श्रीगणेशाय नमः।
श्रीरामचरितमानस
लीला–रहस्य
अवतार और प्रभु की लीला का रहस्य
42 पद्य
श्रीरामचरितमानस
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि ॥
बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि ॥
जगत्में जितने जड़ और चेतन जीव हैं, सबको राममय जानकर मैं उन सबके चरणकमलोंकी सदा दोनों हाथ जोड़कर वन्दना करता हूँ ।
सो केवल भगतन हित लागी । परम कृपाल प्रनत अनुरागी ॥
जेहि जन पर ममता अति छोहू । जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू ॥
वह लीला केवल भक्तोंके हितके लिये ही है; क्योंकि भगवान् परम कृपालु हैं और शरणागतके बड़े प्रेमी हैं । जिनकी भक्तोंपर बड़ी ममता और कृपा है, जिन्होंने एक बार जिसपर कृपा कर दी, उसपर फिर कभी क्रोध नहीं किया ।
बंदउँ नाम राम रघुबर को । हेतु कृसानु भानु हिमकर को ॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो । अगुन अनूपम गुन निधान सो ॥
मैं श्रीरघुनाथजीके नाम ‘राम’ की वन्दना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात् ‘र’ ‘आ’ और ‘म’ रूपसे बीज है । वह ‘राम’ नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है । वह वेदोंका प्राण है; निर्गुण, उपमारहित और गुणोंका भण्डार है ।
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा । अकथ अगाध अनादि अनूपा ॥
मोरें मत बड़ नामु दुहू तें । किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें ॥
निर्गुण और सगुण — ब्रह्मके दो स्वरूप हैं । ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं । मेरी सम्मतिमें नाम इन दोनोंसे बड़ा है, जिसने अपने बलसे दोनोंको अपने वशमें कर रखा है ।
लीला सगुन जो कहहिं बखानी । सोइ स्वच्छता करइ मल हानी ॥
प्रेम भगति जो बरनि न जाई । सोइ मधुरता सुसीतलताई ॥
सगुण लीलाका जो विस्तारसे वर्णन करते हैं, वही राम-सुयशरूपी जलकी निर्मलता है, जो मलका नाश करती है; और जिस प्रेमाभक्तिका वर्णन नहीं किया जा सकता, वही इस जलकी मधुरता और सुन्दर शीतलता है ।
अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि । सदा संभु अरधंग निवासिनि ॥
जग संभव पालन लय कारिनि । निज इच्छा लीला बपु धारिनि ॥
ये अजन्मा, अनादि और अविनाशिनी शक्ति हैं । सदा शिवजीके अर्द्धाङ्गमें रहती हैं । ये जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाली हैं; और अपनी इच्छासे ही लीला-शरीर धारण करती हैं ।
प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू । जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू ॥
राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी । सर्ब रहित सब उर पुर बासी ॥
हे प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो जो बात मैंने पहले आपसे पूछी थी, वही कहिये । [यह सत्य है कि] श्रीरामचन्द्रजी ब्रह्म हैं, चिन्मय (ज्ञानस्वरूप) हैं, अविनाशी हैं, सबसे रहित और सबके हृदयरूपी नगरीमें निवास करनेवाले हैं ।
पार्वतीजी ने शिवजी से अपना पहला प्रश्न फिर पूछा।
सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए । बिपुल बिसद निगमागम गाए ॥
हरि अवतार हेतु जेहि होई । इदमित्थं कहि जाइ न सोई ॥
हे पार्वती! सुनो, वेद-शास्त्रोंने श्रीहरिके सुन्दर, विस्तृत और निर्मल चरित्रोंका गान किया है । हरिका अवतार जिस कारणसे होता है, वह कारण ‘बस यही है’ ऐसा नहीं कहा जा सकता (अनेकों कारण हो सकते हैं और ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें कोई जान ही नहीं सकता)
तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही । समुझि परइ जस कारन मोही ॥
जब जब होइ धरम कै हानी । बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ॥
