श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

धर्म–आचरण

कर्तव्य और सदाचरण

45 पद्य

वाल्मीकि रामायण — खण्ड १

रामायण श्रवण का महत्व

तदिदं वर्तयिष्यावः सर्वं निखिलमादितः ।

धर्मकामार्थसहितं श्रोतव्यमनसूयता ॥

हम दोनों आदिसे अन्ततक इस सारे काव्यका पूर्णरूपसे गान करेंगे । इसके द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि होती है; अतः आपलोग दोषदृष्टिका परित्याग करके इसका श्रवण करें ।

बालकाण्ड, अध्याय 5, श्लोक 4 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 80 ज्ञान–विवेक
राजधर्म और कर्तव्य

नहि ते स्त्रीवधकृते घृणा कार्या नरोत्तम ।

चातुर्वर्ण्यहितार्थं हि कर्तव्यं राजसूनुना ॥

नरश्रेष्ठ! तुम स्त्री-हत्याका विचार करके इसके प्रति दया न दिखाना । एक राजपुत्रको चारों वर्णोंके हितके लिये स्त्रीहत्या भी करनी पड़े तो उससे मुँह नहीं मोड़ना चाहिये ।

विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा।

बालकाण्ड, अध्याय 25, श्लोक 17 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 128
राजधर्म और प्रजा रक्षा

नृशंसमनृशंसं वा प्रजारक्षणकारणात् ।

पातकं वा सदोषं वा कर्तव्यं रक्षता सदा ॥

प्रजापालक नरेशको प्रजाजनोंकी रक्षाके लिये क्रूरतापूर्ण या क्रूरतारहित, पातकयुक्त अथवा सदोष कर्म भी करना पड़े तो कर लेना चाहिये । यह बात उसे सदा ही ध्यानमें रखनी चाहिये ।

विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा।

बालकाण्ड, अध्याय 25, श्लोक 18 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 128 नीति–व्यवहार
क्षमा का महान कार्य

क्षान्तं क्षमावतां पुत्र्यः कर्तव्यं सुमहत् कृतम् ।

ऐकमत्यमुपागम्य कुलं चावेक्षितं मम ॥

पुत्रियो! क्षमाशील महापुरुष ही जिसे कर सकते हैं, वही क्षमा तुमने भी की है । यह तुमलोगोंके द्वारा महान् कार्य सम्पन्न हुआ है । तुम सबने एकमत होकर जो मेरे कुलकी मर्यादापर ही दृष्टि रखी है-कामभावको अपने मनमें स्थान नहीं दिया है — यह भी तुमने बहुत बड़ा काम किया है ।

राजा कुशनाभ ने अपनी कन्याओं से कहा।

बालकाण्ड, अध्याय 33, श्लोक 6 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 143 नीति–व्यवहार
लोकहित का कर्तव्य

यदत्रानन्तरं कार्यं लोकानां हितकाम्यया ।

संविधत्स्व विधानज्ञ त्वं हि नः परमा गतिः ॥

‘विधि-विधानके ज्ञाता पितामह! अब लोकहितके लिये जो कर्तव्य प्राप्त हो, उसको पूर्ण कीजिये; क्योंकि आप ही हमारे परम आश्रय हैं’

इन्द्र और अग्निसहित समस्त देवताओं ने भगवान् ब्रह्मा को प्रणाम करके यह कहा।

बालकाण्ड, अध्याय 37, श्लोक 4 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 150 शरणागति
श्रीराम का सर्वाङ्गीण ज्ञान

धर्मकामार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमान् प्रतिभानवान् ।

लौकिके समयाचारे कृतकल्पो विशारदः ॥

उन्हें धर्म, काम और अर्थके तत्त्वका सम्यक् ज्ञान था । वे स्मरणशक्तिसे सम्पन्न और प्रतिभाशाली थे । वे लोकव्यवहारके सम्पादनमें समर्थ और समयोचित धर्माचरणमें कुशल थे ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 1, श्लोक 22 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 234
सज्जन के लक्षण

