श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

नीति–व्यवहार

लोकव्यवहार, मित्रता, वाणी और राजधर्म

33 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

योग्य मन्त्रियों के गुण

एतैर्ब्रह्मर्षिभिर्नित्यमृत्विजस्तस्य पौर्वकाः ।

विद्याविनीता ह्रीमन्तः कुशला नियतेन्द्रियाः ॥

श्रीमन्तश्च महात्मानः शस्त्रज्ञा दृढविक्रमाः ।

कीर्तिमन्तः प्रणिहिता यथावचनकारिणः ॥

तेजःक्षमायशः प्राप्ताः स्मितपूर्वाभिभाषिणः ।

क्रोधात् कामार्थहेतोर्वा न ब्रूयुरनृतं वचः ॥

इन ब्रह्मर्षियोंके साथ राजाके पूर्वपरम्परागत ऋत्विज् भी सदा मन्त्रीका कार्य करते थे । वे सब-के-सब विद्वान् होनेके कारण विनयशील, सलज्ज, कार्यकुशल, जितेन्द्रिय, श्रीसम्पन्न, महात्मा, शस्त्रविद्याके ज्ञाता, सुदृढ़ पराक्रमी, यशस्वी, समस्त राजकार्योंमें सावधान, राजाकी आज्ञाके अनुसार कार्य करनेवाले, तेजस्वी, क्षमाशील, कीर्तिमान् तथा मुसकराकर बात करनेवाले थे । वे कभी काम, क्रोध या स्वार्थके वशीभूत होकर झूठ नहीं बोलते थे ।

बालकाण्ड, अध्याय 7, श्लोक 6–8 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 85
राजधर्म और प्रजा रक्षा

नृशंसमनृशंसं वा प्रजारक्षणकारणात् ।

पातकं वा सदोषं वा कर्तव्यं रक्षता सदा ॥

प्रजापालक नरेशको प्रजाजनोंकी रक्षाके लिये क्रूरतापूर्ण या क्रूरतारहित, पातकयुक्त अथवा सदोष कर्म भी करना पड़े तो कर लेना चाहिये । यह बात उसे सदा ही ध्यानमें रखनी चाहिये ।

विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा।

बालकाण्ड, अध्याय 25, श्लोक 18 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 128 धर्म–आचरण
क्षमा का महान कार्य

क्षान्तं क्षमावतां पुत्र्यः कर्तव्यं सुमहत् कृतम् ।

ऐकमत्यमुपागम्य कुलं चावेक्षितं मम ॥

पुत्रियो! क्षमाशील महापुरुष ही जिसे कर सकते हैं, वही क्षमा तुमने भी की है । यह तुमलोगोंके द्वारा महान् कार्य सम्पन्न हुआ है । तुम सबने एकमत होकर जो मेरे कुलकी मर्यादापर ही दृष्टि रखी है-कामभावको अपने मनमें स्थान नहीं दिया है — यह भी तुमने बहुत बड़ा काम किया है ।

राजा कुशनाभ ने अपनी कन्याओं से कहा।

बालकाण्ड, अध्याय 33, श्लोक 6 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 143 धर्म–आचरण
सज्जन के लक्षण

दृढभक्तिः स्थिरप्रज्ञो नासद्ग्राही न दुर्वचः ।

निस्तन्द्रीरप्रमत्तश्च स्वदोषपरदोषवित् ॥

गुरुजनोंके प्रति उनकी दृढ़ भक्ति थी । वे स्थितप्रज्ञ थे और असवस्तुओंको कभी ग्रहण नहीं करते थे । उनके मुखसे कभी दुर्वचन नहीं निकलता था । वे आलस्यरहित, प्रमादशून्य तथा अपने और पराये मनुष्योंके दोषोंको अच्छी प्रकार जाननेवाले थे ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 1, श्लोक 24 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 235 धर्म–आचरण
शास्त्रज्ञ और व्यवहार कुशल

