श्रीगणेशाय नमः।

श्रीरामचरितमानस

साधना–योग

अभ्यास, संयम और मन का निग्रह

31 पद्य

श्रीरामचरितमानस

नाम जप से ब्रह्मसुख

नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी । बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी ॥

ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा । अकथ अनामय नाम न रूपा ॥

ब्रह्माके बनाये हुए इस प्रपञ्च (दृश्य जगत्) से भलीभाँति छूटे हुए वैराग्यवान् मुक्त योगी पुरुष इस नामको ही जीभसे जपते हुए [तत्त्वज्ञानरूपी दिनमें] जागते हैं और नाम तथा रूपसे रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुखका अनुभव करते हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 22.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 45 नाम महिमा ज्ञान–विवेक
मन्त्र और महामणि की महिमा

मंत्र महामनि बिषय ब्याल के । मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥

हरन मोह तम दिनकर कर से । सेवक सालि पाल जलधर से ॥

विषयरूपी साँपका जहर उतारनेके लिये मन्त्र और महामणि हैं । ये ललाटपर लिखे हुए कठिनतासे मिटनेवाले बुरे लेखों (मन्द प्रारब्ध) को मिटा देनेवाले हैं । अज्ञानरूपी अन्धकारके हरण करनेके लिये सूर्यकिरणोंके समान और सेवकरूपी धानके पालन करनेमें मेघके समान हैं ।

बालकाण्ड, चौपाई 32(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 57 भक्ति ज्ञान–विवेक
भक्ति और ज्ञान का स्वरूप

भगति निरूपन बिबिध बिधाना । छमा दया दम लता बिताना ॥

सम जम नियम फूल फल ग्याना । हरि पद रति रस बेद बखाना ॥

नाना प्रकारसे भक्तिका निरूपण और क्षमा, दया तथा दम (इन्द्रियनिग्रह) लताओंके मण्डप हैं । मनका निग्रह, यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) ही उनके फूल हैं, ज्ञान फल है और श्रीहरिके चरणोंमें प्रेम ही इस ज्ञानरूपी फलका रस है । ऐसा वेदोंने कहा है ।

बालकाण्ड, चौपाई 37.7 श्रीरामचरितमानस पृ. 62 धर्म–आचरण

करहि जाइ तपु सैलकुमारी । नारद कहा सो सत्य बिचारी ॥

मातु पितहि पुनि यह मत भावा । तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा ॥

हे पार्वती! नारदजीने जो कहा है, उसे सत्य समझकर तू जाकर तप कर । फिर यह बात तेरे माता-पिताको भी अच्छी लगी है । तप सुख देनेवाला और दुःख-दोषका नाश करनेवाला है ।

बालकाण्ड, चौपाई 73.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 92
तप की शक्ति

जनि आचरजु करहु मन माहीं । सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं ॥

तपबल तें जग सृजइ बिधाता । तपबल बिष्नु भए परित्राता ॥

हे पुत्र! मनमें आश्चर्य मत करो, तपसे कुछ भी दुर्लभ नहीं है, तपके बलसे ब्रह्मा जगत्को रचते हैं । तपहीके बलसे विष्णु संसारका पालन करनेवाले बने हैं ।

कपटी तपस्वी (एकतनु मुनि) ने राजा प्रतापभानु से तप की महिमा बताते हुए कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 163.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 169 ज्ञान–विवेक
तप की महिमा

तपबल संभु करहिं संघारा । तप तें अगम न कछु संसारा ॥

भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा । कथा पुरातन कहै सो लागा ॥

तपहीके बलसे रुद्र संहार करते हैं । संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तपसे न मिल सके । यह सुनकर राजाको बड़ा अनुराग हुआ । तब वह (तपस्वी) पुरानी कथाएँ कहने लगा ।