दृढभक्तिः स्थिरप्रज्ञो नासद्ग्राही न दुर्वचः ।

निस्तन्द्रीरप्रमत्तश्च स्वदोषपरदोषवित् ॥

गुरुजनोंके प्रति उनकी दृढ़ भक्ति थी । वे स्थितप्रज्ञ थे और असवस्तुओंको कभी ग्रहण नहीं करते थे । उनके मुखसे कभी दुर्वचन नहीं निकलता था । वे आलस्यरहित, प्रमादशून्य तथा अपने और पराये मनुष्योंके दोषोंको अच्छी प्रकार जाननेवाले थे ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 1, श्लोक 24 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 235 नीति–व्यवहार
श्रीराम के सद्गुण

धर्मज्ञः सत्यसंधश्च शीलवाननसूयकः ।

क्षान्तः सान्त्वयिता श्लक्ष्णः कृतज्ञो विजितेन्द्रियः ॥

मृदुश्च स्थिरचित्तश्च सदा भव्योऽनसूयकः ।

प्रियवादी च भूतानां सत्यवादी च राघवः ॥

श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, शीलवान्, अदोषदर्शी, शान्त, दीन-दु: खियोंको सान्त्वना प्रदान करनेवाले, मृदुभाषी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, कोमल स्वभाववाले, स्थिरबुद्धि, सदा कल्याणकारी, असूयारहित, समस्त प्राणियोंके प्रति प्रिय वचन बोलनेवाले और सत्यवादी हैं ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 2, श्लोक 31–32 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 239 नीति–व्यवहार
श्रीराम का न्यायपूर्ण शासन

हन्त्येष नियमाद् वध्यानवध्येषु न कुप्यति ।

युनक्त्यर्थेः प्रहृष्टश्च तमसौ यत्र तुष्यति ॥

जो शास्त्र के अनुसार प्राणदण्ड पानेके अधिकारी हैं, उनका ये नियमपूर्वक वध कर डालते हैं तथा जो शास्त्रदृष्टिसे अवध्य हैं, उनपर ये कदापि कुपित नहीं होते हैं । जिसपर ये संतुष्ट होते हैं, उसे हर्षमें भरकर धनसे परिपूर्ण कर देते हैं ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 2, श्लोक 46 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 240 नीति–व्यवहार
श्रीराम के सद्गुण

सत्यं दानं तपस्त्यागो मित्रता शौचमार्जवम् ।

विद्या च गुरुशुश्रूषा ध्रुवाण्येतानि राघवे ॥

सत्य, दान, तप, त्याग, मित्रता, पवित्रता, सरलता, विद्या और गुरु-शुश्रूषा — ये सभी सद्गुण श्रीराममें स्थिररूपसे रहते हैं ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 12, श्लोक 30 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 270
श्रीराम के सद्गुण

क्षमा यस्मिंस्तपस्त्यागः सत्यं धर्मः कृतज्ञता ।

अप्यहिंसा च भूतानां तमृते का गतिर्मम ॥

जिनमें क्षमा, तप, त्याग, सत्य, धर्म, कृतज्ञता और समस्त जीवोंके प्रति दया भरी हुई है, उन श्रीरामके बिना मेरी क्या गति होगी?

महाराज दशरथ शोक से सन्तप्त होकर विलाप करते हुए कैकेयी से प्रार्थना कर रहे थे।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 12, श्लोक 33 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 271
सत्य और धर्म

आहुः सत्यं हि परमं धर्मं धर्मविदो जनाः ।

सत्यमाश्रित्य च मया त्वं धर्मं प्रतिचोदितः ॥

धर्मज्ञ पुरुष सत्यको ही सबसे श्रेष्ठ धर्म बतलाते हैं, उस सत्यका सहारा लेकर मैंने आपको धर्मका पालन करनेके लिये ही प्रेरित किया है ।

कैकेयी ने दशरथ से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 14, श्लोक 3 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 279 ज्ञान–विवेक
सत्य की प्रधानता

धर्ममूलमिदं राम विदितं च सतामपि ।

तत् सत्यं न त्यजेद् राजा कुपितस्त्वत्कृते यथा ॥

राम! सत्य ही धर्मकी जड़ है, यह सत्पुरुषोंका भी निश्चय है । कहीं ऐसा न हो कि ये महाराज तुम्हारे कारण मुझपर कुपित होकर अपने उस सत्यको ही छोड़ बैठें । जैसे भी इनके सत्यका पालन हो, वैसा तुम्हें करना चाहिये ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 18, श्लोक 24 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 295 ज्ञान–विवेक
पितृसेवा का महत्व

