श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६

वैराग्य

अनासक्ति और संसार की नश्वरता

36 पद्य

महाभारत — खण्ड ६

शिव भक्ति का महत्त्व

अम्बा उवाच

हरचरणनिरतमतिना ।

भवितव्यमनार्जवं युगं प्राप्य ।

संसारभयं न भवति ।

हरभक्तिरसायनं पीत्वा ॥

कुटिल कलिकालको पाकर सभी पुरुषोंको अपना मन भगवान् शंकरके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें लगा देना चाहिये । शिव भक्तिरूपी रसायनके पी लेनेपर संसाररूपी रोगका भय नहीं रह जाता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 14, श्लोक 184 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 188 भक्ति
भक्तों की स्वतन्त्रता

एवमेव महादेवं भक्ता ये मानवा भुवि ।

न ते संसारवशगा इति मे निश्चिता मतिः ॥

‘इसी प्रकार इस भूतलपर जो मानव महादेवजीके भक्त हैं, वे संसारके अधीन नहीं होते — यह मेरा निश्चित विचार है ।’

श्रीकृष्ण ने धर्मपुत्र युधिष्ठिर से कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 18, श्लोक 69–70 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 284 माया–संसार
उत्तम ब्रह्मचर्य और धर्म

भीष्म → तात

ब्रह्मचर्यात् परं तात मधुमांसस्य वर्जनम् ।

मर्यादायां स्थितो धर्मः शमश्चैवास्य लक्षणम् ॥

भीष्मजीने कहा — तात! मांस और मदिराका त्याग ब्रह्मचर्यसे भी श्रेष्ठ है-वही उत्तम ब्रह्मचर्य है । वेदोक्त मर्यादामें स्थित रहना सबसे श्रेष्ठ धर्म है तथा मन और इन्द्रियोंको संयममें रखना ही सर्वोत्तम पवित्रता है ।

भीष्मजी ने युधिष्ठिर को उत्तम ब्रह्मचर्य, श्रेष्ठ धर्म और सर्वोत्तम पवित्रता के विषय में बताया।

अनुशासनपर्व, अध्याय 22, श्लोक 25 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 324 साधना–योग
स्त्री के प्रति व्यवहार

देवशर्मा उवाच

नासां स्नेहो नरैः कार्यस्तथैवेर्ष्या जनेश्वर ।

खेदमास्थाय भुञ्जीत धर्ममास्थाय चैव ह ।

अनृताविह पर्वादिदोषवर्ज नराधिप ॥

नरेश्वर! मनुष्योंको स्त्रियोंके प्रति न तो विशेष आसक्त होना चाहिये और न उनसे ईर्ष्या ही करनी चाहिये । वैराग्यपूर्वक धर्मका आश्रय लेकर पर्व आदि दोषका त्याग करते हुए ऋतुस्नानके पश्चात् उनका उपभोग करना चाहिये ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 43, श्लोक 25 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 464 नीति–व्यवहार
तृष्णा का स्वभाव

विश्वामित्र उवाच

कामं कामयमानस्य यदा कामः समृध्यते ।

अथैनमपरः कामस्तृष्णाविध्यति बाणवत् ॥

विश्वामित्र बोले — किसी वस्तुकी कामना करनेवाले मनुष्यकी एक इच्छा जब पूरी होती है, तब दूसरी नयी उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार तृष्णा तीरकी तरह मनुष्यके मनपर चोट करती ही रहती है ।

विश्वामित्र ने कश्यप और गौतम के कथनों के सन्दर्भ में कहा।

अनुशासनपर्व, अध्याय 93, श्लोक 43 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 796 माया–संसार

भीष्म उवाच

एवमेते महात्मानो भोगैर्बहुविधैरपि ।

क्षुधा परमया युक्ताश्छन्द्यमाना महात्मभिः ।

नैव लोभं तदा चक्रुस्ततः स्वर्गमवाप्नुवन् ॥

इस प्रकार उन महात्माओंने अत्यन्त भूखे होनेपर और बड़े-बड़े लोगोंके अनेक प्रकारके भोगोंद्वारा लालच देनेपर भी उस समय लोभ नहीं किया । इसीसे उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 93, श्लोक 141–142 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 813 साधना–योग

