श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६
नीति–व्यवहार
लोकव्यवहार, मित्रता, वाणी और राजधर्म
35 पद्य
महाभारत — खण्ड ६
भीष्म उवाच
उपदेशो न कर्तव्यो जातिहीनस्य कस्यचित् ।
उपदेशे महान् दोष उपाध्यायस्य भाष्यते ॥
किसी भी नीच जातिके मनुष्यको उपदेश नहीं देना चाहिये । उसे उपदेश देनेपर उपदेशक आचार्यके लिये महान् दोष बताया जाता है ।
भीष्म उवाच
उपदेशो न कर्तव्यः कदाचिदपि कस्यचित् ।
उपदेशाद्धि तत् पापं ब्राह्मणः समवाप्नुयात् ॥
ब्राह्मणको चाहिये कि वह कभी किसीको उपदेश न करे; क्योंकि उपदेश करनेसे वह शिष्यके पापको स्वयं ग्रहण करता है ।
भीष्म उवाच
विमृश्य तस्मात् प्राज्ञेन वक्तव्यं धर्ममिच्छता ।
सत्यानृतेन हि कृत उपदेशो हिनस्ति हि ॥
अतः धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले विद्वान् पुरुषको बहुत सोच-विचारकर बोलना चाहिये; क्योंकि साँच और झूठमिश्रित वाणीसे किया गया उपदेश हानिकारक होता है ।
भीष्म उवाच
वक्तव्यमिह पृष्टेन विनिश्चित्य विनिश्चयम् ।
स चोपदेशः कर्तव्यो येन धर्ममवाप्नुयात् ॥
यहाँ किसीके पूछनेपर बहुत सोच-विचारकर शास्त्रका जो सिद्धान्त हो वही बताना चाहिये तथा उपदेश वह करना चाहिये जिससे धर्मकी प्राप्ति हो ।
युधिष्ठिर उवाच
अनृताः स्त्रिय इत्येवं वेदेष्वपि हि पठ्यते ।
धर्मोऽयं पूर्विका संज्ञा उपचारः क्रियाविधिः ॥
वेदोंमें भी यह बात पढ़ी गयी है कि स्त्रियाँ असत्यभाषिणी होती हैं, ऐसी दशामें उनका वह असत्य भी सहधर्मके अन्तर्गत आ सकता है, किंतु असत्य कभी धर्म नहीं हो सकता; अतः दाम्पत्यधर्मको जो सहधर्म कहा गया है, यह उसकी गौण संज्ञा है । वे पति-पत्नी साथ रहकर जो भी कार्य करते हैं, उसीको उपचारतः धर्म नाम दे दिया गया है ।
राजा उवाच
साधुवृत्तो हि यो राजा सद्वृत्तमनुतिष्ठति ।
किं न प्राप्तं भवेत् तेन स्वव्याजेनेह कर्मणा ॥
जो राजा सदाचारी होकर सबके साथ सद्बर्ताव करता है वह अपने निश्छल कर्मसे किस वस्तुको नहीं प्राप्त कर लेता ।
देवशर्मा उवाच
नासां स्नेहो नरैः कार्यस्तथैवेर्ष्या जनेश्वर ।
खेदमास्थाय भुञ्जीत धर्ममास्थाय चैव ह ।
अनृताविह पर्वादिदोषवर्ज नराधिप ॥
नरेश्वर! मनुष्योंको स्त्रियोंके प्रति न तो विशेष आसक्त होना चाहिये और न उनसे ईर्ष्या ही करनी चाहिये । वैराग्यपूर्वक धर्मका आश्रय लेकर पर्व आदि दोषका त्याग करते हुए ऋतुस्नानके पश्चात् उनका उपभोग करना चाहिये ।
भीष्म उवाच
शीलवृत्ते समाज्ञाय विद्यां योनिं च कर्म च ।
सद्भिरेवं प्रदातव्या कन्या गुणयुते वरे ॥