कपटी तपस्वी (एकतनु मुनि) ने राजा प्रतापभानु से तप की महिमा बताते हुए कहा।

बालकाण्ड, चौपाई 163.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 169 ज्ञान–विवेक
विकार त्याग और सेवा

रागु रोषु इरिषा मदु मोहू । जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू ॥

सकल प्रकार बिकार बिहाई । मन क्रम बचन करेहु सेवकाई ॥

राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह-इनके वश स्वप्नमें भी मत होना । सब प्रकारके विकारोंका त्याग कर मन, वचन और कर्मसे श्रीसीतारामजीकी सेवा करना ।

सुमित्राजी ने लक्ष्मणजी को वन जाने की आज्ञा देते हुए इस प्रकार शिक्षा दी।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 75.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 407 काम–क्रोध–लोभ–मोह
श्रीराम के दर्शन का प्रभाव

रामहि देखि एक अनुरागे । चितवत चले जाहिं सँग लागे ॥

एक नयन मग छबि उर आनी । होहिं सिथिल तन मन बर बानी ॥

कोई श्रीरामचन्द्रजीको देखकर ऐसे अनुरागमें भर गये हैं कि वे उन्हें देखते हुए उनके साथ लगे चले जा रहे हैं । कोई नेत्रमार्गसे उनकी छविको हृदयमें लाकर शरीर, मन और श्रेष्ठ वाणीसे शिथिल हो जाते हैं (अर्थात् उनके शरीर, मन और वाणीका व्यवहार बंद हो जाता है)

श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी का रूप देखकर सब प्रेमानन्द में मग्न हो गए।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 114.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 440 भक्ति
गुरु आज्ञा और कर्तव्य

लखि बिधि बाम कालु कठिनाई । धीरजु धरहु मातु बलि जाई ॥

सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू । प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू ॥

विधाताको प्रतिकूल और कालको कठोर देखकर धीरज धरो, माता तुम्हारी बलिहारी जाती है । गुरुकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसीके अनुसार कार्य करो और प्रजाका पालन कर कुटुम्बियोंका दुःख हरो ।

माता कौसल्या भरतजी से कह रही हैं।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 176.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 491
आज्ञा पालन का महत्त्व

गुरपितु मातु स्वामि सिख पालें । चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें ॥

अस बिचारि सब सोच बिहाई । पालहु अवध अवधि भरि जाई ॥

गुरु, पिता, माता और स्वामीकी शिक्षा (आज्ञा) का पालन करनेसे कुमार्गपर भी चलनेसे पैर गड्ढेमें नहीं पड़ता (पतन नहीं होता) । ऐसा विचारकर सब सोच छोड़कर अवध जाकर अवधिभर उसका पालन करो ।

श्रीरामचन्द्रजी ने भरतजी से अयोध्या लौटकर राज्य सँभालने को कहा।

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 315.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 609 धर्म–आचरण
रामप्रेम की शक्ति

देह दिनहुँ दिन दूबरि होई । घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई ॥

नित नव राम प्रेम पनु पीना । बढ़त धरम दलु मनु न मलीना ॥

भरतजीका शरीर दिनोंदिन दुबला होता जाता है । तेज (अन्न, घृत आदिसे उत्पन्न होनेवाला मेद) घट रहा है । बल और मुखछबि (मुखकी कान्ति अथवा शोभा) वैसी ही बनी हुई है । रामप्रेमका प्रण नित्य नया और पुष्ट होता है, धर्मका दल बढ़ता है और मन उदास नहीं है (अर्थात् प्रसन्न है)

अयोध्याकाण्ड, चौपाई 325.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 617 वैराग्य
नवधा भक्ति का वर्णन

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा । पंचम भजन सो बेद प्रकासा ॥

छठ दम सील बिरति बहु करमा । निरत निरंतर सज्जन धरमा ॥

मेरे (राम) मन्त्रका जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास — यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदोंमें प्रसिद्ध है । छठी भक्ति है इन्द्रियोंका निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्योंसे वैराग्य और निरंतर संत पुरुषोंके धर्म (आचरण) में लगे रहना ।