भीष्म उवाच

निर्ममा निरहंकारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः ।

शुचयस्तीर्थभूतास्ते ये भैक्ष्यमुपभुञ्जते ॥

जो ममता, अहंकार, राग-द्वेषादि द्वन्द्व और परिग्रहसे रहित एवं भिक्षासे जीवन निर्वाह करते हैं, वे विशुद्ध अन्तःकरणवाले साधु पुरुष तीर्थस्वरूप हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 108, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 967

भीष्म उवाच

रजस्तमः सत्त्वमथो येषां निर्धोतमात्मनः ।

शौचाशौचसमायुक्ताः स्वकार्यपरिमार्गिणः ॥

सर्वत्यागेष्वभिरताः सर्वज्ञाः समदर्शिनः ।

शौचेन वृत्तशौचार्थास्ते तीर्थाः शुचयश्च ये ॥

जिनके अन्तःकरणसे तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण धुल गये हैं अर्थात् जो तीनों गुणोंसे रहित है, जो बाह्य पवित्रता और अपवित्रतासे युक्त रहकर भी अपने कर्तव्य (तत्त्वविचार, ध्यान, उपासना आदि) का ही अनुसंधान करते हैं । जो सर्वस्वके त्यागमें ही अभिरुचि रखते हैं, सर्वज्ञ और समदर्शी होकर शौचाचारके पालनद्वारा आत्मशुद्धिका सम्पादन करते हैं, वे सत्पुरुष ही परम पवित्र तीर्थस्वरूप हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 108, श्लोक 7–8 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 968

बृहस्पति उवाच

ये पापानि नराः कृत्वा निरस्यन्ति व्रतैः सदा ।

सुखदुःखसमायुक्ता व्यथितास्ते भवन्त्युत ॥

असंवासाः प्रजायन्ते म्लेच्छाश्चापि न संशयः ।

नराः पापसमाचारा लोभमोहसमन्विताः ॥

जो पापाचारी पुरुष लोभ और मोहके वशीभूत हो पाप करके उसे व्रत आदिके द्वारा दूर करनेका प्रयत्न करते हैं, वे सदा सुख-दुःख भोगते हुए व्यथित रहते हैं । उन्हें कहीं रहनेको ठौर नहीं मिलता तथा वे म्लेच्छ होकर सदा मारे-मारे फिरते हैं । इसमें संशय नहीं है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 111, श्लोक 127–128 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 992 कर्म–प्रारब्ध

बृहस्पति उवाच

आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति पूरुषः ।

न्यस्तदण्डो जितक्रोधः स प्रेत्य सुखमेधते ॥

जो मनुष्य सब भूतोंको अपने समान समझता, किसीपर प्रहार नहीं करता (दण्डको हमेशाके लिये त्याग देता है) और क्रोधको अपने काबूमें रखता है, वह मृत्युके पश्चात् सुख भोगता है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 113, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1000 धर्म–आचरण

भीष्म उवाच

एवं वै परमं धर्मं प्रशंसन्ति मनीषिणः ।

प्राणा यथाऽऽत्मनोऽभीष्टा भूतानामपि वै तथा ॥

इस प्रकार मनीषी पुरुष अहिंसारूप परमधर्मकी प्रशंसा करते हैं । जैसे मनुष्यको अपने प्राण प्रिय होते हैं, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंको अपने-अपने प्राण प्रिय जान पड़ते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 115, श्लोक 19 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1009 ज्ञान–विवेक

भीष्म उवाच

प्रवृत्तिलक्षणो धर्मः प्रजार्थिभिरुदाहृतः ।

यथोक्तं राजशार्दूल न तु तन्मोक्षकाङ्क्षिणाम् ॥

नृपश्रेष्ठ! प्रजार्थी पुरुषोंने प्रवृत्तिरूप धर्मका प्रतिपादन किया है, परन्तु वह मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले विरक्त पुरुषोंके लिये अभीष्ट नहीं है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 115, श्लोक 47 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1013 ज्ञान–विवेक

