षिता स्वस्य वृत्तस्य धर्मस्य च परंतपः ॥
वे तेजमें सूर्य के समान, क्षमामें पृथ्वीके तुल्य, बुद्धिमें बृहस्पतिके सदृश और यशमें इन्द्रके समान हैं । वे सम्पूर्ण जीव-जगत् के तथा स्वजनोंके भी रक्षक हैं । शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम अपने सदाचार और धर्मकी रक्षा करते हैं ।
अर्चिष्मानर्चितोऽत्यर्थ ब्रह्मचर्यव्रते स्थितः ।
साधूनामुपकारशः प्रचारशश्च कर्मणाम् ॥
सर्वत्र अत्यन्त भक्तिभाव से उनकी पूजा होती है । ये कान्तिमान् एवं परम प्रकाशस्वरूप हैं, ब्रह्मचर्य व्रत के पालनमें लगे रहते हैं, साधु पुरुषोंका उपकार मानते और आचरणोंद्वारा सत्कर्मों के प्रचारका ढंग जानते हैं ।
धर्मापदेशात् त्यजतः खराज्यं ।
मां चाप्यरण्यं नयतः पदातेः ।
नासीद् यथा यस्य न भीर्न शोकः ।
कश्चित् स धैर्य हृदये करोति ॥
धर्मपालन के उद्देश्यसे अपने राज्यका त्याग करते और मुझे पैदल ही वनमें लाते समय जिन्हें तनिक भी भय और शोक नहीं हुआ, वे श्रीरघुनाथजी इस संकट के समय हृदय में धैर्य तो धारण करते हैं न?
सीता ने हनुमान्जी से कहा।
न मांसं राघवो भुङ्के न चैव मधु सेवते ।
वन्यं सुविहितं नित्यं भक्तमश्नाति पञ्चमम् ॥
कोई भी रघुवंशी न तो मांस खाता है और न मधुका ही सेवन करता है; फिर भगवान् श्रीराम इन वस्तुओंका सेवन क्यों करते? वे सदा चार समय उपवास करके पाँचवें समय शास्त्रविहित जंगली फल-मूल और नीवार आदि भोजन करते हैं ।
आनृशंस्यं परो धर्मस्त्वत्त एव मया श्रुतम् ।
जानामि त्वां महावीर्य महोत्साहं महाबलम् ॥
दया करना सबसे बड़ा धर्म है, यह मैंने आपसे ही सुना है । मैं आपको अच्छी तरह जानती हूँ । आपका बल, पराक्रम और उत्साह महान् है ।
सीता जी ने श्री राम से कहा।
अस्मिन् काले महाप्राज्ञ सत्त्वमातिष्ठ तेजसा ।
शूराणां हि मनुष्याणां त्वद्विधानां महात्मनाम् ।
विनष्टे वा प्रणष्टे वा शोकः सर्वार्थनाशनः ॥
अतः महाप्राज्ञ श्रीराम! आप इस समय तेजके साथ ही धैर्यका आश्रय लें । कोई वस्तु खो गयी हो या नष्ट हो गयी हो, उसके लिये आप-जैसे शूरवीर महात्मा पुरुषोंको शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि शोक सब कामको बिगाड़ देता है ।
त्रिषु चैतेषु यच्छ्रेष्ठं श्रुत्वा तन्नावबुध्यते ।
राजा वा राजमात्रो वा व्यर्थ तस्य बहुश्रुतम् ॥
धर्म, अर्थ और काम इन तीनोंमें धर्म ही श्रेष्ठ है; अतः विशेष अवसरोंपर अर्थ और कामकी उपेक्षा करके भी धर्मका ही सेवन करना चाहिये — इस बातको विश्वसनीय पुरुषों-से सुनकर भी जो राजा या राजपुरुष नहीं समझता अथवा समझकर भी स्वीकार नहीं करता, उसका अनेक शास्त्रोंका अध्य व्यर्थ ही है ।
कर्मणा मनसा वाचा यथा नातिचराम्यहम् ।
राघवं सर्वधर्मक्षं तथा मां पातु पावकः ॥
यदि मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता श्रीरघुनाथजीका अतिक्रमण न किया हो तो अग्निदेव मेरी रक्षा करें ।