श्रीरामजी ने शबरीजी को नवधा भक्ति बताते हुए कहा।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 36.1 श्रीरामचरितमानस पृ. 669 धर्म–आचरण

सावधान मानद मदहीना । धीर धर्म गति परम प्रबीना ॥

सावधान, दूसरोंको मान देनेवाले, अभिमानरहित, धैर्यवान्, धर्मके ज्ञान और आचरणमें अत्यन्त निपुण … ।

अरण्यकाण्ड, चौपाई 45.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 680 धर्म–आचरण

जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं । अंत राम कहि आवत नाहीं ॥

जासु नाम बल संकर कासी । देत सबहि सम गति अबिनासी ॥

मुनिगण जन्म-जन्ममें (प्रत्येक जन्ममें) [अनेकों प्रकारका] साधन करते रहते हैं । फिर भी अन्तकालमें उन्हें ‘राम’ नहीं कह आता (उनके मुखसे रामनाम नहीं निकलता) । जिनके नाम बलसे शङ्करजी काशीमें सबको समानरूपसे अविनाशिनी गति (मुक्ति) देते हैं ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 10.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 694 ज्ञान–विवेक

मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु । रामचंद्र कर काजु सँवारेहु ॥

भानु पीठि सेइअ उर आगी । स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी ॥

मन, वचन तथा कर्मसे उसीका (सीताजीका पता लगानेका) उपाय सोचना । श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सम्पन्न (सफल) करना । सूर्यको पीठसे और अग्निको हृदयसे (सामनेसे) सेवन करना चाहिये । परन्तु स्वामीकी सेवा तो छल छोड़कर सर्वभावसे (मन, वचन, कर्मसे) करनी चाहिये ।

किष्किन्धाकाण्ड, चौपाई 23.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 705 नीति–व्यवहार

कह कपि हृदयँ धीर धरु माता । सुमिरु राम सेवक सुखदाता ॥

उर आनहु रघुपति प्रभुताई । सुनि मम बचन तजहु कदराई ॥

हनुमान्जीने कहा — हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीका स्मरण करो । श्रीरघुनाथजीकी प्रभुताको हृदयमें लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ दो ।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 15.5 श्रीरामचरितमानस पृ. 730 भक्ति
निर्मल मन की पात्रता

निर्मल मन जन सो मोहि पावा । मोहि कपट छल छिद्र न भावा ॥

भेद लेन पठवा दससीसा । तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा ॥

जो मनुष्य निर्मल मनका होता है, वही मुझे पाता है । मुझे कपट और छल छिद्र नहीं सुहाते । यदि उसे रावणने भेद लेनेको भेजा है, तब भी हे सुग्रीव! अपनेको कुछ भी भय या हानि नहीं है ।

श्रीरामजी ने सुग्रीव से हँसकर कहा।

सुन्दरकाण्ड, चौपाई 44.3 श्रीरामचरितमानस पृ. 756 भक्ति

तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम ॥

जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम ॥

तबतक जीवकी कुशल नहीं और न स्वप्नमें भी उसके मनको शान्ति है, जबतक वह शोकके घर काम (विषय-कामना) को छोड़कर श्रीरामजीको नहीं भजता ।

सुन्दरकाण्ड, दोहा 46 श्रीरामचरितमानस पृ. 758

फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद ॥

मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम ॥

यद्यपि बादल अमृत-सा जल बरसाते हैं, तो भी बेत फूलता-फलता नहीं । इसी प्रकार चाहे ब्रह्माके समान भी ज्ञानी गुरु मिलें, तो भी मूर्खके हृदयमें चेत (ज्ञान) नहीं होता ।

