श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २

कर्म–प्रारब्ध

कर्म और उसका फल

38 पद्य

महाभारत — खण्ड २

अविद्या और तृष्णा का चक्र

शौनक उवाच

एवं पतति संसारे तासु तास्विह योनिषु ।

अविद्याकर्मतृष्णाभिर्भ्राम्यमाणोऽथ चक्रवत् ॥

इस प्रकार अविद्या, कर्म और तृष्णाद्वारा चक्रकी भाँति भ्रमण करता हुआ मनुष्य संसारकी विभिन्न योनियोंमें गिरता है ।

शौनकजी ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 2, श्लोक 71 महाभारत — खण्ड २ पृ. 47 माया–संसार

व्यास उवाच

अथवा जायमानस्य यच्छीलमनुजायते ।

श्रूयते तन्महाराज नामृतस्यापसर्पति ॥

कथं वा मन्यते भीष्मो द्रोणोऽथ विदुरोऽपि वा ।

भवान् वात्र क्षमं कार्यं पुरा वोऽर्थोऽभिवर्धते ॥

किंतु महाराज! जन्मके समय किसी वस्तुका जैसा स्वभाव बन जाता है वह दूर नहीं होता। भले ही वह वस्तु अमृत ही क्यों न हो? यह बात मेरे सुननेमें आयी है । अथवा इस विषयमें भीष्म, द्रोण, विदुर या तुम्हारी क्या सम्मति है? यहाँ जो उचित हो, वह कार्य पहले करना चाहिये, उसीसे तुम्हारे प्रयोजनकी सिद्धि हो सकती है ।

वनपर्व, अध्याय 8, श्लोक 11–12 महाभारत — खण्ड २ पृ. 94
कर्म की नित्यता

द्रौपदी उवाच

कर्मभिश्चिन्तितो लोको गत्यां गत्यां पृथग्विधः ।

तस्मात् कर्माणि नित्यानि लोभान्मोक्षं यियासति ॥

नेह धर्मानृशंस्याभ्यां न क्षान्त्या नार्जवेन च ।

पुरुषः श्रियमाप्नोति न घृणित्वेन कर्हिचित् ॥

कर्मोंके अनुसार उत्तम, मध्यम, अधम योनिमें भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतलायी गयी है, अतः कर्म नित्य हैं (भोगे बिना उन कर्मोंका क्षय नहीं होता) । मूर्ख लोग लोभसे ही मोक्ष पानेकी इच्छा रखते हैं । इस जगत्में धर्म, कोमलता, क्षमा, विनय और दयासे कोई भी मनुष्य कभी धन और ऐश्वर्यकी प्राप्ति नहीं कर सकता ।

वनपर्व, अध्याय 30, श्लोक 2–3 महाभारत — खण्ड २ पृ. 228 नीति–व्यवहार
कर्तव्यनिष्ठ कर्म

युधिष्ठिर उवाच

अस्तु वात्र फलं मा वा कर्तव्यं पुरुषेण यत् ।

गृहे वा वसता कृष्णे यथाशक्ति करोमि तत् ॥

कृष्णे! यहाँ उस कर्मका फल हो या न हो, गृहस्थ आश्रममें रहनेवाले पुरुषका जो कर्तव्य है, मैं उसीका यथाशक्ति कर्तव्यबुद्धिसे पालन करता हूँ ।

युधिष्ठिर ने द्रौपदी से कहा।

वनपर्व, अध्याय 31, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड २ पृ. 236 धर्म–आचरण
धर्म का प्रधान स्थान

युधिष्ठिर उवाच

एते हि धर्ममेवादौ वर्णयन्ति सदानघे ।

कर्तव्यममरप्रख्याः प्रत्यक्षागमबुद्धयः ॥

अनघे! ये अमरोंके समान विख्यात तथा वेदगम्य विषयको भी प्रत्यक्ष देखनेवाले महर्षि धर्मको ही सबसे प्रथम आचरणमें लानेयोग्य बताते हैं ।

युधिष्ठिर ने द्रौपदी से कहा।

वनपर्व, अध्याय 31, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड २ पृ. 237