न ह्यतो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम् ।

यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिया ॥

पिताकी सेवा अथवा उनकी आज्ञाका पालन करना, जैसा महत्त्वपूर्ण धर्म है, उससे बढ़कर संसारमें दूसरा कोई धर्माचरण नहीं है ।

राम ने कैकेयी से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 19, श्लोक 22 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 298
धर्मनिष्ठ कर्तव्य

भरतः पालयेद् राज्यं शुश्रूषेच्च पितुर्यथा ।

तथा भवत्या कर्तव्यं स हि धर्मः सनातनः ॥

‘तुम ऐसा प्रयत्न करना, जिससे भरत इस राज्यका पालन और पिताजीकी सेवा करते रहें; क्योंकि यही सनातन धर्म है’

श्रीराम ने माता कैकेयी से यह वचन कहे।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 19, श्लोक 26 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 298
धर्म की श्रेष्ठता

धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम् ।

धर्मसंश्रितमप्येतत् पितुर्वचनमुत्तमम् ॥

संसारमें धर्म ही सबसे श्रेष्ठ है । धर्ममें ही सत्यकी प्रतिष्ठा है । पिताजीका यह वचन भी धर्म आश्रित होनेके कारण परम उत्तम है ।

श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 21, श्लोक 41 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 306
धर्म और पत्नी का महत्व

धर्मार्थकामाः खलु जीवलोके ।

समीक्षिता धर्मफलोदयेषु ।

ये तत्र सर्वे स्युरसंशयं मे ।

भार्येव वश्याभिमता सपुत्रा ॥

इस जीवजगत्में पूर्वकृत धर्मके फलकी प्राप्तिके अवसरोंपर जो धर्म, अर्थ और काम तीनों देखे गये हैं, वे सब-के- 5- सब जहाँ धर्म है, वहाँ अवश्य प्राप्त होते हैं — इसमें संशय नहीं है; ठीक उसी तरह जैसे भार्या धर्म, अर्थ और काम तीनोंकी साधन होती है । वह पतिके वशीभूत या अनुकूल रहकर अतिथि सत्कार आदि धर्मके पालनमें सहायक होती है । प्रेयसीरूपसे कामका साधन बनती है और पुत्रवती होकर उत्तम लोककी प्राप्तिरूप अर्थकी साधिका होती है ।

श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 21, श्लोक 57 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 308 नीति–व्यवहार
पिता की आज्ञा का पालन

न तेन शक्नोमि पितुः प्रतिज्ञामिमां न कर्तुं सकलां यथावत् ।

देव्याश्च भर्ता स गतिश्च धर्मः ॥

इसलिये मैं पिताकी इस सम्पूर्ण प्रतिज्ञाका यथावत् पालन करनेसे मुँह नहीं मोड़ सकता । तात लक्ष्मण! वे हम दोनोंको आज्ञा देनेमें समर्थ गुरु हैं और माताजीके तो वे ही पति, गति तथा धर्म हैं ।

श्रीराम ने लक्ष्मण से पिता की आज्ञा के पालन के विषय में कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 21, श्लोक 60 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 308 गुरु महिमा
पिताजी का सत्यपरक चरित्र

सत्यः सत्याभिसंधश्च नित्यं सत्यपराक्रमः ।

परलोकभयाद् भीतो निर्भयोऽस्तु पिता मम ॥

पिताजी सदा सत्यवादी और सत्यपराक्रमी रहे हैं । वे परलोकके भयसे सदा डरते रहते हैं; इसलिये मुझे वही काम करना चाहिये, जिससे मेरे पिताजीका पारलौकिक भय दूर हो जाय ।

श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 22, श्लोक 9 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 309
पति की सेवा

यावज्जीवति काकुत्स्थः पिता मे जगतीपतिः ।

शुश्रूषा क्रियतां तावत् स हि धर्मः सनातनः ॥

‘मेरे पिता ककुत्स्थकुल-भूषण महाराज दशरथ जबतक जीवित हैं, तबतक तुम उन्हींकी सेवा करो । पतिकी सेवा ही स्त्रीके लिये सनातन धर्म है’

श्रीराम ने माता कौसल्या से वन गमन के समय कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 24, श्लोक 13 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 316
धर्म का संरक्षण