शास्त्रज्ञश्च कृतज्ञश्च पुरुषान्तरकोविदः ।

यः प्रग्रहानुग्रहयोर्यथान्यायं विचक्षणः ॥

वे शास्त्रोंके ज्ञाता, उपकारियोंके प्रति कृतज्ञ तथा पुरुषोंके तारतम्यको अथवा दूसरे पुरुषोंके मनोभावको जाननेमें कुशल थे । यथायोग्य निग्रह और अनुग्रह करनेमें वे पूर्ण चतुर थे ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 1, श्लोक 25 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 235 ज्ञान–विवेक
श्रीराम के अनुपम गुण

अप्रधृष्यश्च संग्रामे क्रुद्धैरपि सुरासुरैः ।

अनसूयो जितक्रोधो न दृप्तो न च मत्सरी ॥

संग्राममें कुपित होकर आये हुए समस्त देवता और असुर भी उनको परास्त नहीं कर सकते थे । उनमें दोषदृष्टिका सर्वथा अभाव था । वे क्रोधको जीत चुके थे । दर्प और ईर्ष्याका उनमें अत्यन्त अभाव था ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 1, श्लोक 30 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 235 काम–क्रोध–लोभ–मोह
श्रीराम के सद्गुण

धर्मज्ञः सत्यसंधश्च शीलवाननसूयकः ।

क्षान्तः सान्त्वयिता श्लक्ष्णः कृतज्ञो विजितेन्द्रियः ॥

मृदुश्च स्थिरचित्तश्च सदा भव्योऽनसूयकः ।

प्रियवादी च भूतानां सत्यवादी च राघवः ॥

श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, शीलवान्, अदोषदर्शी, शान्त, दीन-दु: खियोंको सान्त्वना प्रदान करनेवाले, मृदुभाषी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, कोमल स्वभाववाले, स्थिरबुद्धि, सदा कल्याणकारी, असूयारहित, समस्त प्राणियोंके प्रति प्रिय वचन बोलनेवाले और सत्यवादी हैं ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 2, श्लोक 31–32 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 239 धर्म–आचरण
श्रीराम का न्यायपूर्ण शासन

हन्त्येष नियमाद् वध्यानवध्येषु न कुप्यति ।

युनक्त्यर्थेः प्रहृष्टश्च तमसौ यत्र तुष्यति ॥

जो शास्त्र के अनुसार प्राणदण्ड पानेके अधिकारी हैं, उनका ये नियमपूर्वक वध कर डालते हैं तथा जो शास्त्रदृष्टिसे अवध्य हैं, उनपर ये कदापि कुपित नहीं होते हैं । जिसपर ये संतुष्ट होते हैं, उसे हर्षमें भरकर धनसे परिपूर्ण कर देते हैं ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 2, श्लोक 46 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 240 धर्म–आचरण
प्रजा का रञ्जन

अमात्यप्रभृतीः सर्वाः प्रजाश्चैवानुरञ्जय ।

कोष्ठागारायुधागारैः कृत्वा संनिचयान् बहून् ॥

इष्टानुरक्तप्रकृतिर्यः पालयति मेदिनीम् ।

तस्य नन्दन्ति मित्राणि लब्ध्वामृतमिवामराः ॥

मन्त्री, सेनापति आदि समस्त अधिकारियों तथा प्रजाजनोंको सदा प्रसन्न रखना । जो राजा कोष्ठागार (भण्डारगृह) तथा शस्त्रागार आदिके द्वारा उपयोगी वस्तुओंका बहुत बड़ा संग्रह करके मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि समस्त प्रकृतियोंको प्रिय मानकर उन्हें अपने प्रति अनुरक्त एवं प्रसन्न रखते हुए पृथ्वीका पालन करता है, उसके मित्र उसी प्रकार आनन्दित होते हैं, जैसे अमृतको पाकर देवता प्रसन्न हुए थे ।

राजा दशरथ ने श्रीराम से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 3, श्लोक 44–45 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 244 सेवा–करुणा–विनय
सौतेले पुत्र का भय