बृहदश्व → राजन

नारदस्य वचः श्रुत्वा पप्रच्छ बलवृत्रहा ।

धर्मज्ञाः पृथिवीपालास्त्यक्तजीवितयोधिनः ॥

शस्त्रेण निधनं काले ये गच्छन्त्यपराङ्मुखाः ।

अयं लोकोऽक्षयस्तेषां यथैव मम कामधुक् ॥

बृहदश्व कहते हैं — राजन्! नारदकी बात सुनकर बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्रने उनसे पूछा — मुने! जो धर्मज्ञ भूपाल अपने प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध करते हैं और पीठ न दिखाकर लड़ते समय किसी शस्त्रके आघातसे मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनके लिये हमारा यह स्वर्गलोक अक्षय हो जाता है और मेरी ही तरह उन्हें भी यह मनोवांछित भोग प्रदान करता है ।

वनपर्व, अध्याय 54, श्लोक 17–18 महाभारत — खण्ड २ पृ. 394
नियति और आयु का विधान

दमयन्ती उवाच

नाप्राप्तकालो म्रियते श्रुतं वृद्धानुशासनम् ।

या नाहमद्य मृदिता हस्तियूथेन दुःखिता ॥

जिसकी मृत्युका समय नहीं आया है, वह इच्छा होते हुए भी मर नहीं सकता । वृद्ध पुरुषोंका यह जो उपदेश मैंने सुन रखा है, यह ठीक ही जान पड़ता है, तभी तो आज मैं दुःखित होनेपर भी हाथियोंके झुंडसे कुचलकर मर न सकी ।

दमयन्ती ने हाथियों के झुण्ड से बच जाने पर कहा।

वनपर्व, अध्याय 65, श्लोक 39 महाभारत — खण्ड २ पृ. 469
सत्त्वगुणियों का धैर्य

बृहदश्व उवाच

विषमावस्थिते दैवे पौरुषेऽफलतां गते ।

विषादयन्ति नात्मानं सत्त्वोपाश्रयिणो नराः ॥

जब दैव (प्रारब्ध) प्रतिकूल हो और पुरुषार्थ निष्फल हो जाय, उस समय भी सत्त्वगुणका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने मनमें विषाद नहीं लाते ।

बृहदश्व मुनि ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 79, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड २ पृ. 554 वैराग्य
पृथूदकतीर्थ की महिमा

पुलस्त्य उवाच

अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि स्त्रिया वा पुरुषेण वा ।

यत् किंचिदशुभं कर्म कृतं मानुषबुद्धिना ॥

तत् सर्वं नश्यते तत्र स्नातमात्रस्य भारत ।

अश्वमेधफलं चास्य स्वर्गलोकं च गच्छति ॥

भारत! स्त्री हो या पुरुष, उसने मानव-बुद्धिसे अनजानमें या जान-बूझकर जो कुछ भी पापकर्म किया है, वह सब पृथूदकतीर्थमें स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाता है और तीर्थसेवी पुरुषको अश्वमेधयज्ञके फल एवं स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है ।

वनपर्व, अध्याय 83, श्लोक 143–144 महाभारत — खण्ड २ पृ. 602 ज्ञान–विवेक
तीर्थ स्नान का फल

पुलस्त्य → राजन

तत्र स्नात्वा च पीत्वा च स्वर्गलोके महीयते ।

अमावास्यां तु तत्रैव राहुग्रस्ते दिवाकरे ॥

यः श्राद्धं कुरुते मर्त्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु ।

अश्वमेधसहस्रस्य सम्यगिष्टस्य यत् फलम् ॥

स्नात एव समाप्नोति कृत्वा श्राद्धं च मानवः ।

यत् किंचिद् दुष्कृतं कर्म स्त्रिया वा पुरुषेण वा ॥

स्नातमात्रस्य तत् सर्वं नश्यते नात्र संशयः ।

पद्मवर्णेन यानेन ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥

राजन्! उसमें स्नान और जलपान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है । जो सूर्यग्रहणके समय अमावास्याको वहाँ पितरोंका श्राद्ध करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो — । भलीभाँति सम्पन्न किये हुए सहस्र अश्वमेध यज्ञोंका जो फल होता है, उसे मनुष्य उस तीर्थमें स्नानमात्र करके अथवा श्राद्ध करके पा लेता है । स्त्री या पुरुषने जो कुछ भी दुष्कर्म किया हो, वह सब वहाँ स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाता है; इसमें संशय नहीं है । वह पुरुष कमलके समान रंगवाले विमानद्वारा ब्रह्मलोकमें जाता है ।

