श्रीगणेशाय नमः।
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २
नीति–व्यवहार
लोकव्यवहार, मित्रता, वाणी और राजधर्म
22 पद्य
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २
यदि रामः समुद्रान्तां मेदिनीं परिवर्तयेत् ।
अस्याः कृते जगच्चापि युक्तमित्येव मे मतिः ॥
इन के लिये तो यदि भगवान् श्रीरामं समुद्रपर्यन्त पृथ्वी तथा सारे संसार को भी उलट देते तो भी वह मेरे विचार से उचित ही होता ।
प्रीतोऽस्मि सोऽहं यद्भुतं वनं तैः कृतकर्मभिः ।
धर्षितं मर्षणीयं च चेष्टितं कृतकर्मणाम् ॥
गच्छ शीघ्रं मधुवनं संरक्षस्व त्वमेव हि ।
शीघ्रं प्रेषय सर्वास्तान् हनूमत्प्रमुखान् कपीन् ॥
मामा! अपना कार्य सिद्ध करके लौटे हुए उन वानरोंने जो मेरे मधुवनका उपभोग किया है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ; अतः तुम्हें भी कृतकृत्य होकर आये हुए उन कपियोंकी ढिठाई तथा उद्दण्डतापूर्ण चेष्टाओंको क्षमा कर देना चाहिये । अब शीघ्र जाओ और तुम्हीं उस मधुवनकी रक्षा करो । साथ ही हनुमान् आदि सब वानरोंको जल्दी यहाँ भेजो ।
सुग्रीव ने दधिमुख से कहा।
नाशापयितुमीशोऽहं युवराजोऽस्मि यद्यपि ।
अयुक्तं कृतकर्माणो यूयं धर्षयितुं बलात् ॥
‘यद्यपि मैं युवराज हूँ तो भी आपलोगोंपर हुक्म नहीं चला सकता । आपलोग बहुत बड़ा कार्य पूरा करके आये हैं, अतः बलपूर्वक आपपर शासन चलाना कदापि उचित नहीं है’
अङ्गद ने वानरों से कहा।
तदलं शोकमालम्ब्य क्रोधमालम्ब भूपते ।
निश्चेष्टाः क्षत्रिया मन्दाः सर्वे चण्डस्य बिभ्यति ॥
पृथ्वीनाथ! अपने हृदयमें शोकको स्थान देना व्यर्थ है । इस समय तो आप शत्रुओंके प्रति क्रोध धारण कीजिये । जो क्षत्रिय मन्द (क्रोधशून्य) होते हैं, उनसे कोई चेष्टा नहीं बन पाती; परंतु जो शत्रुके प्रति आवश्यक रोषसे भरा होता है, उससे सब डरते हैं ।
एकोऽर्थ विमृशेदेको धर्मे प्रकुरुते मनः ।
एकः कार्याणि कुरुते तमाहुर्मध्यमं नरम् ॥
जो अकेला ही अपने कर्तव्यका विचार करता है, अकेला ही धर्ममें मन लगाता है और अकेला ही सब काम करता है, उसे मध्यम श्रेणीका पुरुष कहा जाता है ।
यः पश्चात् पूर्वकार्याणि कर्माण्यभिचिकीर्षति ।
पूर्व चापरकार्याणि स न वेद नयानयो ॥
जो पहले करने योग्य कार्योंको पीछे करना चाहता है और पीछे करने योग्य काम पहले ही कर डालता है, वह नीति और अनीतिको नहीं जानता ।
परस्य वीर्य स्वबलं च बुद्ध्वा ।
स्थानं क्षयं चैव तथैव वृद्धिम् ।
तथा स्वपक्षेऽप्यनुमृश्य बुद्ध्या ।
वदेत् क्षमं स्वामिहितं स मन्त्री ॥
‘वास्तवमें सच्चा मन्त्री वही है जो अपने और शत्रु पक्ष के बल-पराक्रमको समझकर तथा दोनों पक्षोंकी स्थिति, हानि और वृद्धिका अपने बुद्धिके द्वारा विचार करके जो स्वामीके लिये हितकर और उचित हो वही बात कहे’