शोचामि दुर्मतित्वं ते का हि प्राज्ञा प्रहर्षयेत् ।

अरेः सपत्नीपुत्रस्य वृद्धिं मृत्योरिवागताम् ॥

मुझे तुम्हारी दुर्बुद्धिके लिये ही अधिक शोक होता है । अरी! सौता बेटा शत्रु होता है । वह सौतेली माँके लिये साक्षात् मृत्युके समान है । भला, उसके अभ्युदयका अवसर आया देख कौन बुद्धिमती स्त्री अपने मनमें हर्ष मानेगी ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 8, श्लोक 4 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 255
धर्म और पत्नी का महत्व

धर्मार्थकामाः खलु जीवलोके ।

समीक्षिता धर्मफलोदयेषु ।

ये तत्र सर्वे स्युरसंशयं मे ।

भार्येव वश्याभिमता सपुत्रा ॥

इस जीवजगत्में पूर्वकृत धर्मके फलकी प्राप्तिके अवसरोंपर जो धर्म, अर्थ और काम तीनों देखे गये हैं, वे सब-के- 5- सब जहाँ धर्म है, वहाँ अवश्य प्राप्त होते हैं — इसमें संशय नहीं है; ठीक उसी तरह जैसे भार्या धर्म, अर्थ और काम तीनोंकी साधन होती है । वह पतिके वशीभूत या अनुकूल रहकर अतिथि सत्कार आदि धर्मके पालनमें सहायक होती है । प्रेयसीरूपसे कामका साधन बनती है और पुत्रवती होकर उत्तम लोककी प्राप्तिरूप अर्थकी साधिका होती है ।

श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 21, श्लोक 57 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 308 धर्म–आचरण
पुरुषार्थ और दैव

विक्लवो वीर्यहीनो यः स दैवमनुवर्तते ।

वीराः सम्भावितात्मानो न दैवं पर्युपासते ॥

जो कायर है, जिसमें पराक्रमका नाम नहीं है, वही दैवका भरोसा करता है । सारा संसार जिन्हें आदरकी दृष्टिसे देखता है, वे शक्तिशाली वीर पुरुष दैवकी उपासना नहीं करते हैं ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 23, श्लोक 16 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 313
त्याग की सच्चाई

यो हि दत्त्वा द्विपश्रेष्ठं कक्ष्यायां कुरुते मनः ।

रज्जुस्नेहेन किं तस्य त्यजतः कुञ्जरोत्तमम् ॥

जो श्रेष्ठ गजराजका दान करके उसके रस्सेमें मन लगाता है — लोभवश रस्सेको रख लेना चाहता है, वह अच्छा नहीं करता; क्योंकि उत्तम हाथीका त्याग करनेवाले पुरुषको उसके रस्सेमें आसक्ति रखनेकी क्या आवश्यकता है?

श्रीराम ने राजा दशरथ से विनीत होकर कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 37, श्लोक 3 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 352
राजधर्म का अभाव

न हि मन्ये नृशंसे त्वं राजधर्ममवेक्षसे ।

गतिं वा न विजानासि राजवृत्तस्य शाश्वतीम् ॥

क्रूर स्वभाववाली कैकेय! मेरी समझमें तू राजधर्मपर दृष्टि नहीं रखती है अथवा उसे बिलकुल नहीं जानती । राजाओंके बर्तावका जो सनातन स्वरूप है, उसका भी तुझे ज्ञान नहीं है ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 73, श्लोक 21 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 453
रघुकुल के गुण

त्वय्येतत् पुरुषव्याघ्र युक्तं राघववंशजे ।

गुरुवृत्तिर्दमश्चैव साधूनां चानुयायिता ॥

पुरुषसिंह! तुम रघुकुलमें उत्पन्न हुए हो । तुममें गुरुजनोंकी सेवा, इन्द्रियसंयम तथा श्रेष्ठ पुरुषोंके अनुसरणका भाव होना उचित ही है ।

भगवान् भरद्वाज ने प्रसन्न होकर भरत से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 90, श्लोक 20 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 489 साधना–योग
पति की सहधर्मिणी

तदेवमेतं त्वमनुव्रता सती ।

पतिप्रधाना समयानुवर्तिनी ।

भव स्वभर्तुः सहधर्मचारिणी ।

यशश्च धर्मं च ततः समाप्स्यसि ॥

‘अतः तुम इसी प्रकार अपने इन पतिदेव श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें लगी रहो-सतीधर्मका पालन करो, पतिको प्रधान देवता समझो और प्रत्येक समय उनका अनुसरण करती हुई अपने स्वामीकी सहधर्मिणी बनो, इससे तुम्हें सुयश और धर्म दोनोंकी प्राप्ति होगी’