भीष्मजीने कहा — बेटा! सत्पुरुषोंको चाहिये कि वे पहले वरके शील-स्वभाव, सदाचार, विद्या, कुल, मर्यादा और कार्योंकी जाँच करें । फिर यदि वह सभी दृष्टियोंसे गुणवान् प्रतीत हो तो उसे कन्या प्रदान करें ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर को कन्यादान के विषय में उपदेश देते हुए कहा।
भीष्म → राजन
नैव निष्ठाकरं शुल्कं ज्ञात्वाऽऽसीत् तेन नाहृतम् ।
न हि शुल्कपराः सन्तः कन्यां ददति कर्हिचित् ॥
भीष्मजीने कहा — राजन्! मूल्य दे देनेसे ही विवाहका अन्तिम निश्चय नहीं हो जाता (उसमें परिवर्तनकी सम्भावना रहती ही है) । यह समझकर ही मूल्य देनेवाला मूल्य देता है और फिर उसे वापस नहीं माँगता । सज्जन पुरुष कभी-कभी मूल्य लेकर भी किसी विशेष कारणवश कन्यादान नहीं करते हैं ।
भीष्मजी ने युधिष्ठिर से कहा।
भीष्म उवाच
गोब्राह्मणाय साहाय्यं कुर्वाणा वै न संशयः ।
आनृशंस्यमनुक्रोशः सत्यवाक्यं तथा क्षमा ॥
स्वशरीरैरपि त्राणं बाह्यानां सिद्धिकारणम् ।
भवन्ति मनुजव्याघ्र तत्र मे नास्ति संशयः ॥
पुरुषसिंह! यदि ये गौ और ब्राह्मणोंकी सहायता करें, क्रूरतापूर्ण कर्मको त्याग दें, सबपर दया करें, सत्य बोलें, दूसरोंके अपराध क्षमा करें और अपने शरीरको कष्टमें डालकर भी दूसरोंकी रक्षा करें तो इन वर्णसंकर मनुष्योंकी भी पारमार्थिक उन्नति हो सकती है — इसमें संशय नहीं है ।
भीष्म → राजन
यथोपदेशं परिकीर्तितासु ।
नरः प्रजायेत विचार्य बुद्धिमान् ।
निहीनयोनिर्हि सुतोऽवसादयेत् ।
तितीर्षमाणं हि यथोपलो जले ॥
राजन्! जैसा ऋषि-मुनियोंने उपदेश किया है, उसके अनुसार बतायी हुई वर्ण एवं बाह्यजातिकी स्त्रियोंमें बुद्धिमान् मनुष्यको अपने हिताहितका भलीभाँति विचार करके ही संतान उत्पन्न करनी चाहिये; क्योंकि नीच योनिमें उत्पन्न हुआ पुत्र भवसागरसे पार जानेकी इच्छावाले पिताको उसी प्रकार डुबोता है, जैसे गलेमें बँधा हुआ पत्थर तैरनेवाले मनुष्यको पानीके अतलगर्तमें निमग्न कर देता है ।
भीष्म उवाच
आर्यरूपसमाचारं चरन्तं कृतके पथि ।
सुवर्णमन्यवर्णं वा स्वशीलं शास्ति निश्चये ॥
जो कृत्रिम मार्गका आश्रय लेकर श्रेष्ठ पुरुषोंके अनुरूप आचरण करता है, वह सोना है या काँच — शुद्ध वर्णका है या संकर वर्णका? इसका निश्चय करते समय उसका स्वभाव ही सब कुछ बता देता है ।
भीष्म उवाच
अरक्षितारं हर्तारं विलोप्तारमनायकम् ।
तं वै राजकलिं हन्युः प्रजाः सन्नह्य निर्घृणम् ॥
जो प्रजाकी रक्षा नहीं करता, केवल उसके धनको लूटता-खसोटता रहता है, तथा जिसके पास कोई नेतृत्व करनेवाला मन्त्री नहीं है, वह राजा नहीं, कलियुग है । समस्त प्रजाको चाहिये कि ऐसे निर्दयी राजाको बाँधकर मार डाले ।