सीताजी ने अग्निदेव के समीप हाथ जोड़कर यह कहा।
यत् तु कार्य वयस्येन स्निग्धेन च हितेन च ।
कृतं सुग्रीव तत् सर्वे भवताधर्मभीरुणा ॥
सखे सुग्रीव! एक हितैषी एवं प्रेमी मित्रको जो काम करना चाहिये, वह सब तुमने पूरा-पूरा कर दिखाया; क्योंकि तुम अधर्मसे डरनेवाले हो ।
श्रीराम ने विभीषणसहित महापराक्रमी सुग्रीव से कहा।
नहि धर्माभिरतानां लोके किंचन दुर्लभम् ॥
‘क्योंकि जो धर्म में अनुरक्त हैं, उनके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है’
विभीषण ने ब्रह्माजी से कहा।
माच बुद्धिमधर्मे त्वं कुर्या राजन् कथंचन ।
बुद्धिमन्तो हि राजानो ध्रुवमश्नन्ति मेदिनीम् ॥
राजन्! तुम किसी तरह भी अधर्म में मन न लगाना । जिनकी बुद्धि ठीक है, वे राजा निश्चय ही दीर्घकालतक पृथ्वी-का राज्य भोगते हैं ।
श्रीराम ने विभीषण से कहा।
एष राजन् परो धर्मः फलवान् प्रेत्य राघव ।
नहि धर्माद् भवेत् किंचिद् दुष्प्रापमिति मे मतिः ॥
रघुनन्दन! यह प्रजापालनरूप परम धर्म राजाको पर-लोक में उत्तम फल देनेवाला होता है । मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि धर्मसे कुछ भी दुर्लभ नहीं है ।
कुत्ते ने श्रीराम से कहा।
नावसीदन्ति राजानो विप्रवासेषु राघव ।
प्रजा च परिपाल्या हि क्षात्रधर्मेण राघव ॥
रघुकुलभूषण! राजालोग परदेशमें रहनेपर भी दुखी नहीं होते हैं । रघुवीर! राजाको क्षत्रिय धर्मके अनुसार प्रजाका भलीभाँति पालन करना चाहिये ।
श्रीरामचन्द्रजी ने शत्रुघ्न से कहा।
एवं स कालः सुमहान् राज्यस्थस्य महात्मनः ।
धर्मे प्रयतमानस्य व्यतीयाद् राघवस्य च ॥
इस प्रकार राज्य करते हुए महात्मा भगवान् श्रीरघुनाथ जीका बहुत बड़ा समय धर्मपालनके प्रयत्न में ही बीता ।
विसर्जये त्वां सौमित्रे मा भूद् धर्मविपर्ययः ।
त्यागो वधो वा विहितः साधूनां ह्यभयं समम् ॥
‘सुमित्रानन्दन! मैं तुम्हारा परित्याग करता हूँ, जिससे धर्मका लोप न हो । साधु पुरुषों का त्याग किया जाय अथवा वध — दोनों समान ही हैं’
श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा।
त्यजैनं बलवान् कालो मा प्रतिज्ञां वृथा कृथाः ।
प्रतिज्ञायां हि नष्टायां धर्मो हि विलयं व्रजेत् ॥
काल बड़ा प्रबल है । तुम लक्ष्मणका परित्याग कर दो । प्रतिशा झूठी न करो; क्योंकि प्रतिज्ञाके नष्ट होनेपर धर्मका लोप हो जायगा ।
शासितश्च सखित्वेन कार्य ते मम शासनम् ।
प्रजाः संरक्ष धर्मेण नोत्तरं वक्तुमर्हसि ॥
मैंने मित्रभावसे ये बातें तुमसे कही हैं । तुम्हें मेरी आशाका पालन करना चाहिये । तुम धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करो । इस समय मैंने जो कुछ कहा है, तुम्हें उसका प्रति-वाद नहीं करना चाहिये ।
भगवान् ने विभीषण से मित्रभाव से कहा।