श्रीमहेश्वर उवाच

सर्वभूतदया धर्मो न चैकग्रामवासिता ।

आशापाशविमोक्षश्च शस्यते मोक्षकाङ्क्षिणाम् ॥

मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनी चाहिये । यही उनका धर्म है । उन्हें सदा एक ही गाँवमें नहीं रहना चाहिये और अपने आशारूपी बन्धनोंको तोड़नेका प्रयत्न करना चाहिये । यही मुमुक्षुके लिये प्रशंसाकी बात है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 141, श्लोक 81 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1170 धर्म–आचरण

श्रीमहेश्वर उवाच

वृक्षमूलपरो नित्यं शून्यागारनिवेशनः ।

नदीपुलिनशायी च नदीतीररतिश्च यः ॥

विमुक्तः सर्वसङ्गेषु स्नेहबन्धेषु च द्विजः ।

आत्मन्येवात्मनो भावं समासज्जेत वै द्विजः ॥

संन्यासी द्विजको उचित है कि वह सब प्रकारकी आसक्तियों और स्नेहबन्धनोंसे मुक्त होकर सर्वदा वृक्षके नीचे, सूने घरमें अथवा नदीके किनारे रहता हुआ अपने अन्तःकरणमें ही परमात्माका ध्यान करे ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 141, श्लोक 84–85 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1170

श्रीमहेश्वर उवाच

वीतरागा विमुच्यन्ते पुरुषाः कर्मबन्धनैः ।

कर्मणा मनसा वाचा ये न हिंसन्ति किंचन ॥

जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसीकी हिंसा नहीं करते हैं और जिनकी आसक्ति सर्वथा दूर हो गयी है, वे पुरुष कर्मबन्धनोंसे मुक्ता हो जाते हैं ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 144, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1200

उमा उवाच

न कामेषु न भोगेषु नैश्वर्ये न सुखे तथा ।

स्पृहा यस्या यथा पत्यौ सा नारी धर्मभागिनी ॥

जिसके हृदयमें पतिके लिये जैसी चाह होती है, वैसी काम, भोग और सुखके लिये भी नहीं होती । वह स्त्री पातिव्रतधर्मकी भागिनी होती है ।

अनुशासनपर्व, अध्याय 146, श्लोक 47 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1395 धर्म–आचरण
संसार से मुक्ति

ब्राह्मण उवाच

सुखदुःखे यथा सम्यगनित्ये यः प्रपश्यति ।

कायं चामेध्यसंघातं विनाशं कर्मसंहितम् ॥

यच्च किंचित्सुखं तच्च दुःखं सर्वमिति स्मरन् ।

संसारसागरं घोरं तरिष्यति सुदुस्तरम् ॥

जो मनुष्य सुख और दुःख दोनोंको अनित्य समझता है, शरीरको अपवित्र वस्तुओंका समूह समझता है और मृत्युको कर्मका फल समझता है तथा सुखके रूपमें प्रतीत होनेवाला जोकुछ भी है वह सब दुःख ही दुःख है, ऐसा मानता है, वह घोर एवं दुस्तर संसार-सागरसे पार हो जायगा ।

सिद्ध ब्राह्मण ने काश्यप से कहा।

अनुगीतापर्व, अध्याय 18, श्लोक 31–32 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1669 ज्ञान–विवेक

ब्राह्मण उवाच

अनमित्रश्च निर्बन्धुरनपत्यश्च यः क्वचित् ।

त्यक्तधर्मार्थकामश्च निराकाङ्क्षी च मुच्यते ॥

जो किसीको अपना मित्र, बन्धु या संतान नहीं मानता, जिसने सकाम धर्म, अर्थ और कामका त्याग कर दिया है तथा जो सब प्रकारकी आकांक्षाओंसे रहित है, वह मुक्त हो जाता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 19, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1670

ब्राह्मण उवाच

नैव धर्मी न चाधर्मी पूर्वोपचितहायकः ।

धातुक्षयप्रशान्तात्मा निर्द्वन्द्वः स विमुच्यते ॥

जिसकी न धर्ममें आसक्ति है न अधर्ममें, जो पूर्वसंचित कर्मोंको त्याग चुका है, वासनाओंका क्षय हो जानेसे जिसका चित्त शान्त हो गया है तथा जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित है, वह मुक्त हो जाता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 19, श्लोक 7 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1671
वैराग्य और आत्म-निरीक्षण