बृहस्पति उवाच
अमृतप्रसवां भूमिं प्राप्नोति पुरुषो ददत् ।
नास्ति भूमिसमं दानं नास्ति मातृसमो गुरुः ।
नास्ति सत्यसमो धर्मो नास्ति दानसमो निधिः ॥
भूमिदान करनेवाला पुरुष अमृत पैदा करनेवाली भूमि पाता है, भूमिके समान कोई दान नहीं है, माताके समान कोई गुरु नहीं है, सत्यके समान कोई धर्म नहीं है और दानके समान कोई निधि नहीं है ।
बृहस्पति ने इन्द्र से कहा।
नारद उवाच
प्रत्यक्षं प्रीतिजननं भोक्तुर्दातुर्भवत्युत ।
सर्वाण्यन्यानि दानानि परोक्षफलवन्त्युत ॥
अन्नका दान ही एक ऐसा दान है, जो दाता और भोक्ता, दोनोंको प्रत्यक्षरूपसे संतुष्ट करनेवाला होता है । इसके सिवा अन्य जितने दान हैं, उन सबका फल परोक्ष है ।
पितामह उवाच
न त्वेवासां दानमात्रं प्रशस्तं ।
पात्र कालो गोविशेषो विधिश्च ।
कालज्ञानं विप्र गवान्तरं हि ।
दुःखं ज्ञातुं पावकादित्यभूतम् ॥
केवल गौओंका दानमात्र कर देना प्रशंसाकी बात नहीं है; उसके लिये उत्तम पात्र, उत्तम समय, विशिष्ट गौ, विधि और कालका ज्ञान आवश्यक है । विप्रवर! गौओंमें जो परस्पर तारतम्य है, उसको तथा अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी पात्रको जानना बहुत ही कठिन है ।
भीष्म उवाच
न चाशिष्यायाव्रतायोपकुर्या ।
न्नाश्रद्दधानाय न वक्रबुद्धये ।
गुह्यो ह्ययं सर्वलोकस्य धर्मो ।
नेमं धर्मं यत्र तत्र प्रजल्पेत् ॥
जो मनुष्य अपना शिष्य नहीं है, जो व्रतका पालन नहीं करता, जिसमें श्रद्धाका अभाव है तथा जिसकी बुद्धि कुटिल है, उसे इस गोदान-विधिका उपदेश न दे; क्योंकि यह सबसे गोपनीय धर्म है; अतः इसका यत्र-तत्र सर्वत्र प्रचार नहीं करना चाहिये ।
भीष्म → राजन
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु नरो लोभं विवर्जयेत् ।
एष धर्मः परो राजंस्तस्माल्लोभं विवर्जयेत् ॥
राजन्! इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह सभी दशाओंमें लोभका त्याग करे, क्योंकि यह सबसे बड़ा धर्म है । अतः लोभको अवश्य त्याग देना चाहिये ।
भीष्म उवाच
सतां गुरूणां वृद्धानां कुलस्त्रीणां विशेषतः ।
परिवादं न च ब्रूयात् परेषामात्मनस्तथा ।
परिवादो ह्यधर्माय प्रोच्यते भरतर्षभ ॥
भरतश्रेष्ठ! सत्पुरुषों, गुरुजनों, वृद्धों और विशेषतः कुलांगनाओंकी, दूसरे लोगोंकी और अपनी भी निन्दा न करे; क्योंकि निन्दा करना अधर्मका हेतु बताया गया है ।
भीष्म उवाच
न चेर्ष्या स्त्रीषु कर्तव्या रक्ष्या दाराश्च सर्वशः ।
अनायुष्या भवेदीर्ष्या तस्मादीर्ष्या विवर्जयेत् ॥