पुलस्त्यजी ने तीर्थ का पुण्यफल बताते हुए कहा।

वनपर्व, अध्याय 83, श्लोक 196–199 महाभारत — खण्ड २ पृ. 608

पुलस्त्य उवाच

यद्यकार्यशतं कृत्वा कृतं गङ्गाभिषेचनम् ।

सर्वं तत् तस्य गङ्गाम्भो दहत्यग्निरिवेन्धनम् ॥

सर्वं कृतयुगे पुण्यं त्रेतायां पुष्करं स्मृतम् ।

द्वापरेऽपि कुरुक्षेत्रं गङ्गा कलियुगे स्मृता ॥

पुष्करे तु तपस्तप्येद् दानं दद्यान्महालये ।

मलये त्वग्निमारोहेद् भृगुतुङ्गे त्वनाशनम् ॥

जैसे अग्नि ईंधनको जला देती है, उसी प्रकार सैकड़ों निषिद्ध कर्म करके भी यदि गंगास्नान किया जाय तो उसका जल उन सब पापोंको भस्म कर देता है । सत्ययुगमें सभी तीर्थ पुण्यदायक होते हैं । त्रेतामें पुष्करका महत्त्व है । द्वापरमें कुरुक्षेत्र विशेष पुण्यदायक है और कलियुगमें गंगाकी अधिक महिमा बतायी गयी है । पुष्करमें तप करे, महालयमें दान दे, मलय पर्वतमें अग्निपर आरूढ हो और भृगुतुंगमें उपवास करे ।

वनपर्व, अध्याय 85, श्लोक 89–91 महाभारत — खण्ड २ पृ. 641
कर्मफल का सिद्धान्त

धर्म → राजन

नान्यः कर्तुः फलं राजन्नुपभुङ्क्ते कदाचन ।

इमानि तव दृश्यन्ते फलानि वदतां वर ॥

धर्मने कहा — राजन्! कर्ताके सिवा दूसरा कोई उसके किये हुए कर्मोंका फल कभी नहीं भोगता है । वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाराज! तुम्हें अपने पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप जो ये पुण्य लोक प्राप्त हुए हैं, प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं ।

धर्मराज ने राजर्षि सोमक से कहा।

वनपर्व, अध्याय 128, श्लोक 14 महाभारत — खण्ड २ पृ. 878
पशु योनि के कारण

सर्प → तात

विपरीतैश्च राजेन्द्र कारणैर्मानुषो भवेत् ।

तिर्यग्योनिस्तथा तात विशेषश्चात्र वक्ष्यते ॥

कामक्रोधसमायुक्तो हिंसालोभसमन्वितः ।

मनुष्यत्वात् परिभ्रष्टस्तिर्यग्योनौ प्रसूयते ॥

राजेन्द्र! इसके विपरीत कारण उपस्थित होनेपर मनुष्ययोनिमें तथा पशु-पक्षी आदि योनिमें जन्म लेना पड़ता है। तात! पशु-पक्षी आदि योनियोंमें जन्म लेनेका जो विशेष कारण है, उसे भी यहाँ बतलाया जाता है । जो काम, क्रोध, लोभ और हिंसामें तत्पर होकर मानवतासे भ्रष्ट हो जाता है, अपनी मनुष्य होनेकी योग्यताको भी खो देता है, वही पशु-पक्षी आदि योनिमें जन्म पाता है ।

सर्परूपधारी नहुष ने युधिष्ठिर से कहा।

वनपर्व, अध्याय 181, श्लोक 11–12 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1222 काम–क्रोध–लोभ–मोह

वैशम्पायन उवाच

कर्मणः पुरुषः कर्ता शुभस्याप्यशुभस्य वा ।

स फलं तदुपाश्नाति कथं कर्ता स्विदीश्वरः ॥

कुतो वा सुखदुःखेषु नृणां ब्रह्मविदां वर ।

इह वा कृतमन्वेति परदेहेऽथ वा पुनः ॥

मैं सोचता हूँ, शुभ और अशुभ कर्म करनेवाला जो पुरुष है, वह अपने उन कर्मोंका फल कैसे भोगता है तथा ईश्वर उन कर्मफलोंका रचयिता कैसे होता है? ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीश्वर! सुख और दुःखकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंमें मनुष्योंकी प्रवृत्ति कैसे होती है? मनुष्यका किया कर्म इस लोकमें ही उसका अनुसरण करता है अथवा पारलौकिक शरीरमें भी ।