ब्राह्मण उवाच

अकर्मवान् विकाङ्क्षश्च पश्येज्जगदशाश्वतम् ।

अश्वत्थसदृशं नित्यं जन्ममृत्युजरायुतम् ॥

वैराग्यबुद्धिः सततमात्मदोषव्यपेक्षकः ।

आत्मबन्धविनिर्मोक्षं स करोत्यचिरादिव ॥

जो किसी भी कर्मका कर्ता नहीं बनता, जिसके मनमें कोई कामना नहीं है, जो इस जगत्को अश्वत्थके समान अनित्य-कलतक न टिक सकनेवाला समझता है तथा जो सदा इसे जन्म, मृत्यु और जरासे युक्त जानता है, जिसकी बुद्धि वैराग्यमें लगी रहती है और जो निरन्तर अपने दोषोंपर दृष्टि रखता है, वह शीघ्र ही अपने बन्धनका नाश कर देता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 19, श्लोक 8–9 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1671
परम सुखदायक धर्म

वासुदेव उवाच

नातः परं सुखं त्वन्यत् किंचित् स्याद् भरतर्षभ ।

बुद्धिमान् श्रद्दधानश्च पराक्रान्तश्च पाण्डव ॥

यः परित्यज्यते मर्त्यो लोकसारमसारवत् ।

एतैरुपायैः स क्षिप्रं परां गतिमवाप्नुते ॥

भरतश्रेष्ठ! इससे बढ़कर दूसरा कोई सुखदायक धर्म नहीं है । पाण्डुनन्दन! जो कोई बुद्धिमान्, श्रद्धालु और पराक्रमी मनुष्य लौकिक सुखको सारहीन समझकर उसे त्याग देता है, वह उपर्युक्त इन उपायोंके द्वारा बहुत शीघ्र परम गतिको प्राप्त कर लेता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 19, श्लोक 64–65 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1678 धर्म–आचरण

मन उवाच

बहूनपि हि संकल्पान् मत्वा स्वप्नानुपास्य च ।

बुभुक्षया पीड्यमानो विषयानेव धावति ॥

बहुत-से संकल्पोंका मनन और स्वप्नोंका आश्रय लेकर भोग भोगनेकी इच्छासे पीड़ित हुआ प्राणी विषयोंकी ओर ही दौड़ता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 22, श्लोक 27 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1693 माया–संसार
मुख्य ब्रह्मचर्य

ब्राह्मण उवाच

अपेतव्रतकर्मा तु केवलं ब्रह्मणि स्थितः ।

ब्रह्मभूतश्चरल्लोंके ब्रह्मचारी भवत्ययम् ॥

जो व्रत और कर्मोंका त्याग करके केवल ब्रह्ममें स्थित है, वह ब्रह्मस्वरूप होकर संसारमें विचरता रहता है, वही मुख्य ब्रह्मचारी है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 26, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1708 ज्ञान–विवेक
ब्रह्मचर्य का स्वरूप

ब्राह्मण उवाच

संकल्पदंशमशकं शोकहर्षहिमातपम् ।

मोहान्धकारतिमिरं लोभव्याधिसरीसृपम् ॥

विषयैकात्ययाध्वानं कामक्रोधविरोधकम् ।

तदतीत्य महादुर्गं प्रविष्टोऽस्मि महद् वनम् ॥

ब्राह्मणने कहा — प्रिये! जहाँ संकल्परूपी डाँस और मच्छरोंकी अधिकता होती है । शोक और हर्षरूपी गर्मी, सर्दीका कष्ट रहता है, मोहरूपी अन्धकार फैला हुआ है, लोभ तथा व्याधिरूपी सर्प विचरा करते हैं । जहाँ विषयोंका ही मार्ग है, जिसे अकेले ही तै करना पड़ता है तथा जहाँ काम और क्रोधरूपी शत्रु डेरा डाले रहते हैं, उस संसाररूपी दुर्गम पथका उल्लंघन करके अब मैं ब्रह्मरूपी महान् वनमें प्रवेश कर चुका हूँ ।