और जैसा कुछ मेरी समझमें आता है, हे सुमुखि! वही कारण मैं तुमको सुनाता हूँ । जब-जब धर्मका ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं ।
शिवजी ने पार्वतीजी को श्रीराम के अवतार के कारण बताते हुए कहा।
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी । सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी ॥
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा । हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ॥
और वे ऐसा अन्याय करते हैं कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता तथा ब्राह्मण, गौ, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति [दिव्य] शरीर धारण कर सज्जनोंकी पीड़ा हरते हैं ।
सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं । कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं ॥
राम जनम के हेतु अनेका । परम बिचित्र एक तें एका ॥
उसी यशको गा-गाकर भक्तजन भवसागरसे तर जाते हैं । कृपासागर भगवान् भक्तोंके हितके लिये शरीर धारण करते हैं । श्रीरामचन्द्रजीके जन्म लेनेके अनेक कारण हैं, जो एक-से-एक बढ़कर विचित्र हैं ।
हरि अनंत हरिकथा अनंता । कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता ॥
रामचंद्र के चरित सुहाए । कलप कोटि लगि जाहिं न गाए ॥
श्रीहरि अनन्त हैं (उनका कोई पार नहीं पा सकता) और उनकी कथा भी अनन्त है; सब संतलोग उसे बहुत प्रकारसे कहते-सुनते हैं । श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर चरित्र करोड़ कल्पोंमें भी गाये नहीं जा सकते ।
शिवजी पार्वती से कहते हैं।
ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई । भगत हेतु लीलातनु गहई ॥
जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा । तौ हमार पूजिहि अभिलाषा ॥
ऐसे [महान्] प्रभु भी सेवकके वशमें हैं और भक्तोंके लिये [दिव्य] लीलाविग्रह धारण करते हैं । यदि वेदोंमें यह वचन सत्य कहा है तो हमारी अभिलाषा भी अवश्य पूरी होगी ।
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना । प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना ॥
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं । कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं ॥
मैं तो यह जानता हूँ कि भगवान् सब जगह समान रूपसे व्यापक हैं, प्रेमसे वे प्रकट हो जाते हैं । देश, काल, दिशा, विदिशामें बताओ, ऐसी जगह कहाँ है, जहाँ प्रभु न हों ।
शिवजी ने पार्वतीजी से कहा कि देवताओं की सभा में उन्होंने यह बात कही थी।
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार ॥
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार ॥
ब्राह्मण, गौ, देवता और संतोंके लिये भगवान्ने मनुष्यका अवतार लिया । वे [अज्ञानमयी, मलिना] माया और उसके गुण (सत्, रज, तम) और [बाहरी तथा भीतरी] इन्द्रियोंसे परे हैं । उनका [दिव्य] शरीर अपनी इच्छासे ही बना है [किसी कर्मबन्धनसे परवश होकर त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थोंके द्वारा नहीं] ।
ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप ॥
भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप ॥
जो व्यापक, अकल (निरवयव), इच्छारहित, अजन्मा और निर्गुण हैं; तथा जिनका न नाम है न रूप, वही भगवान् भक्तोंके लिये नाना प्रकारके अनुपम (अलौकिक) चरित्र करते हैं ।
देखन बागु कुअँर दुइ आए । बय किसोर सब भाँति सुहाए ॥
स्याम गौर किमि कहौं बखानी । गिरा अनयन नयन बिनु बानी ॥
[उसने कहा—] दो राजकुमार बाग देखने आये हैं । किशोर अवस्थाके हैं और सब प्रकारसे सुन्दर हैं । वे साँवले और गोरे [रंगके] हैं; उनके सौन्दर्यको मैं कैसे बखानकर कहूँ । वाणी बिना नेत्रकी है और नेत्रोंके वाणी नहीं है ।