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 117, श्लोक 29 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 559 धर्म–आचरण
तीन प्रमुख व्यसन

त्रीण्येव व्यसनान्यत्र कामजानि भवन्त्युत ।

मिथ्यावाक्यं तु परमं तस्माद् गुरुतरावुभौ ॥

परदाराभिगमनं विना वैरं च रौद्रता ।

मिथ्यावाक्यं न ते भूतं न भविष्यति राघव ॥

इस जगत्में कामसे उत्पन्न होनेवाले तीन ही व्यसन होते हैं । मिथ्याभाषण बहुत बड़ा व्यसन है, किंतु उससे भी भारी दो व्यसन और हैं-परस्त्रीगमन और बिना वैरके ही दूसरोंके प्रति क्रूरतापूर्ण बर्ताव । रघुनन्दन! इनमेंसे मिथ्याभाषणरूप व्यसन तो न आपमें कभी हुआ है और न आगे होगा ही ।

सीता ने वन की ओर प्रस्थित हुए श्रीराम से स्नेहभरी मनोहर वाणी में यह कहा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 9, श्लोक 3–4 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 582 काम–क्रोध–लोभ–मोह
देशधर्म का पालन

क्व च शस्त्रं क्व च वनं क्व च क्षात्रं तपः क्व च ।

व्याविद्धमिदमस्माभिर्देशधर्मस्तु पूज्यताम् ॥

कहाँ शस्त्र धारण और कहाँ वनवास! कहाँ क्षत्रियका हिंसामय कठोर कर्म और कहाँ सब प्राणियोंपर दया करनारूप तप — ये परस्पर विरुद्ध जान पड़ते हैं । अतः हमलोगोंको देशधर्मका ही आदर करना चाहिये (इस समय हम तपोवनरूप देशमें निवास करते हैं, अतः यहाँके अहिंसामय धर्मका पालन करना ही हमारा कर्तव्य है)

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 9, श्लोक 27 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 584 धर्म–आचरण
असावधानी और भोग का परिणाम

अयुक्तचारं दुर्दर्शमस्वाधीनं नराधिपम् ।

वर्जयन्ति नरा दूरान्नदीपङ्कमिव द्विपाः ॥

जो राज्यकी देखभालके लिये गुप्तचरोंको नियुक्त नहीं करता है, प्रजाजनोंको जिसका दर्शन दुर्लभ हो जाता है और कामिनी आदि भोगोंमें आसक्त होनेके कारण अपनी स्वाधीनता खो बैठता है, ऐसे राजाको प्रजा दूरसे ही त्याग देती है । ठीक उसी तरह, जैसे हाथी नदीकी कीचड़से दूर ही रहते हैं ।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 33, श्लोक 5 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 643
सचेत राजा की महिमा

नयनाभ्यां प्रसुप्तो वा जागर्ति नयचक्षुषा ।

व्यक्तक्रोधप्रसादश्च स राजा पूज्यते जनैः ॥

जो स्थूल आँखोंसे तो सोता है, परंतु नीतिकी आँखोंसे सदा जागता रहता है तथा जिसके क्रोध और अनुग्रहका फल प्रत्यक्ष प्रकट होता है, उसी राजाकी लोग पूजा करते हैं ।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 33, श्लोक 21 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 644
कर्तव्य का निर्णय

स सर्वैः सचिवैः सार्धं विभीषणपुरस्कृतैः ।

मन्त्रयित्वा स धर्मिष्ठैः कृत्वा निश्चयमात्मनः ।

दोषाणां च गुणानां च सम्प्रधार्य बलाबलम् ।

आत्मनश्च बलं ज्ञात्वा राघवस्य च तत्त्वतः ।

हितं हि तव निश्चित्य क्षमं त्वं कर्तुमर्हसि ॥

तुम विभीषण आदि सभी धर्मात्मा मन्त्रियोंके साथ सलाह करके अपने कर्तव्यका निश्चय करो । अपने और श्रीरामके दोषों तथा गुणोंके बलाबलपर भलीभाँति विचार करके अपनी और श्रीरामचन्द्रजीकी शक्तिको ठीक-ठीक समझ लो । फिर क्या करनेसे तुम्हारा हित होगा, इसका निश्चय करके जो उचित जान पड़े, वही कार्य तुम्हें करना चाहिये ।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 37, श्लोक 23–24 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 653 धर्म–आचरण
मन्त्री का कर्तव्य

