श्रीगणेशाय नमः।
श्रीरामचरितमानस
सेवा–करुणा–विनय
सेवा, दया और नम्रता
24 पद्य
श्रीरामचरितमानस
प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आप समान ॥
तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान ॥
प्रभु (श्रीरामचन्द्रजी) तो वृक्षके नीचे और बंदर डालीपर (अर्थात् कहाँ मर्यादापुरुषोत्तम सच्चिदानन्दघन परमात्मा श्रीरामजी और कहाँ पेड़ोंकी शाखाओंपर कूदनेवाले बंदर) । परन्तु ऐसे बंदरोंको भी उन्होंने अपने समान बना लिया । तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी सरीखे शीलनिधान स्वामी कहीं भी नहीं हैं ।
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा । श्रुति कह परम धरम उपकारा ॥
पर हित लागि तजइ जो देही । संतत संत प्रसंसहिं तेही ॥
तथापि मैं तुम्हारा काम तो करूँगा, क्योंकि वेद दूसरेके उपकारको परम धर्म कहते हैं । जो दूसरेके हितके लिये अपना शरीर त्याग देता है, संत सदा उसकी बड़ाई करते हैं ।
कामदेव ने देवताओं से अपनी विपत्ति सुनने के बाद यह कहा।
सेवत तोहि सुलभ फल चारी । बरदायनी पुरारिपुरारि पिआरी ॥
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे । सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे ॥
हे [भक्तोंको मुँहमाँगा] वर देनेवाली! हे त्रिपुरके शत्रु शिवजीकी प्रिय पत्नी! आपकी सेवा करनेसे चारों फल सुलभ हो जाते हैं । हे देवि! आपके चरणकमलोंकी पूजा करके देवता, मनुष्य और मुनि सभी सुखी हो जाते हैं ।
जानकीजी ने देवी के चरण पकड़ लिए।
बिनय प्रेम बस भई भवानी । खसी माल मूरति मुसुकानी ॥
सादर सियँ प्रसाद सिर धरेऊ । बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ ॥
सुनु सिय सत्य असीस हमारी । पूजिहि मन कामना तुम्हारी ॥
नारद बचन सदा सुचि साचा । सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा ॥
गिरिजाजी सीताजीके विनय और प्रेमके वशमें हो गयीं । उन (के गले) की माला खिसक पड़ी और मूर्ति मुसकरायी । सीताजीने आदरपूर्वक उस प्रसाद (माला) को सिरपर धारण किया । गौरीजीका हृदय हर्षसे भर गया और वे बोलीं, हे सीता! हमारी सच्ची आसीस सुनो, तुम्हारी मन:कामना पूरी होगी । नारदजीका वचन सदा पवित्र (संशय, भ्रम आदि दोषोंसे रहित) और सत्य है । जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही वर तुमको मिलेगा ।
पुष्पवाटिका में गौरी-पूजन के समय सीताजी की विनय से प्रसन्न होकर गिरिजाजी ने आशीर्वाद दिया।
नृप सब भाँति सबहि सनमानी । कहि मृदु बचन बोलाईं रानी ॥
बधू लरिकनीं पर घर आईं । राखेहु नयन पलक की नाईं ॥
राजाने सबका सब प्रकारसे सम्मान करके, कोमल वचन कहकर रानियोंको बुलाया और कहा — बहुएँ अभी बच्ची हैं, पराये घर आयी हैं । इनको इस तरहसे रखना जैसे नेत्रोंको पलकें रखती हैं (जैसे पलकें नेत्रोंकी सब प्रकारसे रक्षा करती हैं और उन्हें सुख पहुँचाती हैं, वैसे ही इनको सुख पहुँचाना)
राजा दशरथजी ने रानियों को बुलाकर बहुओं के प्रति व्यवहार का निर्देश दिया।
गुरपितु मातु बंधु सुर साईं । सेइअहिं सकल प्रान की नाईं ॥
रामु प्रानप्रिय जीवन जी के । स्वारथ रहित सखा सबही के ॥
गुरु, पिता, माता, भाई, देवता और स्वामी, इन सबकी सेवा प्राणके समान करनी चाहिये । फिर श्रीरामचन्द्रजी तो प्राणोंके भी प्रिय हैं, हृदयके भी जीवन हैं और सभीके स्वार्थरहित सखा हैं ।
सुमित्राजी ने वन जाते लक्ष्मणजी से कहा।
बारहिं बार जोरि जुग पानी । कहत रामु सब सन मृदु बानी ॥
सोइ सब भाँति मोर हितकारी । जेहि तें रहै भुआल सुखारी ॥
श्रीरामचन्द्रजी बार-बार दोनों हाथ जोड़कर सबसे कोमल वाणी कहते हैं कि मेरा सब प्रकारसे हितकारी मित्र वही होगा जिसकी चेष्टासे महाराज सुखी रहें ।