एक सखी ने सीताजी के पास आकर दोनों राजकुमारों की सुन्दरता का वर्णन किया।
ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे । होइहहिं टूटें धनुष सुखारे ॥
उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा । दुरे नखत जग तेजु प्रकासा ॥
वैसे ही हे प्रभो! आपके सब भक्त धनुष टूटनेपर सुखी होंगे । सूर्य उदय हुआ, बिना ही परिश्रम अन्धकार नष्ट हो गया । तारे छिप गये, संसारमें तेजका प्रकाश हो गया ।
राज समाज बिराजत रूरे । उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे ॥
जिन्ह कें रही भावना जैसी । प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी ॥
वे राजाओंके समाजमें ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानो तारागणोंके बीच दो पूर्ण चन्द्रमा हों । जिनकी जैसी भावना थी, प्रभुकी मूर्ति उन्होंने वैसी ही देखी ।
राजकुमार (राम और लक्ष्मण) वहाँ आए।
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी । जगदंबिका रूप गुन खानी ॥
उपमा सकल मोहि लघु लागीं । प्राकृत नारि अंग अनुरागीं ॥
रूप और गुणोंकी खान जगज्जननी जानकीजीकी शोभाका वर्णन नहीं हो सकता । उनके लिये मुझे [काव्यकी] सब उपमाएँ तुच्छ लगती हैं; क्योंकि वे लौकिक स्त्रियोंके अंगोंसे अनुराग रखनेवाली हैं (अर्थात् वे जगत्की स्त्रियोंके अंगोंको दी जाती हैं) । [काव्यकी उपमाएँ सब त्रिगुणात्मक, मायिक जगत्से ली गयी हैं, उन्हें भगवान्की स्वरूपाशक्ति श्रीजानकीजीके अप्राकृत, चिन्मय अंगोंके लिये प्रयुक्त करना उनका अपमान करना और अपनेको उपहासास्पद बनाना है] ।
जनकजी ने सीताजी को बुला भेजा तब सुअवसर जानकर सब चतुर और सुन्दर सखियाँ आदरपूर्वक उन्हें लिवा चलीं।
जनक सुकृत मूरति बैदेही । दसरथ सुकृत रामु धरें देही ॥
इन्ह सम काहुँ न सिव अवराधे । काहुँ न इन्ह समान फल लाधे ॥
जनकजीके सुकृत (पुण्य) की मूर्ति जानकीजी हैं और दशरथजीके सुकृत देह धारण किये हुए श्रीरामजी हैं । इन [दोनों राजाओं] के समान किसीने शिवजीकी आराधना नहीं की; और न इनके समान किसीने फल ही पाये ।
सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं । जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं ॥
भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी । रामु पुनीत प्रेम अनुगामी ॥
[वसिष्ठजीने कहा—] हे राजन्! सुनिये, जिनसे विमुख होकर लोग पछताते हैं और जिनके भजन बिना जीकी जलन नहीं जाती, वही स्वामी (सर्वलोकमहेश्वर) श्रीरामजी आपके पुत्र हुए हैं, जो पवित्र प्रेमके अनुगामी हैं । [श्रीरामजी पवित्र प्रेमके पीछे-पीछे चलनेवाले हैं, इसीसे तो प्रेमवश आपके पुत्र हुए हैं] ।
राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर ॥
अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ॥
हे राम! आपका स्वरूप वाणीके अगोचर, बुद्धिसे परे, अव्यक्त, अकथनीय और अपार है । वेद निरन्तर उसका ‘नेति नेति’ कहकर वर्णन करते हैं ।
ज्ञानी मुनि वाल्मीकि ने श्री राम से कहा।
बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन ॥
बचन किरातन्ह के सुनतजिमि पितु बालक बैन ॥
जो वेदोंके वचन और मुनियोंके मनको भी अगम हैं, वे करुणाके धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी भीलोंके वचन इस तरह सुन रहे हैं जैसे पिता बालकोंके वचन सुनता है ।
बैरिउ राम बड़ाईबड़ाई करहीं । बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं ॥
सारद कोटि कोटि सत सेषा । करिन सकहिं प्रभु गुन गन लेखा ॥