विभीषण ने राक्षस सेनापतियों के मध्य यह बात कही।
गृहीतो वा न विज्ञातो भारोऽज्ञानस्य वाह्यते ।
ईदृशैः सचिवैर्युक्तो मूर्खैर्दिष्ट्या धराम्यहम् ॥
यदि तुमने उसे ग्रहण भी किया हो तो भी इस समय तुम्हें उसका ज्ञान नहीं रह गया है — तुमने उसे भुला दिया है । तुमलोग केवल अज्ञानका बोझ ढो रहे हो । ऐसे मूर्ख मन्त्रियोंके सम्पर्क में रहते हुए भी जो मैं अपने राज्यको सुरक्षित रख सका हूँ, यह सौभाग्यकी ही बात है ।
रावण ने शुक और सारण से क्रोधपूर्वक यह कठोर बात कही।
आचार्या गुरवो वृद्धा वृथा वां पर्युपासिताः ।
सारं यद् राजशास्त्राणामनुजीव्यं न गृह्यते ॥
तुमलोगोंने आचार्य, गुरु और वृद्धोंकी व्यर्थ ही सेवा की है; क्योंकि राजनीतिका जो संग्रहणीय सार है, उसे तुम नहीं ग्रहण कर सके ।
रावण ने बात समाप्त होने पर वीर शुक और सारण को क्रोधपूर्वक यह कठोर बात कही।
तन्न विश्वसनीयं वो राक्षसानां रणाजिरे ।
एतेनैवोपमानेन नित्यं जिह्मां हि राक्षसाः ॥
‘इसलिये इसी दृष्टान्तको सामने रखकर आपको रणक्षेत्र में राक्षसोंका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि राक्षस सदा ही कुटिल होते हैं’
गरुड़ ने श्रीराम से कहा।
देशकालविहीनानि कर्माणि विपरीतवत् ।
क्रियमाणानि दुष्यन्ति हवींष्यप्रयतेष्विव ॥
जो कार्यं उचित देश-काल न होनेपर विपरीत स्थिति में किये जाते हैं, वे संस्कारहीन अग्नियोंमें होमे गये हविष्य की भाँति केवल दुःखके ही कारण होते हैं ।
त्रयाणां पञ्चधा योगं कर्मणां यः प्रपद्यते ।
सचिवैः समयं कृत्वा स सम्यग् वर्तते पथि ॥
जो राजा सचिवोंके साथ विचार करके क्षय, वृद्धि और स्थानरूपसे उपलक्षित साम, दान और दण्ड — इन तीनों कर्मोंके पाँच प्रकारके प्रयोगको काममें लाता है, वही उत्तम नीति मार्गपर विद्यमान है, ऐसा समझना चाहिये ।
यथागमं च यो राजा समयं च चिकीर्षति ।
बुध्यते सचिवैर्बुद्ध्या सुहृदश्चानुपश्यति ॥
जो नरेश नीतिशास्त्र के अनुसार मन्त्रियोंके साथ क्षयं आदिके लिये उपयुक्त समयका विचार करके तदनुरूप कार्यं करता है और अपनी बुद्धिसे सुहृदोंकी भी पहचान कर लेता है, वही कर्तव्य और अकर्तव्यका विवेक कर पाता है ।
कर्मणा सूचयात्मानं न विकत्थितुमर्हसि ।
पौरुषेण तु यो युक्तः स तु शूर इति स्मृतः ॥
पराक्रमके द्वारा अपनी वीरताका परिचय दे । झूठी शेखी बघारना तेरे लिये उचित नहीं है । शूर वही माना गया है, जिसमें पुरुषार्थ हो ।
युद्धस्थल में अतिकाय के रोष और गर्व से भरे वचन सुनकर लक्ष्मण को क्रोध आया और उन्होंने यह वचन कहे।
देशकालौ च विज्ञेयौ लक्षणानीङ्गितानि च ।
दैन्यं हर्षश्च खेदश्च रथिनश्च बलाबलम् ॥
सारथिको देश-कालका, शुभाशुभ लक्षणोंका, रथीकी चेष्टाओं का, उत्साह, अनुत्साह और खेदका तथा बलाबलका भी ज्ञान रखना चाहिये ।
रावण के सारथि ने रावण से कहा।