श्रीरामचन्द्रजी ने सबको समझाया।
धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम ॥
लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम ॥
[वसिष्ठजीने कहा—] हे राम! तुम धर्मके सेतु और दयाके धाम हो, तुम भला ऐसा क्यों न कहो? लोग दुखी हैं । दो दिन तुम्हारा दर्शन कर शान्ति लाभ कर लें ।
जो सेवकु साहिबहि सँकोची । निज हित चहइ तासु मति पोची ॥
सेवक हित साहिब सेवकाई । करै सकल सुख लोभ बिहाई ॥
जो सेवक स्वामीको संकोचमें डालकर अपना भला चाहता है, उसकी बुद्धि नीच है । सेवकका हित तो इसीमें है कि वह समस्त सुखों और लोभोंको छोड़कर स्वामीकी सेवा ही करे ।
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना । सेवाधरमु कठिन जगु जाना ॥
स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू । बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू ॥
वेद, शास्त्र और पुराणोंमें प्रसिद्ध है और जगत् जानता है कि सेवाधर्म बड़ा कठिन है । स्वामिधर्ममें (स्वामीके प्रति कर्तव्यपालनमें) और स्वार्थमें विरोध है (दोनों एक साथ नहीं निभ सकते) । वैर अंधा होता है और प्रेमको ज्ञान नहीं रहता [मैं स्वार्थवश कहूँगा या प्रेमवश, दोनोंमें ही भूल होनेका भय है] ।
भरतजी ने समाज के सम्मुख श्री रामचन्द्रजी से यह वचन कहे।
को साहिब सेवकहि नेवाजी । आपु समाज साज सब साजी ॥
निज करतूति न समुझिअ सपनें । सेवक सकुच सोचु उर अपनें ॥
ऐसा सेवकपर कृपा करनेवाला स्वामी कौन है जो आप ही सेवकका सारा साज-सामान सज दे (उसकी सारी आवश्यकताओंको पूर्ण कर दे) और स्वप्नमें भी अपनी कोई करनी न समझकर (अर्थात् मैंने सेवकके लिये कुछ किया है ऐसा न जानकर) उलटा सेवकको संकोच होगा, इसका सोच अपने हृदयमें रखे!
भरतजी ने श्रीरामचन्द्रजी की स्तुति करते हुए कहा।
सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई । स्वारथ छल फल चारि बिहाई ॥
अग्या सम न सुसाहिब सेवा । सो प्रसादु जन पावै देवा ॥
वह रुचि है — कपट, स्वार्थ और [अर्थ-धर्म-काम-मोक्षरूप] चारों फलोंको छोड़कर स्वाभाविक प्रेमसे स्वामीकी सेवा करना । और आज्ञापालनके समान श्रेष्ठ स्वामीकी और कोई सेवा नहीं है । हे देव! अब वही आज्ञारूप प्रसाद सेवकको मिल जाय ।
भरतजी ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी से यह विनती की।
सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ ॥
तुलसी प्रीतिकि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ ॥
सेवक हाथ, पैर और नेत्रोंके समान और स्वामी मुखके समान होना चाहिये । तुलसीदासजी कहते हैं कि सेवक-स्वामीकी ऐसी प्रीतिकी रीति सुनकर सुकवि उसकी सराहना करते हैं ।
संत चरन पंकज अति प्रेमा । मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा ॥
गुरु पितु मातु बंधु पति देवा । सब मोहि कहँ जानै दृढ़दृढ़ सेवा ॥
मम गुन गावत पुलक सरीरा । गदगद गिरा नयन बह नीरा ॥
काम आदि मद दंभ न जाकें । तात निरंतर बस मैं ताकें ॥
जिसका संतोंके चरणकमलोंमें अत्यन्त प्रेम हो; मन, वचन और कर्मसे भजनका दृढ़ नियम हो और जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवामें दृढ़ हो, मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाय, वाणी गद्गद हो जाय और नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओंका] जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वशमें रहता हूँ ।
परहित बस जिन्ह के मन माहीं । तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥
तनु तजि तात जाहु मम धामा । देउँ काह तुम्ह पूरनकामा ॥