वनपर्व, अध्याय 183, श्लोक 57–58 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1246
कर्मों का फल

मार्कण्डेय उवाच

तत्रास्य स्वकृतं कर्म छायेवानुगतं सदा ।

फलत्यथ सुखार्हो वा दुःखार्हो वाथ जायते ॥

कृतान्तविधिसंयुक्तः स जन्तुर्लक्षणैः शुभैः ।

अशुभैर्वा निरादानो लक्ष्यते ज्ञानदृष्टिभिः ॥

वहाँ दूसरे स्थूल शरीरमें उसके पूर्वजन्मका किया हुआ कर्म छायाकी भाँति सदा उसके पीछे लगा रहता और यथासमय अपना फल देता है । इसलिये जीव सुख अथवा दुःख भोगनेके योग्य होकर जन्म लेता है । यमराजके विधान (पुण्य और पापके फल-भोग)-में नियुक्त हुआ जीव अपने शुभ अथवा अशुभ लक्षणोंद्वारा अपनेको मिले हुए सुख अथवा दुःखका निवारण करनेमें असमर्थ है । यह बात ज्ञान-दृष्टिवाले महात्मा पुरुषोंद्वारा देखी जाती है ।

वनपर्व, अध्याय 183, श्लोक 78–79 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1249

मार्कण्डेय → राजन

किंचिद् दैवाद्धठात् किंचित् किंचिदेव स्वकर्मभिः ।

प्राप्नुवन्ति नरा राजन् मा तेऽस्त्वन्या विचारणा ॥

राजन्! विवेकी मनुष्य कर्मोंका कुछ फल प्रारब्धवश प्राप्त करते हैं, कुछ कर्मोंका फल हठात् प्राप्त होता है और कुछ कर्मोंका फल अपने उद्योगसे ही प्राप्त होता है । इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ।

वनपर्व, अध्याय 183, श्लोक 86 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1250

सरस्वती उवाच

सदक्षिणां काञ्चनचारुशृङ्गीं ।

कांस्योपदोहां द्रविणैरुत्तरीयैः ।

धेनुं तिलानां ददतो द्विजाय ।

लोका वसूनां सुलभा भवन्ति ॥

स्वकर्मभिर्दानवसंनिरुद्धे ।

तीव्रान्धकारे नरके सम्पतन्तम् ।

महार्णवे नौरिव वातयुक्ता ।

दानं गवां तारयते परत्र ॥

जो सोनेके बने हुए सुन्दर सींग, काँसके दुग्धपात्र, द्रव्य तथा ओढ़नेके वस्त्र और दक्षिणासहित तिलकी धेनुका ब्राह्मणको दान करता है, उसके लिये वसुओंके लोक सुलभ हो जाते हैं । जैसे महासागरमें डूबते हुए मनुष्यको अनुकूल वायुके सहयोगसे चलनेवाली नाव बचा लेती है, उसी प्रकार जो अपने कर्मों द्वारा काम, क्रोध आदि दानवोंसे घिरे हुए घोर अज्ञानान्धकारसे परिपूर्ण नरकमें गिर रहा है, उसे गोदानजनित पुण्य परलोकमें उबार लेता है ।

वनपर्व, अध्याय 186, श्लोक 13–14 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1266
कलियुग के अन्त की स्थिति

मार्कण्डेय उवाच

अल्पावशिष्टे तु तदा चुगान्ते भरतर्षभ ।

सहस्रान्ते नराः सर्वे प्रायशोऽनृतवादिनः ॥

यज्ञप्रतिनिधिः पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा ।

व्रतप्रतिनिधिश्चैव तस्मिन् काले प्रवर्तते ॥

भरतश्रेष्ठ! सहस्र युगकी समाप्तिमें जब थोड़ा-सा ही समय शेष रह जाता है, उस समय कलियुगके अन्तिम भागमें प्रायः सभी मनुष्य मिथ्यावादी हो जाते हैं । पार्थ! उस समय यज्ञ, दान और व्रतके प्रतिनिधि कर्म चालू हो जाते हैं अर्थात् यज्ञ, दान, तप मुख्य विधिसे न होकर गौण विधिसे नाममात्र होने लगते हैं ।

वनपर्व, अध्याय 188, श्लोक 29–30 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1286 माया–संसार