त्यागिनं संग्रहीतारं सानुक्रोशं जितेन्द्रियम् ।
सर्वे त्वामभिगच्छन्ति ततः सम्बोधयामि ते ॥
ऐसा करने से सब लोग यह जानेंगे कि विभीषण उचित अवसरपर धनका त्याग एवं दान करते हैं, यथासमय न्यायोचित रीतिसे धन और रत्न आदिका संग्रह करते रहते हैं, दयालु हैं और जितेन्द्रिय हैं; इसलिये तुम्हें ऐसा करने के लिये समझा रहा हूँ ।
श्रीराम ने विभीषण को वानर सेना के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने हेतु रत्न और धन देने की सलाह दी।
हीनं रतिगुणैः सर्वैरभिहन्तारमाहवे ।
सेना त्यजति संविग्ना नृपतिं तं नरेश्वर ॥
‘नरेश्वर! जो राजा सेवकों में प्रेम उत्पन्न करनेवाले दान-मान आदि सब गुणोंसे रहित होता है, उसे युद्ध के अवसरपर उद्विग्न हुई सेना छोड़कर चल देती है, वह समझती है कि यह व्यर्थ ही हमारा वध करा रहा है-हमारे भरण-पोषणका या योग-क्षेमकी चिन्ता इसे बिल्कुल नहीं है’
श्रीराम ने विभीषण को वानरयूथपतियों के सत्कार और एक गुणहीन राजा के व्यवहार के विषय में समझाते हुए ऐसा कहा।
नैतदेको भवानेव करिष्यति विपर्ययम् ।
सुरासुरैराचरितं तत् कुरुष्व वचो मम ॥
‘इस तरहका विपरीत आचरण केवल आप ही नहीं करेंगे । देवताओं और असुरोंने भी पहले इस नीतिसे काम लिया है; अतः आप मेरी बात मान लें’
प्रहस्त ने दशग्रीव से कहा।
एवं बलिभ्यो बलिनः सन्ति राघवनन्दन ।
नावज्ञा हि परे कार्या य इच्छेच्छ्रेय आत्मनः ॥
रघुकुलनन्दन! इस प्रकार संसारमें बलवान् से बलवान् वीर पड़े हुए हैं; अतः जो अपना कल्याण चाहे उसे दूसरे की अवहेलना नहीं करनी चाहिये ।
मुनि ने श्रीराम से कहा।
माच बुद्धिमधर्मे त्वं कुर्या राजन् कथंचन ।
बुद्धिमन्तो हि राजानो ध्रुवमश्नन्ति मेदिनीम् ॥
राजन्! तुम किसी तरह भी अधर्म में मन न लगाना । जिनकी बुद्धि ठीक है, वे राजा निश्चय ही दीर्घकालतक पृथ्वी-का राज्य भोगते हैं ।
श्रीराम ने विभीषण से कहा।
लोकपीडाकरं कर्म न कर्तव्यं विचक्षणैः ।
बालानां तु शुभं वाक्यं ग्राह्यं लक्ष्मणपूर्वज ।
तस्माच्छृणोमि ते वाक्यं साधु युक्तं महाबल ॥
‘लक्ष्मण के बड़े भाई! बुद्धिमान् पुरुषोंको ऐसा कर्म नहीं करना चाहिये, जो सम्पूर्ण जगत् को पीड़ा देने वाला हो । बालकोंकी कही हुई बात भी यदि अच्छी हो तो उसे ग्रहण करना ही उचित है; अतः महाबली वीर! मैंने तुम्हारी उत्तम एवं युक्तिसंगत बातको बड़े ध्यान से सुना है’
भरत ने श्रीराम से कहा।
शासितश्च सखित्वेन कार्य ते मम शासनम् ।
प्रजाः संरक्ष धर्मेण नोत्तरं वक्तुमर्हसि ॥
मैंने मित्रभावसे ये बातें तुमसे कही हैं । तुम्हें मेरी आशाका पालन करना चाहिये । तुम धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करो । इस समय मैंने जो कुछ कहा है, तुम्हें उसका प्रति-वाद नहीं करना चाहिये ।
भगवान् ने विभीषण से मित्रभाव से कहा।