लङ्काकाण्ड, सोरठा 16(ख) श्रीरामचरितमानस पृ. 789 ज्ञान–विवेक
भजन का महत्व

ईस भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना ॥

दान पर बुधि सक्ति प्रचंडा । बर बिग्यान कठिन कोदंडा ॥

ईश्वरका भजन ही [उस रथको चलानेवाला] चतुर सारथि है । वैराग्य ढाल है और सन्तोष तलवार है । दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है ।

श्रीरामजी ने विभीषणजी से कहा।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 80(क).4 श्रीरामचरितमानस पृ. 853 वैराग्य

अमल अचल मन त्रोन समाना । सम जम नियम सिलीमुख नाना ॥

कवच अभेद बिप्र गुर पूजा । एहि सम बिजय उपाय न दूजा ॥

निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकसके समान है । शम (मनका वशमें होना), [अहिंसादि] यम और [शौचादि] नियम — ये बहुत-से बाण हैं । ब्राह्मणों और गुरुका पूजन अभेद्य कवच है । इसके समान विजयका दूसरा उपाय नहीं है ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 80(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 853 ज्ञान–विवेक

अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर । भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर ॥

काम क्रोध मद गज पंचानन । बसहु निरंतर जन मन कानन ॥

आप निर्गुण, सगुण, दिव्य गुणोंके धाम और परम सुन्दर हैं । भ्रमरूपी अन्धकारके [नाशके] लिये प्रबल प्रतापी सूर्य हैं । काम, क्रोध और मदरूपी हाथियोंके [वधके] लिये सिंहके समान आप इस सेवकके मनरूपी वनमें निरन्तर निवास कीजिये ।

लङ्काकाण्ड, चौपाई 115.2 श्रीरामचरितमानस पृ. 897 काम–क्रोध–लोभ–मोह

करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ । पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ ॥

सम मानि निरादर आदरही । सब संत सुखी बिचरंति मही ॥

वे प्रेमपूर्वक नियम लेकर निरन्तर शुद्ध हृदयसे आपके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं और निरादर और आदरको समान मानकर वे सब संत सुखी होकर पृथ्वीपर विचरते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 194(क).8 श्रीरामचरितमानस पृ. 926 भक्ति
मानव शरीर का महत्व

बड़ें भाग मानुष तनु पावा । सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा ॥

साधन धाम मोच्छ कर द्वारा । पाइ न जेहिं परलोक सँवारा ॥

बड़े भाग्यसे यह मनुष्यशरीर मिला है । सब ग्रन्थोंने यही कहा है कि यह शरीर देवताओंको भी दुर्लभ है (कठिनतासे मिलता है) । यह साधनका धाम और मोक्षका दरवाजा है । इसे पाकर भी जिसने परलोक न बना लिया … ।

श्रीरामचन्द्रजी ने अयोध्यावासियों को उपदेश देते हुए कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 43.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 952 वैराग्य
मानव शरीर का महत्व

नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो । सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ॥

करनधार सदगुर दृढ़ नावा । दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ॥

यह मनुष्यका शरीर भवसागर [से तारने] के लिये बेड़ा (जहाज) है । मेरी कृपा ही अनुकूल वायु है । सद्गुरु इस मजबूत जहाजके कर्णधार (खेनेवाले) हैं । इस प्रकार दुर्लभ (कठिनतासे मिलनेवाले) साधन सुलभ होकर (भगवत्कृपासे सहज ही) उसे प्राप्त हो गये हैं … ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 44.4 श्रीरामचरितमानस पृ. 953 वैराग्य गुरु महिमा
गुरु की महत्ता

गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई । जौं बिरंचि संकर सम होई ॥

संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता । दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता ॥

गुरुके बिना कोई भवसागर नहीं तर सकता, चाहे वह ब्रह्माजी और शंकरजीके समान ही क्यों न हो । [गरुड़जीने कहा—] हे तात! मुझे सन्देहरूपी सर्पने डस लिया था और [साँपके डसनेपर जैसे विष चढ़नेसे लहरें आती हैं, वैसे ही] बहुत-सी कुतर्करूपी दुःख देनेवाली लहरें आ रही थीं ।