यं पालयसि धर्मं त्वं प्रीत्या च नियमेन च ।

स वै राघवशार्दूल धर्मस्त्वामभिरक्षतु ॥

रघुकुलसिंह! तुम नियमपूर्वक प्रसन्नताके साथ जिस धर्मका पालन करते हो, वही सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करे ।

माता कौसल्या ने श्रीराम को वनवास के समय आशीर्वाद देते हुए कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 25, श्लोक 3 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 318
पितृसेवा का महत्त्व

न सत्यं दानमानौ वा यज्ञो वाप्याप्तदक्षिणाः ।

तथा बलकराः सीते यथा सेवा पितुर्मता ॥

सीते! पिताकी सेवा करना कल्याणकी प्राप्तिका जैसा प्रबल साधन माना गया है, वैसा न सत्य है, न दान है, न मान है और न पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञ ही हैं ।

श्रीराम ने सीता से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 30, श्लोक 35 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 332 सेवा–करुणा–विनय
धर्मनिष्ठ आत्मसंयम

प्रतीक्षमाणोऽभिजनं तदार्तमनार्तरूपः प्रहसन्निवाथ ।

जगाम रामः पितरं दिदृक्षुः ।

पितुर्निदेशं विधिवच्चिकीर्षुः ॥

पूर्वजोंकी निवासभूमि अवधके मनुष्य वहाँ शोकसे आतुर होकर खड़े थे । उन्हें देखकर भी श्रीराम स्वयं शोकसे पीड़ित नहीं हुए-उनके शरीरपर व्यथाका कोई चिह्न प्रकट नहीं हुआ । वे पिताकी आज्ञाका विधिपूर्वक पालन करनेकी इच्छासे उनका दर्शन करनेके लिये हँसते हुए-से आगे बढ़े ।

श्रीरामचन्द्रजी ने माता कैकेयी के भवन में प्रवेश करके देखा कि सुमन्त्र और अवध के मनुष्य शोक से आतुर खड़े हैं।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 33, श्लोक 29 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 342 कर्म–प्रारब्ध
धर्मविरुद्ध त्याग का परिणाम

अदुष्टस्य हि संत्यागः सत्पथे निरतस्य च ।

निर्दहेदपि शक्रस्य द्युतिं धर्मविरोधवान् ॥

जिसमें कोई दुष्टता नहीं है, जो सदा सन्मार्गमें ही स्थित है, ऐसे पुरुषका त्याग धर्मसे विरुद्ध माना जाता है । ऐसा धर्मविरोधी कर्म तो इन्द्रके भी तेजको दग्ध कर देगा ।

मन्त्री सिद्धार्थ ने कैकेयी से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 36, श्लोक 29 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 352
श्रीराम का उत्तम धर्म

यस्तवार्ये गतः पुत्रस्त्यक्त्वा राज्यं महाबलः ।

साधु कुर्वन् महात्मानं पितरं सत्यवादिनम् ॥

शिष्टैराचरिते सम्यक्शश्वत् प्रेत्य फलोदये ।

रामो धर्मे स्थितः श्रेष्ठो न स शोच्यः कदाचन ॥

बहिन! जो राज्य छोड़कर अपने महात्मा पिताको भलीभाँति सत्यवादी बनानेके लिये वनमें चले गये हैं, वे तुम्हारे महाबली श्रेष्ठ पुत्र श्रीराम उस उत्तम धर्ममें स्थित हैं, जिसका सत्पुरुषोंने सर्वदा और सम्यक् प्रकारसे पालन किया है तथा जो परलोकमें भी सुखमय फल प्रदान करनेवाला है । ऐसे धर्मात्माके लिये कदापि शोक नहीं करना चाहिये ।

धर्मपरायणा सुमित्रा ने कौसल्या को इस प्रकार विलाप करती देख यह धर्मयुक्त बात बोली।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 44, श्लोक 3–4 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 370
श्रीराम का धर्म

कीर्तिभूतां पताकां यो लोके भ्रमयति प्रभुः ।

धर्मः सत्यव्रतपरः किं न प्राप्तस्तवात्मजः ॥

जो प्रभु संसारमें अपनी कीर्तिमयी पताका फहरा रहे हैं और सदा सत्यव्रतके पालनमें तत्पर रहते हैं, उन धर्मस्वरूप तुम्हारे पुत्र श्रीरामको कौन-सा श्रेय प्राप्त नहीं हुआ है ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 44, श्लोक 7 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 370
कैकेयी का अधर्म