ब्राह्मण ने अपनी पत्नी से कहा।

अनुगीतापर्व, अध्याय 27, श्लोक 1–2 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1710 माया–संसार
आत्म-स्थिति और निर्लिप्तता

ब्राह्मण उवाच

तेभ्यश्चान्यांस्तेषु नित्यांश्च भावान् ।

भूतात्मानं लक्षयेरन् शरीरे ।

तस्मिंस्तिष्ठन्नास्मि सक्तः ।

कथंचित् ।

कामक्रोधाभ्यां जरया मृत्युना च ॥

इन बाह्य इन्द्रियों और विषयोंसे भिन्न जो स्वप्न और सुषुप्तिके वासनामय विषय एवं इन्द्रियाँ हैं तथा उनमें भी जो नित्यभाव हैं, उनसे भी विलक्षण जो भूतात्मा है, उसको शरीरके भीतर योगीजन देख पाते हैं । उसी भूतात्मामें स्थित हुआ मैं कहीं किसी तरह भी काम, क्रोध, जरा और मृत्युसे ग्रस्त नहीं होता ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 28, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1714 ज्ञान–विवेक

ब्राह्मण उवाच

विस्मितश्चापि राजर्षिरिमां गाथां जगाद ह ।

अहो कष्टं यदस्माभिः सर्वं बाह्यमनुष्ठितम् ॥

भोगतृष्णासमायुक्तैः पूर्वं राज्यमुपासितम् ।

इति पश्चान्मया ज्ञातं योगान्नास्ति परं सुखम् ॥

इस सफलतासे राजर्षि अलर्कको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने इस गाथाका गान किया — ‘अहो! बड़े कष्टकी बात है कि अबतक मैं बाहरी कामोंमें ही लगा रहा और भोगोंकी तृष्णासे आबद्ध होकर राज्यकी ही उपासना करता रहा । ध्यानयोगसे बढ़कर दूसरा कोई उत्तम सुखका साधन नहीं है, यह बात तो मुझे बहुत पीछे मालूम हुई है’

अनुगीतापर्व, अध्याय 30, श्लोक 30–31 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1728 साधना–योग

गुरु उवाच

ज्ञानं त्वेव परं विद्मः संन्यासं तप उत्तमम् ।

यस्तु वेद निराबाधं ज्ञानतत्त्वं विनिश्चयात् ।

सर्वभूतस्थमात्मानं स सर्वगतिरिष्यते ॥

हम ज्ञानको ही परब्रह्म और संन्यासको उत्तम तप जानते हैं । जो अबाधित ज्ञानतत्त्वको निश्चयपूर्वक जानकर अपनेको सब प्राणियोंके भीतर स्थित देखता है, वह सर्वगति (सर्वव्यापक) माना जाता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 35, श्लोक 16 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1747 ज्ञान–विवेक
सांसारिक कर्मों की व्यर्थता

ब्रह्मा उवाच

मुधा ज्ञानं मुधा वृत्तं मुधा सेवा मुधा श्रमः ।

एवं यो युक्तधर्मः स्यात् सोऽमुत्रात्यन्तमश्नुते ॥

नाना प्रकारकी सांसारिक जानकारी, सकाम व्यवहार, सेवा और श्रम व्यर्थ है — ऐसा समझकर जो कल्याणके साधनमें लग जाता है, वह परलोकमें अक्षय सुखका भागी होता है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 38, श्लोक 4 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1762 कर्म–प्रारब्ध

ब्रह्मा उवाच

निर्ममो निरहङ्कारो निराशीः सर्वतः समः ।

अकामभूत इत्येव सतां धर्मः सनातनः ॥

ममता, अहंकार और आशासे रहित होकर सर्वत्र समदृष्टि रखना और सर्वथा निष्काम हो जाना ही श्रेष्ठ पुरुषोंका सनातन धर्म है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 38, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1762 धर्म–आचरण