देवगण → ब्रह्मन

प्राप्नुवन्ति नरा विप्र यत् कृत्वा कर्म शोभनम् ।

सत्यं दानं तपश्चोग्रमहिंसा चैव जन्तुषु ॥

मद्विधानेन विहिता मम देहविहारिणः ।

मयाऽऽविर्भूतविज्ञाना विचेष्टन्ते न कामतः ॥

ब्रह्मन्! जिस शुभ कर्मोंके आचरणसे मनुष्यको कल्याणकी प्राप्ति होती है, वे सत्य, दान, उग्र तपस्या और किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेका स्वभाव — ये सब मेरे ही विधानसे निर्मित हुए हैं और मेरे ही शरीरमें विहार करते हैं । मैं समस्त प्राणियोंके ज्ञानको जब प्रकट कर देता हूँ, तभी वे चेष्टाशील होते हैं, अन्यथा अपनी इच्छासे वे कुछ नहीं कर सकते ।

वनपर्व, अध्याय 189, श्लोक 22–23 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1304 धर्म–आचरण

मार्कण्डेय → युधिष्ठिर

विजित्य पृथिवीं सर्वां मोदमानः सुखी भव ।

एष भूतो भविष्यश्च धर्मस्ते समुदीरितः ॥

न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिदतीतानागतं भुवि ।

तस्मादिमं परिक्लेशं त्वं तात हृदि मा कृथाः ॥

सारी पृथ्वीको जीतकर सदा सानन्द और सुखी रहो । तात युधिष्ठिर! मैंने तुम्हें जो यह धर्म बताया है, इसका पालन भूतकालमें भी हुआ है और भविष्यकालमें भी इसका पालन होना चाहिए । भूत और भविष्यकी ऐसी कोई बात नहीं है, जो तुम्हें ज्ञात न हो; अतः इस समय जो यह क्लेश तुम्हें प्राप्त हुआ है, इसके लिये हृदयमें कोई विचार न करो ।

वनपर्व, अध्याय 191, श्लोक 26–27 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1326

राजा उवाच

नास्य वर्षं वर्षति वर्षकाले ।

नास्य बीजं रोहति काल उप्तम् ।

भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे ।

न त्राणं लभेत् त्राणमिच्छन् स काले ॥

जो राजा अपनी शरणमें आये हुए भयभीत प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसके देशमें समयपर वर्षा नहीं होती । उसके बोये हुए बीज भी समयपर नहीं उगते हैं । वह कभी संकटके समय जब अपनी रक्षा चाहता है, तब उसे कोई रक्षक नहीं मिलता ।

वनपर्व, अध्याय 197, श्लोक 12 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1360

मार्कण्डेय उवाच

वृथा जन्मानि चत्वारि वृथा दानानि षोडश ।

वृथा जन्म ह्यपुत्रस्य ये च धर्मबहिष्कृताः ॥

परपाकेषु येऽश्नन्ति आत्मार्थं च पचेत् तु यः ।

पर्यश्नन्ति वृथा ये च तदसत्यं प्रकीर्त्यते ॥

= मार्कण्डेयजीने कहा — (नीचे लिखे अनुसार) चार प्रकारके जीवन व्यर्थ हैं और सोलह प्रकारके दान व्यर्थ हैं । जो पुत्र-हीन हैं, जो धर्मसे बहिष्कृत (भ्रष्ट) हैं, जो सदा दूसरोंकी ही रसोईमें भोजन किया करते हैं तथा जो केवल अपने लिये ही भोजन बनाते एवं देवता और अतिथियोंको न देकर अकेले ही भोजन कर लेते हैं, उनका वह भोजन असत् कहा गया है । अतः उनका जन्म वृथा है (इस प्रकार इन चार प्रकारके मनुष्योंका जन्म व्यर्थ है)

वनपर्व, अध्याय 200, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1375

व्याध उवाच

कर्म चेत्किंचिदन्यत् स्यादितरन्न तदाचरेत् ।

यत् कल्याणमभिध्यायेत् तत्रात्मानं नियोजयेत् ॥

यदि भूलसे कभी कोई निन्दित कर्म बन जाय तो फिर दुबारा वैसा काम न करे । अपने मन और बुद्धिसे विचार करनेपर जो कल्याणकारी प्रतीत हो, उसी कार्यमें अपनेको लगावे ।

वनपर्व, अध्याय 207, श्लोक 44 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1440