गरुड़जी ने काकभुशुण्डिजी से कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 93(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 997 गुरु महिमा ज्ञान–विवेक

जप तप मख सम दम ब्रत दाना । बिरति बिबेक जोग बिग्याना ॥

सब कर फल रघुपति पद प्रेमा । तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा ॥

अनेक जप, तप, यज्ञ, शम (मनको रोकना), दम (इन्द्रियोंको रोकना), व्रत, दान, वैराग्य, विवेक, योग, विज्ञान आदि सबका फल श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रेम होना है । इसके बिना कोई कल्याण नहीं पा सकता ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 95(क).3 श्रीरामचरितमानस पृ. 999 भक्ति
नाम सङ्कीर्तन की महिमा

द्वापर करि रघुपति पद पूजा । नर भव तरहिं उपाय न दूजा ॥

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा । गावत नर पावहिं भव थाहा ॥

द्वापरमें श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी पूजा करके मनुष्य संसारसे तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है । और कलियुगमें तो केवल श्रीहरिकी गुणगाथाओंका गान करनेसे ही मनुष्य भवसागरकी थाह पा जाते हैं ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 103(क).2 श्रीरामचरितमानस पृ. 1007 नाम महिमा भक्ति

सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई । जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई ॥

जप तप ब्रत जम नियम अपारा । जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा ॥

तेइ तृन हरित चरै जब गाई । भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई ॥

नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा । निर्मल मन अहीर निज दासा ॥

श्रीहरिकी कृपासे यदि सात्त्विकी श्रद्धारूपी सुन्दर गौ हृदयरूपी घरमें आकर बस जाय; असंख्यों जप, तप, व्रत, यम और नियमादि शुभ धर्म और आचार (आचरण), जो श्रुतियोंने कहे हैं, उन्हीं [धर्माचाररूपी] हरे तृणों (घास) को जब वह गौ चरे और आस्तिक भावरूपी छोटे बछड़ेको पाकर वह पेन्हावे । निवृत्ति (सांसारिक विषयोंसे और प्रपञ्चसे हटना) नोई (गौके दूहते समय पिछले पैर बाँधनेकी रस्सी) है, विश्वास [दूध दूहनेका] बरतन है, निर्मल (निष्पाप) मन जो स्वयं अपना दास है (अपने वशमें है), दुहनेवाला अहीर है ।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 117(क).5 श्रीरामचरितमानस पृ. 1028 धर्म–आचरण
ज्ञान मार्ग की कठिनता

ग्यान पंथ कृपान कै धारा । परत खगेस होइ नहिं बारा ॥

जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई । सो कैवल्य परम पद लहई ॥

ज्ञानका मार्ग कृपाण (दुधारी तलवार) की धारके समान है । हे पक्षिराज! इस मार्गसे गिरते देर नहीं लगती । जो इस मार्गको निर्विघ्न निबाह ले जाता है, वही कैवल्य (मोक्ष) रूप परमपदको प्राप्त करता है ।

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से ज्ञान-मार्ग की कठिनाई बताते हुए कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 119(क).1 श्रीरामचरितमानस पृ. 1031 ज्ञान–विवेक
मोह और मानसिक रोग

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला । तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला ॥

काम बात कफ लोभ अपारा । क्रोध पित्त नित छाती जारा ॥

सब रोगोंकी जड़ मोह (अज्ञान) है । उन व्याधियोंसे फिर और बहुत-से शूल उत्पन्न होते हैं । काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है ।

काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी को मानस-रोगों के विषय में बताते हुए कहा।

उत्तरकाण्ड, चौपाई 121(क).15 श्रीरामचरितमानस पृ. 1037 काम–क्रोध–लोभ–मोह ज्ञान–विवेक