शत्रु भी श्रीरामजीकी बड़ाई करते हैं । बोल-चाल, मिलनेके ढंग और विनयसे वे मनको हर लेते हैं । करोड़ों सरस्वती और अरबों शेषजी भी प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहोंकी गिनती नहीं कर सकते ।
तदपि करहिं सम बिषम बिहारा । भगत अभगत हृदय अनुसारा ॥
अगुन अलेप अमान एकरस । रामु सगुन भए भगत पेम बस ॥
तथापि वे भक्त और अभक्तके हृदयके अनुसार सम और विषम व्यवहार करते हैं (भक्तको प्रेमसे गले लगा लेते हैं और अभक्तको मारकर तार देते हैं) । गुणरहित, निर्लेप, मानरहित और सदा एकरस भगवान् श्रीराम भक्तके प्रेमवश ही सगुण हुए हैं ।
लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं । राम बिमुख थलु नरक न लहहीं ॥
यहु संसउ सब के मन माहीं । राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं ॥
लोक और वेदमें प्रसिद्ध है और कवि (ज्ञानी) भी कहते हैं कि जो श्रीरामजीसे विमुख हैं उन्हें नरकमें भी ठौर नहीं मिलती । सबके मनमें यह सन्देह हो रहा था कि हे विधाता! श्रीरामचन्द्रजीका अयोध्या जाना होगा या नहीं ।
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू । राम जनमु जग मंगल हेतू ॥
गुर पितु मातु बचन अनुसारी । खल दलु दलन देव हितकारी ॥
वे सत्यप्रतिज्ञ हैं और वेदकी मर्यादाके रक्षक हैं । श्रीरामजीका अवतार ही जगत्के कल्याणके लिये हुआ है । वे गुरु, पिता और माताके वचनोंके अनुसार चलनेवाले हैं । दुष्टोंके दलका नाश करनेवाले और देवताओंके हितकारी हैं ।
दलि दुख सजइ सकल कल्याना । अस असीस राउरि जग जाना ॥
सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी । सकइ को टारि टेक जो टेकी ॥
आपकी आशिष ही एक ऐसी है जो दुःखोंका दमन करके, समस्त कल्याणोंको सज देती है; यह जगत् जानता है । हे स्वामी! आप वही हैं जिन्होंने विधाताकी गति (विधान) को भी रोक दिया । आपने जो टेक टेक दी (जो निश्चय कर दिया) उसे कौन टाल सकता है?
निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि ॥
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि ॥
देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणोंके लिये प्रभु अपनी इच्छासे [किसी कर्मबन्धनसे नहीं] अवतार लेते हैं । वहाँ सगुणोपासक [भक्तगण सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य] सब प्रकारके मोक्षोंको त्यागकर उनकी सेवामें साथ रहते हैं ।
त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही । तासु नारि निसिचर पति हरिही ॥
तासु खोज पठइहि प्रभु दूता । तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता ॥
[उन्होंने कहा—] त्रेतायुगमें साक्षात् परब्रह्म मनुष्यशरीर धारण करेंगे । उनकी स्त्रीको राक्षसोंका राजा हर ले जायगा । उसकी खोजमें प्रभु दूत भेजेंगे । उनसे मिलनेपर तू पवित्र हो जायगा ।
तात राम नहिं नर भूपाला । भुवनेस्वर कालहु कर काला ॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता । ब्यापक अजित अनादि अनंता ॥
हे तात! राम मनुष्योंके ही राजा नहीं हैं । वे समस्त लोकोंके स्वामी और कालके भी काल हैं । वे [सम्पूर्ण ऐश्वर्य, यश, श्री, धर्म, वैराग्य एवं ज्ञानके भण्डार] भगवान् हैं; वे निरामय (विकाररहित), अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म हैं ।
अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना । ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना ॥
निज जन जानि ताहि अपनावा । प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा ॥
ऐसे परम कृपालु प्रभुको छोड़कर जो मनुष्य दूसरेको भजते हैं, वे बिना सींग-पूँछके पशु हैं । अपना सेवक जानकर विभीषणको श्रीरामजीने अपना लिया । प्रभुका स्वभाव वानरकुलके मनको [बहुत] भाया ।
एक बान काटी सब माया । जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया ॥
कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके । भए प्रबल रन रहहिं न रोके ॥
तब श्रीरामजीने एक ही बाणसे सारी माया काट डाली, जैसे सूर्य अन्धकारके समूहको हर लेता है । तदनन्तर उन्होंने कृपाभरी दृष्टिसे वानर-भालुओंकी ओर देखा, [जिससे] वे ऐसे प्रबल हो गये कि रणमें रोकनेपर भी नहीं रुकते थे ।
तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी । सदा एकरस सहज उदासी ॥
अकल अगुन अज अनघ अनामय । अजित अमोघसक्ति करुनामय ॥
आप समरूप, ब्रह्म, अविनाशी, नित्य, एकरस, स्वभावसे ही उदासीन (शत्रु-मित्र-भावरहित), अखण्ड, निर्गुण (मायिक गुणोंसे रहित), अजन्मा, निष्पाप, निर्विकार, अजेय, अमोघशक्ति (जिनकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और दयामय हैं ।
रावण-वध के बाद देवताओं ने श्रीरघुनाथजी की स्तुति की।
छन महिं सबहि मिले भगवाना । उमा मरम यह काहुँ न जाना ॥
एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा । आगें चले सील गुन धामा ॥
भगवान् क्षणमात्रमें सबसे मिल लिये । हे उमा! यह रहस्य किसीने नहीं जाना । इस प्रकार शील और गुणोंके धाम श्रीरामजी सबको सुखी करके आगे बढ़े ।
ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार ॥
सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार ॥
जो [बौद्धिक] ज्ञान, वाणी और इन्द्रियोंसे परे और अजन्मा हैं तथा माया, मन और गुणोंके परे हैं, वही सच्चिदानन्दघन भगवान् श्रेष्ठ नरलीला करते हैं ।
सोइ सच्चिदानंद घन रामा । अज बिग्यान रूप बल धामा ॥
ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता । अखिल अमोघसक्ति भगवंता ॥
श्रीरामजी वही सच्चिदानन्दघन हैं जो अजन्मा, विज्ञानस्वरूप, रूप और बलके धाम, सर्वव्यापक एवं व्याप्य (सर्वरूप), अखण्ड, अनन्त, सम्पूर्ण, अमोघशक्ति (जिसकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और छ: ऐश्वर्योंसे युक्त भगवान् हैं ।
भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप ॥
किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप ॥
भगवान् प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने भक्तोंके लिये राजाका शरीर धारण किया और साधारण मनुष्योंके-से अनेकों परम पावन चरित्र किये ।
जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ ॥
सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ ॥
असि रघुपति लीला उरगारी । दनुज बिमोहनि जन सुखकारी ॥
जे मति मलिन बिषयबस कामी । प्रभु पर मोह धरहिं इमि स्वामी ॥
जैसे कोई नट (खेल करनेवाला) अनेक वेष धारण करके नृत्य करता है, और वही-वही (जैसा वेष होता है, उसीके अनुकूल) भाव दिखलाता है, पर स्वयं वह उनमेंसे कोई हो नहीं जाता, हे गरुड़जी! ऐसी ही श्रीरघुनाथजीकी यह लीला है, जो राक्षसोंको विशेष मोहित करनेवाली और भक्तोंको सुख देनेवाली है । हे स्वामी! जो मनुष्य मलिनबुद्धि, विषयोंके वश और कामी हैं, वे ही प्रभुपर इस प्रकार मोहका आरोप करते हैं ।
काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से कहा।
सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर ॥
भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर ॥
सर्वत्र वही शिशुपन, वही शोभा और वही कृपालु श्रीरघुवीर! इस प्रकार मोहरूपी पवनकी प्रेरणा मैं भुवन-भुवनमें देखता फिरता था ।
सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार ॥
गुनउ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार ॥
हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! सुनिये, कलिकाल पाप और अवगुणोंका घर है । किन्तु कलियुगमें एक गुण भी बड़ा है कि उसमें बिना ही परिश्रम भवबन्धनसे छुटकारा मिल जाता है ।