सभी उपायोंसे अपनी स्त्रीकी रक्षा करनी चाहिये । स्त्रियोंसे ईर्ष्या रखना उचित नहीं है । ईर्ष्या करनेसे आयु क्षीण होती है । इसलिये उसे त्याग देना ही उचित है ।
बृहस्पति उवाच
यथा परः प्रक्रमते परेषु ।
तथापरे प्रक्रमन्ते परस्मिन् ।
तथैव तेऽस्तूपमा जीवलोके ।
यथा धर्मो नैपुणेनोपदिष्टः ॥
जैसे एक मनुष्य दूसरोंपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार अवसर आनेपर दूसरे भी उसके ऊपर आक्रमण करते हैं । इसीको तुम जगत्में अपने लिये भी दृष्टान्त समझो । अतः किसीपर आक्रमण नहीं करना चाहिये । इस प्रकार यहाँ कौशलपूर्वक धर्मका उपदेश किया है ।
अरुन्धती उवाच
अश्रद्दधानो मानी च ब्रह्महा गुरुतल्पगः ।
असम्भाष्या हि चत्वारो नैषां धर्मः प्रकाशयेत् ॥
जो श्रद्धासे रहित, अभिमानी, ब्रह्महत्यारे और गुरुस्त्रीगामी हैं, इन चार प्रकारके मनुष्योंसे बात भी नहीं करनी चाहिये । इनके सामने धर्मके रहस्यको प्रकाशित न करे ।
श्रीमहेश्वर उवाच
परुषं ये न भाषन्ते कटुकं निष्ठुरं तथा ।
अपैशुन्यरताः सन्तस्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥
जो किसीकी चुगली नहीं खाते और कभी किसीसे रूखी, कड़वी और निष्ठुरतापूर्ण बात मुँहसे नहीं निकालते, वे सज्जन पुरुष स्वर्गमें जाते हैं ।
श्रीमहेश्वर उवाच
पिशुनां न प्रभाषन्ते मित्रभेदकरीं गिरम् ।
ऋतं मैत्रं तु भाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥
जो दो मित्रोंमें फूट डालनेवाली चुगलीकी बातें नहीं करते हैं, सत्य और मैत्रीभावसे युक्त वचन बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।
भीष्म उवाच
अवराणां समानानां शिष्याणां च समाचरेत् ।
पापमाचक्षते नित्यं हृदयं पापकर्मिणः ॥
जो अपने बराबरके हों, अपनेसे छोटे हों अथवा शिष्य हों, उनको ‘तुम’ कहनमें कोई हर्ज नहीं है । पापकर्मी पुरुषका हृदय ही उसके पापको प्रकट कर देता है ।
युधिष्ठिर उवाच
मैवं भव न ते युक्तमिदमज्ञानमीदृशम् ।
प्रायश्चित्तानि सर्वाणि विदितानि च तेऽनघ ।
राजधर्माश्च ते सर्वे दानधर्माश्च ते श्रुताः ॥
तुम ऐसे न बनो, तुम्हारे लिये इस तरह अज्ञानका अवलम्बन उचित नहीं है । निष्पाप नरेश! तुम्हें सब प्रकारके प्रायश्चित्तोंका भी ज्ञान है । तुमने सब प्रकारके राजधर्म और दानधर्म भी सुने हैं ।
व्यास उवाच
ईश्वरेण च युक्तोऽयं साध्वसाधु च मानवः ।
करोति पुरुषः कर्म तत्र का परिदेवना ॥
यह मनुष्य अथवा पुरुषसमुदाय ईश्वरसे प्रेरित होकर ही भले-बुरे काम करता है । अतः इसके लिये शोक करनेकी क्या आवश्यकता है?