कैकेय्या यदि चेद् राज्यं स्यादधर्म्यमनाथवत् ।

न हि नो जीवितेनार्थः कुतः पुत्रैः कुतो धनैः ॥

यदि इस राज्यपर कैकेयीका अधिकार हो गया तो यह अनाथ-सा हो जायगा । इसमें धर्मकी मर्यादा नहीं रहने पायेगी । ऐसे राज्यमें तो हमें जीवित रहनेकी ही आवश्यकता नहीं जान पड़ती, फिर यहाँ धन और पुत्रोंसे क्या लेना है?

पुरवासियों की स्त्रियाँ अपने पतियों से यह बातें कहने लगीं।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 48, श्लोक 21 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 380
राजा का धर्म

यथा दृष्टिः शरीरस्य नित्यमेव प्रवर्तते ।

तथा नरेन्द्रो राष्ट्रस्य प्रभवः सत्यधर्मयोः ॥

जैसे दृष्टि सदा ही शरीरके हितमें प्रवृत्त रहती है, उसी प्रकार राजा राज्यके भीतर सत्य और धर्मका प्रवर्त्तक होता है ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 67, श्लोक 33 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 438
धर्मनिष्ठता का फल

दिष्ट्या न चलितो धर्मादात्मा ते सहलक्षणः ।

वत्स सत्यप्रतिज्ञो हि सतां लोकानवाप्स्यसि ॥

‘वत्स! सौभाग्यकी बात है कि शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तुम्हारा चित्त धर्मसे विचलित नहीं हुआ है । तुम सत्यप्रतिज्ञ हो, इसलिये तुम्हें सत्पुरुषोंके लोक प्राप्त होंगे’

कौसल्या ने भरत से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 75, श्लोक 62 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 461
पिता की आज्ञा का पालन

रामस्तथा सत्यवृत्तिः सतां धर्ममनुस्मरन् ।

नाजहात् पितुरादेशं शशी ज्योत्स्नामिवोदितः ॥

सत्यपूर्ण बर्ताव करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने सत्पुरुषोंके धर्मका विचार करके पिताकी आज्ञाका उसी प्रकार उल्लङ्घन नहीं किया, जैसे उदित चन्द्रमा अपनी चाँदनीको नहीं छोड़ता है ।

पुरोहित वसिष्ठजी ने भरत से यह मधुर वचन कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 82, श्लोक 6 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 472
सत्य का महत्त्व

सत्यमेवानृशंसं च राजवृत्तं सनातनम् ।

तस्मात् सत्यात्मकं राज्यं सत्ये लोकः प्रतिष्ठितः ॥

सत्यका पालन ही राजाओंका दयाप्रधान धर्म है — सनातन आचार है, अतः राज्य सत्यस्वरूप है । सत्यमें ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित है ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 109, श्लोक 10 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 538
सत्य की प्रधानता

उद्विजन्ते यथा सर्पान्नरादनृतवादिनः ।

धर्मः सत्यपरो लोके मूलं सर्वस्य चोच्यते ॥

झूठ बोलनेवाले मनुष्यसे सब लोग उसी तरह डरते हैं, जैसे साँपसे । संसारमें सत्य ही धर्मकी पराकाष्ठा है और वही सबका मूल कहा जाता है ।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 109, श्लोक 12 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 539
स्वर्गलोक का मार्ग

सत्यं च धर्मं च पराक्रमं च ।

भूतानुकम्पां प्रियवादितां च ।

द्विजातिदेवातिथिपूजनं च ।

पन्थानमाहुस्त्रिदिवस्य सन्तः ॥

सत्य, धर्म, पराक्रम, समस्त प्राणियोंपर दया, सबसे प्रिय वचन बोलना तथा देवताओं, अतिथियों और ब्राह्मणोंकी पूजा करना — इन सबको साधु पुरुषोंने स्वर्गलोकका मार्ग बताया है ।

श्रीराम ने जाबालि से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 109, श्लोक 31 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 540
पति की सहधर्मिणी