ब्रह्मा उवाच

मुधा दानं मुधा यज्ञो मुधाऽधीतं मुधा व्रतम् ।

मुधा प्रतिग्रहश्चैव मुधा धर्मो मुधा तपः ॥

एवंवृत्तास्तु ये केचिल्लोकेऽस्मिन् सत्त्वसंश्रयाः ।

ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्थास्ते धीराः साधुदर्शिनः ॥

सकाम दान, यज्ञ, अध्ययन, व्रत, परिग्रह, धर्म और तप — ये सब व्यर्थ हैं — ऐसा समझकर जो उपर्युक्त बर्तावका पालन करते हुए इस जगत् में सत्यका आश्रय लेते हैं और वेदकी उत्पत्तिके स्थानभूत परब्रह्म परमात्मामें निष्ठा रखते हैं, वे ब्राह्मण ही धीर और साधुदर्शी माने गये हैं ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 38, श्लोक 9–10 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1763 ज्ञान–विवेक

ब्रह्मा उवाच

निराशीर्निर्गुणः शान्तो निरासक्तो निराश्रयः ।

आत्मसङ्गी च तत्त्वज्ञो मुच्यते नात्र संशयः ॥

जो निष्काम, निर्गुण, शान्त, अनासक्त, निराश्रय, आत्मपरायण और तत्त्वका ज्ञाता होता है, वह मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 46, श्लोक 46 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1802 ज्ञान–विवेक

ब्रह्मा उवाच

तपः प्रदीप इत्याहुराचारो धर्मसाधकः ।

ज्ञानं वै परमं विद्यात् संन्यासं तप उत्तमम् ॥

ज्ञानी पुरुषोंका कहना है कि तपस्या (परमात्म-तत्त्वको प्रकाशित करनेवाला) दीपक है, आचार धर्मका साधक है, ज्ञान परब्रह्मका स्वरूप है और संन्यास ही उत्तम तप है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 47, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1805 ज्ञान–विवेक

ब्रह्मा उवाच

हित्वा गुणमयं सर्वं कर्म जन्तुः शुभाशुभम् ।

उभे सत्यानृते हित्वा मुच्यते नात्र संशयः ॥

शुभ और अशुभ समस्त त्रिगुणात्मक कर्मोंका तथा सत्य और असत्य — इन दोनोंका भी त्याग करके संन्यासी मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 47, श्लोक 11 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1806

ब्रह्मा उवाच

एषा गतिर्विरक्तानामेष धर्मः सनातनः ।

एषा ज्ञानवतां प्राप्तिरेतद् वृत्तमनिन्दितम् ॥

यही विरक्त पुरुषोंकी गति है, यही सनातन धर्म है, यही ज्ञानियोंका प्राप्तव्य स्थान है और यही अनिन्दित सदाचार है ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 51, श्लोक 38 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 1828 धर्म–आचरण

नकुल उवाच

विशुद्धमनसो दान्ताः श्रद्धादमसमन्विताः ।

अनसूयवो विक्रोधाः साधवो वीतमत्सराः ।

त्यक्तमानमदक्रोधा धर्मज्ञा द्विजसत्तमाः ।

स ब्रह्मचर्यं गोत्रं ते तस्य ख्यात्वा परस्परम् ।

कुटीं प्रवेशयामासुः क्षुधार्तमतिथिं तदा ॥

ब्राह्मण-परिवारके सब लोग विशुद्धचित्त, जितेन्द्रिय, श्रद्धालु, मनको वशमें रखनेवाले, दोषदृष्टिसे रहित, क्रोधहीन, सज्जन, ईर्ष्यारहित और धर्मज्ञ थे । उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने अभिमान, मद और क्रोधको सर्वथा त्याग दिया था । क्षुधासे कष्ट पाते हुए उस अतिथि ब्राह्मणको अपने ब्रह्मचर्य और गोत्रका परस्पर परिचय देते हुए वे कुटीमें ले गये ।

अनुगीतापर्व, अध्याय 90, श्लोक 36–37 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 2042 धर्म–आचरण

वैशम्पायन उवाच

योगयुक्ता महात्मानस्त्यागधर्ममुपेयुषः ।

अभिजग्मुर्बहून् देशान् सरितः सागरांस्तथा ॥

वे सब-के-सब योगयुक्त महात्मा तथा त्याग-धर्मका पालन करनेवाले थे । उन्होंने अनेक देशों, नदियों और समुद्रोंकी यात्रा की ।

मौसलपर्व, अध्याय 1, श्लोक 30 महाभारत — खण्ड ६ पृ. 2492 ज्ञान–विवेक