व्याध उवाच

यो यथाप्रकृतिर्जन्तुः स स्वां प्रकृतिमश्नुते ।

पापात्मा क्रोधकामादीन् दोषानाप्नोत्यनात्मवान् ॥

जिस जीवकी जैसी प्रकृति होती है, वह अपनी प्रकृतिका ही अनुसरण करता है । अपने मनको वशमें न रखनेवाला पापात्मा पुरुष ही काम, क्रोध आदि दोषोंको प्राप्त होता है ।

वनपर्व, अध्याय 207, श्लोक 76 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1445 काम–क्रोध–लोभ–मोह

मार्कण्डेय उवाच

विधिना हि हते पूर्वं निमित्तं घातको भवेत् ॥

क्योंकि विधाताके द्वारा पहलेसे ही जीवकी मृत्यु निश्चित की जाती है; किंतु घातक (कसाई अथवा व्याध) उसमें निमित्त बन जाता है अर्थात् जो स्वेच्छासे ज्ञानपूर्वक जीवहिंसा करता है, वह घातक व्यर्थ ही निमित्त बनकर दोषका भागी होता है ।

वनपर्व, अध्याय 208, श्लोक 3 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1449

मार्कण्डेय उवाच

पूर्वं हि विहितं कर्म देहिनं न विमुञ्चति ।

धात्रा विधिरयं दृष्टो बहुधा कर्मनिर्णये ॥

पहलेका किया हुआ कर्म देहधारी मनुष्यको नहीं छोड़ता है। बहुधा कर्मका निर्णय करते समय विधाताने इसी विधिको अपने सामने रखा है ।

वनपर्व, अध्याय 208, श्लोक 10 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1450
कर्म का फल

व्याध उवाच

यत् करोत्यशुभं कर्म शुभं वा यदि सत्तम ।

अवश्यं तत् समाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः ॥

सज्जनशिरोमणे! मनुष्य जो शुभ या अशुभ कार्य करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है, इसमें संशय नहीं है ।

वनपर्व, अध्याय 209, श्लोक 5 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1454

व्याध → ब्रह्मन

न केचिदीशते ब्रह्मन् स्वयंग्राह्यस्य सत्तम ।

कर्मणा प्राक् कृतानां वै इह सिद्धिः प्रदृश्यते ॥

ब्रह्मन्! साधुशिरोमणे! कोई अपने हाथमें आयी हुई वस्तुका भी उपयोग करनेमें समर्थ नहीं है । इस जगत्में पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके ही फलकी प्राप्ति देखी जाती है ।

वनपर्व, अध्याय 209, श्लोक 22 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1457

व्याध उवाच

जातिमृत्युजरादुःखैः सततं समभिद्रुतः ।

संसारे पच्यमानश्च दोषैरात्मकृतैर्नरः ॥

मनुष्य अपने ही किये हुए अपराधोंके कारण जन्म-मृत्यु और जरासम्बन्धी दुःखोंसे सदा पीडित हो बारंबार संसारमें पचता रहता है ।

वनपर्व, अध्याय 209, श्लोक 33 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1459

व्याध उवाच

अवश्यं क्रियमाणस्य कर्मणो दृश्यते फलम् ।

न हि निर्वेदमागम्य किंचित् प्राप्नोति शोभनम् ॥

किये जानेवाले कर्मका फल अवश्य दृष्टिगोचर होता है । केवल खिन्न होकर बैठ रहनेसे कोई अच्छा परिणाम हाथ नहीं लगता ।

वनपर्व, अध्याय 216, श्लोक 26 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1500

मार्कण्डेय उवाच

बृहदुक्थस्तपस्यैव पुत्रो भूमिमुपाश्रितः ।

अग्निहोत्रे हूयमाने पृथिव्यां सद्भिरिज्यते ॥

इस पृथ्वीपर जब अग्निहोत्र होने लगता है, उस समय तप (पाञ्चजन्य)-के ही पुत्र बृहदुक्थ इस भूतलपर स्थित हो श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा पूजित होते हैं ।

वनपर्व, अध्याय 220, श्लोक 18 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1516
कर्मफल की निश्चितता