तदेवमेतं त्वमनुव्रता सती ।

पतिप्रधाना समयानुवर्तिनी ।

भव स्वभर्तुः सहधर्मचारिणी ।

यशश्च धर्मं च ततः समाप्स्यसि ॥

‘अतः तुम इसी प्रकार अपने इन पतिदेव श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें लगी रहो-सतीधर्मका पालन करो, पतिको प्रधान देवता समझो और प्रत्येक समय उनका अनुसरण करती हुई अपने स्वामीकी सहधर्मिणी बनो, इससे तुम्हें सुयश और धर्म दोनोंकी प्राप्ति होगी’

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 117, श्लोक 29 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 559 नीति–व्यवहार
श्रीराम का पितृवत्सल व्यवहार

सकृद् दृष्टास्वपि स्त्रीषु नृपेण नृपवत्सलः ।

मातृवद् वर्तते वीरो मानमुत्सृज्य धर्मवित् ॥

महाराज दशरथने एक बार भी जिन स्त्रियोंको प्रेमदृष्टिसे देख लिया है, उनके प्रति भी ये पितृवत्सल धर्मज्ञ वीर श्रीराम मान छोड़कर माताके समान ही बर्ताव करते हैं ।

सीता ने अनसूया से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 118, श्लोक 6 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 559
पति सेवा का महत्त्व

न विस्मृतं तु मे सर्वं वाक्यैः स्वैर्धर्मचारिणि ।

पतिशुश्रूषणान्नार्यास्तपो नान्यद् विधीयते ॥

धर्मचारिणि! इसके सिवा मेरे अन्य स्वजनोंने अपने वचनोंद्वारा जो-जो उपदेश किया है, वह भी मुझे भूला नहीं है । स्त्रीके लिये पतिकी सेवाके अतिरिक्त दूसरे किसी तपका विधान नहीं है ।

सीता ने अनसूया से कहा।

आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड, अध्याय 118, श्लोक 9 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 560
देशधर्म का पालन

क्व च शस्त्रं क्व च वनं क्व च क्षात्रं तपः क्व च ।

व्याविद्धमिदमस्माभिर्देशधर्मस्तु पूज्यताम् ॥

कहाँ शस्त्र धारण और कहाँ वनवास! कहाँ क्षत्रियका हिंसामय कठोर कर्म और कहाँ सब प्राणियोंपर दया करनारूप तप — ये परस्पर विरुद्ध जान पड़ते हैं । अतः हमलोगोंको देशधर्मका ही आदर करना चाहिये (इस समय हम तपोवनरूप देशमें निवास करते हैं, अतः यहाँके अहिंसामय धर्मका पालन करना ही हमारा कर्तव्य है)

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 9, श्लोक 27 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 584 नीति–व्यवहार
धर्म का कठिन मार्ग

आत्मानं नियमैस्तैस्तैः कर्षयित्वा प्रयत्नतः ।

प्राप्तये निपुणैर्धर्मो न सुखाल्लभते सुखम् ॥

चतुर मनुष्य भिन्न-भिन्न वानप्रस्थोचित नियमोंके द्वारा अपने शरीरको क्षीण करके यत्नपूर्वक धर्मका सम्पादन करते हैं; क्योंकि सुखदायक साधनसे सुखके हेतुभूत धर्मकी प्राप्ति नहीं होती है ।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 9, श्लोक 31 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 584 साधना–योग
कर्तव्य का निर्णय

स सर्वैः सचिवैः सार्धं विभीषणपुरस्कृतैः ।

मन्त्रयित्वा स धर्मिष्ठैः कृत्वा निश्चयमात्मनः ।

दोषाणां च गुणानां च सम्प्रधार्य बलाबलम् ।

आत्मनश्च बलं ज्ञात्वा राघवस्य च तत्त्वतः ।

हितं हि तव निश्चित्य क्षमं त्वं कर्तुमर्हसि ॥

तुम विभीषण आदि सभी धर्मात्मा मन्त्रियोंके साथ सलाह करके अपने कर्तव्यका निश्चय करो । अपने और श्रीरामके दोषों तथा गुणोंके बलाबलपर भलीभाँति विचार करके अपनी और श्रीरामचन्द्रजीकी शक्तिको ठीक-ठीक समझ लो । फिर क्या करनेसे तुम्हारा हित होगा, इसका निश्चय करके जो उचित जान पड़े, वही कार्य तुम्हें करना चाहिये ।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 37, श्लोक 23–24 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 653 नीति–व्यवहार
परम शरण और राजधर्म