सम्पृष्टेन तु वक्तव्यं सचिवेन विपश्चिता ।

ॐॐॐ ।

उद्यताञ्जलिना राज्ञो य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥

जो अपना कल्याण चाहता हो, उस बुद्धिमान् मन्त्रीको उचित है कि वह राजासे उसके पूछनेपर ही अपना अभिप्राय प्रकट करे और वह भी हाथ जोड़कर नम्रताके साथ ।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 40, श्लोक 9 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 659 सेवा–करुणा–विनय
मृत्युबोध और हठ

निवार्यमाणस्तु मया हितैषिणा ।

न मृष्यसे वाक्यमिदं निशाचर ।

परेतकल्पा हि गतायुषो नरा ।

हितं न गृह्णन्ति सुहृद्धिरीरितम् ॥

‘निशाचर! मैं तुम्हारा हितैषी हूँ, इसीलिये तुम्हें पापकर्मसे रोक रहा हूँ; किंतु तुम्हें मेरी बात सहन नहीं मरणासन्न पुरुष अपने सुहृदोंकी कही हुई हितकर बातें होती है । सच है जिनकी आयु समाप्त हो जाती है, वे । नहीं स्वीकार करते हैं’

मारीच ने रावण से कहा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 41, श्लोक 20 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 661 कर्म–प्रारब्ध
छः राजनीतिक उपाय

शृणु राघव तत्त्वेन यथा सीतामवाप्स्यसि ।

राम षड् युक्तयो लोके याभिः सर्वं विमृश्यते ।

परिमृष्टो दशान्तेन दशाभागेन सेव्यते ॥

रघुनन्दन! आप जिस प्रकार सीताको पा सकेंगे, वह ठीक-ठीक बता रहा हूँ, सुनिये । श्रीराम! लोकमें छः युक्तियाँ हैं, जिनसे राजाओंद्वारा सब कुछ प्राप्त किया जाता है (उन युक्तियों तथा उपायोंके नाम हैं — संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय) । जो मनुष्य दुर्दशासे ग्रस्त होता है, वह दूसरे किसी दुर्दशाग्रस्त पुरुषसे ही सेवा या सहायता प्राप्त करता है (यह नीति है)

कबन्ध ने राम से कहा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 72, श्लोक 7–8 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 741
बुद्धि और विवेक का महत्व

बुद्धिविज्ञानसम्पन्न इङ्गितैः सर्वमाचर ।

नह्यबुद्धिं गतो राजा सर्वभूतानि शास्ति हि ॥

‘बुद्धि और विज्ञानसे सम्पन्न होकर आप दूसरोंकी चेष्टाओंके द्वारा उनका मनोभाव समझें और उसीके अनुसार सभी आवश्यक कार्य करें; क्योंकि जो राजा बुद्धि-बलका आश्रय नहीं लेता, वह सम्पूर्ण प्रजापर शासन नहीं कर सकता’

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 2, श्लोक 18 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 764 ज्ञान–विवेक
मित्रों के प्रति उदारता

रजतं वा सुवर्णं वा शुभान्याभरणानि च ।

अविभक्तानि साधूनामवगच्छन्ति साधवः ॥

अच्छे स्वभाववाले मित्र अपने घरके सोने-चाँदी अथवा उत्तम आभूषणोंको अपने अच्छे मित्रोंके लिये अविभक्त ही मानते हैं-उन मित्रोंका अपने धनपर अपने ही समान अधिकार समझते हैं ।

श्रीराम ने सुग्रीव से कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 8, श्लोक 7 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 777
मित्रता का परित्याग