वैशम्पायन उवाच

ध्रुवं प्रवास्यत्यसमीरितोऽपि ।

ध्रुवं प्रजास्यत्युत गर्भिणी या ।

ध्रुवं दिनादौ रजनीप्रणाशस्तथा क्षपादौ च दिनप्रणाशः ॥

निश्चय ही बिना किसी प्रेरणाके भी हवा चलेगी ही, जो गर्भिणी है, वह समयपर अवश्य ही बच्चा जनेगी । दिनके आदिमें रजनीका नाश अवश्यम्भावी है तथा रात्रिके प्रारम्भमें दिनका भी अन्त होना निश्चित है । (इसी प्रकार पापका फल भी किसीके टाले नहीं टल सकता)

वनपर्व, अध्याय 236, श्लोक 25 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1624

वैशम्पायन उवाच

इह यत् क्रियते कर्म तत् परत्रोपयुज्यते ।

तस्माच्छरीरं युञ्जीत तपसा नियमेन च ॥

इस लोकमें जो कर्म किया जाता है, उसका फल परलोकमें भोगना पड़ता है । इसलिये अपने शरीरको तप और नियमोंके पालनमें लगावे ।

वनपर्व, अध्याय 259, श्लोक 20 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1735

देवदूत उवाच

कृतस्य कर्मणस्तत्र भुज्यते यत् फलं दिवि ।

न चान्यत् क्रियते कर्म मूलच्छेदेन भुज्यते ॥

अपने किये हुए सत्कर्मोंका जो फल होता है, वही स्वर्गमें भोगा जाता है । वहाँ कोई नया कर्म नहीं किया जाता । अपना पुण्यरूप मूलधन गँवानेसे ही वहाँके भोग प्राप्त होते हैं ।

वनपर्व, अध्याय 261, श्लोक 28 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1748

देवदूत → ब्रह्मन

इह यत् क्रियते कर्म तत् परत्रोपभुज्यते ।

कर्मभूमिरियं ब्रह्मन् फलभूमिरसौ मता ॥

इस मनुष्यलोकमें मानव शरीरद्वारा जो कर्म किया जाता है, उसीको परलोकमें भोगा जाता है । ब्रह्मन्! यह कर्मभूमि और वह फलभोगकी भूमि मानी गयी है ।

वनपर्व, अध्याय 261, श्लोक 35 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1749
काल, दैव और नियति

युधिष्ठिर उवाच

मन्ये कालश्च भगवान् दैवं च विधिनिर्मितम् ।

भवितव्यं च भूतानां यस्य नास्ति व्यतिक्रमः ॥

मेरी समझमें भगवान् काल, विधिनिर्मित दैव और समस्त प्राणियोंकी भवितव्यता अर्थात् उनके लिये होनेवाली घटना — ये तीनों ही प्रबल हैं; इनको कोई टाल नहीं सकता ।

युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय मुनि से कहा।

वनपर्व, अध्याय 273, श्लोक 6 महाभारत — खण्ड २ पृ. 1826
मिथ्या आसक्ति का परिणाम

द्रौपदी उवाच

मिथ्याभिगृध्नो हि नरः पापात्मा मोहमास्थितः ।

अयशः प्राप्नुयाद् घोरं महद् वा प्राप्नुयाद् भयम् ॥

झूठे विषयोंमें आसक्त होनेवाला पापात्मा मनुष्य मोहमें पड़कर भयंकर अपयश पाता है अथवा उसे बड़े भारी भय (मृत्यु) का सामना करना पड़ता है ।

द्रौपदी ने कीचक से कहा।

विराटपर्व, अध्याय 14, श्लोक 37 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2211 माया–संसार

भीष्म उवाच

तदैव ते हि विक्रान्तुमीषुः कौरवनन्दनाः ।

धर्मपाशनिबद्धास्तु न चेलुः क्षत्रियव्रतात् ॥

यच्चानृत इति ख्यायाद् यः स गच्छेत् पराभवम् ।

वृणुयुर्मरणं पार्था नानृतत्वं कथंचन ॥

कुरुकुलको आनन्द देनेवाले पाण्डव उसी समय पराक्रम करनेमें समर्थ थे, किंतु वे धर्मके बन्धनमें बँधे थे; इसलिये क्षत्रियव्रतसे विचलित नहीं हुए । यदि कोई अर्जुनको असत्यवादी कहेगा तो वह पराजयको प्राप्त होगा । कुन्तीके पुत्र मौतको गले लगा सकते हैं, किंतु किसी प्रकार असत्यका आश्रय नहीं ले सकते ।

विराटपर्व, अध्याय 52, श्लोक 8–9 महाभारत — खण्ड २ पृ. 2443 धर्म–आचरण