युक्तदण्डा हि मृदवः प्रशान्ता वसुधाधिपाः ।

सदा त्वं सर्वभूतानां शरण्यः परमा गतिः ॥

क्योंकि राजालोग अपराधके अनुसार ही उचित दण्ड देनेवाले, कोमल स्वभाववाले और शान्त होते हैं । आप तो सदा ही समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाले तथा उनकी परम गति हैं ।

लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 65, श्लोक 10 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 725 सेवा–करुणा–विनय
सर्वत्र धर्मपरायणों की उपस्थिति

सर्वत्र खलु दृश्यन्ते साधवो धर्मचारिणः ।

शूराः शरण्याः सौमित्रे तिर्यग्योनिगतेष्वपि ॥

शूर, शरणागतरक्षक, धर्मपरायण श्रेष्ठ पुरुष सभी जगह देखे जाते हैं । पशु-पक्षीकी योनियोंमें भी उनका अभाव नहीं है ।

श्रीराम ने लक्ष्मण से जटायु की मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हुए यह कहा।

आदिकाव्येऽरण्यकाण्ड, अध्याय 68, श्लोक 24 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 732

अनृतं नोक्तपूर्वं मे चिरं कृच्छ्रेऽपि तिष्ठता ।

धर्मलोभपरीतेन न च वक्ष्ये कथंचन ।

सफलां च करिष्यामि प्रतिज्ञां जहि संभ्रमम् ॥

‘बहुत समयसे संकट झेलते रहनेपर भी मैं कभी झूठ नहीं बोला हूँ । मेरे किसी तरह मैं झूठ तो प्रतिज्ञाको भी अवश्य और घबराहटको अपने प्रसूतं कलमक्षेत्रं तदाह्वाननिमित्तं च सुग्रीव कुरु तं शब्दं’ जैसे इन्द्र वर्षा फलसे सम्पन्न करते हैं, मनमें धर्मका लोभ है । इसलिये बोलूँगा ही नहीं । साथ ही अपनी सफल करूँगा । अतः तुम भय हृदयसे निकाल दो ।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 14, श्लोक 14–15 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 796
राजा भरत का धर्म

तां पालयति धर्मात्मा भरतः सत्यवानृजुः ।

धर्मकामार्थतत्त्वज्ञो निग्रहानुग्रहे रतः ॥

धर्मात्मा राजा भरत इस पृथ्वीका पालन करते हैं । देना वे सत्यवादी, सरल तथा धर्म, अर्थ और कामके तत्त्वको जाननेवाले हैं; अतः दुष्टोंके निग्रह तथा साधु पुरुषोंके प्रति अनुग्रह करनेमें तत्पर रहते हैं ।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 18, श्लोक 7 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 807

नेदमत्र त्वया ग्राह्यं साधुवृत्तेन लक्ष्मण ।

तां प्रीतिमनुवर्तस्व पूर्ववृत्तं च संगतम् ॥

लक्ष्मण! तुम सदाचारी हो । तुम्हें इस प्रकार सुग्रीवके मारनेका निश्चय नहीं करना चाहिये । उसके प्रति । जो तुम्हारा प्रेम था, उसीका अनुसरण करो और उसके साथ पहले जो मित्रता की गयी है, उसे निबाहो ।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 31, श्लोक 7 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 854
मद्यपान का निषेध

नहि धर्मार्थसिद्ध्यर्थं पानमेवं प्रशस्यते ।

पानादर्थश्च कामश्च धर्मश्च परिहीयते ॥

धर्म और अर्थकी सिद्धिके निमित्त प्रयत्न करनेवाले पुरुषके लिये इस तरह मद्यपान अच्छा नहीं माना जाता है; क्योंकि मद्यपानसे अर्थ, धर्म और काम तीनोंका नाश होता है ।

लक्ष्मण ने तारा से सुग्रीव की स्थिति बताते हुए यह वचन कहा।

किष्किन्धाकाण्ड, अध्याय 33, श्लोक 46 वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ पृ. 863