व्यास उवाच
नागायुतसमप्राणः साक्षाद् विष्णुरिवापरः ।
स यक्ष्यमाणो धर्मात्मा शातकुम्भमयान्युत ।
कारयामास शुभ्राणि भाजनानि सहस्रशः ॥
उनमें दस हजार हाथियोंके समान बल था । वे साक्षात् दूसरे विष्णुके समान जान पड़ते थे । धर्मात्मा मरुत्त जब यज्ञ करनेको उद्यत हुए, उस समय उन्होंने सहस्रों सोनेके समुज्ज्वल पात्र बनवाये ।
यति उवाच
अहिंसा सर्वधर्माणामिति वृद्धानुशासनम् ।
यदिहिंस्रं भवेत् कर्म तत् कार्यमिति विद्महे ॥
वृद्ध पुरुषोंका यह उपदेश है कि अहिंसा सब धर्मोंमें श्रेष्ठ है, जो कार्य हिंसासे रहित हो वही करने योग्य है, यही हमारा मत है ।
ब्रह्मा उवाच
परिवादकथा नित्यं देवब्राह्मणवैदिकी ।
अत्यागश्चाभिमानश्च मोहो मन्युस्तथाक्षमा ।
मत्सरश्चैव भूतेषु तामसं वृत्तमिष्यते ॥
देवता, ब्राह्मण और वेदकी सदा निन्दा करना, दान न देना, अभिमान, मोह, क्रोध, असहनशीलता और प्राणियोंके प्रति मात्सर्य — ये सब तामस बर्ताव हैं ।
ब्रह्मा उवाच
तेष्वप्रमादं कुर्वीत त्रिषु कर्मसु धर्मवित् ।
दान्तो मैत्रः क्षमायुक्तः सर्वभूतसमो मुनिः ॥
सर्वमेतद् यथाशक्ति विप्रो निर्वर्तयन् शुचिः ।
एवं युक्तो जयेत् स्वर्गं गृहस्थः संशितव्रतः ॥
धर्मज्ञ ब्राह्मणको इनके पालनमें कभी प्रमाद नहीं करना चाहिये । इन्द्रियसंयमी, मित्रभावसे युक्त, क्षमावान्, सब प्राणियोंके प्रति समानभाव रखनेवाला, मननशील, उत्तम व्रतका पालन करनेवाला और पवित्रतासे रहनेवाला गृहस्थ ब्राह्मण सदा सावधान रहकर अपनी शक्तिके अनुसार यदि उपर्युका नियमोंका पालन करता है तो वह स्वर्गलोकको जीत लेता है ।
ब्रह्माजी ने महर्षिगण से कहा।
ब्रह्मा उवाच
परं नोद्वेजयेत् काचिन्न च कस्यचिदुद्विजेत् ।
विश्वास्यः सर्वभूतानामग्र्यो मोक्षविदुच्यते ॥
किसी दूसरे प्राणीको उद्वेगमें न डाले और स्वयं भी किसीसे उद्विग्न न हो । जो सब प्राणियोंका विश्वासपात्र बन जाता है, वह सबसे श्रेष्ठ और मोक्ष-धर्मका ज्ञाता कहलाता है ।
ब्रह्मा उवाच
तथैनमवमन्येरन् परे सततमेव हि ।
यथावृत्तश्चरेच्छान्तः सतां धर्मानकुत्सयन् ।
य एवं वृत्तसम्पन्नः स मुनिः श्रेष्ठ उच्यते ॥
जिस कामके करनेसे समाजके दूसरे लोग अनादर करें, वैसा ही काम शान्त रहकर सदा करता रहे, किंतु सत्पुरुषोंके धर्मकी निन्दा न करे । जो इस प्रकारके बर्तावसे सम्पन्न है, वह श्रेष्ठ मुनि कहलाता है ।
उत्तङ्क → राजन
प्राहुर्वाक्संयतं विप्रं धर्मनैपुणदर्शिनः ।
मित्रेषु यश्च विषमः स्तेन इत्येव तं विदुः ॥
उत्तंकने कहा — राजन्! धर्मनिपुण विद्वानोंने उसीको ब्राह्मण कहा है, जो अपनी वाणीका संयम करता हो-सत्यवादी हो । जो मित्रोंके साथ विषमताका व्यवहार करता है, उसे चोर माना गया है ।
इत्युक्तोऽहं नरेन्द्रेण न हन्तव्या नृपा इति ।
कथं तन्न मृषेदं स्याद् धर्मराजवचः शुभम् ।
न हन्येरंश्च राजानो राज्ञश्चाज्ञा कृता भवेत् ॥
‘अहो! महाराजने कहा था कि क्षत्रियोंका वध न करना । धर्मराजका वह मंगलमय वचन कैसे मिथ्या न हो । राजालोग मारे न जायँ और राजा युधिष्ठिरकी आज्ञाका पालन हो जाय, इसके लिये क्या करना चाहिये ।’