धनत्यागः सुखत्यागो देशत्यागोऽपि वानघ ।

वयस्यार्थे प्रवर्तन्ते स्नेहं दृष्ट्वा तथाविधम् ॥

‘अनघ! साधुपुरुष अपने मित्रका अत्यन्त उत्कृष्ट प्रेम देख आवश्यकता पड़नेपर उसके लिये धन, सुख और देशका भी परित्याग कर देते हैं’

श्रीरामचन्द्रजी ने लक्ष्मण के सामने ही प्रिय वचन बोलनेवाले सुग्रीव से कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 8, श्लोक 9 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 777
राजा के गुण

नयश्च विनयश्चोभौ यस्मिन् सत्यं च सुस्थितम् ।

विक्रमश्च यथा दृष्टः स राजा देशकालवित् ॥

जिसमें नीति, विनय, सत्य और पराक्रम आदि सभी राजोचित गुण यथावत् रूपसे स्थित देखे जायँ, वही देश-काल-तत्त्वको जाननेवाला राजा होता है (भरतमें ये सभी गुण विद्यमान हैं)

धर्मात्मा राजा भरत इस पृथ्वी का पालन करते हैं।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 18, श्लोक 8 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 807
मध्यम मार्ग का महत्व

न चातिप्रणयः कार्यः कर्तव्योऽप्रणयश्च ते ।

उभयं हि महादोषं तस्मादन्तरदृग् भव ॥

‘किसीके साथ अत्यन्त प्रेम न करो और प्रेमका सर्वथा अभाव भी न होने दो; क्योंकि ये दोनों ही महान् दोष हैं । अतः मध्यम स्थितिपर ही दृष्टि रखो’

बाली ने सुग्रीव को सम्बोधित करते हुए कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 22, श्लोक 23 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 819
प्रतिज्ञा भङ्ग का अधमत्व

अर्थिनामुपपन्नानां पूर्वं चाप्युपकारिणाम् ।

आशां संश्रुत्य यो हन्ति स लोके पुरुषाधमः ॥

जो बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा पहले ही उपकार करनेवाले कार्यार्थी पुरुषोंको प्रतिज्ञापूर्वक आशा देकर पीछे उसे तोड़ देता है, वह संसारके सभी पुरुषोंमें नीच है ।

श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि वे सुग्रीव से यह कहें।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 30, श्लोक 71 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 852
कृतज्ञता का महत्त्व

पूर्वं कृतार्थो मित्राणां न तत्प्रतिकरोति यः ।

कृतघ्नः सर्वभूतानां स वध्यः प्लवगेश्वर ॥

वानरराज! जो पहले मित्रोंके द्वारा अपना कार्य सिद्ध करके बदलेमें उन मित्रोंका कोई उपकार नहीं करता है, वह कृतघ्न एवं सब प्राणियोंके लिये वध्य है ।

लक्ष्मण ने सुग्रीव से कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 34, श्लोक 10 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 865
श्रेष्ठ राजा के लक्षण

धर्ममर्थं च कामं च काले यस्तु निषेवते ।

विभज्य सततं वीर स राजा हरिसत्तम ॥

हित्वा धर्मं तथार्थं च कामं यस्तु निषेवते ।

स वृक्षाग्रे यथा सुप्तः पतितः प्रतिबुध्यते ॥

वीर! वानरशिरोमणे! जो धर्म, अर्थ और काम लिये समयका विभाग करके सदा उचित समयपर उनका (न्याययुक्त) सेवन करता है, वही श्रेष्ठ राजा है ।

श्रीराम ने सुग्रीव से कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 38, श्लोक 20–21 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 873
गुरु का आश्रय

गुरुश्च गुरुपुत्रश्च त्वं हि नः कपिसत्तम ।

भवन्तमाश्रित्य वयं समर्था ह्यर्थसाधने ॥

‘कपिश्रेष्ठ! तुम्हीं हमारे गुरु और गुरुपुत्र हो । तुम्हारा आश्रय लेकर ही हम सब लोग कार्यसाधनमें समर्थ हो सकते हैं’

अङ्गद ने जाम्बवान् से कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 65, श्लोक 27 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 933 गुरु महिमा