जिनके मनमें दूसरेका हित बसता है (समाया रहता है), उनके लिये जगत्में कुछ भी (कोई भी गति) दुर्लभ नहीं है । हे तात! शरीर छोड़कर आप मेरे परम धाममें जाइये । मैं आपको क्या दूँ? आप तो पूर्णकाम हैं (सब कुछ पा चुके हैं)
श्रीरामचन्द्रजी ने जटायु से कहा।
मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव ॥
मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव ॥
मन, वचन और कर्मसे कपट छोड़कर जो भूदेव ब्राह्मणोंकी सेवा करता है, मुझसमेत ब्रह्मा, शिव आदि सब देवता उसके वशमें हो जाते हैं ।
श्रीरामजी ने कबन्ध को ब्राह्मणकुल से द्रोह न करने की शिक्षा देते हुए यह कहा।
फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ ॥
पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ ॥
फलोंके बोझसे झुककर सारे वृक्ष पृथ्वीके पास आ लगे हैं, जैसे परोपकारी पुरुष बड़ी सम्पत्ति पाकर [विनयसे] झुक जाते हैं ।
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम ॥
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ॥
हनुमान्जीने उसे हाथसे छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा — भाई! श्रीरामचन्द्रजीका काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ?
हनुमान्जी ने मैनाक पर्वत से कहा।
सब उदार सब पर उपकारी । बिप्र चरन सेवक नर नारी ॥
एकनारि ब्रत रत सब झारी । ते मन बच क्रम पति हितकारी ॥
सभी नर-नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और सभी ब्राह्मणोंके चरणोंके सेवक हैं । सभी पुरुषमात्र एकपत्नीव्रती हैं । इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्मसे पतिका हित करनेवाली हैं ।
जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी । बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी ॥
निज कर गृह परिचरजा करई । रामचंद्र आयसु अनुसरई ॥
यद्यपि घरमें बहुत-से (अपार) दास और दासियाँ हैं और वे सभी सेवाकी विधिमें कुशल हैं, तथापि [स्वामीकी सेवाका महत्त्व जाननेवाली] श्रीसीताजी घरकी सब सेवा अपने ही हाथोंसे करती हैं और श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका अनुसरण करती हैं ।
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई । पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥
निर्नय सकल पुरान बेद कर । कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर ॥
हे भाई! दूसरोंकी भलाईके समान कोई धर्म नहीं है और दूसरोंको दुःख पहुँचानेके समान कोई नीचता (पाप) नहीं है । हे तात! समस्त पुराणों और वेदोंका यह निर्णय (निश्चित सिद्धान्त) मैंने तुमसे कहा है, इस बातको पण्डितलोग जानते हैं ।
प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान ॥
जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान ॥
धर्मके चार चरण (सत्य, दया, तप और दान) प्रसिद्ध हैं, जिनमेंसे कलिमें एक [दानरूपी] चरण ही प्रधान है । जिस किसी प्रकारसे भी दिये जानेपर दान कल्याण ही करता है ।
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं । संत मिलन सम सुख जग नाहीं ॥
पर उपकार बचन मन काया । संत सहज सुभाउ खगराया ॥
जगत्में दरिद्रताके समान दुःख नहीं है तथा संतोंके मिलनके समान जगत्में सुख नहीं है । और हे पक्षिराज! मन, वचन और शरीरसे परोपकार करना, यह संतोंका सहज स्वभाव है ।
संत सहहिं दुख पर हित लागी । पर दुख हेतु असंत अभागी ॥
भूर्ज तरू सम संत कृपाला । पर हित निति सह बिपति बिसाला ॥
संत दूसरोंकी भलाईके लिये दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरोंको दुःख पहुँचानेके लिये । कृपालु संत भोजके वृक्षके समान दूसरोंके हितके लिये भारी विपत्ति सहते हैं (अपनी खालतक उधड़वा लेते हैं)